Saturday, 7 October 2017

खजुराहो

खजुराहो भारत के मध्य प्रदेश प्रान्त में स्थित एक प्रमुख शहर है जो अपने प्राचीन एवं कलात्मक भवनों के लिये विश्वविख्यात है. खजुराहो का इतिहास लगभग एक हजार साल पुराना है. यह शहर चन्देल साम्राज्‍य की प्रथम राजधानी था. खजुराहो के मंदिरों का निर्माण 950 ईसवीं से 1050 ईसवीं के बीच चन्देल राजाओं द्वारा किया गया था.

खजुराहो में यूं तो अनेकों ऐसे प्राचीन भवन और मंदिर हैं जिनको वास्तुकला का असाधारण नमूना कहा जा सकता है, लेकिन खजुराहों की प्रसिद्धि की मुख्य बजह वह भवन हैं जिनमे संभोग की विभिन्न मुद्राओं को कलात्मक रूप से उभारा गया है. दुनिया भर के पर्यटक, "प्रेम" के इस अप्रतिम सौंदर्य के प्रतीक को देखने के लिए, निरंतर आते रहते है.

भारत और भारतीय संस्क्रति के दुश्मन, इन भवनों और उनमे बनाई गई मूर्तियों को लेकर, अक्सर भारतीय संस्क्रति का अपमान भी करते रहते हैं जबकि सारा विश्व इन्हें दुनिया को भारत की अनमोल देन मानता है. खजुराहो के भवनों में जो दिखाया गया है वह भी जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा है जिसको आमतौर पर खुले आम प्रदर्शन नहीं होता है.

तब इन भवनों को बनाने का आखिर क्या उद्देश्य रहा होगा ? हमें गर्व है कि भारत में जीवन के प्रत्येक क्षेत्र को जान्ने और समझने की निरंतर प्रिक्रिया चलती रहती आई है. हमारी संस्क्रति में "काम" को बहुत ही महत्वपूर्ण माना गया है. इसको सबसे बड़े "पुरुषार्थ" में भी गिना जाता है और इसे जीवन की सबसे बड़ी "बुराई" भी माना जाता है.

हमारे पूर्वजों ने जीवन के प्रत्येक अंग का गहन अध्यन किया है. जीवन का विस्त्रत अध्यन करने के बाद उन मनीषियों ने प्रत्येक मनुष्य के लिए चार पुरुषार्थ ( धर्म, अर्थ, काम, और मोक्ष ) बताये हैं. "काम" के महत्त्व को समझते हुए इसे जीवन का एक महत्वपूर्ण पुरुषार्थ कहा गया है. क्योंकि काम के द्वारा ही स्रष्टि, आगे से आगे चलती है.

इसी प्रकार जिन चार बुराइयों ( काम, क्रोध, लोभ और मोह) को सबसे ज्यादा विनाशकारी बताया गया है उन चार महा बुराइयों मे भी "काम" को रखा गया है. अर्थात "काम" जब तक सृजन के लिए है तब तो वह एक पुरुषार्थ है और अगर यही "काम" अनियंत्रित होकर कामंधता में बदल जाए तो महाविनाशकारी भी हो जाता है.

खजुराहो के भवनों में इसी "कामकला" को सिखाया गया है. सभी बड़े भवनों को आमतौर पर मदिर भले ही कह दिया जाता हो लेकिन यह भवन वास्तव में कोई उपासना स्थल नहीं है और न ही यहाँ कोई पूजा पाठ करने जाता है. यह एक तरह से प्राचीन काल के "हनीमून प्वाइंट" जहां लोग "क्वालिटी टाइम" बिताने और कुछ सीखने आते थे.

इन भवनों के साथ मंदिर शब्द जोड़कर, वो असभ्य और बर्बर जातियां, भारतीय संस्क्रति का सबसे ज्यादा मजाक उडाती हैं जिनके यहाँ कामान्धता धर्म का हिस्सा है. जिनके यहाँ औरत को इंसान तक नहीं समझा जाता है. लड़ाई में शत्रु को हराने के बाद शत्रु के परिवार की स्त्रियों को सताना, जहां जीत की निशानी समझा जाता है.

खजुराहो के यह भवन दुनिया भर के लोगों को "कामज्ञान" देने और "छुट्टी मनाने" के लिए जाने के स्थल हैं न की कोई उपासना स्थल. यह मनोरंजन के स्थल है तीर्थस्थल नहीं है. इनका अपना बहुत बड़ा महत्त्व है. पति पत्नी को एक साथ एक बार यहाँ अवश्य जाना चाहिए और मनोरजन के साथ प्राचीन "काम ज्ञान" को समझना चाहिए.

इसका महत्त्व वो लोग नहीं समझ सकते जिनके यहाँ लोग सत्ता के लिए अपनी 9 साल की बेटी को 54 साल आदमी को सौंप देते हैं, इस बर्बर समुदाय के लोग भले ही खजुराहो के भवनों को लेकर भारतीय संस्क्रति का मजाक उड़ाते हो लेकिन यह हकीकत है कि - इंटरनेट पर अश्लील चित्र और फिल्मे देखने में भी यही लोग सबसे आगे हैं.

Monday, 18 September 2017

एक था "पर्शिया"

एक देश था पर्शिया. वहां के लोग बहुत ही शांतिप्रिय थे, वे लोग संत "जरथुस्त्र" के अनुयाई थे. जरथुस्त्र का समय 1500 ई.पू. का माना जाता है. यह लोग अग्नि की पूजा करते थे. यह लोग केवल व्यापार में लगे रहते थे, इनका लड़ाई झगडे से कोई वास्ता नहीं था. लगभग सारी दुनिया में इनका व्यापार फैला हुआ था.
हम लोग जिस "पारस" पत्थर की कहानिया पढ़ते सुनते आये हैं कि - पारस के छूने से मिट्टी भी सोना बन जाती है, वो दरअसल पारसियों की व्यापार नीति ही है. पारसी जिस चीज का भी व्यापार करते उसमे तरक्की करते हैं. समुद्री और जमीनी रास्तों से इन्होने अपने व्यापार को लगभग सारी दुनिया में पहुंचा दिया था.
दुनिया के सबसे संपन्न लोगों में इनकी गिनती होती थी. लगभग 2200 साल तक परसिया ने बहुत तरक्की की. इसी बीच एक 7वीं शताव्दी में अरब में एक नहीं बिचारधारा का जन्म हुआ, जिसका नाम था इस्लाम. इसके कुछ अनुयायी भी पर्शिया में भी आये. पारसी बहुत खुश थे कि - उनको बहुत सस्ते मजदूर मिल रहे हैं.
पारसियों ने उनका दिल खोलकर स्वागत किया. उनको अपने यहाँ अच्छे से रखा. धीरे धीरे उनकी संख्या बढ़ने लगी, पारसियों ने इसपर कोई ध्यान नहीं दिया. धीरे धीरे वहां लड़ाई झगडे शुरू हो गए. लेकिन अमीर पारसी सोंचते थे कि- जमीन और धन तो हमारा ही है ये लोग तो हमारे सस्ते नौकर हैं इनसे हमको क्या खतरा.
पारसियों के पास धन तो बहुत था लेकिन सेना नहीं थी, शान्तिप्रिय व्यापारी होने के कारण वो इसकी जरूरत ही महेसूस नहीं करते थे. कुछ बर्षों में वहां मुस्लिम्स की संख्या बहुत ज्यादा बढ़ गई. इसी बीच अरबों और तुर्कों ने पर्शिया पर बर्बर हमले करने शुरू कर दिये. पारसियों का बड़े पैमाने पर कत्लेआम हुआ और उनकी सम्पत्ति छीन ली गई.
ज्यादातर पारसियों ने अपनी जान बचाने के लिए धर्मपरिवर्तन कर लिया लेकिन कुछ पारसी अपनी जान बचाने के लिए भारत जाने में कामयाब रहे. भारत ने उनको शरण, सुरक्षा और व्यापार का मौक़ा दिया. उन पारसियों ने भी अपने व्यापार कौशल का भारत में भी इस्तेमाल किया और भारत की तरक्की में अपना भरपूर योगदान दिया.
पर्शिया अब पारसियों का देश नहीं रहा. वह एक इस्लामी देश "ईरान" बन चूका था. पारसी धर्म के प्रतीक वहां सदियों तक विधमान रहे. 1979 में "अयातुल्ला खोमैनी" ने इस्लामिक रेवलूशन के नाम पर, जोरोऐस्ट्रेनियन पूजास्थलों के प्रतीकों में आग लगा दी और मूर्तियों को तोड़कर उनकी जगह अयातुल्ला खोमैनी की तस्वीरें लगा दी.
अरब के मुसलमान आज भी अपने आपको सच्चा मुसलमान तथा पर्शिया के मुसलमानों को हुए शिया मुसलमान मानते हैं. इन्ही मतभेद के कारण सऊदी अरब (सुन्नी) और ईरान (शिया) के बीच टकराव हर काल में ही होता रहा है. अरब के लोग अन्य मुल्कों के गैर सुन्नी लोगों को मुसलमान तक नहीं मानते हैं.
वे शियाओं को तो इस्लाम से खारिज तक ही कर देते हैं. कुछ बर्ष पहले सऊदी किंग द्वारा स्थापित इस्लामिक ऑर्गेनाइजेशन के चीफ और सऊदी अरब के सबसे बड़े धर्मगुरु मुफ्ती अब्दुल अजीज अल-शेख ने घोषणा कर दी थी कि - ईरानी लोग मुस्लिम नहीं हैं. क्योंकि वे मेजाय (पारसी) के बच्चे हैं इसलिए इनकी सुन्नियों से पुरानी दुश्मनी है.

"शिया" शब्द भी संभवता "पर्शिया" से ही आया है. अरब के सुन्नी मुसलमान , ईरान के शिया मुसलमानों को दोयम दर्जे का मुसलमान मानते हैं. पापिस्तान, बंगालदेश, भारत, आदि  के मुसलमानो को तो अपनी बराबरी का समझते ही नहीं. ये लोग चाहे कितने भी संपन्न क्यों न हो जाएँ, अरब में सुन्नी अरबी की लड़की से शादी नहीं कर सकते. 
हमें भी दूसरों की गलती से सबक लेना चाहिए.

Saturday, 2 September 2017

धर्म और जीवन

मनुष्य ने प्रारम्भ से ही प्रकति को समझने का प्रयास कर दिया था. जहाँ अन्य जीव जंतुओं का उद्देश केवल भोजन और संतान ब्रद्धि था, वहीँ मनुष्य प्रक्रति के रहस्यों को समझने का प्रयास जारी रखा. जीवन की उत्पति कैसे होती है और म्रत्यु के बाद क्या होता है इस रहस्य को समझने के लिए अनेकों सिद्धांत प्रतिपादित किये.
भगवान् ने मनुष्य को बनाया है या मनुष्य ने भगवान् को बनाया है यह भी एक पुराना विवाद है. आस्तिक लोगों का मानना है कि - स्वर्ग अथवा सातवें आसमान पर बैठे, भगवान् / अल्ला ने स्रष्टि की रचना की और स्वयं अवतार लेकर अथवा अपने मैसेंजर भेजकर मनुष्य को जीवन जीने का ज्ञान दिया,
जबकि नास्तिक लोगों का मानना है कि - मनुष्य ने एक सुपरपावर भगवान की कल्पना की है और जो बात उसे समझ न आये वो उसे भगवान पर छोड़कर निश्चिन्त हो जाता है. जब तक जिस घटना का रहस्य समझ न आये उसे ईश्वर या देवता मान लेते हैं जब विज्ञान उसका रहस्य खोज लेता है तब उसे विज्ञान मान लेते हैं.
जब तक यह नहीं पता था कि - बारिस कैसे होती है तब तक के लिए बर्षा के लिए "इंद्र" की कल्पना कर ली गई, आज जब बर्षाचक्र समझ आ गया तो चर्चा इंद्र के बजाय मानसून की होती है. सुस्र्ज और चंद्रमा जब तक रहस्य थे तब उनको देवता मान लिया गया, जब उनकी गति समझ आ गई विज्ञान का हिस्सा बन गए.
आस्तिकों में भी भगवान् की तरह तरह की परिकल्पनाए हैं. किसी का मानना है कि - कोई साकार ब्रह्म है जो स्वर्ग में बैठकर धरती की गतिबिधियों का नियंत्रण करता है और स्थिति नियंत्रण से बाहर हो जाने पर, खुद धरती पर अवतार लेता है और मानवीय रूप में जन्म लेकर मर्यादाओं को पुनर्स्थापित करता है
तो किसी का मानना है कि ईशवर निराकार है और वो अपने किसी विशेष दूत के द्वारा धरती पर सन्देश भेजकर व्यवस्था को बनाता है. यहाँ तक कोई विवाद नहीं है सभी अपने अपने तरीके से जीवन के रहस्य को समझने का प्रयास कर रहे हैं. विवाद तब शुरू होता है जब लोग अपने बिचार दूसरों पर थोपना शुरू करते हैं.
सूरज, चाँद, धरती, पहाड़, नदी, बर्षा, भूकंप, आदि जैसी जिन चीजों का रहस्य विज्ञान खोज चुका है उस पर तो विवाद का कोई कारण रह ही नहीं जाता है, चाहे आपके प्राचीन ग्रंथों में उसपर कुछ भी क्यों न लिखा हो. जीवन और म्रत्यु का रहस्य जब तक न समझ आये तब तक उसे जैसे चाहे माने लेकिन नये ज्ञान का रास्ता बंद न करें.
जीवन और म्रत्यु को लेकर यूं तो बहुत सारी अवधारणाएं है लेकिन दो सिद्धांत सवाधिक प्रचलित हैं. एक सनातन धर्म की पुनर्जन्म की अवधारणा और दुसरी इस्लाम की कयामत वाली अवधारणा. चाहे पुनर्जन्म की अवधारणा हो या कयामत की अवधारणा दोनों का उद्देश्य मनुष्य को अच्छे कर्म के लिए प्रेरित करना है.
जहाँ पुनर्जन्म की अवधारणा में यह बताया जाता है कि इस जन्म में जैसी कर्म करोगे अगले जन्म में उसके वैसे ही फल मिलेंगे. वहीँ कयामत की अवधारणा यह कहती है जैसे कर्म करोगे उसका बैसा ही फल क़यामत वाले दिन मिलेगा. कुल मिलाकर दोनों ही अवधारणाओं का उद्देश्य मनुष्य को अच्छे काम करने की प्रेरणा देना है.
इसलिए जिस मान्यता को मानना है मानिए लेकिन दूसरों पर अपनी मान्यता जबरन थोपने की कोशिश न करें. अपनी अपनी मान्यता पर चलते हुए विज्ञान द्वारा इसका रहस्य खुलने का इन्तजार कीजिए. अगर पुनर्जन्म होता है तो न मानने के बाबजूद मुस्लमान का भी होगा और अगर नहीं होता है तो हिन्दू का भी नहीं होगा.
अगर क़यामत वाली अवधारणा सही है तो हिन्दू को भी उससे गुजरना होगा, चाहे वो इसे मानता हो या न मानता हो. हो सकता है विज्ञान इन सब प्रचलित मान्यताओं से अलग कोई नया और सर्वमान्य सिद्धांत ही खोज निकाले. इसलिए बिना विवाद किये विज्ञान के निष्कर्ष का इन्तजार कीजिए.

Friday, 1 September 2017

बेसलान स्कूल होस्टेज क्राइसेस

जेहादी आतंक से भारत सदियों से परिचित है, क्योंकि भारत इसे सदियों से झेलता आया है. यहाँ गजनी, गौरी, खिलजी, बाबर, अकबर, औरंगजेब, टीपू, नादिर, अब्दाली, दाऊद, कसाब, आदि के अनगिनत जुल्मो के किस्सों से भारत का इतिहास रक्त रंजित है. भारत जब भी दुनिया को अपने ऊपर हुए जुल्म के बारे में बताता था तो अमेरिका, रूस, जैसे शक्तिशाली और तथाकथित मानवाधिकारवादी(?) देश, भारत को ही संयम की सीख देने लगते थे.

जब पिछले दशकों में, शेष विश्व भी इस जेहादी आतंक की चपेट में आया, तब दुनिया को इस आतंक की भयावहता का अहेसास हुआ है. जब खुद उनपर जेहादी हमले हुए तब उन्हें भारत का दर्द समझ आया. यूँ तो दुनिया में एक से बढ़कर एक भयंकर जेहादी हमले हुए हुए हैं जिनमे लाखों लोग मर चुके हैं, लेकिन रूस के "बेसलान" के एक स्कूल में जिस तरह का हमला हुआ था, उसके बारे में सुनकर तो पत्थरदिल इंसान की भी रूह काँप जाती है.
रूस के एक शहर "बेसलान" में, बच्चो के एक स्कूल पर हुआ यह "जेहादी हमला", दुनिया का सब से बड़ा. क्रूर और दिल दहलाने वाला नरसंहार था. मासूम बच्चो के साथ किये गया यह "सेक्शुअल नरसंहार" इतना शर्मनाक और दर्दनाक था. कि - पूरी दुनिया सन्न रह गयी थी. इस घटना के बाद रूस से अपने यहाँ मुस्लिमो पर कई प्रतिबन्ध लगा दिए थे, लेकिन भारत में सरकार ने जनता तक इस घटना की पूरी जानकारी नहीं पहुँचने दी.
बच्चों के स्कूल पर हुआ यह "जेहादी" हमला "बेसलान स्कूल क्राइसेस" के नाम से कुख्यात है. 1 सितम्बर 2004 को "बेसलान" के एक स्कुल में, कुछ इस्लामी आतंकवादी अचानक घुस गए और घुसते ही पुरुषों का मार दिया, ताकि किसी तरह के प्रतिरोध की संभावना ना रहे. ये जेहादी आतंकी, आतंकवाद से भी ज़्यादा दरिंदगी दिखना चाहते थे. स्कूल में 3 से 8 साल तक बच्चे थे. वो जेहादी उन सभी बच्चों को स्कूल के जिम हॉल में ले गये.
इसके बाद बच्चों की चीखती आवाज़ें, इनके ज़ुल्म के आगे दब कर रह गयी. बारी बारी से 3 से 8 साल की एक एक बच्ची के साथ, कई कई आतंकवादियों ने बलात्कार किया. इन हैवानों ने न सिर्फ बलात्कार किया बल्कि बच्चों के गुप्तांगों में अपने बंदूक और अन्य वस्तुओं को घुसेड़ा और दूसरे सारे बंधक बच्चों को ये सब देखने को मजबूर किया गया. जितना बच्चों से खून निकलता, ये हैवान उतनी ही ज़ोर जोर से कहकहे लगाते थे.
हथियार के गुप्तांगों में डालने के वजह से, हथियार भी खून से सन गये थे. इस सब से भी उन जालिमो का जी नहीं भरा तो उन छोटे-छोटे बच्चों को बुरी तरह पीटा भी. बहुत सारी बच्चियां ब्लीडिंग और दर्द की वजह से उसी समय मर गयी. जेहादियों ने मासूम बच्चों को खूब लहू लुहान किया और खूब ठहाके लगाए . जैसे-जैसे समय बीता उनके ज़ुल्म और बढ़ते गये. बच्चों के पानी मांगने पर पानी की जगह, अपना पेशाब पीने पर मजबूर किया.
आतंकवादियों ने बच्चों के सामने पानी के बर्तन को रख दिया और कहा जो इसको पीने आएगा उसको मैं गोली मार दूँगा. इसके बाद बच्चों को मे अपनी मौत का ख़ौफ़ समा गया . बच्चे डर कर चिल्ला भी नही पा रहे थे क्योकि ऐसा करने पर उनको मारा पीटा जाता. अब तक स्कूल के बाहर भीड़ लग चुकी थी. आतंकी अंदर से खड़े हो कर नगरवासियों पर कॉमेंट करते हुए अंडे फेंकते और हँसते थे. बच्चों के उपर इनकी क्रूरता लगातार जारी रही.
रात को जेहादियों ने इन्ही मजबूर मासूम बच्चों से कहा कि - वो नंगे, खून से सने और मरे हुए, बलात्कार के शिकार बच्चों की लाशों को, घसीटकर पीछे फेंक कर आयें. इस बीच रशियन सैनिकों ने स्कूल को घेर लिया और पहले उनसे समझौते की कोशिशें की जिससे बच्चों को बचाया जा सके. आतंकियों ने साफ कर दिया था कि - अगर गैस का इस्तेमाल हुआ या बिजली काटी गयी तो वो तुरंत बच्चों को मार देंगे.
इस बीच रूस की सब से अच्छी फोर्स "Alpha and Vympel" आ चुकी थी. रूसी विशेष बलों ने विभिन्न तकनीकों का उपयोग करते हुए स्कूल पर हमला कर दिया . इस हमले में टैंक, बंदूक, बम, राकेट्स , सभी इस्तेमाल किये गए. स्पेशल फोर्स के कमांडोज ने अपनी जान पर खेल कर हमला किया लेकिन उस अभागे दिन सिर्फ़ रक्तपात के सिवा कुछ भी हासिल नही हो पाया. 334 लोग मारे गये, जिस मे से 186 छोटे-छोटे मासूम बच्चे थे.
247 बच्चे जो गंभीर रूप से घायल थे, उनको इलाज के लिए मास्को भेजा गया. सुरक्षा बल के सैनिक भी मारे गये थे. बच्चों की लाशें और उनकी दुर्दशा को देख कर उनके माँ बाप के चीख पुकार और रोने की आवाज़ से पूरा इलाक़ा दहल उठा. जो बच्चे स्कूल से निकल रहे थे सब खून से सने हुए थे. लाशों के ढेर लगे थे. ऐसा घिनौना काम केवल शैतान ही कर सकते हैं. भारत के इतिहास में भी ऐसी क्रूरता की कहानिया शैतानों से ही जुडी हुई है.
गुरु गोविन्द सिंह के बच्चों को ज़िंदा दीवार में चुनवाना, मोतीराम मेहरा के बच्चों को कोल्हू में पेरना, बन्दा बहादुर के बेटे को बाप की आँखों के सामने काटकर, बेटे का दिल निकाल कर बाप के मुह में जबरन ठूंसना, इस्लाम कबूल न करने वाले माँ-बाप के बच्चों को काटकर उनके अंगों की माला बनाकर माँ-बाप के गले में डालना, माँ की गोद से बच्चे को छीनकर बच्चे को उछालकर बल्लम की नोक पर लेना तो, भारत ने भी देखा है.
मैंने उस वीभत्स घटना को साधारण शब्दों में लिखा है , और ज्यादा वीभत्स चित्र यहाँ नही डाले हैं. आप को एक बार गूगल पर जाकर "beslan school hostage crisis" लिखकर सर्च करना चाहिए. सर्च करते ही आपको उस घटना का विवरण और चित्र सामने आ जायेंगे.  उस घटना का विवरण और चित्र देखकर समझ आजाएगा कि ये जेहादी आतंकी की नीचता की किस हद तक जा सकते हैं.

Sunday, 13 August 2017

शास्त्री जी के इस्तीफे का सच

जब भी कहीं कोई दुर्घटना होती है तो लोग "लाल बहादुर शास्त्री" जी का उदाहरण देकर, उस विभाग के मंत्री का इस्तीफा मंगना शुरू कर देते हैं. क्या लाल बहादुर शास्त्री जी ने जिम्मेदार लोगों पर कार्यवाही करने और पीड़ितों को न्याय दिलाने की अपनी जिम्मेदारी निभाने के बजाय, जिम्मेदारी से भागकर कोई महान काम क्या था ?
कितने लोग ऐसे हैं जिनको उस दुर्घटना के बारे में पता है ? क्या आप बता सकते हैं कि यह दुर्घटना कब और कहाँ हुई थी ? इस दुर्घटना में कितने लोग मारे गए थे और सरकारी आंकड़ों में यह संख्या कितनी है ? वास्तव में दुर्घटना के जिम्मेदार कितने लोगों को सजा मिली थी ? शास्त्री जी के इस्तीफे से पीड़ितों को क्या मिल गया था ?
एक बात मैं यह कहना चाहता हूँ कि - यहाँ मैं शास्त्री जी की क्षमता पर सवाल नहीं उठा रहा बल्कि नैतिकता के आधार पर इस्तीफे की बात कर रहा हूँ.क्या शास्त्री जी ने इस हादसे से दुखी होकर संन्यास ले लिया था और सत्ता छोड़ दी थी ? कहीं ऐसा तो नही कि शास्त्री जी के इस्तीफे की आड़ में सारे मामले को ही दबा दिया गया था ?
वो चर्चित रेल दुर्घटना 27 नवंबर 1956 को तमिलनाडु के अरियालुर में हुई थी. स्थानीय अखबारों और प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार उस हादसे में 500 से ज्यादा लोगों की मौत हुई थी, हालांकि सरकारी आंकड़ों में यह संख्या 142 बताई जाती है. इस बात की कहीं कोई जानकारी नहीं मिलती है कि किसी अधिकारी को इसमें सजा मिली हो.
पीड़ितों का कहाँ इलाज हुआ और उनको कितना मुआवजा मिला, इस मामले में कहीं भी कोई जानकारी नहीं मिलती है, जबकि शास्त्री जी के इस्तीफे की चर्चा सर्वत्र मिलती है. शास्त्री जी ने भी मात्र रेलमंत्री पद से इस्तीफा दिया था कोई राजनीति से संन्यास नहीं लिया था. रेलमंत्री पद से इस्तीफा देने के बाद भी बिना बिभाग के मंत्री के रूप में कबिनेट में बने रहे.
उस समय दूसरा आम चुनाव नजदीक था. विपक्ष ने "जीप घोटाला", "POK पर पापिस्तान का कब्जा", "तिब्बत पर चीन का कब्ज़ा", " संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् की स्थाई सीट दावा न करने", पापिस्तान से भारत आये विस्थापितों का सही पुनर्वास न होने, आदि जैसे मुद्दों पर नेहरू सरकार को घेर रखा था. उसी समय यह दुर्घटना घट गई.
दुर्घटना की नैतिक जिम्मरदारी लेते हुए शास्त्री जी ने रेलमंत्री पद से इस्तीफ़ा दे दिया. आपदा को अवसर में बदलते हुए कांग्रेस ने बड़ी चालाकी से दुर्घटना के बजाय शास्त्री जी के इस्तीफे को महानता में बदल कर, उसे चुनावी मुद्दा बना दिया. लोग दुर्घटना पर सवाल उठाने के बजाय इस्तीफे की बात करने लगे और कांग्रेस पार्टी को 1957 के लोकसभा चुनाव में भारी विजय मिली.
नैतिकता के आधार पर रेलमंत्री पद से इस्तीफा देने वाले शास्त्री जी कुछ ही माह बाद परिवहन मंत्री बन गए. उसके साथ वे संचार मंत्री भी बने तथा बाद में वाणिज्य और उद्द्योग मंत्री बने. 1961 में गोविन्द वल्लभ पंत के देहांत के पश्चात वह गृह मंत्री बने तथा 1964 में प्रधानमंत्री नेहरूजी की म्रत्यु के बाद शास्त्री जी प्रधान मंत्री बन गए.

Wednesday, 9 August 2017

अंग्रेजों भारत छोडो आन्दोलन

सन 1942 में  9-अगस्त के ही दिन महात्मा गांधी ने "अंग्रेजो भारत छोडो आन्दोलन" का ऐलान किया था. आन्दोलन के पहले दिन से ही गांधी जी एवं उनके कई निकटवर्ती सहयोगी जेल के नाम पर सरकारी सुरक्षा में, विबिन्न पैलेसों और डाक बंगलों में चले गए थे, और वे लोग आन्दोलन की समाप्ति के बाद ही बाहर आये थे.
यह आन्दोलन शुरू होते ही कांग्रेस के हाथ से निकल कर, देश की जनता का क्रांतिकारी आन्दोलन बन गया था, जिन पर गांधी या कांग्रेस का कोई नियंत्रण नहीं था, गांधीजी के द्वारा अहिंसक आन्दोलन का आव्हान किया गया था, लेकिन देश के जोशीले युवाओं ने खुलकर अंग्रेजों के खिलाफ हिंसक प्रदर्शन किये.
क्रांतिकारियों ने देशभर में हजारों पुलिस स्टेशन, रेलवे स्टेशन, डाक घर, सरकारी कार्यालयों एवं अंग्रेजों इत्यादि पर खुलकर हमले किये और उनको बहुत नुकशान पहुंचाया. सरकारी आँकड़ों के अनुसार इस जनआन्दोलन में 940 लोग मारे गये, 1630 लोग घायल हुए,18,000 डी० आई० आर० में नजरबन्द हुए तथा 60,229 गिरफ्तार हुए थे.
दरअसल उन दिनों दूसरा विश्वयुद्ध (1939 से 1944 तक) चल रहा था जिसमे भारत के क्रांतिकारी सुभाष चन्द्र बोस की आजाद हिन्द फ़ौज में शामिल होकर अंग्रेजों पर हमले कर रहे थे. जो भारतीय आजाद हिन्द फ़ौज में शामिल में शामिल नहीं थे वे भी उसका समर्थन कर रहे थे और नेताजी सुभाष चन्द्र बोस को अपना आदर्श मानतेे थे.
1939 से 1944 तक चले दूसरे विश्वयुद्ध में अंग्रेजो को बहुत क्षति उठानी पडी थी, दूसरी तरफ सुभाष चन्द्र बोस की आजाद हिन्द फ़ौज ने भी अंग्रेजों की नाक में दम कर रखा था. आजाद हिन्द फ़ौज ने जर्मनी और जापान के सहयोग से अंग्रेजों पर हमले तेज कर दिए थे और अंडमान -निकोवार को आजाद भी करा लिया था.
उस समय "सुभाष चन्द्र बोस" भारत के युवाओं के महानायक बने हुए थे. देश की जनता मानने लगी थी कि - गांधीजी की अहिंसा से कुछ नहीं होगा. "बोस" के रास्ते पर चलकर ही आजादी मिल सकती है. सुभाष चन्द्र बोस के नारे "तुम मुझे खून दो, मै तुम्हे आजादी दूँगा" तथा "दिल्ली चलो" ने देश की जनता में जोश भर दिया था.
ऐसे में मौके की नजाकत को भाँपते हुए 8 अगस्त 1942 की रात में गांधी जी ने, बम्बई से "अँग्रेजों भारत छोड़ो" का नारा दिया और गिरफ्तारी के नाम पर सरकारी सुरक्षा में "आगा खान पैलेस" में चले गये. 9 अगस्त का दिन चुनने की एक ख़ास बजह थी. 1925 में 9 अगस्त को काकोरी ट्रेन काण्ड हुआ था.
भारत छोडो आन्दोलन का श्रेय भले ही गांधी जी को दिया जाता है लेकिन इसमें भाग लेने वाले अधिकांश क्रांतिकारियों ने सुभाष चन्द्र बोस की उग्र बिचारधारा से साथ जबरदस्त क्रान्ति की थी. उन लोगों का सिद्धांत अंहिसा के साथ सविनय निवेदन करना नहीं बल्कि अंग्रेजों से युद्ध कर उनको मार भगाना था.
गांधी जी जेल (आगा खान पैलेस) से अक्सर अहिसा का आव्हान करते थे मगर युवा उसे अनसुना कर देते थे. भारत छोड़ो आंदोलन सही मायने में एक जन आंदोलन था. इसको गांधीजी और कांग्रेस ने शुरू अवश्य किया था. लेकिन इसमें भाग लेने वाले आन्दोलनकारी सुभाष चन्द्र बोस के आदर्श पर चलते थे.
आजाद हिन्द फ़ौज बाहर से सैन्य हमने कर रही थी और देश के अन्दर क्रांतिकारी अंग्रेजों को भारी नुकशान पहुंचा रहे थे. किन्तु दुर्भाग्यवश युद्ध का पासा पलट गया. जर्मनी ने हार मान ली और जापान को भी घुटने टेकने पड़े. सुभाषचन्द्र बोस की मौत की खबर (?) के साथ ही आजाद हिन्द फ़ौज का अभियान और भारत छोडो आन्दोलन समाप्त हो गया.
दुसरे विश्वयुद्ध, आजाद हिन्द फ़ौज और भारत छोडो आन्दोलन ने अंग्रेजों को इतना कमजोर कर दिया था कि उनको यहाँ से भागना पडा. भारत और हां, इस आन्दोलन के दौरान मुस्लिम लीग और अधिकाँश मुश्लिम नेता, क्रान्ति / आन्दोलन से दूर रहकर, अलग पापिस्तान की मांग में लगे रहे.

Friday, 4 August 2017

पं. दीनदयाल उपाध्याय

एकात्म मानववाद के प्रणेता, भारतीय जन संघ के संस्थापक सदस्य एवं अध्यक्ष "पं. दीनदयाल उपाध्याय" 
*****************************************************************************************************
प. दीनदयाल उपाध्याय का जन्म 25 सितम्बर1916 को मथुरा जिले के छोटे से गाँव नगला चन्द्रभान में हुआ था. इनके पिता का नाम भगवती प्रसाद उपाध्याय तथा माता रामप्यारी थीं. उनकी तीन बर्ष की आयु में उनके पिता का तथा 7 बर्ष की आयु में माता का निधन हो गया. उसके बाद उनका पालन पोषण उनकी ननिहाल में हुआ.
प.दीनदयाल उपाध्याय 
उन्होंने अपने से छोटी कक्षाओं के विद्यार्थियों को ट्यूशन पढाते पढ़ाते, अपनी शिक्षा को जारी रखा. आगरा, पिलानी, कानपुर, प्रयाग से बी. एस.सी. तक शिक्षा प्राप्त की तथा सिविल सेवा की परीक्षा भी उत्तीर्ण की लेकिन उन्होंने अंग्रेज सरकार की नौकरी नहीं की. वे देशवाशियों को जाग्रत करने के उद्देश्य से संघ के पूर्णकालिक प्रचारक बन गए.
उनकी राजनैतिक सुझबूझ से संघ के सरसंघ चालक "श्री गुरुजी" भी बहुत प्रभावित थे. उन्होंने संघ की बिचारधारा का प्रसार करने के लिए, राष्ट्रधर्म, पाञ्चजन्य और स्वदेश जैसी पत्र-पत्रिकाएँ प्रारम्भ की. उन्होंने सभी तरह की बिचार धाराओं का अध्ययन करने के बाद, भारतीय परिवेश के अनुकूल "एकात्म मानववाद" का सिद्धांत दिया.
दीनदयाल उपाध्याय की अवधारणा थी कि - "देश की आजादी के बाद भारत के विकास का आधार, अपनी भारतीय संस्कृति हो, न कि अंग्रेजों द्वारा छोड़ी गयी पाश्चात्य विचारधारा. उनका कहना था कि -“वसुधैव कुटुम्बकम” हमारी सभ्यता और परम्परा है. उनका मानना था कि - केवल "सांस्कृतिक राष्ट्रवाद" ही समस्त भारत को एक रख सकता है.
प. दीनदयाल उपाध्याय के अनुसार - "भारत में रहनेवाला और इसके प्रति ममत्व की भावना रखने वाला मानव समूह "एक जन" हैं. उनकी जीवन प्रणाली ,कला , साहित्य, दर्शन सब भारतीय संस्कृति है. इसलिए भारतीय राष्ट्रवाद का आधार यह संस्कृति है . इस संस्कृतिमें निष्ठा रहे, तभी भारत एकात्म रहेगा और मानवमात्र में भेदभाव ख़त्म होगा.
प. दीनदयाल उपाध्याय के एकात्म मानववाद के सिद्धांत के बिरोध में वामपंथी और पूजीवादी दोनों तरह की विदेशी बिचार धाराओं के लोग थे क्योंकि उन विदेशियों को भय था कि - भारतीय सनातन पद्धति से निर्मित, "सांस्क्रतिक राष्ट्रवाद" के सामने साम्यवाद और पूंजीवाद दोनों धराशाई हो जायेंगे और उनकी राजनीति ख़त्म हो जायेगी.
उनकी क्षमताओं को देखते हुए डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने 1951 में भारतीय जन संघ की स्थापना करते समय उनको पार्टी का महासचिव नियुक्त किया. कश्मीर के भारत में पूर्ण विलय के लिए किये गए आन्दोलन में डा. मुखर्जी की जेल में संदेहास्पद परिस्थितियों में म्रत्यु के बाद उन्होंने संगठन को आगे बढाने की जिम्मेदारी को उन्होंने बखूबी निभाया.
उन्होंने 15 वर्षों तक महासचिव के रूप में जनसंघ की सेवा की. भारतीय जनसंघ के 14वें वार्षिक अधिवेशन में प. दीनदयाल उपाध्याय को दिसंबर 1967 में कालीकट में जनसंघ का अध्यक्ष निर्वाचित किया गया. 19 दिसंबर 1967 को दीनदयाल उपाध्याय को भारतीय जनसंघ का अध्यक्ष चुना गया,लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था.
11 फ़रवरी, 1968 की सुबह मुग़ल सराय रेलवे स्टेशन पर एक ट्रेन में प. दीनदयाल का निष्प्राण शरीर पाया गया. इसका पता चलते ही सारा देश दु:ख में डूब गया. भारतीय जनसंघ के नेताओं के अलावा, भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. जाकिर हुसैन, प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और मोरारजी देसाई, आदि ने भी उनको श्रद्धांजलि अर्पित की.
प. दीनदयाल उपाध्याय द्वारा डा. श्यामाप्रसाद जी के साथ मिलकर, "भारतीय जनसंघ" के रूप में लगाया गया पौधा, आज "भारतीय जनता पार्टी" जैसा विशाल ब्रक्ष बन चुका है, जिसको दुनिया का सबसे बड़ा राजनीतक दल कहलाने का सौभाग्य मिला हुआ है. "भारतीय जनता पार्टी" की सोंच में उनका "एकात्म मानववाद" और "सांस्क्रतिक राष्ट्रवाद" ही है.