महान आत्मा बाबा मोती राम मेहरा जी का बलिदान
दिसंबर 1704, आनंदपुर साहिब की धरती पर कई महीनों से संघर्ष चल रहा था. गुरु गोविन्द सिंह जी और उनके साथियों ने विशाल मुगल सेना का सामना किया था. घेराबंदी लंबी होती जा रही थी. किले के भीतर रसद कम हो रही थी, आखिरकार परिस्थितियाँ ऐसी बनीं कि गुरु गोविन्द सिंह जी को आनंदपुर साहिब छोड़ना पड़ा.
सिरसा नदी के पास परिवार बिछुड़ गया. इसी उथल-पुथल में माता गुजरी जी अपने दो छोटे पौत्रों—साहिबजादा बाबा जोरावर सिंह जी और साहिबजादा बाबा फतेह सिंह जी—के साथ अलग हो गईं. परिस्थितियों ने उन्हें एक ऐसे व्यक्ति के घर पहुँचा दिया, जिस पर उन्होंने भरोसा किया था.
माता गुजरी जी और दोनों छोटे साहिबजादे अंततः सरहिंद के सूबेदार वजीर खान के कब्जे में पहुँच गए. उन्हें सरहिंद के प्रसिद्ध ठंडे बुर्ज में कैद कर दिया गया. सर्दियों की कड़कड़ाती रातें थीं. नन्हे साहिबजादों के सामने कोई आराम नहीं था. उनकी दादी माता गुजरी जी स्वयं वृद्ध थीं, लेकिन उनके हौसले में कोई कमी नहीं थी.
दूसरी ओर सत्ता को उम्मीद थी कि डर, भूख, ठंड और लालच के सामने ये बच्चे टूट जाएंगे. लेकिन वे यह भूल गए थे कि ये बच्चे किस घर में पैदा हुए थे. वे गुरु गोविन्द सिंह जी के पुत्र और गुरु तेगबहादुर जी के पौत्र थे.
उनसे कहा गया कि यदि वे अपना धर्म छोड़कर इस्लाम स्वीकार कर लें तो उन्हें सम्मान मिलेगा, धन मिलेगा और राजसी जीवन मिलेगा. लेकिन दोनों बालकों ने इन प्रस्तावों को ठुकरा दिया.
इतनी छोटी उम्र में भी उनके चेहरे पर भय नहीं था. उनकी दृढ़ता देखकर सत्ता का अहंकार और क्रोध बढ़ता गया. उसी समय सरहिंद में एक ऐसा व्यक्ति था, जिसका नाम इतिहास में हमेशा के लिए अमर होने वाला था. उसका नाम था—बाबा मोती राम मेहरा.
मोती राम मेहरा सरहिंद में रसोई से जुड़े कार्य में थे और हिंदू बंदियों तथा आने-जाने वाले लोगों की सेवा कार्य से भी उनका संबंध था. उनके पिता का नाम हरिया राम और माता का नाम भोली था.
उन्हें पता चला कि गुरु गोविन्द सिंह जी की वृद्ध माता और दो छोटे बच्चे ठंडे बुर्ज में कैद हैं. उन्हें यह भी मालूम था कि बंदियों को भोजन-पानी उपलब्ध कराने पर कठोर सजा का आदेश था. यह जानकार उस महान आत्मा का हृदय करूणा से भर गया.
मोती राम मेहरा के मन में एक सवाल उठ रहा था—“क्या मैं गुरु के परिवार को भूखा-प्यासा देखकर चुप रह सकता हूँ?” वह घर पहुँचे और उन्होंने अपनी माता और पत्नी को सारी बात बताई और कहा कि मैं कैसे गुरु परिवार की मदद कर सकता हूँ.
घरवालों को भी पता था कि गुरु परिवार की कोई भी मदद करना उनको खतरे में डाल सकता है, लेकिन उन सबने मिलकर निश्चय किया कि उनसे जो भी संभव होगा वह करेंगे. मोती राम मेहरा ने निश्चय कर लिया कि वे किसी भी कीमत पर माता गुजरी जी और छोटे साहिबजादों तक दूध पहुँचाएँगे.
उनके परिवार ने भी उनका साथ दिया. उनकी पत्नी ने उन्हें अपने आभूषण और पैसे दिए ताकि पहरेदारों को प्रसन्न करके ठंडे बुर्ज तक पहुँचा जा सके. अब शुरू हुई वह सेवा, जिसने मोती राम मेहरा का नाम इतिहास में अमर कर दिया.
पहली रात
हाथ में दूध था. सामने मुगल पहरेदार थे. हर कदम पर खतरा था. अगर पकड़े जाते तो मृत्यु निश्चित थी. एक सिपाही को कुछ धन देकर वे किसी तरह ठंडे बुर्ज तक पहुँचे. वहाँ उन्होंने माता गुजरी जी और दोनों छोटे साहिबजादों को दूध पहुँचाया. कल्पना कीजिए उस दृश्य की—बाहर कड़ाके की ठंड. बुर्ज में वृद्ध दादी और दो छोटे बच्चे.
फिर एक व्यक्ति चुपचाप उनके लिए गर्म दूध लेकर पहुँचता है. उस व्यक्ति के हाथ में केवल गर्म दूध नहीं था बल्कि वह उस महान आत्मा के हाथों में मानवता की गर्माहट था.
दूसरी रात
मोती राम मेहरा फिर पहुँचे. उन्हें पता था कि पहली बार बच जाना इस बात की गारंटी नहीं है कि दूसरी बार भी बच जाएँगे. फिर भी वे गए. उन्होंने फिर माता गुजरी जी और साहिबजादों की सेवा की. और फिर लौट आए.
तीसरी रात
अब खतरा और बड़ा था. लेकिन उनका संकल्प उससे भी बड़ा था. वह तीसरी रात भी दूध लेकर पहुँचे. इस प्रकार लगातार तीन रातों तक उन्होंने माता गुजरी जी और दोनों छोटे साहिबजादों की सेवा की.
किसी ने वजीर खान को बता दिया कि उसके ही अधीन काम करने वाला एक व्यक्ति उन कैदियों को दूध पिला रहा है. वजीर खान को जब पता चला कि उसके आदेश की अवहेलना करके किसी ने गुरु के परिवार की सेवा की है, तो उसने मोती राम मेहरा और उनके परिवार को गिरफ्तार करने का आदेश दिया.
मोती राम मेहरा को दरबार में लाया गया. अब मोती राम मेहरा के सामने मौत खड़ी थी.
उनके सामने सवाल था—“तुमने ऐसा क्यों किया?”
मोती राम मेहरा ने अपने कर्म को छिपाने की कोशिश नहीं की. उन्होंने अपराधी की तरह सिर नहीं झुकाया. उन्होंने कहा कि - भूखे और प्यासे बच्चों तथा उनकी वृद्ध दादी की सेवा करना कोई अपराध नहीं, बल्कि मनुष्य और धर्म का कर्तव्य है.
यही बात उनके बलिदान को और महान बनाती है. वह चाहते तो कह सकते थे कि उन्होंने कुछ नहीं किया. वह चाहते तो अपने परिवार को बचाने के लिए माफी माँग सकते थे. लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया. उन्होंने गुरु परिवार की सेवा करने की बात को स्वीकार किया. और उसके परिणाम को भी स्वीकार किया.
जालिम बजीर खान ने उन्हें अत्यंत कठोर सजा सुनाई. उसने उनके परिवार को भी नहीं छोड़ा. ऐतिहासिक और धार्मिक परंपराओं में वर्णित है कि बाबा मोती राम मेहरा और उनके परिवार को कोल्हू में पेरकर शहीद किया गया.
मोतीराम मेहरा की आखों के सामने पहले उसके बच्चे को, फिर उनकी माँ को, फिर उसकी पत्नी को कोल्हू में परा गया और उसके बाद मोती राम मेहरा को भी कोल्हू में पेर कर शहीद कर दिया गया.
लेकिन वह मौत उसकी हार नहीं थी. वह उसकी जीत थी. क्योंकि अत्याचार करने वाला शासक अपनी ताकत के बावजूद आज इतिहास में सम्मान का पात्र नहीं है. लेकिन एक साधारण सेवक—मोती राम मेहरा—आज भी श्रद्धा से याद किए जाते हैं.
उनकी महानता केवल इस बात में नहीं थी कि उन्होंने दूध पिलाया बल्कि उनकी महानता इस बात में थी कि उन्होंने जानते-बूझते हुए खतरा उठाया. उन्हें पता था कि सामने मुगल सत्ता है. उन्हें पता था कि राजा के आदेश की अवहेलना करने का अर्थ मृत्यु हो सकता है.
लेकिन उनकी अंतरात्मा ने कहा - मैं उन बच्चों को ठंड में भूखा-प्यासा मरने के लिए नहीं छोड़ सकता. उनकी इसी मानवता की भावना ने उन्हें इतिहास में अमर कर गया. आज जब हम गुरु परिवार के बलिदान की बात करते हैं तो उनके साथ महान आत्मा मोती राम मेहरा जी और उनके परिवार को भी पूरी श्रद्धा से याद किया जाता है.
उनकी कहानी हमें बताती है कि इतिहास केवल राजाओं और सेनापतियों से नहीं बनता. कभी-कभी इतिहास का सबसे उज्ज्वल पन्ना एक ऐसे सामान्य व्यक्ति के नाम लिखा जाता है जिसके हाथ में तलवार नहीं होती है बल्कि मात्र एक दूध का पात्र होता है.
मोती राम मेहरा के हाथ में भी तलवार नहीं थी. उनके पास कोई सेना नहीं थी. उनके पास कोई किला नहीं था. उनके पास कोई सत्ता नहीं थी. उनके पास था - सेवा का भाव. और वही सेवा अंततः उनका सबसे बड़ा हथियार बन गई.
आज भी दिसंबर माह के शहीदी सप्ताह में, महान आत्मा मोती राम मेहरा जी की याद में जगह-जगह दूध के लंगर लगाए जाते हैं. मोती राम मेहरा जी का बलिदान याद दिलाता है कि कि किसी भूखे को भोजन देना, किसी प्यासे को पानी देना, किसी पीड़ित की सहायता करना और संकट में पड़े निर्दोष मनुष्य के साथ खड़ा होना ही मानवता का धर्म है.
बाबा मोती राम मेहरा ने यही धर्म निभाया. उन्होंने यह नहीं सोचा कि उनकी सहायता का राजनीतिक परिणाम क्या होगा. उन्होंने केवल इतना देखा—दो छोटे बच्चे ठंड में कैद हैं और उनकी वृद्ध दादी उनके साथ हैं.
उनकी कहानी केवल सिख इतिहास की कहानी नहीं है बल्कि यह भारतीय इतिहास में मानवता, निष्ठा और बलिदान की कहानी है. जब-जब छोटे साहिबजादों की शहादत को याद किया जाएगा, जब-जब माता गुजरी जी की तपस्या को याद किया जाएगा, तब-तब उस व्यक्ति को भी याद किया जाना चाहिए जिसने उन कठिनतम रातों में उनके लिए दूध पहुँचाने का साहस किया था—
अमर शहीद बाबा मोती राम मेहरा जी की जय.
बाबा मोती राम मेहरा जी और उनके परिवार की शहादत को शत-शत नमन.
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