Friday, 9 March 2018

होली का महत्त्व

हमारा जीवन इतनी मुश्किलों और व्यस्तताओं से भरा हुआ है कि - हम अपने लिए समय ही नहीं निकाल पाते हैं. जीवन की इन्ही व्यस्ताओं से थोड़ा ब्रेक लेने और आनंद के पल उपलब्ध कराने के लिए ही हमारे पूर्वजो ने त्योहारों और उत्सवों का प्रावधान बनाया है. इन त्योहारों के बहाने हम कुछ समय के लिए कार्य से ब्रेक लेकर परिवार, रिश्तेदारों और मित्रों से मिल लेते हैं.
त्योहारों का चयन करते समय भी हमारे पूर्वजों ने बहुत ही बुद्धिमानी से काम लिया है. उन्होंने ऋतुओं की प्रवृत्ति, उन दिनों में मिलने वाली फल / वनस्पति, उस मौसम के समय हमारी शारीरिक / मानशिक आवश्यकताओं आदि का ध्यान भी रखा है. आज हम होली की बात करते हैं. होली की अग्नि को सर्दी को भष्म करने के प्रतीक के रूप में देखा जाता है.
बसंत पंचमी के बाद से ही प्रक्रति में नए फूल खिलने लगते हैं और चारों तरफ रंग बिखर जाते है. इसीलिए इसको रंगों का त्यौहार बनाया है. भारतीय कैलेण्डर विक्रम संवत के अनुसार होली के बाद साल का अंतिम पखवाड़ा होता है. इसलिए इसको कुछ विशेष बनाया गया है. इस मौके पर एक दुसरे को रंग लगाकर गले लगाते हैं और साल भर के गिले शिकवे भुला देते हैं.
यूँ तो होली का त्यौहार वैदिक युग से चला आ रहा है. भागवत, रामायण और महाभारत में अवध और ब्रज की होली का बहुत उल्लेख मिलता है. लेकिन इसको भव्य स्तर पर आयोजित करने का श्रेय उज्जैन के राजा वीर विक्रमादित्य को जाता है. राजा वीर विक्रमादित्य के समय में ही, ऋषि वराहमिहिर ने विक्रम संवत बाले कैलेण्डर का आविष्कार किया था.
विक्रमादित्य ने आखिरी पखवाड़े को ( होली से बर्षप्रतिपदा ) को अवकास का समय घोषित किया था. इस पखवाड़े के पहले 7 दिन मस्ती के लिए तथा बाद वाले 7 दिन नए साल की तैयारी के लिए निर्धारित किये थे. उज्जैन के आस पास के कई क्षेत्रों में आज भी होली पुरे एक सप्ताह तक चलती है. (कृपया उज्जैन के आस पास के मित्र इसकी पुष्टि करने की कृपा करें)
होली से लेकर अगले 7 दिन केवल मस्ती के लिए थे. राजा वीर विक्रमादित्य ने तो जनता को यहाँ तक की छुट दी थी कि - अगर कोई व्यक्ति राजा, अधिकारी, किसी साम्मानित व्यक्ति अथवा राजा की किसी नीति, आदि से नाराज है, तो वो होली के मौके पर उसका मजाक उड़ाकर उसपर अपनी नाराजगी जता सकता है, इसको अपराध नहीं माना जाएगा.
अपनी भड़ास निकालकर "बुरा न मानो होली है" कहने की परम्परा का प्रारम्भ उसी समय शुरू हुआ था. राजा वीर विक्रमादित्य ने यह नियम इसलिए बनाया था कि छोटे लोग अपने बड़ों तक बिना डरे अपनी शकायत पहुंचा सके और बड़े लोग छोटे लोगों की समस्याओं और आकांक्षाओं को जानकार उसके अनुसार अपने व्यवहार तथा नीति में बदलाब कर सकें.
आज हम होली के बहाने परिवार के साथ इकट्ठे होते हैं. एक दुसरे को अपने घर बुलाकर उनको विशेष पकवांन खिलाते. घर, मोहल्ले को साफ़ करते हैं. पुरानी गंदगी, कटुता, रंजिश को ख़त्म कर , स्वच्छता और मित्रता का वातावरण तैयार करते हैं. भारतेंदु हरिश्चंद्र ने सत्य ही लिखा था, यह त्यौहार ही हमारी असली म्युनिसपिल्टी हैं.li

Sunday, 25 February 2018

स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर

1857 की क्रान्ति की असफलता के बाद अधिकाँश भारतीय निराश होकर बैठ गए थे. वे यह मान चुके थे कि अंग्रेजों को पराजित करना असंभव है. तब पचास साल बाद महान स्वतंत्रता सेनानी "स्वतंत्र्यवीर सावरकर" ने देश को इस भ्रम से निकालने और देश को पुनः एक और बड़ी क्रान्ति के लिए खडा करने का कार्य किया, स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर ने अपना सारा जीवन देश के लिए समर्पित कर दिया था.
बहुत से लोग यह समझते हैं कि - देश में आजादी के आन्दोलन की शुरुआत कांग्रेस और गांधीजी ने की थी. जबकि 1885 में जन्मी कांग्रेस का अपने जन्म के तीन दशक बाद तक, इसमें कोई विशेष योगदान नही था. गांधी जी तो भारत में आये ही 1915 में थे. कांग्रेस के संस्थापक महासचिव एक अंग्रेज "ए ओ ह्यूम" थे, यह मात्र एक कुलीन वर्ग की संस्था थी. आजादी की लड़ाई में कांग्रेस बहुत बाद में शामिल हुई थी.
वीर सावरकर द्व्रारा "अभिनव भारत" की स्थापना, पुणे में विदेशी वस्त्रों की होली, "1857 - प्रथम स्वातंत्र समर" ग्रन्थ लिखना, नाशिक षड्यंत्र, कालापानी की सजा आदि जैसी बड़ी घटनाओं के होने के समय तक तो गांधीजी का भारत में आगमन तक नही हुआ था. "सावरकर" ने 1904 में "अभिनव भारत" नामक एक क्रान्तिकारी संगठन की स्थापना की थी, जिसने देशविदेश में क्रान्ति की लहर पैदा करदी थी.
1905 में उन्होने पुणे में विदेशी वस्त्रों की होली जलाई (गांधीजी से बहुत पहले) . सावरकर ने अंग्रेजों द्वारा प्रचारित ग़दर से सम्बंधित घटनाओं का अध्ययन कर उनका भारतीय सोंच के साथ बिश्लेषण किया और "गदर" को "भारत का प्रथम स्वाधीनता संग्राम" सिद्ध किया. 10 मई, 1907 को इन्होंने इंडिया हाउस, लन्दन में प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की स्वर्ण जयन्ती मनाई थी, जिसने विदेशों में रह रहे भारतीय भी माहौल बनाया.
उन्होंने "1857- प्रथम स्वातंत्र समर" नाम का ग्रन्थ लिखकर देशवाशियों में क्रान्ति की ज्वाला को भड़का दिया था. सभी क्रांतिकारी उसका धर्मग्रन्थ जैसा सम्मान करते थे. इसके लिए अंग्रेजों ने उन्हें कालापानी जेल भेज दिया, कालापानी जेल में उनपर खूंखार कैदियों की तरह अमानवीय अत्याचार किये जाते थे. 4- जुलाई,1911 से लेकर 21 मई, 1921 तक दस साल पोर्ट ब्लेयर की "कालापानी" जेल में रहकर अमानवीय यातनाएं झेलीं.
देश को आजादी दिलाने में उनके ग्रन्थ का बहुत बड़ा योगदान था. इस ग्रन्थ को चोरी छुपे छपवाना और प्रचारित करना उस युग में महान क्रांतिकारी कार्य माना जाता था. सावरकर के ग्रन्थ से नाराज अंग्रेज उन्हें बड़ी सजा देना चाहते थे, लेकिन किताब लिखना इतना बड़ा गुनाह नहीं था कि उन्हें उम्रकैद/फांसी दी जा सके, इसलिए उन्हें "नासिक" के कलेक्टर "जैकसन" की हत्या के षडयंत्र का आरोप लगाकर कालापानी की सजा दी गई थी,
आजाद भारत में कांग्रेस सरकार ने भी उनका महत्व कम करने की सदैव कोशिश की. उन की याचिका को, कांग्रेसी उनका माफीनामा बताकर देश को गुमराह करते रहते हैं, जबकि वह याचिका भी खारिज कर दी गई थी, और सावरकर को उसके 10 साल तक कालापानी तथा 3 साल तक रत्नागिरी जेल में रखा गया था. जेल से रिहाई के बाद भी उनपर खुफिया पुलिस की नजर रहती थी, पहले अंग्रेज सरकार फिर नेहरु सरकार द्वारा.
अंग्रेजी सरकार लम्बे समय तक केस चलाने के बाबजूद उन्हें "नासिक षड्यंत्र" में गुनाहगार साबित नही कर सकी और रिहा करना पडा. लेकिन कालापानी से रिहा होने के बाद भी तीन साल रत्नागिरी जेल में रखा गया. महान क्रांतिकारी "सरदार भगत सिंह" भी "वीर सावरकर से रत्नागिरी जेल में मिले थे. वीर सावरकर ने ही भगत सिंह को 'चन्द्र शेखर आजाद" के गुट में शामिल होने की सलाह दी थी.
सावरकर प्रारम्भ में पूरी तरह से धर्म निरपेक्ष थे. उन्होंने अपने ग्रन्थ में 1857 की लड़ाई में शामिल होने वाले सभी मुस्लिम वीरो को भी बहुत सम्मान दिया था. अंग्रेजी इतिहास में गलत बताये गए बहादुर शाह जफ़र, वाजिद अली शाह, बेगम हजरत महल, आदि को उन्होंने महान क्रान्तिकारी लिखा था. लेकिन 1921-24 में मालावार, कोहाट, मुल्तान, में हुए दंगे में हिन्दुओं पर हुए अत्याचार ने उनकी सोंच को हिन्दू हितैषी बना दिया था.
सावरकर अखंड भारत के पक्षधर थे लेकिन उनका यह भी मानना था कि - अंग्रेजों को भगाने और मुसलमानों को अलग मुस्लिमराष्ट्र ( पाकिस्तान) दिए जाने के बाद, शेष भारत को हिन्दुराष्ट्र घोषित किया जाना चाहिए. सावरकर का कहना था कि - राज्य की सीमायें नदी तथा पहाड़ों या नेताओं के सन्धि-पत्रों से निर्धारित नहीं होतीं, वे देश के नवयुवकों के शौर्य, धैर्य, त्याग एवं पराक्रम से निर्धारित होती हैं.
प्रथम स्वाधीनता संग्राम के वीरों सम्मान दिलाने वाले सावरकर को, आजाद भारत में खुद वह सम्मान नही मिला जिसके वे हक़दार थे. गांधीजी की ह्त्या के बाद 5 फ़रवरी 1948 को उन्हें भी प्रिवेन्टिव डिटेन्शन एक्ट धारा के तहत गिरफ्तार कर लिया गया था, जिसमे वे निर्दोष साबित हुए. 4 अप्रैल 1950 को पाकिस्तानी प्रधान मंत्री "लियाक़त अली ख़ान' के दिल्ली आगमन पर भी उन्हें बेलगाम जेल में बंद कर दिया था.
10 नवम्बर 1957 को नई दिल्ली में आयोजित हुए, "1857" के प्रथम भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम के "शाताब्दी समारोह" में वे मुख्य वक्ता रहे. 8 - अक्टूबर 1959 को उन्हें पुणे विश्वविद्यालय ने डी०.लिट० की मानद उपाधि से अलंकृत किया. 26 फ़रवरी 1966 को बम्बई में भारतीय समयानुसार प्रातः 10 बजे उन्होंने पार्थिव शरीर छोड़कर परमधाम को प्रस्थान किया.
राष्ट्र के महानायक को हम उनकी पुण्यतिथि पर एकबार फिर कोटि कोटि नमन करते हैं

"चंद्रमुखी" की "चांदनी". अब "चाँद के टुकड़े" में नहीं, तारों में दिखेगी










"चंद्रमुखी" की "चांदनी". अब "चाँद के टुकड़े" में नहीं, तारों में दिखाई देगी 
किसी के हाथ न आयेगी यह लड़की क्योंकि हवा में विलीन हो गई "हवा हवाई'
बालीबुड की "सल्तनत" पर बरसों राज करने वाली "रूप की रानी" नहीं रही
इस खबर को सुनकर एक "लम्हे" को तो विशवास भी नहीं हुआ.
शायद ही कोई ऐसा "हिम्मतवाला" या "जांबाज" उनका फैन होगा,
जिसे यह दुखभरी खबर सुनकर "सदमा" न लगा हो
बाल "कलाकार" के रूप में "जूली" फिल्म से फिल्मो से शुरुआत की
उनके "सोलहवा सावन" पार करते, ही फिल्मो को एक "नगीना" मिल गया.
"चाँद के टुकड़े" ने खूबसूरती की, ऐसी "चांदनी" बिखेर दी कि.
"इंसान जाग उठे" और "फ़रिश्ते" भी दीवाने हो गए.
उस पर उनका अथक "कर्म" तो "सोने पर सुहागा" ही था
जिसके दम पर उन्होंने, बेहतरीन फिल्मो का "तोहफा" दिया
इस "अक्लमन्द" हीरोइन ने, अपनी "हिम्मत और मेहनत" के बल पर
ऐसा "हल्ला बोल" दिया कि- फिल्मो में "इन्कलाब" सा आ गया.
"खुदा गवाह" है कि पहले कभी हीरोइन को इतना "लाडला" नहीं माना गया.
इस "शेरनी" के आगे बड़े बड़े "मि.इण्डिया" भी, "मिस्टर बेचारा" दिखाई देते थे.
तभी अचानक "नया कदम" उठाते हुए, वे शादी कर "सुहागन" बन गई
और फिल्मो को छोड़कर यह "चन्द्रमुखी" अपने "घरसंसार" में रम गई
अब उन्होंने अपनी "औलाद" के लिये, "माम" का फर्ज निभाना ही
अपने जीवन का "मकसद" बना लिया और फिल्मो को छोड़ दिया.
उनकी अचानक हुई मौत पर इतनी चर्चा को देखकर, कुछ "पत्थर के इंसान"
ऐसे चिढ रहे हैं जैसे वो फिल्मो में अभिनय करके "गैर कानूनी" काम करती थी
मैंने सोंच लिया है कि- ऐसे "गुमराह" लोगों को भी, "जबाब हम देंगे"
देखते हैं किसकी "मजाल" है जो इस पोस्ट पर आकर कोई उनके खिलाफ बोले
मुझे तो विस्वास ही नहीं हुआ कि - वो इतनी जल्दी "आख़िरी रास्ते" पर चली जायेंगी
मुझे "इंग्लिश विंग्लिस" तो आती नहीं, इसलिए हिंदी में ही ये "नजराना" पेश कर रहा हूँ.

Sunday, 11 February 2018

राजीव गांधी और कम्प्यूटर क्रान्ति

हमने कई कांग्रेसी मित्रों को अक्सर यह कहते सुना है कि- भारत में कम्प्यूटर राजीव गांधी की बजह से आया. अगर राजीव गांधी नहीं होते तो भारत में कम्प्यूटर नहीं आ सकता था. क्या कोई कांग्रेसी मित्र, चरणबद्ध तरीके से विस्तार से यह बता सकता है कि - राजीव गांधी ने भारत में कम्प्यूटर का कैसे विकास और विस्तार किया ?
क्या कोई बताना चाहेगा या फिर अपने पूर्वजों के रास्ते पर चलते रहेंगे ? जैसे आपके बाप दादा यह गाते रहे कि - गांधीजी ने "बिना खड्ग बिना ढाल के देश को आजाद करा दिया था" लेकिन जब उनसे पूंछते कि - कैसे कराया तो बगले झाँकने लगते थे. नेहरु को महान बताते थे लेकिन जब आजाद / बोस का जिक्र करते तो वे खामोश हो जाते.
इंदिरा की तारीफ में कसीदे पढ़ते कि- इदिरा ने बंगलादेश बनाया. लेकिन इस पर चुप हो जाते हैं कि- 3 दिसंबर 1971 तक इंदिरा पूर्वी पापिस्तान में कार्यवाही के खिलाफ थी और पापिस्तान के भारत पर हवाई हमले (आप्रेसन चंगेज खान) के बाद जनरल मानेकशा ने कहा था कि- सैन्य कार्यवाही की घोषणा कीजिए वर्ना तख्ता पलट देंगे.
राजीव गांधी की कम्प्यूटर क्रान्ति के बारे में कुछ बताएँगे या यह भी "बिना खड्ग बिना ढाल" वाले गीत की तरह ही चलता रहेगा. बैसे आपकी जानकारी के लिए बता दूं देश में कम्प्यूटर के किसी भी क्षेत्र में ( साफ्टवेयर हार्डवेयर) में किसी सरकारी कम्पनी का कोई विशेष योगदान नहीं रहा. इसमें सभी काम ज्यादातर निजी कम्पनियों ने किये हैं
टाटा ग्रुप ने "टाटा कन्सलटेनसी सर्विस" की स्थापना 1968 में और नरेंद्र पाटनी ने "पाटनी कम्प्यूटर सर्विस" की स्थापना 1972 में की थी जिसने 1978 में उत्पादन शुरू कर दिया था. प्रेमजी ने "विप्रो" की स्थापना 1980 में और नारायण मूर्ति ने "इनफ़ोसिस" की स्थापना 1981 में की थी, जबकि राजीव गांधी 1984 में प्रधानमंत्री बने थे.
राजीव गांधी अपनी माँ इंदिरा गांधी की हत्या के बाद भारत के प्रधानमंत्री बने थे. सहानुभुति के कारण भारी बहुमत मिल जाने के बाबजूद वे अपने कार्यकाल में कुछ ख़ास नहीं कर पाए. वे केवल अपने कुछ चाटुकारों के बीच घिरे रहते थे जिसके कारण पार्टी के अन्दर भी उनके खिलाफ बगावत हो और कई बड़े कांग्रेसी नेता पार्टी को छोड़ गए.
कांग्रेस को छोड़कर उन पूर्व कांग्रेसी नेताओं ने, राजीव गांधी के खिलाफ घोटालों के आरोप लगाए जिससे देश में कांग्रेस के खिलाफ माहौल बन गया और अगला आम चुनाव् कांग्रेस बुरी तरह से हार गई और उसके बाद से आजतक अकेले अपने दम पर सत्ता में नहीं आ सकी. इस प्रकार राजीव् के समय में कांग्रेस के पतन की शुरुआत हुई.
राजीव का कार्यकाल सिक्खों के कत्लेआम, भोपाल गैस काण्ड, शाहबानो केस, बोफोर्स घोटाला, रामजन्म भूमि का ताला खोलो आन्दोलन, आदि के लिए जाना जाता है. फिर भी यदि कोई कांग्रेसी मित्र, राजीव की कम्प्यूटर क्रान्ति के बारे में कुछ जानता है और देश को बताना चाहता है तो हम उसका स्वागत करते हैं.

गोवा के स्वतंत्रता दिवस (19 दिसंबर) पर हार्दिक शुभकामनाये

गोवा भारत के दक्षिण / पश्चिम क्षेत्र में स्थित छोटा सा राज्य है. सम्पूर्ण भारत के लोग इसे पर्यटन के स्वर्ग के रूप में मानते हैं. लेकिन देश के बहुत सारे लोगों को शायद यह मालूम नहीं है कि - अंग्रेजी शासन से भारत की आजादी के 14 साल के बाद गोवा पुर्तगाली शासन से आजाद हुआ और भारत का अभिन्न अंग बना.
गोवा का प्रथम वर्णन रामायण काल में मिलता है. सरस्वति नदी के सूख जाने पर उन लोगों को बसाने के लिए भगवान् परशुराम में कोंकण क्षेत्र को बसाया था. कोंकण का दक्षिणी क्षेत्र गोपपुरी कहलाता था. इस क्षेत्र के ब्राह्मण आज भी सारस्वत ब्राह्मण कहलाते हैं. यहां मौर्य, शुंग, चालुक्य, शाक्य, कदम्ब वंशो का शासन रहा.
सन 1483-84 में गोवा मुस्लिम शासक युशुफ आदिल खान के अधिकार में आ गया. लगभग 27 वर्ष के मुस्लिम शासन रहने के बाद सन 1510 में पुर्तगाली "अलफांसो द अल्बुबर्क" ने यहाँ आक्रमण कर अधिकार कर लिया. तब से यहाँ पुर्तगालियों का कब्ज़ा हो गया. गोवा के सामरिक महत्व को देखते हुए पुर्तगाल ने यहाँ बहुत धन खर्च किया.
1809 - 1815 के बीच नेपोलियन ने पुर्तगाल पर कब्ज़ा कर लिया और एंग्लो पुर्तगाली गठबंधन के बाद गोवा स्वतः ही अंग्रेजी अधिकार क्षेत्र में आ गया.1815 से 1947 तक गोवा में अंग्रेजो का शासन रहा. 1947 में भारत से अपना नाजायज कब्जा छोड़ते समय अंग्रेजों ने "गोवा, दमन, द्वीव, दादरा और नगर हवेली" को पुर्तगाल को सौंप दिया.
जब भारत से ब्रिटिश शासन को उठाने की बात चल रही थी तब ही अंग्रेजों ने "गोवा, दमन, द्वीव, दादरा और नगर हवेली" को पुर्तगाल को सौंपने की बात शुरू कर दी थी. 18 जून 1946 को डा. राम मनोहर लोहिया ने इन सबको भी साथ ही आजाद करने की मांग की, लेकिन गांधी और नेहरु ने इस पर रहस्यमयी खामोशी बनाय रखी.
भारत में ब्रिटिश शासन ख़त्म हो जाने के बाद पुर्तगाल ने "गोवा, दमन, द्वीव, दादरा और नगर हवेली" का जमकर शोषण करना प्रारम्भ कर दिया था. क्षेत्र में छोटे होने तथा गुजरात के बीच में होने के कारण दादरा और नगर हवेली में सबसे पहले राष्ट्रवाद का उदय होना सुरु हुआ तथा पुर्तगाली शासन से आजादी की मांग उठानी शुरू की.
1953 में गोवा सरकार के एक बैंक कर्मचारी अप्पासाहेब कर्मलकर ने नेशनल लिबरेशन मूवमेंट संगठन (NLMO) शुरू की. उन्होंने नेहरु से इस कार्य के लिए मदद मांगी मगर नेहरु ने इसमें कोई रूचि नहीं ली. तब उन्होंने इसके लिए "राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ" से मदद मांगी. संघ का शीर्ष नेतृत्व इसके लिए तैयार हो गया.
20 जुलाई 1954 को पुणे से सैकड़ो संघ कार्यकर्त्ताओं का पहला जत्था वापी को निकला. संघ के स्वयंसेवको ने आज़ाद गोमान्तक दल के साथ मिलकर 2 अगस्त 1954 को दादरा और नगर हवेली को आजाद करा लिया. स्वतंत्र होने के बावजूद, दादरा-नगर हवेली को पुर्तगाली संपत्ति के रूप में माना जाता रहा.
दादरा / नगर हवेली के आजाद होने के बाद गोवा, दमन और द्वीव में भी आजादी की मांग उठने लगी. 15 अगस्त 1955 में गोवा को पुर्तगाल शासन से मुक्त करने के लिये 3000 सत्याग्रहियों ने आन्दोलन शुरू किया जिस पर पुर्तगाली सरकार ने गोली चलवा दी जिसमे लगभग 30 अहिंसक प्रदर्शनकारी मारे गए.
इसके बाद वहां जगह जगह प्रदर्शन होने लगे. गोवा की जनता भारत सरकार से मदद मांग रही थी लेकिन अमेरिका के भय से भारत सरकार सैन्य कार्यवाही करने से डर रही थी. इस बीच महाराष्ट्र और गुजरात के राष्ट्रवादी हिन्दुओं का वहां काफी प्रभाव हो चूका था. देश की जनता का सरकार पर लगातार दवाव बढ़ता जा रहा था.
नेहरु सरकार गोवा में किसी भी हस्तक्षेप के खिलाफ थी. वहां की हिन्दू जनता पर अत्याचार हो रहे थे. उनको जबरन गौमांस खाने को बाध्य किया जा रहा था. घर में तुलसी का पौधा होना भी गिरफ्तार करने के लिए पर्याप्त कारण माना जाता था. भारत की जनता और सेना भी गोवा को सैन्य कार्यवाही कर आजाद कराना चाहती थी.
दादरा / नगर हवेली को पुर्तगालियों से आजाद कराने के कारण, गोवा / दमन / द्वीव के हिन्दूओ ने भी "राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ" से मदद मांगी. संघ के स्वयंसेवकों ने उनकी मदद का आश्वासन दिया. महाराष्ट्र, गुजरात और कर्नाटक के स्वयंसेवको ने गोवा का प्रवास करना प्रारम्भ कर दिया. देखते ही देखते वहां अनेकों स्थान पर शाखा लगने लगी.
पुर्तगाली सरकार ने संघ की शाखा पर प्रतिबन्ध लगा दिया और संघ से जुड़े गोवा वाशियों को गिरफ्तार कर जेल में डालना शुरू कर दिया. भारत सरकार ने भी इसके लिए संघ को मना किया. इसी बीच 24 नवम्बर 1961 को पुर्तगाली सेनाओं ने एक भारतीय नौसैनिक जहाज पर हमला कर दिया. अब भारत के पास हमले की बजह भी थी
भारत ने गोवा को पुर्तगालियों से मुक्त करने के लिए आपरेशन विजय शुरू किया जिसकी जिम्मेदारी सेना की दक्षिणी कमान को सौंपी गई. भारतीय सेना ने चारो ओर से, जल थल एवं वायु सेना की उस समय की आधुनिकतम तैयारियों के साथ, दिसम्बर 17-18 की रात में ऑपरेशन विजय के अंतर्गत सैनिक कार्यवाही शुरू कर दी.
युद्ध में थल सेना की कमान मेजर जनरल के.पी. कैंथ को दी गयी. 40 घंटे की लड़ाई के बाद गोवा की पुर्तगाली सेना ने, भारतीय सेना के सामने हथियार डाल दिए. 2 सिख लाइट इन्फैंट्री ने 19 दिसम्बर 1961 की सुबह पणजी के सचिवालय भवन पर तिरंगा फहरा दिया. भारतीय सेना गोवा पर 450 साल से चले आ रहे पुर्तगाली शासन का अंत कर दिया.
दूसरी तरफ गुजरात के संघ के स्वयंसेवक भारी संख्या में तिरंगा लेकर ने दमन और द्वीव में घुस गए. वहां की जनता ने भी उनका स्वागत किया. पुर्तगाली अधिकारियों ने बिना बिरोध के समर्पण कर दिया.और इस प्रकार गोवा के साथ साथ दमन, दीव, दादरा और नगर हवेली का भी आधिकारिक तौर पर भारत में विलय हो गया.

"दादरा नगर हवेली" का स्वाधीनता आन्दोलन और आरएसएस

"दादरा और नगर हवेली" के स्वाधीनता दिवस (2 अगस्त 1954) पर हार्दिक शुभकामनाये और दादरा नगर हवेली को पुर्तगालियों से आजाद कराकर भारत में शामिल करने वाले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवको को हार्दिक अभिनंदन. बहुत से लोगों को पता नहीं है कि - दादरा, नगर हवेली, गोवा, दमन, द्वीव. की आजादी में संघ का हाथ है.
15 अगस्त 1947 को भारत के आजाद होने के बाद भी गोवा, दमन, द्वीव. दादरा, नगर हवेली, आदि आजाद नहीं हुए थे. अंग्रेजों ने इन्हें पुर्तगाल को सौंप दिया था. भारत की आजादी से पहले प्रख्यात समाजवादी नेता डा. राममनोहर लोहिया ने इनकी भी आजादी की मांग उठाई थी. लेकिन नेहरू ने उनकी इस मांग को कोई महत्त्व नहीं दिया.
18 जून 1946 को डा. राममनोहर लोहिया ने, गोवा, दमन, द्वीव. दादरा, नगर हवेली, आदि की आजादी की आवाज सबसे पहले उठाई थी मगर उनकी बातों पर न सरकार ने ध्यान दिया और न ही उन क्षेत्रों की जनता ने. देश की आजादी के बाद भी उन्होंने लोगों को जाग्रत करने के प्रयास किये मगर उनके प्रयासों को ख़ास सफलता नहीं मिली.
1953 में गोवा सरकार के एक बैंक कर्मचारी अप्पासाहेब कर्मलकर ने नेशनल लिबरेशन मूवमेंट संगठन (NLMO) शुरू की. उन्होंने नेहरु से इस कार्य के लिए मदद मांगी मगर नेहरु ने इसमें कोई रूचि नहीं ली. तब वे विश्वनाथ लावंडे, दत्तात्रेय देशपांडे, प्रभाकर सीनरी और श्री. गोले के साथ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नेताओं से मिले.
ये लोग उस समय रा.स्व. संघ के महाराष्ट्र के सर्वोच्च अधिकारी श्री बाबाराव भिड़े व श्री विनायक राव आप्टे से मिले और उनके सम्मुख सशस्त्र क्रांति की योजना रखी. सर्वश्री शिवशाहीर बाबा साहब पुरन्दरे, संगीतकार सुधीर फड़के, खेलकूद प्रसारक राजाभाऊ वाकणकर, शब्दकोश रचयिता विश्वनाथ नरवणे, आदि ने सहमति जताई.
अंतिम निर्णय श्री गुरु जी को लेना था. सुधीर फडके और नाना काजरेकर (जो मुक्ति के पश्चात्‌ दादरा नगर हवेली के पुलिस अधिकारी बने) ने गुरु जी को तैयार करने का जिम्मा लिया. सारी योजना को समझने के बाद गुरु जी ने अभियान चलाने की अनुमति दे दी. लेकिन इसके लिए पुख्ता रणनीति बनाने पर जोर दिया.
पहले क्षेत्र के लोगों को आजादी के लिए तैयार करके फिर हमले की योजना बनाई गई थ. पुणे महानगर पालिका के सदस्य "श्रीकृष्ण भिड़े" और "बाबा साहब पुरन्दरे" को जुझारू स्वयं सेवको चूनने और नासिक स्थित "भोंसले मिलिट्री स्कूल" के एक प्रशिक्षक "मेजर प्रभाकर कुलकर्णी" को उन्हें ट्रेनिंग देने की जिम्मेदारी दी गई.
इतने बड़े अभियान को सफल करने हेतु आर्थिक सहायता की जरूरत थी. यह जिम्मेदारी सुधीर फडके ने ली. उन्होंने स्वर सम्राज्ञी लता मंगेशकर को अभियान जानकारी देते हुए पुणे के हीराबाग मैदान में "लता मंगेशकर-रजनी' का कार्यक्रम आयोजित किया. इसके अलाबा अनेकों व्यापारियों ने इस कार्य के लिए स्वेच्छा से धन दिया.
बाबा साहब पुरन्दरे, विश्वनाथ नरवणे, नाना काजरेकर आदि को सैन्य अभियान का नेतृत्व करना था. हथियरों को जमा करने की जिम्मेदारी श्री राजाभाऊ वाकणकर पर थी. "सुधीर फडके" ने संगीत कार्यक्रमों के बहाने दादरा / नगर हवेली में प्रवास कर वहां की जनता को जाग्रत करने और माहौल बनाने का काम भी किया.
संघ के कार्यकर्त्ताओं ने उस क्षेत्र के दौरे करने शुरू कर दिए. इस प्रकार युद्धस्थल की छोटी-छोटी जानकारी, स्थानीय समर्थन, शस्त्र सामग्री एवं पैसा, इकट्ठा होने के पश्चात्‌ श्री बाबाराव भिड़े ने पुणे के तरुणों को प्रतिज्ञा दिलाई. माहौल बनाने के बाद 20 जुलाई 1954 को पुणे से कार्यकर्त्ताओं का पहला जत्था वापी को निकला.
आज़ाद गोमान्तक दल के सदस्य तथा अन्य आजादी के चाहवान लोग भी उनके साथ मिल गए. 22 जुलाई को दादरा पुलिस स्टेशन पर हमला बोला और पुलिस उप-निरीक्षक अनिसेतो रोसारियो का बध करके वहां तिरंगा फहरा दिया. दादरा को मुक्त घोषित कर "जयंतीभाई" देसाईं को दादरा पंचायत का मुखिया बना दिया गया.
28 जुलाई 1954 को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और आज़ाद गोमान्तक दल के स्वयंसेवक ने नारोली के पुलिस चौकी पर हमला बोला और पुर्तगाली अफसरों को आत्मसमर्पण करने पर मजबूर कर दिया और नारोली को आजाद किया. अगले दिन, 28 जुलाई को स्वतंत्र नारोली की ग्राम पंचायत की स्थापना हुई.
तब तक गुजरात और महाराष्ट्र के हजारों स्वयंसेवक दादरा और नगर हवेली में पहुँच चुके थे. स्थानीय जनता का भी उनको बहुत सहयोग मिल रहा था. 2 अगस्त 1954 को सभी पुर्तगाली अधिकारियों ने सरेंडर कर दिया और राष्ट्रवादियों से सिलवासा के सरकारी कार्यालयों पर तिरंगा लगाया और अप्पासाहेब कर्मलकर को प्रथम प्रशासक चुन लिया.
अप्पासाहेब कर्मलकर ने दादरा / नगर हवेली को आजाद घोषित कर भारत में विलय की घोषणा कर दी, लेकिन भारत सरकार ने फिर भी उनसे दूरी बना कर रखी. स्वतंत्र होने के बावजूद, दादरा-नगर हवेली को पुर्तगाली संपत्ति के रूप में माना जाता रहा. सात साल तक दादरा / नगर हवेली का शासन ऐसे ही चलता रहा.
1961 में जब गोवा /दमन /द्वीव भी आजाद हो गया तब उसके साथ दादरा / नगर हवेली को भी केंद्रशासित राज्य का दर्जा मिला. दादरा / नगर हवेली की आजादी तथा गोवा / दमन / द्वीव की आजादी और भारत में विलय के लिए सबसे पहले आवाज उठाने वाले लोहिया और इस काम को अंजाम पर पहुंचाने वाले आरएसएस को हार्दिक अभिनन्दन.

Sunday, 4 February 2018

चित्तौड़गढ़ : भाग-7 ( रणथम्भौर और हठी हम्मीर )

इस गाथा का चित्तौड़ से कोई सम्बन्ध नहीं है लेकिन जिस कालखंड की चर्चा पिछली पोस्ट्स में हुई है उसके हिसाब से यह गाथा बताना भी महत्त्वपूर्ण है. श्रंखला की कंटीन्यूटी बनी रहे इसलिए इसको शीर्षक "चित्तौड़गढ़ : भाग-7" दे रहा हूँ. हम्मीर देव चौहान, पृथ्वीराज चौहान के वंशज थे. उन्होने रणथंभोर पर 1282 से 1301 तक राज किया था.
वे रणथम्भौर के सबसे महान शासकों में से एक माने जाते हैं. हम्मीर देव के पिता का नाम जैत्रसिंह चौहान एवं माता का नाम हीरा देवी था. वे इतिहास में ‘‘हठी हम्मीर" के नाम से प्रसिद्ध हुए हैं. हम्मीर देव 1282 में रणथम्भौर के शासक बने. हम्मीर देव रणथम्भौर के चौहान वंश के सर्वाधिक प्रतापी, शक्तिशाली एवं महत्वपूर्ण शासक थे.
उन्होंने अपने बाहुबल से विशाल साम्राज्य स्थापित कर लिया था. हम्मीर रासौ के अनुसार रणथम्भौर साम्राज्य उज्जैन से लेकर मथुरा तक एवं मालवा (गुजरात) से लेकर अर्बुदाचल तक हो गया था. हम्मीर देव के वारे में कहा जाता है कि- वो अगर कोई हठ (अर्थात - निश्चय) कर ले वो उसको पूरा किये बिना पीछे नहीं हटते थे.
उनके हठ (अर्थात - दृढ निश्चय) को लेकर अनेको महाकाव्य लिखे गए जिनमे जोधराज शारंगधर द्वारा रचित "हम्मीर रासो" और न्यायचन्द्र सूरी द्वारा रचित "हम्मीर महाकाव्य" अत्यंत प्रसिद्ध हैं. उनके हठ को लेकर "हम्मीर महाकाव्य" में लिखा है - "सिंह गमन तत्पुरूष वचन, कदली फले इक बार। त्रिया तेल हम्मीर हठ, चढ़े न दूजी बार"॥
दिल्ली के सुलतान गुलाम बंश के अंतिम शासक "कय्यूम" की हत्या कर "जलालुद्दीन खिलजी" दिल्ली का सुलतान बन गया था. उसने सुलतान बनते ही 1291 में रणथम्भौर पर आक्रमण किया. हम्मीर देव ने उसे बहुत आसानी से हराकर खदेड़ दिया. जलालुद्दीन ने 1292 में दो बार फिर हमले किये लेकिन हम्मीर देव ने उसे दोनों बार मार भगाया.
उसके बाद जलालुद्दीन खिलजी की दोबारा कभी हिम्मत नहीं हुई रणथम्भौर पर हमला करने की. 1296 में जलालुद्दीन के भतीजे और दामाद "अलाउद्दीन खिलजी" ने, जलालुद्दीन की हत्या कर दी और खुद सुलतान बन गया.सुल्तान बनने के बाद उसने 1298 में गुजरात पर हमला किया, सोमनाथ को लूटा और रानी कमला देवी को उठा लाया.
वापसी में उसने अपने सेना नायक उल्गू खान को रणथम्भौर पर हमला करने का आदेश दिया. इस लड़ाई में भी हम्मीर देव ने खिलजी की सेना को मार भगाया और गुजरात की लूट का माल और हथियार भी छीन लिए. उस धन से हम्मीर देव ने गुजरात सोमनाथ मंदिर, उजजैन के महाकालेश्वर मंदिर और पुष्कर के ब्रह्मा मंदिर का पुनरुद्धार कराया.
इस घटना के बाद अलाउद्दीन खिलजी को रणथम्भौर और भी खटकने लगा. इसी बीच मंगोल से नवी मुसलमान बने, खिलजी के एक मंगोल रिश्तेदार "मुहम्मद शाह" के अवैद्ध सम्बन्ध खिलजी की एक रानी "चिमना" से हो गए थे. मालिक काफूर को इसका पता चल गया और उसने खिलजी को इसकी खबर करदी, इसपर खिलजी आग बबूला हो गया.
खिलजी के भय मुहम्मद शाह अपने साथियों के साथ हम्मीर देव के पास पहुँच गया और चालाकी से उनसे अपनी प्राणरक्षा का बचन ले लिया. अलाउद्दीन खिलजी ने विशाल सेना लेकर रणथम्भौर पर घेरा डाल दिया, लेकिन 9 महीने के घेरे के बाद भी वह हम्मीर देव को झुका नहीं पाया. इसी बीच हम्मीर देव के दो सेना नायक खिलजी से मिल गए.
रणमल और रतिपाल को खिलजी ने रणथम्भौर का राजा बनाने का बचन देकर अपने साथ मिला लिया था. रणमल और रतिपाल ने किले के कमजोर हिस्सों को बारूद से उडा दिया. तब हम्मीर देव ने "शाका" करने का निर्णय लिया. राजपूत केसरिया बाना पहन कर अंतिम युद्ध के लिए तैयार हो गए महिलाओं ने जौहर की तैयारी कर ली.
11जुलाई 1301 को किले के फाटक खोलकर खिलजी की सेना पर टूट पड़े. रणथम्भौर की सेना संख्या में कम थी लेकिन उनके हौसले बुलंद थे. उन्होंने खिलजी की सेना को गाजर मूली की तरह काटना शुरू कर दिया और देखते ही देखते खिलजी की सेना अपने हथियार, तम्बू, झंडे, आदि अपना सब सामान छोड़कर भाग खड़ी हुई.
हम्मीर देव के सैनिको ने वो सारा सामान उठा लिया और किले की तरफ वापस चल पड़े. उन्होंने खिलजी की सेना के झंडे भी उठा लिए थे. बस यहीं उनसे गलती हो गई. खिलजी के झंडों को देखकर किले की महिलाओं को लगा कि- उनके लोग मारे गए हैं और खिलजी की सेना किले पर कब्ज़ा करने आ रही है और वे जौहर की अग्नि में कूद गईं.
जब हम्मीर देव किले में पहुंचे तो महिलाओं को जौहर की अग्नि में जलता देखकर उनको बहुत दुःख हुआ. मन की शांति के लिए शिव मंदिर में गए और प्राश्चित स्वरूप अपना सर काटकर भगवान् शिव के चरणों में चढ़ा दिया. अलाउद्दीन को जब इस घटना का पता चला तो वह वापस लौट आया और उसने दुर्ग पर कब्जा कर लिया.
रणमल और रतिपाल ने रणथम्भौर का राजा बनाने को कहा तो खिलजी ने दोनों का सर कलम करने का आदेश देते हुए कहा कि - जो अपनों का नहीं हुआ वो हमारा क्या होगा. 1563 ई. में बूँदी के एक सरदार सामन्त सिंह हाड़ा ने बेदला और कोठारिया के चौहानों की सहायता से मुस्लिमों से यह क़िला वापस छीन लिया था.