भारतीय धर्मग्रंथों के अनुसार त्रेता युग में भगवान विष्णु ने पहली बार मानव के रूप में वामन अवतार लिया था. उस समय महान असुर राजा वलि ने तीनों लोकों पर अपना अधिकार कर लिया था. सभी छोटे बड़े राजाओं को उसने अपना बंदी बना लिया था. राजा वलि ने स्वर्गलोक पर भी अधिकार कर लिया और इंद्र को वहां से निकाल दिया था. राजा बली असुर थे लेकिन वे महान हरिभक्त "प्रह्लाद" के पौत्र थे, इस कारण भगवान् विष्णु भी उनका कोई अहित नहीं करना चाहते थे. तब भगवान् विष्णु ने वामन अवतार धारण करके राजा वलि से दान में सब कुछ मांगकर इंद्र एवं अन्य राजाओं को वापस किया था. साथ ही भगवान् विष्णु ने राजा बलि को चिरंजीवी रहने का वरदान दिया भारतीय ग्रंथो के अनुसार, उसी समय भगवान् ब्रह्मा जी ने, भगवान् वामन के चरणों को धोकर उस जल को अपने कमंडल में रख लिया था. इसी पवित्र जल से पवित्र गंगा नदी का जन्म हुआ. कालांतर में भागीरथ कड़ी तपस्या के बाद गंगा को धरती पर लेकर आये. गंगा के अवतरण की भी एक रोचक कथा है. त्रेता युग में पृथ्वीलोक पर राजा "सगर" का शासन था. उनकी राजधानी अयोध्या थी. अपने श्रेष्ठ कर्मों की वजह से उनकी कीर्ति तीनों लोक में पहुँच चुकी थी. उन्होंने अश्वमेघ यज्ञ का आयोजन किया, जिसके कारण देवताओं के राजा इंद्र को अपनी गद्दी हिलती दिख रही थी. इंद्र ने वह अश्व चुरा कर कपिल मुनि के आश्रम के पास छोड़ दिया. इंद्र की चाल से अनजान कपिल मुनि झूठे आरोप से क्रोधित हो गए और उन्होंने राजा सगर के सभी पुत्रों (सैनिको) को अपने तपोवल से भस्म कर दिया और उन्हें पाताल लोक में भेज दिया. जब कपिल मुनि को असल बात पता चली तो वे अपना श्राप वापस तो नहीं ले सकते थे पर उन्होंने राजा सगर के पुत्रों को मोक्ष दिलाने का उपाय बताया. उन्होंने कहा - अगर ब्रह्मा जी के कमंडल में बिराजमान माता गंगा धरती पर उतरकर, राजा सगर के पुत्रों की अस्थियों को स्पर्श कर लेती हैं तो वे मोक्ष प्राप्त कर स्वर्ग लोक को चले जाएंगे. राजा सगर के पौत्र अंशुमान ने गंगा को लाने का जिम्मा लिया. वे हिमालय पर चले गए और गंगा को धरती पर कैसे लाया जाय इसका प्रयास करने लगे. उनको अपने प्रयास में सफलता नहीं मिली. फिर उनके पुत्र दिलीप ने अभियान शुरू किया। उन्होंने वर्तमान दिल्ली में यमुना किनारे अपना वेस कैम्प बनाया और हिमालय के गोमुख ग्लेशियर से गंगा को दिल्ली लाकर यमुना में मिलाने का कठिन कार्य करने लगे. उन्होंने अयोध्या को लगभग छोड़ दिया और इसी बेसकैम्प को अपनी राजधानी बना लिया। महाराजा दिलीप के नाम पर ही यह क्षेत्र दिल्ली कहलाने लगा। महाराजा दिलीप को भी इस कार्य में सफलता नहीं मिली। महाराजा दिलीप के बाद उनके पुत्र भागीरथ ने गंगा को लाने का प्रयास प्रारम्भ किया। लेकिन उन्होंने दिल्ली के बजाये वर्तमान हरिद्वार को अपना बेसकैम्प बनाया। ब्रह्मा और शिव के आशीर्वाद से भागीरथ को अपने प्रयास में सफलता मिली। गोमुख से गंगा को निकालकर पर्वतीय इलाकों से गंगा को हरिद्वार के मैदान में ले आये. इसके बाद वे भगीरथ के पीछे चलते हए कान्हापुर होते हुए वे प्रयागराज में यमुना में मिल गईं. प्रयाग के बाद यमुना भी गंगा हो गईं. और आगे जाकर गंगा सागर में समुद्र में समां गईं. भगीरथ के पूर्वजों का उद्धार हो गया और अगस्त्य मुनि द्वारा सोखे हुये समुद्र में फिर से जल भर गया. इस कहानी पर विश्व के बड़े वैज्ञानिक भी शोध कर रहे हैं. कुछ वैज्ञानिकों ने समुद्र मंथन, गंगा अवतरण और भागीरथ की कहानी को जोड़ते हुए कुछ निष्कर्ष भी निकाले है. उनका कहना था कि - यमुना और सरस्वती हिमालय से निकलने वाली प्राचीन नदियां थी. इन नदियों में जल की कमी हो जाने के बाद ही गंगा के जल को लाने का प्रयास किया गया था. यमुना नदी हिमालय से निकलकर पूर्व दिशा में दिल्ली, मथुरा, प्रयाग, पटना, आदि होते हुए बंगाल की खाड़ी में गिरती थी तथा सरस्वती नदी कुरुक्षेत्र, पेहोवा, सिरसा, कालीबंगा, होते हुए अरब सागर में मिलती थी. कालांतर में दोनों नदियों में पानी कम हो गया और इन नदियों के किनारे रहने वाले लोग मरने लगे. तब गंगा को लाने के लिए प्रयास किया गया. पूर्व के निवाशियों (देवताओं) ने हिमालय से नहर निकालकर गंगा को लाने का निर्णय लिया और इसके लिए तपस्या ( परिश्रम) करने में जुट गए. परन्तु दो पीढ़ी (राजा अंशुमान एवं राजा दिलीप) तक इसमें सफलता न मिल सकी तब तीसरी पीढ़ी के भागीरथ ने पश्चिम क्षेत्र की राक्षस जाति के साथ मिलकर एक साथ प्रयास करने का निर्णय किया उनके द्वारा तय किया गया कि गंगा के जल को यमुना और सरस्वती दोनों में पहुँचाया जाएगा. इसके लिए जो पहाड़ काटने का काम किया गया वही समुद्र मंथन था. इसमें राक्षसों के साथ धोखा हुआ. जब कोई आख़िरी पहाड़ काटा जा रहा था तब देवताओं ने ऐसी चालाकी की कि - गंगा का सारा जल यमुना में चला गया और सरस्वति नदी को पानी नहीं मिला। गंगा. ऋषिकेश, हरिद्वार, कान्हापुर होते हुए "प्रयाग" में यमुना से जा मिली। उसके बाद यमुना में होते हुए गंगा, सागर तक पहुँच गया. ऐसा होने से गंगा के मैदान तो हरे भरे हो गए लेकिन सरस्वति घाटी सभ्यता बिना पानी के विलुप्त होती चली गई. बाद में देवताओं हुए राक्षसो के झगडे को ख़त्म करते हुए सरस्वति घाटी वालों को भी गंगा के किनारे जगह दी गई. साथ ही सारस्वत लोगों की भावना को तुष्ट करने के लिए घोषणा कर दी गई कि - सरस्वति नदी भी अदृश्य धारा के रूप में प्रयाग में मिल गई है. इस प्रकार गंगा और यमुना के संगम को अदृष्ट सरस्वति का संगम घोषित कर दिया गया. हालांकि इस शोध में कई बातों में बिरोधाभास है यह शोध कई अन्य शोधार्थियों के लिए प्रेरणा देने का काम तो कर ही सकता है
VANDEMATRAM (वंदेमातरम्)
Tuesday, 7 July 2026
Monday, 15 June 2026
मेरे YouTube चैनल के 5,000 सब्सक्राइबर होने पर हार्दिक आभार************************************************************
प्रिय मित्रों एवं राष्ट्रभक्त बंधुओं, आप सभी के स्नेह, सहयोग और उत्साहवर्धन के कारण मेरे YouTube चैनल “NAVEEN SANGH GEET” ने 5,000 सब्सक्राइबरों का महत्वपूर्ण पड़ाव पार कर लिया है. इस उपलब्धि के लिए मैं आप सभी का हृदय की गहराइयों से धन्यवाद व्यक्त करता हूँ.
कुछ माह पूर्व मैंने यह चैनल इस उद्देश्य से प्रारंभ किया था कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखाओं में गाए जाने वाले प्रेरणादायी देशभक्ति गीत, चिंतनशील बौद्धिक, ईश्वर-भक्ति के गीत, मंत्र तथा राष्ट्रनिर्माण की भावना से ओत-प्रोत सामग्री अधिक से अधिक लोगों तक पहुँच सके.
मुझे अत्यंत प्रसन्नता है कि राष्ट्रप्रेमी समाज ने इस प्रयास को भरपूर स्नेह और समर्थन दिया. बचपन से ही मैं संघ के वातावरण में इन गीतों को सुनता और विभिन्न कार्यक्रमों में गाता आया हूँ. यह गीत हर भारतीय के लिए हैं. यह सुनने वाले के हृदय में देशभक्ति का भाव जगाते हैं.
मेरा सदैव यह विचार रहा कि इन सुंदर, प्रेरणादायी और संस्कारदायी गीतों को ऐसा मधुर संगीत मिले कि वे केवल शाखाओं तक सीमित न रहें, बल्कि प्रत्येक राष्ट्रभक्त के हृदय तक पहुँचें. समय के साथ तकनीक का विकास हुआ और AI ने संगीत के क्षेत्र में भी नई संभावनाओं के द्वार खोल दिए.
मैंने अपने पुत्र (जो तकनीकी क्षेत्र में कार्यरत हैं) से प्रेरणा और मार्गदर्शन प्राप्त कर, AI की सहायता से संघ गीतों को नए संगीतबद्ध रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास किया. प्रारंभिक प्रयोगों के बाद जब परिणाम मन को स्पर्श करने वाले बनने लगे, तब मैंने उन्हें YouTube पर साझा करने का निर्णय लिया.
आज जब अनेक वरिष्ठ स्वयंसेवक यह कहते हैं कि जो गीत पहले केवल शाखा में सुनने को मिलते थे, वे अब यात्रा के दौरान कार में भी सुनते है और इसके अलावा उनके यहाँ घर में या दफ्तर के कार्यों के बीच भी चलते रहते हैं, तो यह मेरे लिए अत्यंत संतोष और प्रेरणा का विषय है.
इससे यह विश्वास और दृढ़ होता है कि राष्ट्रभावना से ओत-प्रोत यह अमूल्य धरोहर अधिकाधिक लोगों तक पहुँच रही है. लगातार हर रोज अनेको राष्ट्रवादी बंधू चैनल को शेयल, लाइक और सब्स्क्राइब कर रहे है, जिससे इनकी पहुँच और ज्यादा राष्ट्रवादी लोगों तक हो रही है
मैं भली-भाँति जानता हूँ कि आपने मेरे चैनल को जो प्रेम दिया है, वह किसी व्यक्ति विशेष के प्रति नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रति आपके सम्मान, राष्ट्रभक्ति के प्रति आपकी निष्ठा तथा इन गीतों में निहित उच्च आदर्शों और संस्कारों के प्रति आपकी श्रद्धा का प्रतीक है.
मैं आप सभी से विनम्र आग्रह करता हूँ कि चैनल पर उपलब्ध गीतों, बौद्धिकों और अन्य वीडियो सामग्री को स्वयं देखें, अपने परिवारजनों और मित्रों तक पहुँचाएँ तथा राष्ट्रभावना के इस संदेश को और व्यापक बनाने में सहयोग करें.
जिन सभी मित्रों ने वीडियो देखे, चैनल को सब्सक्राइब किया, अपने सुझाव दिए और इस यात्रा में साथ दिया, उन सभी के प्रति मैं पुनः हृदय से कृतज्ञता व्यक्त करता हूँ. और जिन्होंने अभी तक चैनल नहीं देखा है, उनसे विनम्र निवेदन है कि एक बार अवश्य देखें.
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— नवीन वर्मा
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Friday, 15 May 2026
स्वदेशी सॉफ्टवेयर : आत्मनिर्भर भारत की नई शक्ति
आज दुनिया डिजिटल युग में प्रवेश कर चुकी है. मोबाइल ऐप, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म, ऑनलाइन गेम, वीडियो प्लेटफॉर्म और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) जैसी तकनीकें केवल सुविधा का माध्यम नहीं रहीं, बल्कि वे किसी भी देश की आर्थिक और रणनीतिक शक्ति का आधार बन चुकी हैं.
Saturday, 22 November 2025
संघ गीत : हे जन्म-भूमि भारत
हे जन्म-भूमि, हे कर्म भूमि भारत
हे वन्दनीय भारत, अभिनन्दनीय भारत।।
जीवन सुमन चढ़ाकर आराधना करेंगे
तेरा जन्म-जन्म भर हम वन्दना करेंगे।
हम अर्चना करेंगे, हे जन्म-भूमि भारत
हे जन्म-भूमि भारत, हे कर्म भूमि भारत।।
महिमा महान् तू है, गौरव निधान तू है
तू प्राण है हमारी, जननी समान तू है
तेरे लिये जियेंगे, तेरे लिये मरेंगे
तेरे लिये जन्म भर, हम साधना करेंगे
हम अर्चना करेंगे, हे जन्म-भूमि भारत
हे जन्म-भूमि भारत, हे कर्म भूमि भारत।।
जिनका मुकुट हिमालय, जग जगमगा रहा है
सागर जिसे रतन की, अंजुलि चढ़ा रहा है
वह देश है हमारा, ललकार कर कहेंगे
उस देश के बिना हम, जीवित नहीं रहेंगे
हम अर्चना करेंगे, हे जन्म-भूमि भारत
हे जन्म-भूमि भारत, हे कर्म भूमि भारत।।
जो संस्कृति अभी तक दुर्जय सी बनी है
जिसका विशाल मन्दिर, आदर्श का धनी है
उसकी विजय-ध्वजा ले, हम विश्व में चलेंगे
संस्कृति सुरभि पवन, बन हर कुञ्ज में बहेंगे
हम अर्चना करेंगे, हे जन्म-भूमि भारत
हे जन्म-भूमि भारत, हे कर्म भूमि भारत।।
शाश्वत स्वतन्त्रता का,जो दीप जल रहा है
आलोक का पथिक जो, अविराम चल रहा है
विश्वास है कि पल भर, रुकने उसे न देंगे
उस दीप की शिखा को, ज्योतित सदा रखेंगे
हम अर्चना करेंगे, हे जन्म-भूमि भारत
हे जन्म-भूमि भारत, हे कर्म भूमि भारत।।
संघ गीत : मनुष्य तू बड़ा महान है
मनुष्य तु बड़ा महान है, भूल मत मनुष्य तू बड़ा महान है।।
धरती की शान तू है,
मनु की संतान,
तेरी मुठ्ठियों मे बंद तूफान है रे,
मनुष्य तू बडा महान है,
मनुष्य तु बड़ा महान है, भूल मत मनुष्य तू बड़ा महान है।।
तू जो चाहे पर्वत पहाडो को फोड दे,
तू जो चाहे नदियों के मुख को भी मोड दे,
तू जो चाहे पर्वत पहाडो को फोड दे,
तू जो चाहे नदियों के मुख को भी मोड दे,
तू जो चाहे माटी से अमृत निचोड़ दे,
तू जो चाहे धरती को अंबर से जोड दे,
अमर तेरे प्राण अमर तेरे प्राण,
मिला तुझको वरदान,
तेरी आत्मा मे स्वयं भगवान है,
तेरी आत्मा मे स्वयं भगवान है रे,
मनुष्य तु बड़ा महान है, भूल मत मनुष्य तू बड़ा महान है।।
नैनो मे ज्वाल तेरी गत मे भुचाल,
तेरी छाती मे छुपा महाकाल है,
नैनो मे ज्वाल तेरी गत मे भुचाल,
तेरी छाती मे छुपा महाकाल है,
पृथ्वी के लाल तेरी हिमगिरि सा भाग,
तेरी भ्रकुटी मे तांडव का ताल है,
निज को तू जान निज को तू जान,
जरा शक्ति पहचान,
तेरी वाणी में ओ तेरी वाणी मे,
युग का अहवान है रे,
मनुष्य तु बड़ा महान है, भूल मत मनुष्य तू बड़ा महान है।।
धरती सा भी तू है अग्नि सा भी,
तू जो चाहे काल को भी थाम ले,
धरती सा भी तू है अग्नि सा भी,
तू जो चाहे काल को भी थाम ले,
पापो का प्रलय रूके पशुता का शिश झुके,
तू जो चाहे हिम्मत से काम ले,
गुरू सा मतीमान गुरू सा मतीमान,
पवन सा गतीमान,
तेरी नभ से भी ऊंची उडान है,
ओ तेरी नब से भी ऊंची उडान है रे,
मनुष्य तु बड़ा महान है, भूल मत मनुष्य तू बड़ा महान है।।
धरती की शान तू है, मनु की संतान,
तेरी मुठ्ठियों मे बंद तूफान है रे,
मनुष्य तु बड़ा महान है, भूल मत मनुष्य तू बड़ा महान है।।
संघ गीत : जो अपने देश धर्म कौम, दे रखवाले हुंदे ने
जो अपने देश धर्म कौम दे, रखवाले हुंदे ने
ओह जीवन सफले हुंदे ने, ओह भागां वाले हुंदे ने ।।
नही रुकदे नही झुकदे,
नही थकदे नही अकदे
कोई बी भैय या परलोभन,
ओहनां नू तोड़ नहीं सकदे
वतन दिया साधकां तन मन, ऐसे ढाले हुंदे ने
ओह जीवन सफले हुंदे ने, ओह भागां वाले हुंदे ने
जो अपने देश धर्म कौम दे, रखवाले हुंदे ने
ओह जीवन सफले हुंदे ने, ओह भागां वाले हुंदे ने ।।
उबलदिआं देगां, तत्तीआं तवीआं,
आरे, रंबीआं, चरखडीआं
जो सच्च दी राह चलदे ने,
मुश्किलां आऊंदीआं बडींआं
कदे फाँसी, कदे गोली, कदे विष प्याले हुंदे ने
ओह जीवन सफले हुंदे ने, ओह भागां वाले हुंदे ने
जो अपने देश धर्म कौम दे, रखवाले हुंदे ने
ओह जीवन सफले हुंदे ने, ओह भागां वाले हुंदे ने ।।
धनी उन्हां जिन्हा कोई
नही हुंदा जमाने विच
सिदकदिलियां जुझारूपन है,
जिन्हां दे खजाने विच
जिन्हा ने शील – संयम, चाल – चलन सम्भाले हुंदे ने
ओह जीवन सफले हुंदे ने, ओह भागां वाले हुंदे ने
जो अपने देश धर्म कौम दे, रखवाले हुंदे ने
जो अपने देश धर्म कौम दे, रखवाले हुंदे ने
संघ गीत : ऐ हिन्द तेरी शान तों जाना लुटावांगे
ऐ हिन्द तेरी शान तों, जानां लुटावांगे।
दुनियां नू तेरी रक्खिया, कर के विखावांगे॥
ऐ हिन्द तेरी शान तों, जानां लुटावांगे।
दुनियां नू तेरी रक्खिया, कर के विखावांगे॥
बन्दे ने धरम रक्खिया, जीवन नू वार के,
दसवें पिता ने दस्सिया, सरवंश वार के.
रक्खी सी लाज धरम दी, अजीत जुझार ने
साडे वी सीनियां दे विच, उठ दे उबाल ने
असी लाडले दशमेश दे बण के विखांवांगे,
नियां नू तेरी रक्खिया, कर के विखावांगे॥
ऐ हिन्द तेरी शान तों, जानां लुटावांगे।
दुनियां नू तेरी रक्खिया, कर के विखावांगे॥
जालिम ने भगत सिंह नू, फांसी चढ़ा दित्ता
भारत दा शेर , आखरी नींदे सुला दित्ता
पर ओह तां हस्स के, देश तों कुरबान हों गिआ
परवानां अपणी कौम तों, बलिदान हो गिआ
कुरबानीयां दा पाठ वी , दिल नूं पढ़ावांगे
दुनियां नू तेरी रक्खिया , कर के विखावांगे॥
ऐ हिन्द तेरी शान तों, जानां लुटावांगे।
दुनियां नू तेरी रक्खिया, कर के विखावांगे॥
चमकी जो बिजली वांग , ओह झांसी दी रानी सी
जननी दे प्यार विच , जो होई दीवानी सी
दुश्मन दे मार मार के, छक्के छुड़ाए सी
घानां दे घान मार के , धरती ते लाहे सी
प्रचण्ड ओस चण्डी नूं , करके विखावांगे
दुनियां नू तेरी रक्खिया. कर के विखावांगे॥
ऐ हिन्द तेरी शान तों, जानां लुटावांगे।
दुनियां नू तेरी रक्खिया, कर के विखावांगे॥
राणा ने उमर जंगलां दे, विच गुजारी सी
खातर धर्म ते देश दे , जिन्दड़ी वी वारी सी
शिवा ने मां तों सिक्खिया , कुरबान होवना
प्यारे धर्म ते देश तों बलिदान हो वना
सारे जग ते फेर तों , भगवा लहरावांगे
दुनियां नू तेरी रक्खिया कर के विखावांगे॥
ऐ हिन्द तेरी शान तों, जानां लुटावांगे।
दुनियां नू तेरी रक्खिया, कर के विखावांगे॥
