Tuesday, 7 July 2026

माँ गंगा का धरती पर अवतरण

भारतीय धर्मग्रंथों के अनुसार त्रेता युग में भगवान विष्णु ने पहली बार मानव के रूप में वामन अवतार लिया था. उस समय महान असुर राजा वलि ने तीनों लोकों पर अपना अधिकार कर लिया था. सभी छोटे बड़े राजाओं को उसने अपना बंदी बना लिया था. राजा वलि ने स्वर्गलोक पर भी अधिकार कर लिया और इंद्र को वहां से निकाल दिया था.

राजा बली असुर थे लेकिन वे महान हरिभक्त "प्रह्लाद" के पौत्र थे, इस कारण भगवान् विष्णु भी उनका कोई अहित नहीं करना चाहते थे. तब भगवान् विष्णु ने वामन अवतार धारण करके राजा वलि से दान में सब कुछ मांगकर इंद्र एवं अन्य राजाओं को वापस किया था. साथ ही भगवान् विष्णु ने राजा बलि को चिरंजीवी रहने का वरदान दिया
भारतीय ग्रंथो के अनुसार, उसी समय भगवान् ब्रह्मा जी ने, भगवान् वामन के चरणों को धोकर उस जल को अपने कमंडल में रख लिया था. इसी जल से पवित्र गंगा नदी का जन्म हुआ. कालांतर में भागीरथ कड़ी तपस्या के बाद गंगा को धरती पर लेकर आये.
गंगा के अवतरण की भी एक रोचक कथा है. त्रेता युग में पृथ्वीलोक पर राजा "सगर" का शासन था. अपने श्रेष्ठ कर्मों की वजह से उनकी कीर्ति तीनों लोक में पहुँच चुकी थी. उन्होंने अश्वमेघ यज्ञ का आयोजन किया, जिसके कारण देवताओं के राजा इंद्र को अपनी गद्दी हिलती दिख रही थी. इंद्र ने वह अश्व चुरा कर कपिल मुनि के आश्रम के पास छोड़ दिया.
इंद्र की चाल से अनजान कपिल मुनि झूठे आरोप से क्रोधित हो गए और उन्होंने राजा सागर के सभी पुत्रों (सैनिको) को अपने तपोवल से भस्म कर दिया और उन्हें पाताल लोक में भेज दिया. जब कपिल मुनि को असल बात पता चली तो वे अपना श्राप वापस तो नहीं ले सकते थे पर उन्होंने राजा सागर के पुत्रों को मोक्ष दिलाने का उपाय बताया.
उन्होंने कहा - अगर ब्रह्मा जी के कमंडल में बिराजमान माता गंगा धरती पर उतरकर, राजा सगर के पुत्रों की अस्थियों को स्पर्श कर लेती हैं तो वे मोक्ष प्राप्त कर स्वर्ग लोक को चले जाएंगे. राजा सगर के पौत्र अंशुमान ने इसके लिए तपस्या प्रारम्भ की परन्तु उनको सफलता नहीं मिली. अंशुमान के बाद उनके पुत्र दिलीप ने तप किया परन्तु उनको भी सफलता नहीं मिली
राजा दिलीप के बाद उनके पुत्र भागीरथ ने तपस्या की. उनके तप से ब्रह्माजी प्रसन्न हुए. भागीरथ ने माँ गंगा को धरती पर छोड़ने की प्रार्थना की. तब माँ गंगा ने कहा कि- मैं तुम्हारी बात मानकर पृथ्वी पर अवश्य आउँगी, किन्तु मेरे वेग को भगवान शिव के अतिरिक्त और कोई सहन नहीं कर सकता. इसलिये तुम पहले भगवान शिव को प्रसन्न करो.
तब भगीरथ ने भगवान शिव की घोर तपस्या की और उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर शिव जी हिमालय के शिखर पर खड़े हो गये। गंगा जी स्वर्ग से सीधे शिव जी की जटाओं पर जा गिरीं। इसके बाद वे भगीरथ के पीछे चलते हए समुद्र में समां गईं. भगीरथ के पूर्वजों का उद्धार हो गया और अगस्त्य मुनि द्वारा सोखे हुये समुद्र में फिर से जल भर गया.
इस कहानी पर विश्व के बड़े वैज्ञानिक भी शोध कर रहे हैं. कुछ वैज्ञानिकों ने समुद्र मंथन, गंगा अवतरण और भागीरथ की कहानी को जोड़ते हुए कुछ निष्कर्ष भी निकाले है. उनका कहना था कि - यमुना और सरस्वती हिमालय से निकलने वाली प्राचीन नदियां थी. इन नदियों में जल की कमी हो जाने के बाद ही गंगा के जल को लाने का प्रयास किया गया था.
यमुना नदी हिमालय से निकलकर पूर्व दिशा में दिल्ली, मथुरा, प्रयाग, पटना, आदि होते हुए बंगाल की खाड़ी में गिरती थी तथा सरस्वती नदी कुरुक्षेत्र, पेहोवा, सिरसा, कालीबंगा, होते हुए अरब सागर में मिलती थी. कालांतर में दोनों नदियों में पानी कम हो गया और इन नदियों के किनारे रहने वाले लोग मरने लगे. तब गंगा को लाने के लिए प्रयास किया गया.
पूर्व के निवाशियों (देवताओं) ने हिमालय से नहर निकालकर गंगा को लाने का निर्णय लिया और इसके लिए तपस्या ( परिश्रम) करने में जुट गए. परन्तु दो पीढ़ी (राजा अंशुमान एवं राजा दिलीप) तक इसमें सफलता न मिल सकी तब तीसरी पीढ़ी के भागीरथ ने पश्चिम क्षेत्र की राक्षस जाति के साथ मिलकर एक साथ प्रयास करने का निर्णय किया
उनके द्वारा तय किया गया कि गंगा के जल को यमुना और सरस्वती दोनों में पहुँचाया जाएगा. इसके लिए जो पहाड़ काटने का काम किया गया वही समुद्र मंथन था. इसमें राक्षसों के साथ धोखा हुआ. जब कोई आख़िरी पहाड़ काटा जा रहा था तब देवताओं ने ऐसी चालाकी की कि - गंगा का सारा जल यमुना में चला गया और सरस्वति नदी को पानी नहीं मिला।
गंगा ऋषिकेश, हरिद्वार, कान्हापुर होते हुए "प्रयाग" में यमुना से जा मिली। उसके बाद यमुना में होते हुए गंगा, सागर तक पहुँच गया. ऐसा होने से गंगा के मैदान तो हरे भरे हो गए लेकिन सरस्वति घाटी सभ्यता बिना पानी के विलुप्त होती चली गई. बाद में देवताओं हुए राक्षसो के झगडे को ख़त्म करते हुए सरस्वति घाटी वालों को भी गंगा के किनारे जगह दी गई.
साथ ही सारस्वत लोगों की भावना को तुष्ट करने के लिए घोषणा कर दी गई कि - सरस्वति नदी भी अदृश्य धारा के रूप में प्रयाग में मिल गई है. इस प्रकार गंगा और यमुना के संगम को अदृष्ट सरस्वति का संगम घोषित कर दिया गया. हालांकि इस शोध में कई बातों में बिरोधाभास है यह शोध कई अन्य शोधार्थियों के लिए प्रेरणा देने का काम तो कर ही सकता है