Friday, 6 January 2023

मलेरकोटला वालों की शराफत का सच

 औरंगजेब के समय में उत्तर भारत में मुघलो के अत्याचार चरम सीमा पर थे. हिन्दुओं को मुस्लमान बनाने के लिए उनपर तरह तरह से अत्याचार किये जा रहे थे, उनकी लड़कियों को उठा लिया जाता था. गुरु तेगबहादुर, भाई सती दास, भाई मति दास, भाई दयाला, दादा कुशाल सिंह दहिया आदि के बलिदान के बाद युवाओं का खून उबलने लगा.

ऐसे में गुरु तेग बहादुर के पुत्र, गुरु गोविन्द सिंह ने मुग़लिया अत्याचार के खिलाफ सशस्त्र संघर्ष का आव्हान किया और खालसा पंथ की स्थापना की. मुग़लों के अत्याचार का बदला लेने के लिए जोशीले युवा इस खालसा पंथ में शामिल हो गये. ज्यादातर हिन्दू परिवारों ने अपना बड़ा बेटा गुरु गोविन्द सिंह के ख़ालसा पंथ को समर्पित कर दिया.
गुरु गोविन्द सिह पर नियंत्रण करने के लिए औरंगजेब ने 10 लाख की फ़ौज आननदपुर साहब भेजी. फ़ौज में पंजाब / हरियाणा / दिल्ली की मुस्लिम रियासतों के सैनिक थे, जिनमे सरहिंद, मलेरकोटला, लाहौर, आदि प्रमुख थे. मुग़ल सैनिको ने 6 महीने तक घेरा डाले रखा. 21 दिसम्बर 1705 बरसात की सर्द रात में गुरु गोविन्द सिंह ने आनंदपुर साहब को छोड़ दिया 
सरसा नदी पार कर गुरु गोविन्द सिंह चमकौर साहब पहुंचे. चमकौर साहब में बुधि चन्द ने अपनी किलेनुमा गढ़ी गुरु गोविन्द सिंह को समर्पित कर दी. यही पर गुरु गोविन्द सिंह दोनों बड़े साहब जादे बाबा अजीत सिह और बाबा जुझार सिंह ने मुग़ल सैनिको से लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए. इस लडाई में मलेरकोटला के नबाब का भाई भी मारा गया . 
दूसरी तरफ गुरु गोविन्द सिंह की माता गुजरी और दोनो छोटे साहबजादे (बाबा फ़तेह सिंह और बाबा जोरावर सिंह ) भी बिछड़ गए. कहा जाता है कि गंगू नाम के उनके रसोइये इनाम के लालच में उन्हें सरहन्द के नबाब बजीर खान के हवाले कर दिया. वहां उनको इस्लाम कबूलने को कहा और उनके इंकार करने पर जिन्दा दीवार में चुनवाने का हुक्म सुनाया.

कहा जाता है कि - ये सजा सुनाये जाने पर, मलेरकोटला के नबाब शेर मुहम्मद खान ने कहा था कि - हमारी दुश्मनी इनके पिता से है, मैं जंग का बदला जंग में लूंगा, इन बच्चों को मारकर नहीं. परन्तु शेर मुहम्मद की बात को अन्य सभी नबाबो ने काट दिया और फिर मलेरकोटला का नबाब शेर मुहम्मद खान भी खामोश हो गया.
लेकिन बात को ऐसे बताया जाता है कि - जैसे मलेरकोटला का नबाब कोई बहुत महान इंसान था और इस एक घटना को लेकर आज के सिक्ख, मुसलमानो के सारे अत्याचारों को भूल जाते हैं जबकि हकीकत यह है कि- आनंद पुर साहब को घेरने और चमकौर साहब की गाढ़ी पर हमला करने मलेरकोटला की फ़ौज भी शामिल थी. 
शेर मोहम्मद की फ़ौज ने गुरु गोविन्द सिंह का मुक्तसर साहब तक पीछा किया था. इसके अलावा इस लड़ाई में वीरांगना बीबीअनूप कौर का नाम भी आता है. 21 दिसम्बर 1705 की बरसाती रात को जब गुरु गोविन्द जी ने आनंदपुर साहब को छोड़ा तो माता गुजरी और छोटे साहबजादों की सुरक्षा का दायित्व बीबी अनूप कौर ने लिया था. 

बीबी अनूप कौर बहुत ही सुन्दर एवं बहादुर युवती थी. उन्होंने स्वेच्छा से माता गुजरी की सुरक्षा की सेवा ली थी. परन्तु सरसा नदी पार करते करते वे सब आपस में बिछड़ गए. बीबी अनुप कौर कौर के साथ दो तीन और सिक्ख थे. उनको पता लगा कि - चमकौर साहब में गुरु गोविन्द सिंह और बड़े साहबजादे हैं और वहां लड़ाई हो रही है तो वे चमकौर साहब की तरफ चल पड़े.
रास्ते में उनका सामना शेर मोहम्मद खान की टुकड़ी से हुआ. इन्होने बहादुरी से मुकाबला किया और अनेकों मुस्लिम सैनको को मार गिराया. लेकिन सैकड़ों सैनिको का चार लोग कब तक मुकाबला करते, बीबी अनूप कौर घायल हो गई और उनके साथी सिख बलिदान हो गए. बीबी अनूप कौर की सुंदरता को देखकर शेर मोहम्मद ने मोहित हो गया.
चमकौर साहब की जीत के बाद मुग़ल सैनिक चमकौर, माछीबाड़ा, मोरिंडा आदि से अनेकों लड़कियों को गुलाम बनाकर लाये थे और उनको नबाबों  के हवाले कर दिया था. उनका धर्म परिवर्तन कराकर उनको अपने साथियों में इनाम स्वरूप बाँट दिया. इनमे सबसे खूबसूरत युवती, वीरांगना बीबी अनूप कौर पर शेर मोहम्मद का दिल आ गया.
नबाब उनको अपने हरम में रखना चाहता था. उसने उनसे इस्लाम कबूलने को कहा लेकिन बीबी अनूप कौर ने इंकार कर दिया. तब नबाब ने उन्हें हरम के एक कमरे में कैद कर दिया. एक दिन मौका पाकर बीबी अनूप कौर ने अपने सीने में खंजर मारकर आत्महत्या कर ली. नबाब ने इसे अपनी शिकस्त मानते हुए, उन्हें मुस्लिमों की तरह दफना दिया.

कुछ समय बाद गुरु गोविन्द सिंह के आदेश पर, नांदेड़ से आकर बाबा बन्दा बहादुर ने पंजाब पर हमला किया और उनकी सेना ने चप्पड़ चिड़ी की जंग में सरहन्द के नबाब बजीर खान को मार गिराया. उसके बाद बन्दा बहादुर ने मलेरकोटला को भी जीत लिया. भाई आली सिंह और भाई माली सिंह ने बन्दा बहादुर को बीबी अनूप कौर के बलिदान के बारे में बयाया, 
बीबी अनूप कौर के बारे में जानकर बन्दा बहादुर अत्यंन्त भाभुक हो गए. उन्होंने कहा हम उनके लिए कुछ और तो नहीं कर सकते लेकिन बीबी अनूप कौर का पार्थिव शरीर कब्र से निकालकर उनका दाह संस्कार अवश्य करेंगे. बन्दा बहादुर ने कब्रिस्तान को खुदवाकर बीबी अनूप कौर के पार्थिव शरीर के अबशेषों को निकाला और उनका विधिवत अग्नि संस्कार किया. 
और हाँ, बन्दा सिंह बहादुर ने मलेरकोटला को तहशनहस करने का अपना इरादा जो बदल दिया था उसकी मुख्य बजह थी मलेरकोटला के सेठ किशनचंद द्वारा उनकी मदद करना. बन्दा बहादुर के मलेरकोटला प्रवास में सेठ किशन चन्द उनका बहुत साथ दिया था तथा अलग से 5000 रूपय शुक्राने में दिए थे कि - मलेरकोटला को नष्ट न करें.
मलेरकोटला वालों से संघर्ष आगे भी ख़त्म नहीं हुआ. 1762 में अहमद शाह अब्दाली ने पंजाब पर आक्रमण किया उस समय मलेरकोटला के नबाब भीखम खान और सरहन्द के नबाब जैनखान ने अब्दाली का साथ दिया. 5 फरवरी 1762 को मलेरकोटला के पास "कुप्प" में अब्दाली, भीखम खान और जैनखान की सेनाओ ने सिक्खों को तीन तरफ से घेर लिया.
सिक्ख बहुत बहुत बहादुरी से लड़े लेकिन तीन विशाल सेनाओ से भला कब तक लड़ते ? इस लड़ाई में संयुक्त मुस्लिम सेनाओ ने 35 हजार सिक्खों की हत्या की. औरतों और बच्चों को भी नहीं छोड़ा. बच्चों को काटकर उनके अंगों की माला बनाकर उनकी माताओं के गले में डालने का बहशियाना काम किया. इस लड़ाई को बड़ा घल्लूघारा कहा जाता है.  
इस घटना के बाद एक सदी और बीत जाने के बाद भी मलेरकोटला वालों का जुल्म ख़त्म नहीं हुआ. तब तक भारत पर अंग्रेजों का राज हो चुका था. 1857 का प्रथम स्वाधीनता संग्राम असफल हो चुका था और ज्यादातर रियासतों के राजाओं और नबाबों ने अंग्रेजों को अपना भाग्य विधाता मान लिया था. ऐसे में नामधारी सिक्ख अपने स्तर पर अंग्रेजों का विरोध कर रहे थे. 
नामधारी सिक्खों के केंद्र भैणी साहब में मकर संक्रांति का पर्व बहुत ही धूमधाम से मनाया जाता है. 1872 में मकर संक्रांति के दिन पर्व में शामिल होने के लिए दूर दूर से भक्त जा रहे थे. ऐसे में गौ-भक्तों को दुखी करने के लिए, मुस्लिम बहुल मलेरकोटला के मुसलमानों ने खुलेआम सड़क के किनारे गौ ह्त्या करना शुरू कर दिया, जिसका अंग्रेजों का भी समर्थन था.
हिन्दू सिक्ख इसको देखकर कुछ नहीं कर पा रहे थे और मन मसोस कर रह जा रहे थे. ऐसे में एक नामधारी सिक्ख गुरुमुख सिंह के नेत्रत्व में, भैणी साहब को जाने वाला कुछ कूकों का एक जत्था उधर से गुजरा. उन्होने मुसलमानों से खुलेआम ऐसा न करने को कहा तो वे लोग कूकों से झगड़ने लगा. कूकों ने भी बहादुरी से उनका मुकाबला किया.
निहत्थे तीर्थयात्री, लड़ने को तैयार बैठे हथियार बंद आतंकियों का कब तक मुकाबला करते. ज्यादातर कूके उस संघर्ष में मारे गए. कुछ लोग किसी तरह जान बचाकर भैणीसाहब पहुंचे. तब 15 जनवरी 1872 कोें गुरु रामसिंह के आदेश पर, हीरा सिंह और लहिणा सिंह के नेत्रत्व में 80 कूकों का एक जत्था हथियारों के साथ मलेरकोटला को रवाना हुआ.

मलेरकोटला में हुए उस संघर्ष में दोनों और के लोग मारे गए. लेकिन अंग्रेज पुलिस ने गौहत्यारे मुसलमानों का साथ दिया और कूकों को गिरफ्तार कर लिया. अंग्रेज जिलाधीश कोवन ने बिना अदालत में मुकदमा चलाये उनको प्राणदंड देने का ऐलान कर दिया. 17 और 18 जनवरी 1872 मलेरकोटला में 66 नामधारी सिक्खों को तोप से उड़ा दिया. 

Wednesday, 14 December 2022

क्या है "मैं पठान का बच्चा हूं, मैं सच्चा बोलता हूं, सच्चा करता हूं" का सच

अंध विरोधियों द्वारा सोशल मीडिया पर मोदी के भाषण की एक 9 सेकण्ड की क्लिप वायरल की जा रही है जिसमे मोदीजी कह रहे हैं कि - मैं पठान का बच्चा हूं, मैं सच्चा बोलता हूं सच्चा करता हूं. 9 सेकण्ड की इस वीडियो क्लिप के जरिए अंधविरोधी खासकर मुसलमान मोदी जी का मजाक बनाने में लगे है और बिना सच जाने इसे आगे बढ़ा रहे हैं.

दरअसल यह वीडियों मोदीजी की टोंक रैली के आधे घंटे से ज्यादा लम्बे भाषण में से काटकर निकाला गया 9 सेकण्ड का हिस्सा है. इसमें मोदी जी जिक्र कर रहे हैं कि इमरान खान के पाकिस्तान का प्रधानमंत्री बनने पर मैंने इमरान को बधाई दी थी तब उन्होंने इमरान से भारत के बजाय गरीबी ,अशिक्षा के खिलाफ लड़ने का जिक्र किया था जिस पर इमरान खान ने जवाब में बोला था कि मैं पठान का बच्चा हूं, मैं सच्चा बोलता हूं सच्चा करता हूं.
मोदी ने टोंक रैली में यह बोला था - "पाकिस्तान में नई सरकार बनी, तो स्वाभाविक है, जो नए प्रधानमंत्री बने थे, प्रोटोकॉल के तहत मैंने उनको फोन करके बधाई दी थी, पाकिस्तान के नए प्रधानमंत्री, क्रिकेटर के रूप में लोग उनको जानते हैं, मैंने उनसे कहा था बहुत लड़ लिया हिंदुस्तान पाकिस्तान ने, पाकिस्तान ने कुछ नहीं पाया, हर लड़ाई हमारे वीर जीत चुके हैं और ये सिलसिला आगे भी जारी रहेगा, और मैंने उनसे कहा था कि अब आप तो राजनीति में आए हो, खेल की दुनिया से आए हो, आओ भारत और पाकिस्तान मिलकर के हम गरीबी के खिलाफ लड़ें, अशिक्षा के खिलाफ लड़ें, ये बात मैंने उनको उस दिन कही थी, और उन्होंने मुझे बोला - मोदी जी मैं पठान का बच्चा हूं, मैं सच्चा बोलता हूं, सच्चा करता हूं "
शरारती तत्वों ने इस पूरे भाषण में से इमरान का जिक्र हटाकर केवल आखिरी लाइन को बार बार चलाना शुरू कर दिया - मैं पठान का बच्चा हूं, मैं सच्चा बोलता हूं, सच्चा करता हूं। उन मूर्खों ने यह जानने की भी कोशिश नहीं की कि - क्या यह बात सही हो सकती है. मोदी विरोधी इसीलिए बार बार मुँह की खाते हैं
मैंने भी पोस्ट का टाइटल जानबूझकर यही रहा है - मैं पठान का बच्चा हूं, मैं सच्चा बोलता हूं, सच्चा करता हूं. अब आप इसका स्क्रीन शॉट लेकर बाक़ी सारा काटकर केवल इतना रखिये और वायरल कीजिये

Friday, 9 December 2022

महान क्रांतिकारी "पं.राम प्रसाद विस्मिल"

महान क्रांतिकारी रामप्रसाद विस्मिल का जन्म 11 जून 1897 को उत्तरप्रदेश के शाहजहांपुर में हुआ था. नाम में पंडित शब्द लगा होने से उनके ब्राह्मण होने का भ्रम होता है. उनके दादा जी नारायण लाल तोमर जाति के क्षत्रिय थे किन्तु उनके आचार-विचार, सत्यनिष्ठा व धार्मिक प्रवृत्ति से कारण उन्हें "पण्डित जी" ही कहकर सम्बोधित करते थे.

"विस्मिल" स्वतन्त्रता सेनानी के साथ साथ कवि, शायर, अनुवादक, बहुभाषाभाषी, इतिहासकार व साहित्यकार भी थे. वे लेखन में अपना नाम विस्मिल, अज्ञात, विजय और राम नाम का इस्तेमाल किया करते थे. 11 वर्ष के क्रान्तिकारी जीवन में उन्होंने कई पुस्तकें लिखीं और उन पुस्तकों को बेचकर जो पैसा मिला, उससे उन्होंने हथियार खरीदे.
रामप्रसाद जब आठवीं कक्षा के छात्र थे तभी संयोग से स्वामी सोमदेव का आर्य समाज भवन में आगमन हुआ. मुंशी इन्द्रजीत ने रामप्रसाद को स्वामीजी की सेवा में नियुक्त कर दिया. यहीं से उनके जीवन की दशा और दिशा दोनों में परिवर्तन प्रारम्भ हुआ.स्वामी सोमदेव के साथ खुली चर्चा से उनके मन में देश-प्रेम की भावना जागृत हुई.
सन् 1916 के कांग्रेस अधिवेशन में लोकमान्य बालगंगाधर तिलक की लखनऊ में विशाल शोभायात्रा निकालने के बाद युवाओं एवं नेताओं का ध्यान उनकी दृढता की ओर गया. अधिवेशन के दौरान उनका परिचय केशव बलिराम हेडगेवार (छ्द्मनाम: केशव चक्रवर्ती), सोमदेव शर्मा व मुकुन्दीलाल आदि से हुआ.
राम प्रसाद बिस्मिल ने शचींद्रनाथ सान्याल, यदु गोपाल मुखर्जी, योगेश चन्द्र चटर्जी आदि के साथ मिलकर हिन्दुस्तान रिपब्लिकन ऐसोसिएशन नाम की पार्टी बनाई. उन्होंने गान्धी जी की नीतियों का मजाक बनाते हुए यह प्रश्न भी किया था कि - "जो व्यक्ति स्वयं को आध्यात्मिक कहता है वह अँग्रेजों से खुलकर बात करने में डरता क्यों है ?"
उन्होंने देश के नौजवानों को ऐसे छद्मवेषी महात्मा के बहकावे में न आने की सलाह देते हुए, क्रान्तिकारी पार्टी में शामिल हो कर अँग्रेजों से टक्कर लेने का खुला आवाहन किया था. जिसमे बाद आजाद, भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव, बटुकेश्वर दत्त आदि उनके साथ जुड़ गए. हथियार खरीदने के लिए उन्होंने सरकारी खजाना लूटने की योजना बनाई.
पार्टी की ओर से पहली डकैती 25 दिसम्बर 1924 को बमरौली में डाली गयी. 9 अगस्त 1925 को उन्होंने अशफाक उल्ला खाँ, राजेन्द्र लाहिड़ी, चन्द्रशेखर आजाद, शचीन्द्रनाथ बख्शी, मन्मथनाथ गुप्त, मुकुन्दी लाल, केशव चक्रवर्ती, मुरारी शर्मा (मुरारी लाल गुप्त) तथा बनवारी लाल आदि के साथ मिलकर काकोरी ट्रेन काण्ड को अंजाम दिया.
बाद में अंग्रेजी हुकूमत ने उनकी पार्टी "हिन्दुस्तान रिपब्लिकन ऐसोसिएशन" के कुल 40 क्रान्तिकारियों पर "अंग्रेज सम्राट" के विरुद्ध सशस्त्र युद्ध छेड़ने, सरकारी खजाना लूटने व मुसाफिरों की हत्या करने का मुकदमा चलाया . जिसमें राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी, पण्डित राम प्रसाद बिस्मिल तथा अशफाक उल्ला खाँ को मृत्यु-दण्ड (फाँसी की सजा) सुनायी गयी.
इस मुकदमे में "जवाहर नेहरु" के साले "जगतनारायण मुल्ला" ने क्रांतिकारियों के खिलाफ सरकारी पक्ष रखने का काम किया था, जबकि क्रान्तिकारियों की ओर से के०सी० दत्त, जय करण नाथ मिश्र व कृपाशंकर हजेला ने क्रमशः राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी, ठाकुर रोशन सिंह व अशफाक उल्ला खाँ की पैरवी की . राम प्रसाद 'बिस्मिल' ने अपनी पैरवी खुद की .
19 -दिसंबर - 1927 को - राम प्रसाद विस्मिल को गोरखपुर जेल में फांसी पर लटका दिया गया था.

Saturday, 3 December 2022

आपरेशन ट्राइडेंट

पापिस्तान ने 3 दिसंबर 1971. को भारत पर हमला किया था. लेकिन अगले ही दिन 4 दिसंबर को भारत ने पापिस्तान को घुटनों पर ला दिया. 4 दिसंबर को थलसेना ने लोंगोवाला में पापिस्तान की टैंक ब्रिगेड की कब्रगाह बना दी थी और 5 दिसंबर की सुबह भारतीय वायु सेना ने बची हुई टैंक ब्रिगेड को तबाह कर पापिस्तान में दहशत फैला दी थी.

4 दिसंबर को ही बंगाल की खाड़ी में भारतीय युद्धपोत "आईएनएस राजपूत" ने पपिस्तान के सबसे खतरनाक हथियार "PNS गाजी" पनडुब्बी को डुबो दिया था. हालांकि "PNS गाजी" से अमेरिका की प्रतिष्ठा जुडी होने के कारण भारत ने इसका आधिकारिक जिक्र नहीं किया लेकिन भारतीय नौ सेना दिवस चुनने में इस घटना का बहुत बड़ा नह्त्व है..

4 दिसंबर को भारत का नौसेना दिवस है. नौसेना दिवस के लिए 4 दिसंबर की तारीख को चुनने की एक ख़ास बजह और है. 4 दिसंबर 1971 को भारतीय नौसेना ने कराची बंदरगाह पर स्थित, नौसेना मुख्यालय पर हमला कर, उसे तवाह कर पापिस्तानी नौसेना की कमर तोड़ दी थी. यह भारतीय नौसेना का अब तक का सबसे खतरनाक हमला था.

भारतीय नेवी ने पाकिस्तान नेवी के कराची बंदरगाह स्थित मुख्यालय को निशाना बनाकर हमला बोला था. नौसेना के इस हमले को "आप्रेसन ट्राइडेंट" का नाम दिया गया था. ट्राइडेंट का मतलब होता है त्रिशूल. इसमें 3 मिसाइल बोट्स का इस्तेमाल किया गया था, जिनके नाम थे- "आईएनएस निपट", "आईएनएस निर्घट" और "आईएनएस वीर".

नौसेना प्रमुख एडमिरल "एस.एम.नंदा" के नेतृत्व में ऑपरेशन ट्राइडेंट का प्लान बनाया गया था. इस टास्क की जिम्मेदारी 25वीं स्क्वॉर्डन कमांडर "बब्रभान यादव" को दी गई थी. आपरेशन के दौरान बब्रभान यादव खुद भी "आईएनएस निपट" पर मौजूद रहे. इस यु्द्ध में पहली बार जहाज पर मार करने वाली एंटी शिप मिसाइल से हमला किया गया था.

4 दिसंबर 1971,रात 9 बजे, भारतीय नौसेना ने कराची की तरफ बढ़ना शुरू किया. रात 10:30 पर कराची बंदरगाह पर पहली मिसाइल दागी गई. 90 मिनट के भीतर पाकिस्तान के 3 नेवी शिप ( पी.एन.एस. खैबर, पीएनएस चैलेंजर और पीएनएस मुहाफिज ) डूब गए और 2 बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गए. कराची तेल डिपो आग शोलों में घिर गया था.

सफल हमले के बाद कमांडर बब्रभान यादव ने अपने उच्च अधिकारी "विजय जेरथ" को संदेश भेजा कि- "इससे अच्छी दिवाली हमने आज तक नहीं देखी". इस पुरे हमले में भारत को किसी तरह का कोई नुकसान नहीं हुआ. इसे भारतीय नौसेना का सबसे सफल हमला माना जाता है. इसलिए इस जीत की याद में 4- दिसंबर को नौसेना दिवस मनाया जाता हैं.

लोंगोवाला युद्ध

राजस्थान के जैसलमेर जिले में, लोंगोवाला पोस्ट पर हुआ भारत - पापिस्तान का युद्ध, दुनिया के दुर्लभ युद्दों में गिना जाता है. इस लड़ाई में पापिस्तान के 3,000 सैनिकों वाली टैंक ब्रिगेड को, भारतीय सेना के 123 जवानो ने नेस्तनाबूत कर दिया था. इसी घटना पर निर्माता निर्देशक "जे पी दत्ता" ने एक भव्य फिल्म "बार्डर" का निर्माण भी किया था.


पापिस्तान सरकार ने विरोधी नेता "शेख मुजीब्र्रह्मान" को गिरफ्तार पूर्वी पापिस्तान में दमनचक्र चला रखा था. बेकसूरों को मारा जा रहा था महिलाओं का बलात्कार किया जा रहा था, ऐसे में सेना का बिरोध करने वहां "मुक्तिवाहिनी" खड़ी हुई. इसमें बंगाली सैनिक भी शामिल हो गए. भारत सरकार ने भी मुक्तिवाहिनी को अपना समर्थन दे दिया.

भारत को रोकने के लिए पापिस्तान ने भारत को पश्चिम में उलझाना चाहा और 3 दिसंबर 1971 को अचानक भारत के कुछ सैन्य हवाई अड्डों (श्रीनगर, पठानकोट, अम्रतसर, जोधपुर, आगरा, आदि ) पर हवाई हमला कर बम गिराने शुरू कर दिए. इंदिरागांधी ने इसे पापिस्तान का भारत पर आक्रमण घोषित कर, जबाबी युद्ध का ऐलान कर दिया.

पापिस्तान के पास ख़ुफ़िया खबर थी कि - पश्चिम में भारतीय सेना कम है. ऐसे में उसने जैसलमेर पर कब्जा करने की रणनीति बनाई और 4 दिसंबर 1971 की रात को 3,000 सैनिको और टैंक ब्रिगेड के साथ लोंगोवाला चौकी पर हमला बोल दिया. उस समय लोंगोवाला में केवल 123 सैनिक ( 120 पंजाब रेजीमेंट के तथा 3 जवान BSF) मौजूद थे.

लोंगोवाल चौकी के इंचार्ज मेजर "कुलदीप चादपुरी" ने इस हमले की खबर हेडक्वार्टर को दी, तो उनको निर्देश दिया कि- 6 घंटे (सुबह) से पहले हवाई मदद नहीं मिल सकती. आप चाहो तो किसी तरह उनको रोको, नहीं तो वहां से निकलकर रामगढ़ आ जाओ. उन 123 जवानो ने पीठ दिखाकर भागने के बजाय, मुकाबला करने का निर्णय लिया.

भारत के वीरों ने अपनी कुछ साधारण थ्री नाट थ्री राइफलो, 2 MMG, हैण्ड ग्रेनेड और एंटी टैंक माईन्स की सहायता से पापिस्तान की सेना को धराशाई करना शुरू कर दिया. भारतीय सेना ने पपिस्तानियों का किस तरह से मुकाबला किया, यह तो आप सबने "बार्डर" फिल्म में देखा ही है. सेना ने पापिस्तान के सैकड़ों सैनिक मार दिए और 12 टैंक नष्ट कर दिए.

इसे देखकर पापिस्तान सेना ने अपने हेडक्वार्टर को मैसेज दिया कि- हमारी ख़ुफ़िया रिपोर्ट झूठी है, लगता है यहाँ पर कोई बड़ी ब्रिगेड मौजूद है. सुबह होते ही भारतीय वायुसेना भी पहुँच गई और ताबड़तोड़ हमले कर पापिस्तानियों को अपने टैंक छोधकर भागने पर मजबूर कर दिया. भारतीय वायुसेना ने पापिस्तान सीमा में घुसकर भी तांडव मचाया.

पापिस्तान के ब्रिगेडियर तारिक मीर को अपने टैंको, भारी सेना और ख़ुफ़िया रिपोर्ट पर इतना भरोसा था कि - उसने अधिकारियों से कहा था कि- हम 24 घंटे में जैसलमेर पर कब्जा कर लेंगे. उसने अपने सनिकों को बोला था "इंशाअल्लाह हम लोग नाश्ता लोंगोवाला में करेंगे, दोपहर का खाना रामगढ़ में खायेंगे और रात का खाना जैसलमेर में खायेंगे.

हालांकि उसके इस डायलाग को ज्यादा प्रभावी बनाने के लिए फिल्म में कहा गया था "सुबह का नाश्ता जैसलमेर में, दोपहर का खाना जयपुर में और रात का खाना दिल्ली में". इस युद्ध में पापिस्तान के 34 टैंक ( 12 थलसेना द्वारा और 22 वायुसेना द्वारा) सहित 200 वाहन नष्ट हो गए और 500 से ज्यादा सैनिक मारे गए थे.

सारी दुनिया में ऐसा एक भी उदाहरण नहीं है जहाँ इतने कम सैनिको द्वारा इतने सारे टैंक नष्ट किये गए हों. पापिस्तान ने तीन दिसंबर को पहला हमला किया था और भारतीय सेना ने 4 दिसंबर को ही लोंगोवाला में करारी मात दी, दुसरी तरफ उसी दिन नौ सेना ने बंगाल की खाड़ी में पापिस्तानी पनडुब्बी "गाजी" को डूबोकर पापिस्तान की कमर तोड़ दी.

4 दिसंबर 1971 : सेना के तीनो अंगों लिए गौरव का दिन

3 दिसंबर 1971 को पापिस्तान ने भारत के कई शहरों पर अचानक हवाई हमला कर दिया था , जिसको उसने नाम दिया था "आपरेशन चंगेज खान" इस हमले के बाद भारत ने भी पापिस्तान से युद्ध करने की घोषणा कर दी और जबाबी हमले के लिए तैयार हो गया. भारतीय सेना तो पहले से ही तैयार थी उसे तो केवल आदेश का इन्तजार था.

युद्ध की घोषणा के अगले ही दिन 4 दिसंबर 1971 को भारतीय सेना के तीनो ही अंगों ( जल सेना, थल सेना और वायु सेना) ने अपने कारनामो से पापिस्तान को बैकफुट पर धकेल दिया. दुष्ट पापिस्तान जो अमेरिकी हथियारों के दम पर फुला हुआ था, युद्ध के पहले ही दिन भारतीय सेना ने उसकी हवा निकाल दी.
पापिस्तान जिस अमेरिकी पनडुब्बी "पीएनएस गाजी" को अपनी सबसे बड़ी ताकत मान रहा था उस पनडुब्बी को भारतीय सेना के साधारण युद्धपोत "आईएनएस राजपूत" ने 4 दिसंबर 1971 को ही ध्वस्त कर दिया. यह भारत की बहुत बड़ी जीत थी क्योंकि उस समय भारत के पास कोई पनडुब्बी नहीं थी जो उसका मुकाबला करती.
4 दिसंबर 1971 की रात को ही पापिस्तान ने अपनी 3,000 सानिको वाली टैंक ब्रिग्रेड के साथ भारत की पश्चिमी सीमा पर "लोंगोवाला पोस्ट" पर हमला बोल दिया. उस चौकी पर भारत के मात्र 123 सैनिक मौजूद थे जिनके पास हथियारों के नाम पर 2 MMG, कुछ एंटी टैंक माइंस, कुछ हैण्ड ग्रेनेड और बाक़ी थ्री नाट थ्री रायफलें थी.
पापिस्तानी सेना के मुकाबले सैनिक तो बहुत कम थे ही साथ ही उन भारतीय सैनिको के पास जो हथियार थे वो पापिस्तानी सेना के हथियारों के सामने खिलौने के समान थे.लेकिन उन भारतीय सैनिको ने इसकी परवाह किये बिना पापिस्तानी सेना का मुकाबला किया और रात में ही पापिस्तानी सेना के 12 टैंक नष्ट कर दिये.
रातभर वो सैनिक "लोंगोवाला" में पापिस्तानियो को रोके रहे और सुबह होते ही भारतीय वायुसेना अपने "हंटर विमानों" के साथ उनकी मदद को पहुँच गई. हंटर विमानों ने अपनी बमवारी से बाक़ी बचे 22 टैंको को ध्वस्त कर दिया. (लोगोंवाला की इस लड़ाई में थल सेना और वायु सेना का कारनामा, आप फिल्म बार्डर में देख चुके हैं)
हंटर विमानों ने केवल लोंगोंवाला में पापिस्तानी टैंको पर ही बमबारी नहीं की बल्कि पपिस्तान में काफी अन्दर तक घुसकर बमबारी की. हंटर विमानों ने पापिस्तान के उस क्षेत्र में तबाही मचा दी. मजे की बात यह कि - उस हमले के समय पापिस्तानी केवल अपना बचाव ही करते नजर आये जबकि उनके पास हंटर से ज्यादा ताकतवर विमान थे.
4 दिसंबर 1971 की रात को ही भारतीय नौसेना नेे पापिस्तान के कराची बंदरगाह पर हमला बोल दिया. इस हमले को भारतीय नौसेना ने नाम दिया "आप्रेसन ट्राइडेंट". इस हमले में भारतीय नौसेना ने "कराची बंदरगाह" को पूरी तरह से तवाह कर दिया और उसके 3 युद्धपोत डुबो दिए और बाक़ी के युद्धपोत भी किसी काम लायक नहीं छोड़े.
युद्ध के पहले ही दिन भारतीय सेना की वीरता और पापिस्तान की तवाही देखकर, केवल पापिस्तान ही नहीं अमेरिका भी भौचक्का रह गया था. उसको उम्मीद नहीं थी कि - उसकी डायल्बो पनडुब्बी (गाजी), पैटर्न टैंक, और खतरनाक युद्धपोतों का भारतीय सेना यह हाल करेगी. इस प्रकार पहले ही दिन भारतीय सेना पापिस्तान पर हावी हो गई.
इस पोस्ट में जिन घटनाओं का जिक्र किया गया है यह सभी घटनाएं बहुत ही महत्त्वपूर्ण है. इसलिए उन सभी घटनाओं पर अलग अलग पोस्ट लिख रहा हूँ. आप सभी से निवेदन है कि उन सभी पोस्ट्स को खुद भी पढ़िए और अपने मित्रों को भी पढ़ाइये. जिससे सभी भारतीय अपनी सेना की वीरता के बारे में जानकर उस पर गर्व कर सकें

आपरेशन चंगेज खान

3 दिसंबर 1971 को पापिस्तान ने भारत के 11 स्थानों ( 9 एयर बेस और 2 जगह कश्मीर में ) श्रीनगर, पठानकोट, अमृतसर, जोधपुर, आगरा, भुज, हलवारा, आदि ) पर अचानक बमबारी कर युद्ध छेड़ दिया था. भारत पर इस हमले को पापिस्तान ने "आप्रेसन चंगेज खान" नाम दिया था. भारत पर पापिस्तान के इस हमले के मुख्यतः तीन कारण माने जाते हैं.

पहली बात यह कि- पापिस्तान को यह लगता था कि उसके पास भारत से ज्यादा खतरनाक हथियार और ताकतवर सेना है. साथ ही उसके पास अमेरिका का समर्थन और अमेरिकी हथियार प्राप्त है. जिनके द्वारा वह वह भारत को आसानी से हराकर, भारत से 1948 और 1965 की हार का बदला ले लेगा और कश्मीर भी छीन लेगा.
दुसरी बात - उन दिनों भारत में राजनैतिक नेतृत्व बहुत ढुलमुल था. शास्त्री जी की मौत में बाद इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री बनी थी लेकिन ज्यादातर सीनियर कांग्रेसी नेताओं को वो पसंद नहीं थी. कांग्रेस दोफाड़ हो चुकी थी. पापिस्तान के आंतरिक हालत पर इंदिरा गाँधी कोई स्टैंड नहीं ले पा रही थी. पापिस्तान को इससे फायेदे की उम्मीद थी.
तीसरा सबसे बड़ा कारण था, पापिस्तान की जनता का ध्यान पापिस्तान के अंदरूनी हालात से हटाकर भारत की तरफ केन्द्रित करना. पूर्वी पापिस्तान में गृहयुद्ध चल रहा था और वह 26 मार्च 1971 को अपने आपको पापिस्तान से आजाद घोषित कर चुका था. पापिस्तान को लगता था कि भारत से युद्ध होने पर पापिस्तानी अपनी अंदरूनी लड़ाई भूल जायेंगे.
पापिस्तान ने अपने हिसाब से तो बहुत बढ़िया सोंचा था लेकिन उसे भारतीय सैनिको की वीरता का अंदाजा नहीं था. भले ही भारतीय सेना के पास आधुनिक हथियार नही थे और न ही उस समय कोई बहुत कुशल राजनैतिक नेतृत्व था, लेकिन भारतीय सेना में देश की रक्षा के लिए मरने मारने का जो जज्बा था वो दुनिया में शायद कहीं नहीं है.
उन दिनों पापिस्तान में राजनैतिक हालात बहुत खराब थे. पूर्वी पापिस्तान (बांग्लादेश) 26 मार्च 1971 को अपने आपको पापिस्तान से अलग स्वतंत्र देश घोषित कर चूका था. बंगलादेश पर जबरन कब्जा बनाए रखने के लिए पश्चिमी पापिस्तान बांग्लादेश की जनता पर बेतहाशा जुल्म कर रहा था. बहुत सारे बांग्लादेशी भारत की शरण में आ गए थे.
पूर्वी भारत (खासकर पश्चिमी बंगाल और बिहार) की जनता इंदिरा गांधी से बांग्लादेश में हस्तक्षेप करने को कह रही थी. मगर इंदिरा गांधी का कहना था कि यह पापिस्तान का आंतरिक मामला है हम इसमें कुछ नहीं कर सकते. भारत के इस ढुलमुल रवैये को पापिस्तान भी भारत की कमजोरी और अपनी ताकत समझ रहा था.
बांग्लादेश द्वारा खुद को आजाद देश घोषित किये हुए 8 महीने से ज्यादा हो चुके थे. बांग्लादेश में पापिस्तान का दमन चक्र जारी था, बांग्लादेश की जनता वहां से पलायन कर भारत में आ रही थी. उनकी हालत देखकर भारतीय बंगाली सबसे ज्यादा आक्रोश में थे. ऐसे में 3 दिसंबर 1971 को इंदिरा गांधी कोलकाता में लोगों को समझाने गई हुई थी.
पापिस्तान जल, थल, वायुसेना तीनो ही मामलों में आधुनिक हथियारों की द्रष्टि से भारत से बीस था. उसने भारत की पश्चिमी सीमा पर पैटर्न टैंको से लैस ब्रिग्रेड लगा दी थी. बंगाल की खाड़ी में "गाजी" नाम की पनडुब्बी भेज दी थी. अपने आपको हर तरह से मजबूत करने के बाद पपिस्तान ने 3 दिसंबर 1971 की शाम को भारत पर हवाई हमला बोल दिया.
इस हवाई हमले (आपरेशन चंगेज खान) के बाद भी इंदिरा गांधी युद्ध का निर्णय नहीं ले पा रही थी. भारतीय सेना का धैर्य जबाब दे रहा था. ऐसे में जनरल मानेकशा ने इंदिरा गांधी से कहा था कि- आप घोषणा करती हैं या फिर मैं खुद युद्ध की घोषणा करू ? तब कोई चारा न देख इंदिरा गांधी को पापिस्तान से युद्ध की घोषणा करनी पडी.
युद्ध की घोषणा के बाद युद्ध की सारी कमान जनरल मानेकशा ने अपने हाथ में ले ली. जनरल मानेकशा ने नेताओं के द्वारा, युद्ध को लेकर कोई बयान तक देने पर रोक लगा दी थी. उस 14 दिन के भीषण युद्ध में भारतीय सेना ने बहुत सीमित संसाधनों के साथ पापिस्तान को शिकस्त देकर आत्मसमर्पण करने को मजबूर कर दिया.
भारत पापिस्तान का यह तीसरा युद्ध कुल 14 दिन तक चला था. पापिस्तान के पास पनडुब्बी. पैटर्न टैक, अमेरिकन लड़ाकू विमान जैसे आधुनिक हथियार थे. लेकिन भारतीय सैनिको के हौशलों आगे उसके सारे आधुनिक अमरीकी हथियार फेल हो गए. 14 दिन के इस युद्ध में भारत ने पापिस्तान को धरती- जल -आकाश हर जगह मात दी.
16 दिसंबर 1971 को पापिस्तान ने भारत से हार मान ली और पापिस्तान की सेना ने भारतीय सेना के सामने आत्मसमर्पण कर दिया. 3 दिसंबर से 16 दिसंबर तक चले उस युद्ध की महत्वपूर घटनाओं को आपके सामने प्रतिदिन प्रस्तुत करने का प्रयास करूँगा. इन्हें पढ़कर आपको भारतीय सेना पर निश्चित रूप से गर्व महेसूस होगा.
इस युद्ध में भारतीय सेना का साथ आम नागरिको और स्वयंसेवकों से लेकर डाकुओं ने तक दिया था. इस श्रंखला को पढने के बाद आपको यह भी पता चल जाएगा कि - भारत पापिस्तान के उस युद्ध की जीत में इंदिरा गांधी का उतना ही योगदान था, जितना भारत को अंग्रेजों आजाद कराने में गांधीजी का था.