Wednesday, 1 January 2025
बीबी अनूप कौर का बलिदान
बीबी अनूप कौर का जन्म 1690 में अमृतसर के पास जलोपुर खेरे गाँव में हुआ था. उनके पिता का नाम लच्छमन दास सोढ़ी था. उन दिनों सोढ़ी समुदाय दो विरोधी गुटों में बँटा हुआ था. एक गुट त्यागमल (गुरु तेग बहादुर) को गुरु पद के लिए समर्थन दे रहा था, जबकि दूसरा गुट उनके भतीजे धीर मल ( बाबा गुरदित्ताजी के पुत्र) को नौवां गुरु बनाना चाहता था.
सोढ़ी वंश के कई सदस्य, जैसे लच्छमन दास, जो गुरु तेग बहादुर के समर्थक थे, दैनिक कलह और संघर्ष से बचने के लिए मध्य पंजाब छोड़कर आनंदपुर में बस गए. अनुप कौर केवल पाँच वर्ष की थीं जब उनके माता-पिता आनंदपुर चले गए. वह हमेशा खुश रहने वाली और सुंदर लड़की थीं. वह साहिबजादों के साथ खेलती थीं और माता सुंदरी उन्हें बहुत पसंद करती थीं.
अनुप कौर अपना अधिकांश समय साहिबजादों के साथ बिताती थीं और उन्हें गुरु परिवार के सदस्य की तरह माना जाता था. उन्होंने उनके साथ रहकर धार्मिक शिक्षा प्राप्त की और गुरमुखी पढ़ना-लिखना सीखा. उन्होंने तलवारबाजी और अन्य युद्ध कलाएं भी सीखना शुरू किया. वे तलवार, ढाल और भाले जैसे हथियारों का भी इस्तेमाल करती थीं और घुड़सवारी भी करती थीं,
जब मुग़ल सेना ने आनंदपुर साहब के किले को घेर लिया तब उन्होंने गुरु के परिवार के महिला सदस्यों की देखभाल करने का दायित्व संभाला. जब 20 दिसंबर 1704 की बरसाती रात को गुरु गोविन्द सिंह ने आनंदपुर खाली कर दिया, उस समय गुरु परिवार के सदस्यों की सुरक्षा का दायित्व अनुप कौर के दल ने ले लिया. किले के बाहर सिखों पर हमला हो गया.
अनुप कौर के नेतृत्व में सिख सैनिक और स्त्रियाँ शत्रु से लड़ते हुए सिरसा नदी की ओर बढ़ते रहे. बाढ़ग्रस्त सिरसा नदी पार करते समय अनुप कौर गुरु के परिवार से बिछड़ गईं. नदी पार करने के बाद, उनकी मुलाकात पाँच सिख सैनिकों से हुई, जिन्होंने उन्हें बताया कि गुरु गोविंद सिंह ने चमकौर में मुगल सेना से युद्ध किया था, जिसमें दो बड़े साहिबजादे लड़ते हुए शहीद हो गए हैं.
उन्हें यह भी बताया गया कि छोटे साहिबजादों को सिरहंद में गिरफ्तार कर लिया गया था. वे सभी सिरहंद की ओर चल पड़े, लेकिन रास्ते में मोरिंडा के पास उनकी मुलाकात मुगल सैनिकों के गश्ती दल से हुई. उनसे हुई लड़ाई में दो सिख सैनिक शहीद हो गए. उसके बाद मलेरकोटला के सैनिको के साथ हुई मुठभेड़ में वे दो सिक्ख भी शहीद हो गए और अनूप कौर भी घायल हो गई.
मुग़ल सैनिको ने बीबी अनूप कौर को बंदी बना लिया और उन्हें मलेरकोटला के नबाब शेर मोहम्मद खान के सामने प्रस्तुत कर दिया. बीबी अनूप कौर की सुंदरता को देखकर शेर मोहम्मद खान ने मोहित हो गया. जिस तरह सीता माता को देखकर रावण रावण सबकुछ भूलकर उनसे विवाह की याचना करने लगा था बैसे ही शेर मोहम्मद खान भी बीबी अनूप कौर से कहने लगा कि - धर्म परिवर्तन कर लें और उससे निकाह कर लें.
उसने उनको तरह तरह के लालच दिए और धमकाया लेकिन बीबी अनूप कौर ने उसकी बात मानने से इंकार कर दिया. तब नबाब ने उन्हें अपने हरम के एक कमरे में कैद कर दिया. तब मजबूर होकर बीबी अनूप कौर ने नबाब से कहा कि अगर वह किसी तरह गुरु साहब के छोटे साहबजादो की जान बचा दे तो वह उसकी हर बात मान लेगी.
अगले दिन सरहिंद के नबाब बजीर खान की कचेहरी में छोटे साहब जाड़ों पर चर्चा होते समय नबाब शेर मोहम्मद खान ने कहा कि हमारी दुश्मनी इनके पिता से है, इनसे नहीं. इसलिए इन्हे मौत की सजा न दी जाए. परन्तु उसकी बात नहीं मानी गई और दोनों छोटे साहबजादों को जिन्दा दीवार में चुनवा दिया गया. इस खबर को सुनकर अनूप कौर को बहुत दुःख हुआ.
तब मौका पाकर बीबी अनूप कौर ने अपने सीने में खंजर मारकर आत्महत्या कर ली. नबाब ने इसे अपनी शिकस्त मानते हुए, उनके पार्थिव शरीर को मुस्लिमों की तरह कब्रिस्तान में दफना दिया. कुछ बर्ष बाद बाबा बन्दा बहादुर ने पंजाब पर हमला किया और चप्पड़ चिड़ी की जंग में सरहन्द के नबाब बजीर खान को मार गिराया और सरहिंद पर अपना अधिकार कर लिया
उसके बाद बन्दा बहादुर ने मलेरकोटला पर हमलाकर मलेरकोटला को भी जीत लिया. प्रोफेसर गंडा सिंह अपने शोध के आधार पर लिखते हैं कि लड़ाई में बन्दा बहादुर का साथ देने वाले भाई आली सिंह और भाई माली सिंह ने बन्दा बहादुर को बीबी अनूप कौर के बलिदान के बारे में बयाया, तो बन्दा बहादुर का हृदय बीबी अनूप कौर के लिए श्रद्धा से भर गया.
उन्होंने अपने साथियों से कहा कि - हम उस महान देवी के लिए कुछ और तो नहीं कर सकते लेकिन बीबी अनूप कौर का पार्थिव शरीर कब्र से निकालकर उनका दाह संस्कार अवश्य करेंगे. उन्होंने कब्रिस्तान को खुदवाकर बीबी अनूप कौर के पार्थिव शरीर के अबशेषों को निकाला और सिक्खी रीति रिवाज के उनका विधिवत अग्नि संस्कार किया.
बन्दा बहादुर के इसी कार्य को उनके आलोचक इतिहासकारों ने लिखा है कि - बन्दा बहादुर मुसलमानो की कब्रों को खोदकर मुसलमानो के शव आग में जलाकर उनकी बेअदवी करता था, जबकि वास्तविकता ये हैं कि - उन्होंने केवल बीबी अनूप कपूर की ही कब्र ही खुदबाकर उनके अबशेषों का अग्नि संस्कार किया था.
बीबी अनूप कपूर अमर रहे, बन्दा बहादुर अमर रहें,
भारत माता की जय, वन्देमातरम
भारत का राष्ट्रीय कैलेंडर एवं डा. मेघनाथ साहा / नेहरू विवाद
भारत में डा. मेघनाथ साहा नाम के एक बड़े खगोल वैज्ञानिक हुए हैं. उन्होंने विभिन्न कैलेंडर्स और पंचांग आदि का अध्यन किया था. उन्होंने 1939 में एक लेख लिखा था ‘भारतीय कैलेंडर में सुधार की आवश्यकता’. आजादी से पहले भी उनके नेहरू जी से बहुत अच्छे समबन्ध थे. जब देश आजाद हुआ तो उन्होंने नेहरू जी को नए कलेण्डर के बारे में सुझाव दिया.
उनका प्रस्ताव प्रधानमंत्री नेहरू जी को भी पसंद आया लेकिन यह एक कठिन काम था क्योंकि कैलेंडर के साथ धर्म और स्थानीय भावनाएं भी जुड़ी हुई थीं. इसी बीच 1952 में डाक्टर मेघनाथ साहा चुनाव जीतकर संसद सदस्य भी बन गए. 1952 में नेहरू सरकार ने कैलेंडर रिफॉर्म कमेटी बनाई और डा. मेघनाथ साहा को इसका अध्यक्ष नियुक्त किया.
समिति ने देश के अलग-अलग हिस्सों में प्रचलित विभिन्न 30 कैलेंडरों का गहराई से अध्ययन किया और 1954 में अपनी सिफारिशें रखी, जिनमें से कुछ इस प्रकार थीं. महीनो के नाम हिन्दू कैलेण्डर वाले हों लेकिन साल में दिन अंग्रेजी कैलेण्डर की तरह 365 / 366 ही हों. दिन रात सामान होने वाला 22 मार्च साल का पहला दिन हो (लीप ईयर में 21 मार्च पहला दिन हो).
एक सिफारिस यह भी की गई कि इस कैलेंडर में साल के पहले 6 महीने 31 दिन के और बाद के 6 महीने 30 दिन के हों, तो लोगों को यह याद करने में सुविधा होगी कि कौन सा महीना 31 दिन का है और कौन सा 30 दिन का. इस प्रकार उन्होंने भारतीय और अंग्रेजी कैलेंडर का समावेश कर एक नया कैलण्डर तैयार किया जो तकनीकी रूप से वास्तव में काफी अच्छा है.
1955 में एकीकृत राष्ट्रीय नागरिक कैलेंडर तैयार हो गया. नेहरू जी ने इसकी प्रस्तावना में लिखा था : पुराने कैलेंडर देश में विभाजन का प्रतिनिधित्व करते हैं. अब जबकि हमने स्वतंत्रता प्राप्त कर ली है, यह स्पष्ट रूप से वांछनीय है कि हमारे देश में नागरिक, सामाजिक और अन्य उद्देश्यों के लिए कैलेंडर में भी एक निश्चित एकरूपता होनी चाहिए.
अब समस्या यह आई कि इस कैलेंडर का प्रारम्भ कब से माना जाए और इसे नाम क्या दिया जाए. कहा जाता है कि नेहरू जी इस कैलेण्डर द्वारा अपने आपको विक्रमादित्य, ईसा मसीह, शालिवाहन, आदि की तरह अमर बनाना चाहते थे और इसे नेहरू सम्वत नाम देना चाहते थे साथ ही चाहते थे इसे अपने जन्म वाले बर्ष से प्रारम्भ करना चाहते थे.
इसी बात को लेकर डा. मेघनाथ साहा और प्रधानमंत्री नेहरू में विवाद हो गया क्योंकि डा. मेघनाथ साहा चाहते थे इसे युधिष्ठिर सम्वत से शुरू किया जाए. विवाद होने पर नेहरू जी ने प्रस्ताव रखा कि आजादी का बर्ष 1947 प्रथम बर्ष हो और बर्ष का नाम "विक्रम सम्वत" की तरह "नेहरू सम्वत" हो. इस बात के लिए मेघनाथ साहा बिलकुल तैयार नहीं थे.
इस विवाद के कारण कैलेंडर जारी करने का काम रुक गया. 26 जनवरी 1956 के एक कार्यक्रम में नेहरू जी ने बिना तारीख बताये शीघ्र ही नया कैलेण्डर जारी होने की घोषणा भी कर दी. डा. मेघनाथ साहा इस बात से भी नाराज हुए. कहा जाता है कि समिति के अन्य सदस्यों द्वारा भी डा. मेघनाथ साहा पर दबाव डाला गया परन्तु वे "नेहरू सम्वत" पर नहीं माने.
तभी अचानक खबर आई कि 16 फरवरी 1956 को अचानक हृदयाघात पड़ने से 62 बर्ष की आयु में डा. मेघनाथ साहा का देहांत हो गया. उस समय वे राष्ट्रपति भवन में स्तिथ योजना आयोग के कार्यालय जा रहे थे. यह भी कहा जाता है कि वे उस समय कैलेंडर से सम्बंधित सारे दस्तावेज लेकर राष्ट्रपति डा. राजेंद्र प्रसाद को सौंपने जा रहे थे.
डा. मेघनाथ साहा के अचानक निधन से नया कैलेंडर लागू करने का कार्यक्रम टल गया और आधिकारिक तौर पर इसका उपयोग 22 मार्च 1957 को शुरू हुआ और इसे शक सम्वत से जोड़ दिया गया. अर्थात 22 मार्च 1957 को 1 चैत्र 1879 शक संवत माना गया. आज ये राष्ट्रीय कैलेण्डर है लेकिन राष्ट्र में शायद ही कोई होगा जो इसको मानता होगा.
इसके साथ सबसे बड़ी दुविधा यह है कि इसमें बर्ष को शक सम्वत नाम दिया है जबकि शक संवत पर आधारित कैलेंडर पहले से ही मौजूद है जिसमे पूर्णमासी के बाद महीना बदलता है, जिससे भ्रम की स्थिति पैदा हो जाती है. इस कैलेंडर को आम जनता के बीच स्वीकृति नहीं मिली और वर्तमान में इसका उपयोग केवल सरकारी कार्यालयों तक ही सीमित है.
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