Friday, 23 June 2017

फिरोज गांधी : प्रसिद्ध परिवार का गुमनाम व्यक्ति



एक व्यक्ति जो खुद सांसद रहा हो, जिसका ससुर, पत्नी और एक बेटा देशा का प्रधान मंत्री रहा हो, जिसका दुसरा बेटा और एक बहू प्रधानमंत्री से भी ज्यादा ताकतवर रहे हों, जिसकी दुसरी बहु भी मंत्री रही हो और जिसके दो पोते भी सांसद हों, वो व्यक्ति इतना "गुमनाम" कैसे हो सकता है? क्या देश को उनके बारे में पता नहीं होना चाहिए ?
जी हाँ, मैं बात कर रहा हूँ "फिरोज गांधी" की , जिनका विवाह इंदिरा गांधी से हुआ था. फिरोज गांधी के बारे में कोई प्रामाणिक जानकारी नहीं मिली है. लेकिन विबिन्न किताबो और वेवसाइट्स पर जो जानकारी उपलब्ध है उनमे से फिरोज गांधी पर जानकारी ढूँढ़ कर, उसको तर्क की कसौटी पर कस कर, संकलित करने का प्रयास कर रहा हूँ .
फिरोज गांधी का धर्म "पारसी" बताया जाता रहा है. उनके बारे में जानकारी निकालने पर पता चलता हैं कि - उनकी माँ (रत्तीमाई) पारसी थी और पिता ( जहांगीर खान) मुसलमान थे. उनकी माँ भी बाद में मुसलमान बन गई थीं. फिरोजगांधी का अंतिम संस्कार भी हिन्दू या पारसी की तरह नहीं, बल्कि मुस्लिम रीत रिवाज से हुआ था.
हैदराबाद से प्रकाशित होने वाले प्रतिष्ठित उर्दू अखबार "दैनिक मुंसिफ" ने इस तरह का दावा किया है. इस अखबार ने "नेहरू डायनेस्टी" के लेखक "के. एन.राव" के हवाले से दावा किया गया कि - इंदिरा और फिरोज ने लंदन में एक मस्जिद में जाकर निकाह कर लिया था और इंदिरा को मुसलमान धर्म स्वीकार करना पड़ा.
जब इस बात की सूचना नेहरु को मिली तो वे इंदिरा से नाराज हो गए, मगर महात्मा गांधी ने इन दोनों को भारत बुला कर वैदिक पद्धति से उनकी शादी करवा दी. फिरोज जहांगीर खान का नाम, कथित रूप से फिरोज गांधी घोषित कर दिया गया. एक लेखक "मोहम्मद यूनुस" ने अपनी पुस्तक में लिखा था कि संजय गांधी का खतना भी किया गया था.
विकीपीडिया में दावा किया गया है कि - इंदिरा से शादी से पहले, फिरोज के कमला नेहरु से संबंधो की भी अफवाहे उड़ी थी. कुछ शरारती लोगों ने इलाहाबाद में इनके बारे में पोस्टर भी लगा दिए. जेल में बंद जवाहरलाल नेहरू ने इस बारे में खोजबीन के लिए रफ़ी अहमद किदवई को इलाहाबाद भेजा लेकिन किदवई ने इसे को पूरी तरह से बेबुनियाद पाया. लेकिन इसके बाबजूद नेहरु आजीवन कमला और फिरोज से नाराज बने रहे .
एक बार "मीनू मसानी" आनंद भवन में मेहमान थे. वो नाश्ता कर रहे थे कि अचानक नेहरू ने उनकी तरफ़ मुड़ कर कहा था, मानू क्या तुम कल्पना कर सकते हो कि कोई मेरी पत्नी के प्रेम में भी फंस सकता है? मीनू ने तपाक से जवाब दिया, मैं ख़ुद उनके प्रेम में पड़ सकता हूँ. इस पर कमला तो मुस्कराने लगीं, लेकिन नेहरू का चेहरा गुस्से से लाल हो गया."
फिरोज गांधी ने कांग्रेस में रहते हुए भी कांग्रेसियों के भ्रष्टचार के खिलाफ आवाज उठाई थी. फिरोज गांधी को भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाने वाला पहला व्यक्ति माना जाता है. उन्होंने अपने युग के आर्थिक घोटाले (मूंदड़ा कांड, जीप घोटाला) का पर्दाफाश किया था और उसके कारण तत्कालीन वित्त मंत्री टीटी कृष्णामचारी को इस्तीफा देना पड़ा था.

किसी व्यक्ति की मृत्यु के बाद उसका अंतिम संस्कार उसके धार्मिक रीत रिवाज के अनुसार करने का प्रावधान थे. हिन्दुओं में मृत शरीर को अग्नि में जलाया जाता है, मुस्लिम्स में दफनाया जाता है तथा पारसियों में चील कौओं को खिलाया जाता है. "दैनिक मुंसिफ" का दावा है कि - फिरोज गांधी को मुस्लिम रीत रिवाज से, इलाहाबाद के कब्रिस्तान में दफनाया गया था.

Sunday, 11 June 2017

उनाकोटि शिव मंदिर श्रंखला ( उनाकोटि, कैलाश शहर, त्रिपुरा )

भारत का नार्थ ईष्ट अनेको रहस्य समेटे हुए है. उनमे एक बहुत बड़ा रहस्य है "उनाकोटि". इस स्थान को ज्यादा प्रचार नहीं मिला है वरना इसको दुनिया के सात अजूबों में स्थान मिलना चाहिए था. वर्तमान केंद्र सरकार और त्रिपुरा सरकार ने नार्थईस्ट में पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए, उनाकोटि के बारे में शेष भारत को जागरूक करना प्रारम्भ किया है.
इस बर्ष 26-जनवरी की निकाली गई त्रिपुरा की झांकी का थीम भी उनाकोटि को रखा गया था. उनाकोटि का अर्थ होता है करोड़ में एक कम. यहाँ पर भगवान शिव की गाथाओं के ऊपर, एक करोड़ में एक कम ( अर्थात - 99,99,999 ) मूर्तियाँ बनी हुई हैं. इनमे में कुछ को विशाल पहाडी चट्टानों पर उकेरा गया है तथा कुछ को पत्थर के बड़े टुकड़ों पर बनाया गया है.
ऐसा माना जाता है कि - माता सती के द्वारा अपने पिता के यग्य में भष्म होकर प्राण त्याग देने के बाद, भगवान् शिव उनके शव को अपने कंधे पर रखकर, तांडव करते हुए विश्व में विचरण करने लगे, जिससे दुनिया में प्रलय आने की संभावना हो गई, तब भगवान् विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से माता सती के शव के टुकड़े करना प्रारम्भ कर दिया .
माता सती के शव के अंग जहाँ जहाँ गिरे वे स्थान शक्ति पीठ कहलाते हैं. उनका आखिरी अंग गुवाहाटी के पास कामाख्या में गिरा था. उसके बाद भगवान् शिव का मोह समाप्त हो गया और उन्होंने तांडव को रोक दिया, परन्तु वे बिना कुछ कहे त्रिपुरा के घने जंगल में समाधि लेकर, तपस्या में लीन हो गए. उसके बाद ही शिव को "त्रिपुरारी" भी कहा जाने लगा.
उन दिनों एक राक्षस "तारकासुर" ने धरती पर आतंक मचाना शुरू कर दिया था. उसको कोई मार नहीं सकता था क्योंकि उसे वरदान प्राप्त था कि - केवल भगवान् शिव का पुत्र ही उसका वध कर सकता है और भगवान शिव का कोई पुत्र था नहीं. इसी बीच माता सती ने "देवी पार्वती" के रूप में दोबारा जन्म ले लिया, परन्तु भगवान् शिव अपनी समाधि में ही लींन रहे.
माता पार्वती शिव को पुनः पाने के लिए तप करने लगी. भगवान् शिव में कामना को जगाने के लिए और उनकी तपस्या भंग करने लिए, देवताओं ने "कामदेव" को भेजा. कामदेव और रति ने उनके तप को भंग तो कर दिया, लेकिन शिव के क्रोधित होकर अपना तीसरा नेत्र खोलने से, कामदेव वहीँ भस्म हो गया. क्रोध शांत होने पर देवताओं ने उनको सब समझाया. कामदेव के नाम पर ही नार्थईस्ट का यह क्षेत्र कामरूप कहलाता है.

तब त्रिपुरा के उसी क्षेत्र में माता पार्वती और भगवान शिव का विवाह हुआ और कालांतर में उनके पुत्र कार्तिकेय के हाथों तारकासुर का बध हुआ. कहा जाता है कि - जब भगवान् शिव समाधि में लीन थे, तब कल्लू कुम्हार नामक एक मूर्तिकार ने ने उनकी बहुत सेवा की थी. माता पार्वती और शिव के विवाह में भी उसने बहुत योगदान दिया था.
जब भगवान् शिव वहां से अपने कैलाशधाम को जाने लगे, तो कल्लू कुम्हार ने भी उनके साथ चलते की जिद की. भगवान् शिव उसको सीधे मना भी नहीं कर सकते थे और साथ ले जाना भी संभव नहीं था. इसलिए उन्होंने कल्लू कुम्हार से कहा कि - अगर तुम एक रात में एक करोड़ मूर्तियाँ बना दो, तो हम तुमको भी अपने साथ कैलाश धाम ले जायेंगे.
भगवान् शिव के सानिध्य में रहने से कल्लू को भी दिव्य शक्तिया प्राप्त हो चुकी थीं. उसने उन शक्तियों का प्रयोग करके रातों रात एक करोड़ मूर्तियों का निर्माण कर दिया. लेकिन सुबह जब उनकी गिनती की गई तो, एक करोड़ में एक कम पाई गई. तब भगवान शिव ने कल्लू से कहा कि - तुम यही रहो, यहाँ आने वाला प्रत्येक व्यक्ति तुमको मेरे साथ साथ याद करेगा.
शिव पुराण में भी इस स्थान का जिक्र है. भगवान् शिव के कैलाशधाम जाने के बाद, कल्लू कुम्हार उस स्थान की देखभाल करने लगा. यह स्थान पौराणिक काल का प्रमुख तीर्थ स्थल बन गया था, परन्तु कालान्तर में पूर्वोत्तर में बौद्ध धर्म का प्रभाव बढ़ने के बाद, यह स्थान गुमनामी में खो गया. विधर्मियों के शासन और सुदूर क्षेत्र में होने से लोग इसे भूलने लगे.
त्रिपुरा सरकार और वर्तमान केंद्र सरकार ने इस स्थान को महत्वपूर्ण धार्मिक पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने का सकल्प लिया है. इस स्थान पर अच्छी सुविधाए मिलने के बाद देशवासी निश्चित रूप से वहां जाना पसंद करेंगे. यदि ऐसा होता है तो पूर्वोत्तर को शेष भारत से सांस्क्रतिक रूप से जोड़ने में यह स्थान बहुत ही सहायक साबित होगा.

Friday, 9 June 2017

जब राष्ट्र संकट में हो, तो राष्ट्रभक्त किसी निमंत्रण की प्रतीक्षा नही करते.

मगध पर मौर्य वंश का 10 वां राजा "वृहदरथ" राज करता था. वह बहुत ही कायरता वाली मानशिकता का व्यक्ति था. लेकिन अपनी कायरता को छुपाने के लिए अपने आपको अहिंसा का पुजारी बताता था. उसके शासन में सेना को कोई सम्मान नहीं था.
उसके सेनापति का नाम था पुश्यमित्र शुंग. सेनापति पुश्यमित्र शुंग बहुत ही वीर, साहसी और दूरदर्शी था. उन्ही दिनों यवनों ने भारत पर आक्रमण कर दिया. सेनापति पुश्यमित्र ने राजा "वृहदरथ" से युद्ध करने की अनुमति मागी लेकिन राजा ने मना कर दिया.
राजा "वृहदरथ" का कहना था कि - हम यवनों को महात्मा बुद्ध के उपदेश सुनाकर, अहिंसा के रास्ते पर ले आयेंगे. लेकिन इधर यवन मारकाट मचाते हुए लगातार भारत पर चढ़े आ रहे थे. तब सेनापति पुश्यमित्र शुंग ने बिना अनुमति यवनों का रास्ता रोक लिया.
भारत की सेना ने यवनों का संहार कर दिया. सेनापति पुश्यमित्र शुंग ने न तो किसी भी यवन को भागने दिया और न ही किसी यवन को बंदी बनाया. उसने पूरी यवन सेना का बध कर दिया. विजय का समाचार पाकर भी "वृहदरथ" अपने सेनापति पुश्यमित्र से नाराज रहा.
युद्ध की समाप्ति पर सेनापति पुश्यमित्र शुंग ने सैनिको के पथ संचलन (परेड) का कार्यक्रम रखा, जिसमे राजा "वृहदरथ" को सैनिको को बधाई और पुरुष्कार देने थे लेकिन राजा ऐसा करने के बजाय राजाज्ञा उलंघन के लिए सेनापति की आलोचना करने लगा.
वृहदरथ ने पूछा - अहिंसा का अनुसरण करने वाले राज्य में तुमने किसकी आज्ञा से यवनों पर आक्रमण किया. इस पर क्रोधित होकर सेनापति पुश्यमित्र शुंग ने कहा जब - जब राष्ट्र संकट से घिरा हो तो राष्ट्रभक्त किसी निमंत्रण पत्र की प्रतीक्षा नही करते.
और यह कहकर अपनी तलवार के एक ही वार से राजा वृहदरथ का सर काट दिया.एक पल को सन्नाटा छा गया. तब सेनापति ने आगे बढ़कर कहा - " न तो वृहदरथ महत्वपूर्ण था और न मैं महत्वपूर्ण हूँ, अगर महत्व है तो सिर्फ और सिर्फ मातृभूमि का है."
पुश्यमित्र शुंग के ऐसे बचन सुनकर सेना और आम जनता सेनापति की जय जयकार करने लगी और मंत्री परिषद् ने पुश्यमित्र शुंग को अपना नया राजा घोषित कर दिया. इस प्रकार मौर्यवंश का साम्राज्य ख़त्म हुआ और "शुंग वंश" का सूत्रपात हुआ.

Wednesday, 31 May 2017

पुष्यमित्र शुंग

सनातन धर्म के महान रक्षक “
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चक्रवर्त्ती “सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य” और उनके पोते “सम्राट अशोक” ने अपने बाहुवल और राजगुरु चाणक्य के बुद्धिबल के योग से एक शक्तिशाली साम्राज्य खडा किया था. लेकिन अशोक का मन युद्ध से उचट जाने और बौद्ध बन जाने के बाद, सनातन धर्म की उपेक्षा होने लगी तथा बौद्ध मत को महिमामंडित तथा बौद्धों का तुष्टीकरण होने लगा.

सनातन धर्म को मानने वालों को, अपना धर्म छोकर बौद्ध बनने पर मजबूर किया जाने लगा था.अशोक के शासनकाल में तो लोग मजबूरी में खामोश रहे लेकिन अशोक के कमजोर उत्तराधिकारियों के समय में अनेको राजा सर उठाने लगे. मौर्यवंश के सबसे कमजोर शासक “वृहदरथ” के समय तक बिदर्भ, कलिंग, स्यालकोट जैसे कई राज्य स्वतंत्र हो गए.

अहिसावादी होने के कारण बौद्ध लोग सेना तथा सैनिकों को सम्मान नहीं देते है इस कारण सेना में भी बौद्ध शासको के खिलाफ “बगावत” की भावना पनपने लगी थी. साम्राज्य पर मौर्य बंश की पकड़ कमजोर होने लगी थी. “वृहदरथ” के कुशासन से परेशान प्रजा, राजा “वृहदरथ” से ज्यादा उसके सेनापति “पुष्यमित्र शुंग” को पसंद करती थी.
सेना और जनता का दिल जीत चुके सेनापति पुष्यमित्र शुंग” ने एक दिन राजा वृहदरथ का बध कर दिया और स्वयं राजा बन गया. देश की जनता और सेना राजा “वृहदरथ” इतना ज्यादा निराश थी कि – उसने ख़ुशी से “पुष्यमित्र शुंग” को अपना राजा स्वीकार कर लिया. राजा बनते ही “पुष्यमित्र शुंग” ने सनातन धर्म को पुनः स्थापित करना प्रारम्भ कर दिया.
“पुष्यमित्र शुंग” जन्म से ब्राह्मण था और कर्म से क्षत्रीय. उसने सेना को पुनः सगठित किया और स्वतंत्र हो चुके बिदर्भ, कलिंग, स्यालकोट, आदि राज्यों को फिर से मगध में मिला लिया. “पुष्यमित्र शुंग” के समय में यवनों के भी कई हमले हुये मगर अपनी वीरता और चतुराई से उसने हर हमले को नाकाम कर यवनों को भागने पर मजबूर कर दिया. “पुष्यमित्र शुंग”  के शासन काल में बौद्ध बने सनातनियों ने पुनः घर वापसी कर ली 
“पुष्यमित्र शुंग” ने वैदिक / सनातन धर्म की स्थापना के लिए बहुत काम किये. उसने जगह जगह मंदिर और यग्यशालाओं का निर्माण किया. बौद्ध शासन में बंन्द कर दिए गए प्राचीन वैदिक / सनातन धर्म के अनुष्ठान करने प्रारम्भ कर दिए गए. अपने राज्य का विस्तार करने के लिए उसने रामायण में वर्णित “अश्वमेघ यग्य” का दो बार आयोजन किया.
इस यग्य के प्रधान पुरोहित महर्षि “पतंजली” थे. उनके यग्य के घोड़े को सिन्धू नदी के तट पर यवनों ने पकड़ लिया था तब उनके पौत्र “वसुमित्र” ने भीषण युद्ध में यवनों को परास्त कर घोड़े को छुडाया और सिंध तक मगध राज्य का विस्तार किया. कुछ बर्ष बाद उन्होंने पुनः अश्वमेघ यग्य किया, लेकिन तब किसी ने घोड़े को पकड़ने का साहस नहीं किया.
उनके समय में योग और आयुर्वेद का बहुत विकास हुआ. सड़कों के किनारे छायादार ब्रक्ष लगवाये गए. मार्ग में हर पांच कोस की दूरी के बाद एक छोटी सी चौकी बनाई जहाँ व्यापारी अपने काफिले के साथ सुरक्षित रूप से, रात्री विश्राम कर सकें. “पुष्यमित्र शुंग” के शासन काल में भारत पुनः एक शक्तिशाली और सम्रद्ध राष्ट्र बन गया था.

पुष्यमित्र की महानता का सबसे बड़ा परिचय इस बात से मिलता है कि - उसके राज में सनातन धर्म का प्रचार-प्रसार करते हुए भी, कभी महात्मा बुद्ध का अपमान नहीं किया गया और बल्कि महात्मा बुद्ध को भी विष्णु का अवतार घोषित कर, उनको भगवान् का दर्जा दिया गया. उसके राज में किसी भी बौद्ध मठ और स्तूप में कोई छेड़छाड़ की गई.
“पुष्यमित्र शुंग” में बौद्ध मठों और स्तूपों को भी भगवान का घर कह कर सम्मान दिया गया और उनको भी तीर्थ घोषित किया गया. पुष्यमित्र के शासन काल में बौद्ध बने ज्यादातर सनातनियों ने पुनः घर वापसी कर ली थी लेकिन वे लोग सनातन धर्म के देवी देवताओं की तरह, भगवान् बुद्ध की पूजा करने के लिए भी स्वतंत्र थे
पुष्यमित्र ने 36 वर्ष (185-149 ई. पू.) तक राज्य किया. उसका साम्राज्य हिमालय से नर्मदा नदी तक और सिन्धु से पूर्वी समुद्र तक विस्तृत था. पुष्यमित्र एवं उसके उत्तराधिकारियों के शासनकाल में लगाए गए शिलालेखों से उसके समय में विशाल, मजबूत और सम्रद्ध भारतबर्ष का परिचय मिलता है. सनातन धर्म के महान रक्षक की जय हो.

महारानी अहिल्याबाई होलकर

रानी अहिल्याबाई छोटे से राज्य इंदौर की रानी थी, लेकिन उन्होंने जिस तरह से अपने राज्य का कुशल संचालन किया तथा उसे सशक्त और सम्रद्ध बनाया, उसके लिए उनका नाम महान साम्राज्ञी के रूप में लिया जाता है. उन्होंने मुग़ल काल में तोड़े गए अनेको मंदिरों का पुनरुद्धार कराया था, इसके लिए उनको हिन्दू ह्रदय साम्राज्ञी भी कहा जाता है.
अहिल्याबाई का जन्म 31 मई सन् 1725 में एक साधारण परिवार में हुआ था, लेकिन उनकी विद्वता से प्रभावित होकर, इन्दौर के महाराजा "मल्हार राव होल्कर" ने अपने पुत्र "खंडेराव" का विवाह उनसे से करवा दिया. उनके एक पुत्र (मालेराव) और एक पुत्री (मुक्ताबाई) थी. राजा मल्हार राव ने अपनी पुत्रबधू को सैन्य प्रशिक्षण भी दिल्बाया.

जब वे मात्र 29 बर्ष की थीं और बच्चे भी बहुत छोटे थे, तब ही सन 1754 में उनके पति "खंडेराव" का देहांत हो गया. पति के देहांत के बाद उन्होंने राज्य का संचालन सम्हाला और अपने स्वसुर के मार्गदर्शन में, उन्होंने इतनी कुशलता से राज्य का प्रशासन चलाया कि - उनकी गणना आज दुनिया के आदर्श शासकों में की जाती हैं.
रानी अहिल्याबाई भगवान शिव की भक्त थीं. उन्होंने भगवान् शिव को राज्य का राजा घोषित किया था तथा स्वयं उनकी सेविका बनकर राज्य का संचालन किया. उनका रहन-सहन बिल्कुल सादा था. जितनी कुशकता से वे राज्य का संचालन करती थी उतनी ही निष्ठा से वे भगवान का पूजन और श्रेष्ठ धर्मग्रंथो का अध्ययन करती थीं.
उन्होंने अपने राज्य के प्रशासन को जिला, तहसील और पंचायत में बाँट दिया. जिलों का कार्य उनके मंत्री देखते थे लेकिन अंतिम निर्णय रानी अहिल्याबाई का ही होता था. उनके शासन में व्यवसाय का बहुत विस्तार हुआ. दूर दूर से आकर कारीगर वहां बसने लगे और देखते ही देखते मालवा बस्त्र निर्माण का केंद्र बन गया.
उस समय नियम था कि पति की म्रत्यु के बाद यदि पुत्र न हो तो सम्पति पर सरकार का कब्जा हो जाता था उन्होंने विधवा को सम्पत्ति का अधिकार दिलवाया. वे युद्ध के समय में हाथी पर बैठकर स्वयं युद्ध का नेत्रत्व करती थीं. वे भगवान शिव की भक्ते थीं और इसलिए उन्हों ने 1777 में विश्व प्रसिद्ध काशी विश्वनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण कराया.
इसके अलावा उन्होंने काशी, गया, सोमनाथ, अयोध्या, मथुरा, हरिद्वार, द्वारिका, बद्रीनारायण, रामेश्वर, जगन्नाथ पुरी इत्यादि प्रसिद्ध तीर्थस्थानों पर मंदिर बनवाए और तीर्थयात्रियों के लिए धर्म शालाएं खुलवायीं. कलकत्ता से बनारस तक की सड़क, बनारस में अन्नपूर्णा का मन्दिर , गया में विष्णु मन्दिर उनके बनवाये हुए हैं.
इसके अतिरिक्त इन्होंने अनेको नदियों पर घाट बनवाए, कुओं औरबावड़ियों का निर्माण करवाया, मार्ग बनवाए, भूखों के लिए अन्नक्षेत्र (लंगर) खोले, प्यासों के लिए प्याऊ बिठलाईं, मंदिरों में विद्वानों की नियुक्ति की तथा शास्त्रों के मनन-चिंतन और 
प्रवचन की भी अनेकों व्यवस्थाएं कीं. 13 अगस्त सन् 1795 को उनका स्वर्गवास हो गया.

Sunday, 28 May 2017

गौ-ह्त्या का उद्देश्य

गौ-ह्त्या का उद्देश्य : सस्ता मांस नहीं बल्कि हिन्दुओं को अपमानित करना है
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भारत में प्राचीन काल में गौ-हत्या होती थी या नहीं, यह विवाद का बिषय हो सकता है लेकिन यह निर्विवाद सत्य है कि - महाभारत काल (श्री कृष्ण के समय) से गौ-ह्त्या पूर्ण रूप से प्रतिबंधित हो गई थी और गायों को पूजने की परम्परा बन गई थी. तब से लेकर अब तक भारतीयों द्वारा गाय को देवी का दर्जा मिला हुआ है.
भारत में गौ-हत्या और गौ-मांस भक्षण मोहम्मद गौरी के आक्रमण के बाद प्रारम्भ हुआ. ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की सलाह मानकर, गायों को आगे रखकर हिन्दुओं पर हमला करके ही गौरी ने बिजय पाई थी. उसने हारे हुए हिन्दुओ को मुसलमान समय, उनकी धार्मिक आस्था को तहस नहस करने के लिए गौ-मांस खिलाया था.
हिन्दुओं को गौ-मांस खिलाने का उद्देश्य, प्रोटीन खिलाकर तगड़ा बनाना नहीं था बल्कि उनकी धार्मिक आस्था को मटियामेट करना था. जैसे कभी किसी से लड़ाई होने पर किसी के द्वारा किसी की माँ अथवा बहन को गाली देना, उसकी माँ अथवा बहन के साथ कुछ करना नहीं होता है बल्कि सामने वाले बिरोधी के स्वाभिमान पर चोट करना होता है.
पहले कई बार पढने / सुनने को मिलता था कि - बकरीद के मौके पर मुस्लिम बहुल इलाकों में गायों को सरेआम सड़कों पर दौडाया, उनको घायल किया और सरेआम काट दिया. वो उनका कोई धार्मिक रिवाज नहीं था बल्कि हिन्दुओं को अपमानित करने के लिए किया जाता था. राष्ट्रवादी सरकार बन्ने के बाद ऐसी खबरे आनी बंद हो चुकी हैं.
अंग्रेजों ने भी भारतीयों को अपमानित करने के लिए यही तकनीक इस्तेमाल की. उन्होंने मुह से खोलने बाले कारतूसों में गाय और सूअर की चर्बी लगाई. ऐसा नहीं था कि - गाय और सूअर की चर्बी से कारतूस बढ़िया हो जाता था. उनको तो सिर्फ एक चिकना और गाढा पदार्थ ही चाहिए था, जो खनिज अथवा पेट्रोलियम ग्रीस से भी काम चल सकता था.
अंग्रेजों ने जानबूझकर कारतूस में गाय और सूअर की चर्बी लगाईं. अगर चर्बी जरुरी थी तो वे चाहते तो दो तरह के कारतूस भी बना सकते थे. दो अलग रंग के पैकेट बना सकते थे. कारतूस के पैकेट लाल हरे दो रंग के बना सकते थे. लाल रंग का पैकेट में सूअर की चर्बी और हरे रंग के पैकेट में गाय की चर्बी लगा सकते थे लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया.
अंग्रेज भारतीयों की अंतरआत्मा को कुचलने, उनको गुलाम होने का बार-बार अहेसास कराने के लिए गाय और सूअर की चर्बी बाला कारतूस बनाते थे. आज भी जो लोग गौ-ह्त्या करते हैं या गौ-मांस की वकालत करते हैं उनका उद्देश मांस नहीं बल्कि हिन्दुओं को अपमानित करना तथा हिन्दुओं के स्वाभिमान को कुचलना है है.
आज केरल में कांग्रेसियों ने गाय के बछड़े को काटा है और उसका वीडियों वायरल किया है. ऐसा करके उन्होंने और कुछ नहीं बल्कि केंद्र की भाजपा सरकार को चुनौती दी है कि - आप चाहे कुछ भी कर लो हमें रोक नहीं पाओगे. ऐसी हरकतें करके कांग्रेस मुसलमानों को दिखाना चाहती है कि - केवल वही भाजपा को टक्कर देने में सक्षम है.

स्वातंत्र्यवीर सावरकर

द्वितीय स्वतंत्रता संग्राम के सूत्रधार "स्वातंत्र्यवीर सावरकर" के जन्मदिवस (28 मई) पर कोटि कोटि नमन
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1857 की क्रान्ति की असफलता के बाद अधिकाँश भारतीय निराश होकर बैठ गए थे. वे यह मान चुके थे कि अंग्रेजों को पराजित करना असंभव है. तब पचास साल बाद महान स्वतंत्रता सेनानी "स्वतंत्र्यवीर सावरकर" ने देश को इस भ्रम से निकालने और देश को पुनः एक और बड़ी क्रान्ति के लिए खडा करने का कार्य किया. स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर ने अपना सारा जीवन देश के लिए समर्पित कर दिया था.
बहुत से लोग यह समझते हैं कि - देश में आजादी के आन्दोलन की शुरुआत कांग्रेस और गांधीजी ने की थी. जबकि 1885 में जन्मी कांग्रेस का अपने जन्म के तीन दशक बाद तक, इसमें कोई योगदान नही था. कान्ग्रेस पार्टी अंग्रेजों द्वारा बनाये गये, अंग्रेज टाईप भारतीयों का क्लब मात्र थी. गांधी जी तो भारत में आये ही 1915 में थे. कांग्रेस के संस्थापक महासचिव एक अंग्रेज "ए ओ ह्यूम" थे, यह मात्र एक कुलीन वर्ग की संस्था थी. आजादी की लड़ाई में कांग्रेस बहुत बाद में शामिल हुई थी.
वीर सावरकर द्व्रारा "अभिनव भारत" की स्थापना, पुणे में विदेशी वस्त्रों की होली, "1857 - प्रथम स्वातंत्र समर" ग्रन्थ लिखना, नाशिक षड्यंत्र, कालापानी की सजा आदि जैसी बड़ी घटनाओं के होने के समय तक तो गांधीजी का भारत में आगमन तक नही हुआ था. "सावरकर" ने 1904 में "अभिनव भारत" नामक एक क्रान्तिकारी संगठन की स्थापना की थी, जिसने देशविदेश में क्रान्ति की लहर पैदा करदी थी.
1905 में उन्होने पुणे में विदेशी वस्त्रों की होली जलाई (गांधीजी से बहुत पहले) . सावरकर ने अंग्रेजों द्वारा प्रचारित ग़दर से सम्बंधित घटनाओं का अध्ययन कर उनका भारतीय सोंच के साथ बिश्लेषण किया और "गदर" को "भारत का प्रथम स्वाधीनता संग्राम" सिद्ध किया. 10 मई, 1907 को इन्होंने इंडिया हाउस, लन्दन में प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की स्वर्ण जयन्ती मनाई थी, जिसने विदेशों में रह रहे भारतीय भी माहौल बनाया.
उन्होंने "1857- प्रथम स्वातंत्र समर" नाम का ग्रन्थ लिखकर देशवाशियों में क्रान्ति की ज्वाला को भड़का दिया था. सभी क्रांतिकारी उसका धर्मग्रन्थ जैसा सम्मान करते थे. इसके लिए अंग्रेजों ने उन्हें कालापानी जेल भेज दिया, कालापानी का जेल अधीक्षक "मिर्जाखान" क्रांतिकारियों पर बहुत जुल्म करता था. मिर्जाखान ने उन पर भी खूंखार कैदियों की तरह अमानवीय अत्याचार किये. 4- जुलाई,1911 से लेकर 21 मई, 1921 तक दस साल पोर्ट ब्लेयर की "कालापानी" जेल में रहकर अमानवीय यातनाएं झेलीं.
देश को आजादी दिलाने में उनके ग्रन्थ का बहुत बड़ा योगदान था. इस ग्रन्थ को चोरी छुपे छपवाना और प्रचारित करना उस युग में महान क्रांतिकारी कार्य माना जाता था. सावरकर के ग्रन्थ से नाराज अंग्रेज उन्हें बड़ी सजा देना चाहते थे, लेकिन किताब लिखना इतना बड़ा गुनाह नहीं था कि उन्हें उम्रकैद/फांसी दी जा सके, इसलिए उन्हें "नासिक" के कलेक्टर "जैकसन" की हत्या के षडयंत्र का आरोप लगाकर कालापानी की सजा दी गई थी,
आजाद भारत में कांग्रेस सरकार ने भी उनका महत्व कम करने की सदैव कोशिश की. 1913 की याचिका को, कांग्रेसी उनका माफीनामा बताकर देश को गुमराह करते रहते हैं, जबकि वह याचिका भी खारिज कर दी गई थी, और सावरकर को उसके 8 साल बाद तक कालापानी तथा 3 साल तक रत्नागिरी जेल में रखा गया था. जेल से रिहाई के बाद भी उनपर खुफिया पुलिस की नजर रहती थी, पहले अंग्रेज सरकार फिर नेहरु सरकार द्वारा
अंग्रेजी सरकार लम्बे समय तक केस चलाने के बाबजूद उन्हें "नासिक षड्यंत्र" में गुनाहगार साबित नही कर सकी और रिहा करना पडा. लेकिन कालापानी से रिहा होने के बाद भी तीन साल रत्नागिरी जेल में रखा गया. क्रांतिकारी करतार सिंह सराभा के कहने पर, "सरदार भगत सिंह" भी "वीर सावरकर से जेल में मिले थे. सावरकर ने ही भगत सिंह को 'चन्द्र शेखर आजाद" के गुट में शामिल होने की सलाह दी थी.
सावरकर प्रारम्भ में पूरी तरह से धर्म निरपेक्ष थे. उन्होंने अपने ग्रन्थ में 1857 की लड़ाई में शामिल होने वाले सभी मुस्लिम वीरो को भी बहुत सम्मान दिया था. अंग्रेजी इतिहास में गलत बताये गए बहादुर शाह जफ़र, वाजिद अली शाह, बेगम हजरत महल, आदि को उन्होंने महान क्रान्तिकारी लिखा था. लेकिन 1921-24 में मालावार, कोहाट, मुल्तान, में हुए दंगे में हिन्दुओं पर हुए अत्याचार ने उनकी सोंच को हिन्दू हितैषी बना दिया था.
सावरकर अखंड भारत के पक्षधर थे लेकिन उनका यह भी मानना था कि - अंग्रेजों को भगाने और मुसलमानों को अलग मुस्लिमराष्ट्र ( पाकिस्तान) दिए जाने के बाद, शेष भारत को हिन्दुराष्ट्र घोषित किया जाना चाहिए. सावरकर का कहना था कि - राज्य की सीमायें नेताओं के सन्धि-पत्रों से निर्धारित नहीं होतीं, वे देश के नवयुवकों के शौर्य, धैर्य, त्याग एवं पराक्रम से निर्धारित होती हैं. सावरकर के अनुसार अंग्रेजों और अंग्रेजों के पिट्ठू राजाओं / नेताओं को कोई हक़ नहीं कि वे आजाद भारत की सीमाएं तय करें.
प्रथम स्वाधीनता संग्राम के वीरों सम्मान दिलाने वाले सावरकर को, आजाद भारत में खुद वह सम्मान नही मिला जिसके वे हक़दार थे. गांधीजी की ह्त्या के बाद 5 फ़रवरी 1948 को उन्हें भी प्रिवेन्टिव डिटेन्शन एक्ट धारा के तहत गिरफ्तार कर लिया गया था, जिसमे वे निर्दोष साबित हुए. 4 अप्रैल 1950 को पाकिस्तानी प्रधान मंत्री "लियाक़त अली ख़ान' के दिल्ली आगमन पर भी उन्हें बेलगाम जेल में बंद कर दिया था.
10 नवम्बर 1957 को नई दिल्ली में आयोजित हुए, "1857" के प्रथम भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम के "शाताब्दी समारोह" में वे मुख्य वक्ता रहे. 8 - अक्टूबर 1959 को उन्हें पुणे विश्वविद्यालय ने डी०.लिट० की मानद उपाधि से अलंकृत किया. 26 फ़रवरी 1966 को बम्बई में भारतीय समयानुसार प्रातः 10 बजे उन्होंने पार्थिव शरीर छोड़कर परमधाम को प्रस्थान किया.
राष्ट्र के महानायक को हम उनके जन्मदिवस पर एक बार फिर कोटि कोटि नमन करते हैं