Tuesday, 7 July 2026

माँ गंगा का धरती पर अवतरण

भारतीय धर्मग्रंथों के अनुसार त्रेता युग में भगवान विष्णु ने पहली बार मानव के रूप में वामन अवतार लिया था. उस समय महान असुर राजा वलि ने तीनों लोकों पर अपना अधिकार कर लिया था. सभी छोटे बड़े राजाओं को उसने अपना बंदी बना लिया था. राजा वलि ने स्वर्गलोक पर भी अधिकार कर लिया और इंद्र को वहां से निकाल दिया था. राजा बली असुर थे लेकिन वे महान हरिभक्त "प्रह्लाद" के पौत्र थे, इस कारण भगवान् विष्णु भी उनका कोई अहित नहीं करना चाहते थे. तब भगवान् विष्णु ने वामन अवतार धारण करके राजा वलि से दान में सब कुछ मांगकर इंद्र एवं अन्य राजाओं को वापस किया था. साथ ही भगवान् विष्णु ने राजा बलि को चिरंजीवी रहने का वरदान दिया भारतीय ग्रंथो के अनुसार, उसी समय भगवान् ब्रह्मा जी ने, भगवान् वामन के चरणों को धोकर उस जल को अपने कमंडल में रख लिया था. इसी पवित्र जल से पवित्र गंगा नदी का जन्म हुआ. कालांतर में भागीरथ कड़ी तपस्या के बाद गंगा को धरती पर लेकर आये. गंगा के अवतरण की भी एक रोचक कथा है. त्रेता युग में पृथ्वीलोक पर राजा "सगर" का शासन था. उनकी राजधानी अयोध्या थी. अपने श्रेष्ठ कर्मों की वजह से उनकी कीर्ति तीनों लोक में पहुँच चुकी थी. उन्होंने अश्वमेघ यज्ञ का आयोजन किया, जिसके कारण देवताओं के राजा इंद्र को अपनी गद्दी हिलती दिख रही थी. इंद्र ने वह अश्व चुरा कर कपिल मुनि के आश्रम के पास छोड़ दिया. इंद्र की चाल से अनजान कपिल मुनि झूठे आरोप से क्रोधित हो गए और उन्होंने राजा सगर के सभी पुत्रों (सैनिको) को अपने तपोवल से भस्म कर दिया और उन्हें पाताल लोक में भेज दिया. जब कपिल मुनि को असल बात पता चली तो वे अपना श्राप वापस तो नहीं ले सकते थे पर उन्होंने राजा सगर के पुत्रों को मोक्ष दिलाने का उपाय बताया. उन्होंने कहा - अगर ब्रह्मा जी के कमंडल में बिराजमान माता गंगा धरती पर उतरकर, राजा सगर के पुत्रों की अस्थियों को स्पर्श कर लेती हैं तो वे मोक्ष प्राप्त कर स्वर्ग लोक को चले जाएंगे. राजा सगर के पौत्र अंशुमान ने गंगा को लाने का जिम्मा लिया. वे हिमालय पर चले गए और गंगा को धरती पर कैसे लाया जाय इसका प्रयास करने लगे. उनको अपने प्रयास में सफलता नहीं मिली. फिर उनके पुत्र दिलीप ने अभियान शुरू किया। उन्होंने वर्तमान दिल्ली में यमुना किनारे अपना वेस कैम्प बनाया और हिमालय के गोमुख ग्लेशियर से गंगा को दिल्ली लाकर यमुना में मिलाने का कठिन कार्य करने लगे. उन्होंने अयोध्या को लगभग छोड़ दिया और इसी बेसकैम्प को अपनी राजधानी बना लिया। महाराजा दिलीप के नाम पर ही यह क्षेत्र दिल्ली कहलाने लगा। महाराजा दिलीप को भी इस कार्य में सफलता नहीं मिली। महाराजा दिलीप के बाद उनके पुत्र भागीरथ ने गंगा को लाने का प्रयास प्रारम्भ किया। लेकिन उन्होंने दिल्ली के बजाये वर्तमान हरिद्वार को अपना बेसकैम्प बनाया। ब्रह्मा और शिव के आशीर्वाद से भागीरथ को अपने प्रयास में सफलता मिली। गोमुख से गंगा को निकालकर पर्वतीय इलाकों से गंगा को हरिद्वार के मैदान में ले आये. इसके बाद वे भगीरथ के पीछे चलते हए कान्हापुर होते हुए वे प्रयागराज में यमुना में मिल गईं. प्रयाग के बाद यमुना भी गंगा हो गईं. और आगे जाकर गंगा सागर में समुद्र में समां गईं. भगीरथ के पूर्वजों का उद्धार हो गया और अगस्त्य मुनि द्वारा सोखे हुये समुद्र में फिर से जल भर गया. इस कहानी पर विश्व के बड़े वैज्ञानिक भी शोध कर रहे हैं. कुछ वैज्ञानिकों ने समुद्र मंथन, गंगा अवतरण और भागीरथ की कहानी को जोड़ते हुए कुछ निष्कर्ष भी निकाले है. उनका कहना था कि - यमुना और सरस्वती हिमालय से निकलने वाली प्राचीन नदियां थी. इन नदियों में जल की कमी हो जाने के बाद ही गंगा के जल को लाने का प्रयास किया गया था. यमुना नदी हिमालय से निकलकर पूर्व दिशा में दिल्ली, मथुरा, प्रयाग, पटना, आदि होते हुए बंगाल की खाड़ी में गिरती थी तथा सरस्वती नदी कुरुक्षेत्र, पेहोवा, सिरसा, कालीबंगा, होते हुए अरब सागर में मिलती थी. कालांतर में दोनों नदियों में पानी कम हो गया और इन नदियों के किनारे रहने वाले लोग मरने लगे. तब गंगा को लाने के लिए प्रयास किया गया. पूर्व के निवाशियों (देवताओं) ने हिमालय से नहर निकालकर गंगा को लाने का निर्णय लिया और इसके लिए तपस्या ( परिश्रम) करने में जुट गए. परन्तु दो पीढ़ी (राजा अंशुमान एवं राजा दिलीप) तक इसमें सफलता न मिल सकी तब तीसरी पीढ़ी के भागीरथ ने पश्चिम क्षेत्र की राक्षस जाति के साथ मिलकर एक साथ प्रयास करने का निर्णय किया उनके द्वारा तय किया गया कि गंगा के जल को यमुना और सरस्वती दोनों में पहुँचाया जाएगा. इसके लिए जो पहाड़ काटने का काम किया गया वही समुद्र मंथन था. इसमें राक्षसों के साथ धोखा हुआ. जब कोई आख़िरी पहाड़ काटा जा रहा था तब देवताओं ने ऐसी चालाकी की कि - गंगा का सारा जल यमुना में चला गया और सरस्वति नदी को पानी नहीं मिला। गंगा. ऋषिकेश, हरिद्वार, कान्हापुर होते हुए "प्रयाग" में यमुना से जा मिली। उसके बाद यमुना में होते हुए गंगा, सागर तक पहुँच गया. ऐसा होने से गंगा के मैदान तो हरे भरे हो गए लेकिन सरस्वति घाटी सभ्यता बिना पानी के विलुप्त होती चली गई. बाद में देवताओं हुए राक्षसो के झगडे को ख़त्म करते हुए सरस्वति घाटी वालों को भी गंगा के किनारे जगह दी गई. साथ ही सारस्वत लोगों की भावना को तुष्ट करने के लिए घोषणा कर दी गई कि - सरस्वति नदी भी अदृश्य धारा के रूप में प्रयाग में मिल गई है. इस प्रकार गंगा और यमुना के संगम को अदृष्ट सरस्वति का संगम घोषित कर दिया गया. हालांकि इस शोध में कई बातों में बिरोधाभास है यह शोध कई अन्य शोधार्थियों के लिए प्रेरणा देने का काम तो कर ही सकता है

Monday, 15 June 2026


 मेरे YouTube चैनल के 5,000 सब्सक्राइबर होने पर हार्दिक आभार

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प्रिय मित्रों एवं राष्ट्रभक्त बंधुओं, आप सभी के स्नेह, सहयोग और उत्साहवर्धन के कारण मेरे YouTube चैनल “NAVEEN SANGH GEET” ने 5,000 सब्सक्राइबरों का महत्वपूर्ण पड़ाव पार कर लिया है. इस उपलब्धि के लिए मैं आप सभी का हृदय की गहराइयों से धन्यवाद व्यक्त करता हूँ.

कुछ माह पूर्व मैंने यह चैनल इस उद्देश्य से प्रारंभ किया था कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखाओं में गाए जाने वाले प्रेरणादायी देशभक्ति गीत, चिंतनशील बौद्धिक, ईश्वर-भक्ति के गीत, मंत्र तथा राष्ट्रनिर्माण की भावना से ओत-प्रोत सामग्री अधिक से अधिक लोगों तक पहुँच सके.

मुझे अत्यंत प्रसन्नता है कि राष्ट्रप्रेमी समाज ने इस प्रयास को भरपूर स्नेह और समर्थन दिया. बचपन से ही मैं संघ के वातावरण में इन गीतों को सुनता और विभिन्न कार्यक्रमों में गाता आया हूँ. यह गीत हर भारतीय के लिए हैं. यह सुनने वाले के हृदय में देशभक्ति का भाव जगाते हैं.

मेरा सदैव यह विचार रहा कि इन सुंदर, प्रेरणादायी और संस्कारदायी गीतों को ऐसा मधुर संगीत मिले कि वे केवल शाखाओं तक सीमित न रहें, बल्कि प्रत्येक राष्ट्रभक्त के हृदय तक पहुँचें. समय के साथ तकनीक का विकास हुआ और AI ने संगीत के क्षेत्र में भी नई संभावनाओं के द्वार खोल दिए.

मैंने अपने पुत्र (जो तकनीकी क्षेत्र में कार्यरत हैं) से प्रेरणा और मार्गदर्शन प्राप्त कर, AI की सहायता से संघ गीतों को नए संगीतबद्ध रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास किया. प्रारंभिक प्रयोगों के बाद जब परिणाम मन को स्पर्श करने वाले बनने लगे, तब मैंने उन्हें YouTube पर साझा करने का निर्णय लिया.

आज जब अनेक वरिष्ठ स्वयंसेवक यह कहते हैं कि जो गीत पहले केवल शाखा में सुनने को मिलते थे, वे अब यात्रा के दौरान कार में भी सुनते है और इसके अलावा उनके यहाँ घर में या दफ्तर के कार्यों के बीच भी चलते रहते हैं, तो यह मेरे लिए अत्यंत संतोष और प्रेरणा का विषय है.

इससे यह विश्वास और दृढ़ होता है कि राष्ट्रभावना से ओत-प्रोत यह अमूल्य धरोहर अधिकाधिक लोगों तक पहुँच रही है. लगातार हर रोज अनेको राष्ट्रवादी बंधू चैनल को शेयल, लाइक और सब्स्क्राइब कर रहे है, जिससे इनकी पहुँच और ज्यादा राष्ट्रवादी लोगों तक हो रही है

मैं भली-भाँति जानता हूँ कि आपने मेरे चैनल को जो प्रेम दिया है, वह किसी व्यक्ति विशेष के प्रति नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रति आपके सम्मान, राष्ट्रभक्ति के प्रति आपकी निष्ठा तथा इन गीतों में निहित उच्च आदर्शों और संस्कारों के प्रति आपकी श्रद्धा का प्रतीक है.

मैं आप सभी से विनम्र आग्रह करता हूँ कि चैनल पर उपलब्ध गीतों, बौद्धिकों और अन्य वीडियो सामग्री को स्वयं देखें, अपने परिवारजनों और मित्रों तक पहुँचाएँ तथा राष्ट्रभावना के इस संदेश को और व्यापक बनाने में सहयोग करें.

जिन सभी मित्रों ने वीडियो देखे, चैनल को सब्सक्राइब किया, अपने सुझाव दिए और इस यात्रा में साथ दिया, उन सभी के प्रति मैं पुनः हृदय से कृतज्ञता व्यक्त करता हूँ. और जिन्होंने अभी तक चैनल नहीं देखा है, उनसे विनम्र निवेदन है कि एक बार अवश्य देखें.

यदि चैनल में दी गई सामग्री आपको उपयोगी और प्रेरणादायी लगे तो चैनल को शेयर, लाइक और सब्सक्राइब करने की कृपा करें. आपका यह स्नेह और आशीर्वाद ही आगे भी बेहतर कार्य करने की प्रेरणा देता रहेगा. आप सभी का हार्दिक धन्यवाद. वंदे मातरम्.

— नवीन वर्मा
NAVEEN SANGH GEET
YouTube Channel

Friday, 15 May 2026

स्वदेशी सॉफ्टवेयर : आत्मनिर्भर भारत की नई शक्ति

आज दुनिया डिजिटल युग में प्रवेश कर चुकी है. मोबाइल ऐप, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म, ऑनलाइन गेम, वीडियो प्लेटफॉर्म और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) जैसी तकनीकें केवल सुविधा का माध्यम नहीं रहीं, बल्कि वे किसी भी देश की आर्थिक और रणनीतिक शक्ति का आधार बन चुकी हैं.

ऐसे समय में भारत के लिए यह आवश्यक हो गया है कि वह विदेशी सॉफ्टवेयर और ऐप्स पर निर्भर रहने के बजाय अपने स्वदेशी सॉफ्टवेयर और डिजिटल प्लेटफॉर्म विकसित करे. इस कार्य में युवा इंजीनियर्स और इन्वेस्टर्स दोनों को आगे आना होगा क्योंकि प्रतिभा के साथ पैसा भी जरूरी है.
भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने “स्टार्टअप इंडिया”, “मेक इन इंडिया” और “स्वदेशी अपनाओ” जैसे अभियानों के माध्यम से देश को आत्मनिर्भर बनाने का आह्वान किया है. इन अभियानों का वास्तविक उद्देश्य केवल उत्पादन बढ़ाना नहीं, बल्कि भारत को तकनीकी रूप से भी विश्व में अग्रणी बनाना है.

क्यों जरूरी है स्वदेशी सॉफ्टवेयर ?
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आज भारत में करोड़ों लोग विदेशी सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म का उपयोग करते हैं. इन सभी से होने वाली भारी कमाई विदेशी कंपनियों के पास जाती ही है, साथ ही भारत के लोगों का सारा डाटा भी इन विदेशी कंपनियों के पास पहुँच जाता है, जिसका दुरूपयोग हो सकता है.
चाहे बात फेसबुक जैसी सोशल नेटवर्किंग सेवाओं की हो, व्हाट्सएप जैसे मैसेजिंग ऐप की, यू-ट्यूब जैसे वीडियो प्लेटफॉर्म की या ऑनलाइन गेम्स की, ..... इन सभी सोशल मीडिया प्लेटफार्म के पास आज लगभग हर भारतीय का सारा डाटा है, जिसको पैसे के लिए भारत के शत्रुओं को बेचा जा सकता है.
यदि भारत के युवा इंजीनियर किसी प्रकार के स्वदेशी विकल्प तैयार करें, तो इससे कई बड़े लाभ होंगे —
देश का पैसा देश में ही रहेगा
लाखों युवाओं को रोजगार मिलेगा
भारत तकनीकी रूप से आत्मनिर्भर बनेगा
डेटा सुरक्षा और राष्ट्रीय सुरक्षा मजबूत होगी
विदेशी कंपनियों पर निर्भरता कम होगी
आज चीन इसका सबसे बड़ा उदाहरण है. चीन ने विदेशी ऐप्स के विकल्प तैयार किए और अपने देश की कंपनियों को बढ़ावा दिया. परिणामस्वरूप आज उसकी कई टेक कंपनियाँ विश्व की सबसे बड़ी कंपनियों में शामिल हैं और चीन के निवासियों का डाटा भी सुरक्षित है.
भारत के पास चीन से भी अधिक युवा शक्ति और प्रतिभा मौजूद है. आवश्यकता केवल सही दिशा और समर्थन की है. हर वर्ष लाखों इंजीनियर कॉलेजों से निकलते हैं. लेकिन कोई इन्वेस्टर पैसा लगाने को तैयार नहीं है. इनके माँ बाप भी यही कहते हैं कि कहीं नौकरी कर लो.
यदि इन युवाओ को घर के साथ साथ सरकार और इन्वेस्टर्स का भी साथ मिल जाए तो ये युवा, नौकरी खोजने के बजाय, नए सॉफ्टवेयर, ऐप और डिजिटल प्लेटफॉर्म बनाने की दिशा में आगे बढ़ सकते हैं, और तकनीक के क्षेत्र में भारत को विश्वगुरु बना सकते हैं.
आज आवश्यकता है कि भारतीय युवा —
स्वदेशी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म विकसित करें
भारतीय संस्कृति और शिक्षा आधारित गेम तैयार करें
वीडियो शेयरिंग और मैसेजिंग ऐप्स बनाएं
भारतीय भाषाओं पर आधारित AI और सॉफ्टवेयर विकसित करें
साइबर सुरक्षा और क्लाउड टेक्नोलॉजी में स्वदेशी समाधान तैयार करें
भारत के पास प्रतिभा की कोई कमी नहीं है. हमारे इंजीनियर दुनिया की बड़ी-बड़ी कंपनियों में काम कर रहे हैं. यदि यही प्रतिभा भारत के लिए काम करे, तो देश डिजिटल महाशक्ति बन सकता है.

इन्वेस्टर्स को आगे आना होगा
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किसी भी बड़े परिवर्तन के लिए पूंजी की आवश्यकता होती है. इसलिए देश के उद्योगपतियों और इन्वेस्टर्स की जिम्मेदारी भी बहुत महत्वपूर्ण है. उन्हें यह समझना होगा कि स्वदेशी सॉफ्टवेयर और टेक्नोलॉजी में निवेश केवल देशभक्ति नहीं, बल्कि भविष्य का सबसे लाभदायक निवेश भी है.
आने वाले समय में डाक्यूमेंट, प्रजेंन्टेशन एप, AI, सॉफ्टवेयर, डिजिटल प्लेटफॉर्म और डेटा आधारित कंपनियाँ ही विश्व अर्थव्यवस्था को नियंत्रित करेंगी. यदि भारतीय इन्वेस्टर्स आज भारतीय स्टार्टअप्स और सॉफ्टवेयर कंपनियों में निवेश करेंगे, तो भविष्य में उन्हें अत्यधिक आर्थिक लाभ प्राप्त होगा.
देश के निवेशकों को चाहिए कि वे —
भारतीय टेक स्टार्टअप्स को फंड दें
युवा इंजीनियरों को रिसर्च और डेवलपमेंट के लिए सहयोग करें
स्वदेशी ऐप और प्लेटफॉर्म बनाने वाली कंपनियों में निवेश करें
विदेशी कंपनियों की नकल करने के बजाय भारतीय नवाचार को बढ़ावा दें
यह निवेश केवल व्यापार नहीं होगा, बल्कि भारत के भविष्य को मजबूत बनाने का कार्य होगा।

तकनीकी क्षेत्र आत्मनिर्भर भारत की दिशा
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“मेक इन इंडिया” और “स्टार्टअप इंडिया” जैसे अभियान तभी पूरी तरह सफल होंगे जब भारत तकनीक और सॉफ्टवेयर के क्षेत्र में भी आत्मनिर्भर बनेगा. यदि देश को आर्थिक रूप से मजबूत, सुरक्षित और समृद्ध बनाना है, तो प्रत्येक क्षेत्र में स्वदेशी पर जोर देना होगा।
जिस प्रकार हम स्वदेशी वस्तुओं को अपनाने की बात करते हैं, उसी प्रकार हमें स्वदेशी डिजिटल प्लेटफॉर्म और सॉफ्टवेयर को भी अपनाना होगा, यह केवल तकनीकी आवश्यकता नहीं, बल्कि राष्ट्रीय आवश्यकता है. सरकार के साथ साथ इन्वेस्टर्स को विचार करना चाहिए.

विदेशी सॉफ्टवेयर का खतरा
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अगर कभी भारत के सम्बंध अमेरिका से खराब हो जाए और अमेरिका भारत को सॉफ्टवेयर सर्विस देने से मना कर दे तो भारत में त्राहि त्राहि मच जायेगी और अमेरिकी सरकार का जो रुख है उसे देखते हुए लगता है कि वह समय अब बहुत दूर भी नहीं है.
निष्कर्ष
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भारत के पास प्रतिभा है, बाजार है, युवा शक्ति है और अवसर भी है. अब आवश्यकता है संकल्प की. देश के युवा इंजीनियरों को नए स्वदेशी ऐप और सॉफ्टवेयर बनाने के लिए आगे आना होगा और देश के निवेशकों को इन प्रयासों में खुलकर निवेश करना होगा.
यदि भारत ने तकनीक के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता प्राप्त कर ली, तो आने वाले वर्षों में भारत केवल उपभोक्ता नहीं, बल्कि दुनिया को तकनीक देने वाला नेतृत्वकर्ता राष्ट्र बनेगा. यही “स्वदेशी अपनाओ”, “स्टार्टअप इंडिया” और “मेक इन इंडिया” का वास्तविक उद्देश्य भी है.
मेरा बेटे ने भी इसी सोंच के साथ इनिसिएटिव लिया है और अपनी खुद की कम्पनी CPG Technologies (P) Ltd. बनाई है और एक टीम बनाकर इस क्षेत्र में काम कर रहा है. अभी उसकी शुरुआत है, आप सब का आशीर्वाद रहा तो वह अपने लक्ष्य को पाने में अवश्य सफल होगा

Saturday, 22 November 2025

संघ गीत : हे जन्म-भूमि भारत

हे जन्म-भूमि, हे कर्म भूमि भारत

हे वन्दनीय भारत, अभिनन्दनीय भारत।।

जीवन सुमन चढ़ाकर आराधना करेंगे

तेरा जन्म-जन्म भर हम वन्दना करेंगे।

हम अर्चना करेंगे, हे जन्म-भूमि भारत

हे जन्म-भूमि भारत, हे कर्म भूमि भारत।। 


महिमा महान् तू है, गौरव निधान तू है

तू प्राण है हमारी, जननी समान तू है

तेरे लिये जियेंगे, तेरे लिये मरेंगे

तेरे लिये जन्म भर, हम साधना करेंगे

हम अर्चना करेंगे, हे जन्म-भूमि भारत

हे जन्म-भूमि भारत, हे कर्म भूमि भारत।। 


जिनका मुकुट हिमालय, जग जगमगा रहा है

सागर जिसे रतन की, अंजुलि चढ़ा रहा है

वह देश है हमारा, ललकार कर कहेंगे

उस देश के बिना हम, जीवित नहीं रहेंगे

हम अर्चना करेंगे, हे जन्म-भूमि भारत

हे जन्म-भूमि भारत, हे कर्म भूमि भारत।। 


जो संस्कृति अभी तक दुर्जय सी बनी है

जिसका विशाल मन्दिर, आदर्श का धनी है

उसकी विजय-ध्वजा ले, हम विश्व में चलेंगे

संस्कृति सुरभि पवन, बन हर कुञ्ज में बहेंगे

हम अर्चना करेंगे, हे जन्म-भूमि भारत

हे जन्म-भूमि भारत, हे कर्म भूमि भारत।। 


शाश्वत स्वतन्त्रता का,जो दीप जल रहा है

आलोक का पथिक जो, अविराम चल रहा है

विश्वास है कि पल भर, रुकने उसे न देंगे

उस दीप की शिखा को, ज्योतित सदा रखेंगे

हम अर्चना करेंगे, हे जन्म-भूमि भारत

हे जन्म-भूमि भारत, हे कर्म भूमि भारत।। 

संघ गीत : मनुष्य तू बड़ा महान है

 मनुष्य तु बड़ा महान है, भूल मत मनुष्य तू बड़ा महान है।।

धरती की शान तू है,
मनु की संतान,
तेरी मुठ्ठियों मे बंद तूफान है रे,
मनुष्य तू बडा महान है,
मनुष्य तु बड़ा महान है, भूल मत मनुष्य तू बड़ा महान है।।

तू जो चाहे पर्वत पहाडो को फोड दे,
तू जो चाहे नदियों के मुख को भी मोड दे,
तू जो चाहे पर्वत पहाडो को फोड दे,
तू जो चाहे नदियों के मुख को भी मोड दे,
तू जो चाहे माटी से अमृत निचोड़ दे,
तू जो चाहे धरती को अंबर से जोड दे,
अमर तेरे प्राण अमर तेरे प्राण,
मिला तुझको वरदान,
तेरी आत्मा मे स्वयं भगवान है,
तेरी आत्मा मे स्वयं भगवान है रे,
मनुष्य तु बड़ा महान है, भूल मत मनुष्य तू बड़ा महान है।।

नैनो मे ज्वाल तेरी गत मे भुचाल,
तेरी छाती मे छुपा महाकाल है,
नैनो मे ज्वाल तेरी गत मे भुचाल,
तेरी छाती मे छुपा महाकाल है,
पृथ्वी के लाल तेरी हिमगिरि सा भाग,
तेरी भ्रकुटी मे तांडव का ताल है,
निज को तू जान निज को तू जान,
जरा शक्ति पहचान,
तेरी वाणी में ओ तेरी वाणी मे,
युग का अहवान है रे,
मनुष्य तु बड़ा महान है, भूल मत मनुष्य तू बड़ा महान है।।

धरती सा भी तू है अग्नि सा भी,
तू जो चाहे काल को भी थाम ले,
धरती सा भी तू है अग्नि सा भी,
तू जो चाहे काल को भी थाम ले,
पापो का प्रलय रूके पशुता का शिश झुके,
तू जो चाहे हिम्मत से काम ले,
गुरू सा मतीमान गुरू सा मतीमान,
पवन सा गतीमान,
तेरी नभ से भी ऊंची उडान है,
ओ तेरी नब से भी ऊंची उडान है रे,
मनुष्य तु बड़ा महान है, भूल मत मनुष्य तू बड़ा महान है।।

धरती की शान तू है, मनु की संतान,
तेरी मुठ्ठियों मे बंद तूफान है रे,
मनुष्य तु बड़ा महान है, भूल मत मनुष्य तू बड़ा महान है।।

संघ गीत : जो अपने देश धर्म कौम, दे रखवाले हुंदे ने

 जो अपने देश धर्म कौम दे, रखवाले हुंदे ने

ओह जीवन सफले हुंदे ने, ओह भागां वाले हुंदे ने ।।


नही रुकदे नही झुकदे, 

नही थकदे नही अकदे

कोई बी भैय या परलोभन, 

ओहनां नू तोड़ नहीं सकदे

वतन दिया साधकां तन मन, ऐसे ढाले हुंदे ने

ओह जीवन सफले हुंदे ने, ओह भागां वाले हुंदे ने


जो अपने देश धर्म कौम दे, रखवाले हुंदे ने

ओह जीवन सफले हुंदे ने, ओह भागां वाले हुंदे ने ।।



उबलदिआं देगां, तत्तीआं तवीआं, 

आरे, रंबीआं, चरखडीआं

जो सच्च दी राह चलदे ने, 

मुश्किलां आऊंदीआं बडींआं

कदे फाँसी, कदे गोली, कदे विष प्याले हुंदे ने

ओह जीवन सफले हुंदे ने, ओह भागां वाले हुंदे ने


जो अपने देश धर्म कौम दे, रखवाले हुंदे ने

ओह जीवन सफले हुंदे ने, ओह भागां वाले हुंदे ने ।।


धनी उन्हां जिन्हा कोई 

नही हुंदा जमाने विच

सिदकदिलियां जुझारूपन है, 

जिन्हां दे खजाने विच

जिन्हा ने शील – संयम, चाल – चलन सम्भाले हुंदे ने

ओह जीवन सफले हुंदे ने, ओह भागां वाले हुंदे ने


जो अपने देश धर्म कौम दे, रखवाले हुंदे ने

जो अपने देश धर्म कौम दे, रखवाले हुंदे ने

संघ गीत : ऐ हिन्द तेरी शान तों जाना लुटावांगे

ऐ हिन्द तेरी शान तों, जानां लुटावांगे।

दुनियां नू तेरी रक्खिया, कर के विखावांगे॥

ऐ हिन्द तेरी शान तों, जानां लुटावांगे।

दुनियां नू तेरी रक्खिया, कर के विखावांगे॥


बन्दे ने धरम रक्खिया, जीवन नू वार के,

दसवें पिता ने दस्सिया, सरवंश वार के.

रक्खी सी लाज धरम दी, अजीत जुझार ने

साडे वी सीनियां दे विच, उठ दे उबाल ने

असी लाडले दशमेश दे बण के विखांवांगे,

नियां नू तेरी रक्खिया, कर के विखावांगे॥

ऐ हिन्द तेरी शान तों, जानां लुटावांगे।

दुनियां नू तेरी रक्खिया, कर के विखावांगे॥


जालिम ने भगत सिंह नू, फांसी चढ़ा दित्ता

भारत दा शेर , आखरी नींदे सुला दित्ता

पर ओह तां हस्स के, देश तों कुरबान हों गिआ

परवानां अपणी कौम तों, बलिदान हो गिआ

कुरबानीयां दा पाठ वी , दिल नूं पढ़ावांगे

दुनियां नू तेरी रक्खिया , कर के विखावांगे॥

ऐ हिन्द तेरी शान तों, जानां लुटावांगे।

दुनियां नू तेरी रक्खिया, कर के विखावांगे॥


चमकी जो बिजली वांग , ओह झांसी दी रानी सी

जननी दे प्यार विच , जो होई दीवानी सी

दुश्मन दे मार मार के, छक्के छुड़ाए सी

घानां दे घान मार के , धरती ते लाहे सी

प्रचण्ड ओस चण्डी नूं , करके विखावांगे

दुनियां नू तेरी रक्खिया. कर के विखावांगे॥

ऐ हिन्द तेरी शान तों, जानां लुटावांगे।

दुनियां नू तेरी रक्खिया, कर के विखावांगे॥


राणा ने उमर जंगलां दे, विच गुजारी सी

खातर धर्म ते देश दे , जिन्दड़ी वी वारी सी

शिवा ने मां तों सिक्खिया , कुरबान होवना

प्यारे धर्म ते देश तों बलिदान हो वना

सारे जग ते फेर तों , भगवा लहरावांगे

दुनियां नू तेरी रक्खिया कर के विखावांगे॥

ऐ हिन्द तेरी शान तों, जानां लुटावांगे।

दुनियां नू तेरी रक्खिया, कर के विखावांगे॥

संघ गीत : चरैवेति-चरैवेति, यही तो मंत्र है अपना

चरैवेति-चरैवेति

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चरैवेति-चरैवेति, यही तो मंत्र है अपना ।

चरैवेति-चरैवेति, यही तो मंत्र है अपना ॥

नहीं रुकना, नहीं थकना, 

सतत चलना सतत चलना ।

यही तो मंत्र है अपना, 

शुभंकर मंत्र है अपना ॥

चरैवेति-चरैवेति, यही तो मंत्र है अपना ।

चरैवेति-चरैवेति, यही तो मंत्र है अपना ।


हमारी प्रेरणा भास्कर, 

है जिनका रथ सतत चलता।

युगों से कार्यरत है जो, 

सनातन है प्रबल ऊर्जा।

गति मेरा धरम है जो, 

भ्रमण करना भ्रमण करना।

यही तो मंत्र है अपना, 

शुभंकर मंत्र है अपना 

चरैवेति-चरैवेति, यही तो मंत्र है अपना ।

चरैवेति-चरैवेति, यही तो मंत्र है अपना ॥१॥


हमारी प्रेरणा माधव, 

है जिनके मार्ग पर चलना।

सभी हिन्दू सहोदर हैं, 

ये जन-जन को सभी कहना।

स्मरण उनका करेंगे और, 

समय दे अधिक जीवन का।

यही तो मंत्र है अपना, 

शुभंकर मंत्र है अपना 

चरैवेति-चरैवेति, यही तो मंत्र है अपना ।

चरैवेति-चरैवेति, यही तो मंत्र है अपना ॥२॥


हमारी प्रेरणा भारत, 

है भूमि की करें पूजा।

सुजल-सुफला सदा स्नेहा, 

यही तो रूप है उसका।

जिएं माता के कारण हम, 

करें जीवन सफल अपना।

यही तो मंत्र है अपना, 

शुभंकर मंत्र है अपना 

चरैवेति-चरैवेति, यही तो मंत्र है अपना ।

चरैवेति-चरैवेति, यही तो मंत्र है अपना ॥३॥


नहीं रुकना, नहीं थकना, 

सतत चलना सतत चलना ।

यही तो मंत्र है अपना, 

शुभंकर मंत्र है अपना ॥

चरैवेति-चरैवेति, यही तो मंत्र है अपना ।

चरैवेति-चरैवेति, यही तो मंत्र है अपना ॥

संघ गीत : हम करें राष्ट्र आराधन

 हम करें राष्ट्र-आराधन, 

हम करें राष्ट्र-आराधन,

तन से, मन से, धन से, 

तन-मन-धन जीवन से

हम करें राष्ट्र-आराधन,

हम करें राष्ट्र आराधन ।। 1।।


अंतर से मुख से कृति से, 

निश्चल हो निर्मल मति से,

श्रद्धा से मस्तक नत से, 

हम करें राष्ट्र अभिवादन

हम करें राष्ट्र आराधन

हम करें राष्ट्र आराधन ।। 2 ।।


अपने हँसते शैशव से, 

अपने खिलते यौवन से,

प्रौढ़तापूर्ण जीवन से, 

हम करें राष्ट्र का अर्चन

हम करें राष्ट्र आराधन

हम करें राष्ट्र आराधन ।। 3 ।।


अपने अतीत को पढ़कर, 

अपना इतिहास उलटकर,

अपना भवितव्य समझकर, 

हम करें राष्ट्र का चिंतन

हम करें राष्ट्र आराधन

हम करें राष्ट्र आराधन ।। 4 ।।


हमने ही उसे दिया था, 

सांस्कृतिक उच्च सिंहासन,

माँ जिस पर बैठी सुख से, 

करती थी जग का शासन,

हम करें राष्ट्र आराधन

हम करें राष्ट्र आराधन ।। 5 ।।


अब कालचक्र की गति से, 

वह टूट गया सिंहासन

अपना तन-मन-धन देकर 

हम करें पुनः संस्थापन

हम करें राष्ट्र आराधन

हम करें राष्ट्र आराधन ।। 6 ।।


Wednesday, 1 January 2025

बीबी अनूप कौर का बलिदान

बीबी अनूप कौर का जन्म 1690 में अमृतसर के पास जलोपुर खेरे गाँव में हुआ था. उनके पिता का नाम लच्छमन दास सोढ़ी था. उन दिनों सोढ़ी समुदाय दो विरोधी गुटों में बँटा हुआ था. एक गुट त्यागमल (गुरु तेग बहादुर) को गुरु पद के लिए समर्थन दे रहा था, जबकि दूसरा गुट उनके भतीजे धीर मल ( बाबा गुरदित्ताजी के पुत्र) को नौवां गुरु बनाना चाहता था. सोढ़ी वंश के कई सदस्य, जैसे लच्छमन दास, जो गुरु तेग बहादुर के समर्थक थे, दैनिक कलह और संघर्ष से बचने के लिए मध्य पंजाब छोड़कर आनंदपुर में बस गए. अनुप कौर केवल पाँच वर्ष की थीं जब उनके माता-पिता आनंदपुर चले गए. वह हमेशा खुश रहने वाली और सुंदर लड़की थीं. वह साहिबजादों के साथ खेलती थीं और माता सुंदरी उन्हें बहुत पसंद करती थीं. अनुप कौर अपना अधिकांश समय साहिबजादों के साथ बिताती थीं और उन्हें गुरु परिवार के सदस्य की तरह माना जाता था. उन्होंने उनके साथ रहकर धार्मिक शिक्षा प्राप्त की और गुरमुखी पढ़ना-लिखना सीखा. उन्होंने तलवारबाजी और अन्य युद्ध कलाएं भी सीखना शुरू किया. वे तलवार, ढाल और भाले जैसे हथियारों का भी इस्तेमाल करती थीं और घुड़सवारी भी करती थीं, जब मुग़ल सेना ने आनंदपुर साहब के किले को घेर लिया तब उन्होंने गुरु के परिवार के महिला सदस्यों की देखभाल करने का दायित्व संभाला. जब 20 दिसंबर 1704 की बरसाती रात को गुरु गोविन्द सिंह ने आनंदपुर खाली कर दिया, उस समय गुरु परिवार के सदस्यों की सुरक्षा का दायित्व अनुप कौर के दल ने ले लिया. किले के बाहर सिखों पर हमला हो गया. अनुप कौर के नेतृत्व में सिख सैनिक और स्त्रियाँ शत्रु से लड़ते हुए सिरसा नदी की ओर बढ़ते रहे. बाढ़ग्रस्त सिरसा नदी पार करते समय अनुप कौर गुरु के परिवार से बिछड़ गईं. नदी पार करने के बाद, उनकी मुलाकात पाँच सिख सैनिकों से हुई, जिन्होंने उन्हें बताया कि गुरु गोविंद सिंह ने चमकौर में मुगल सेना से युद्ध किया था, जिसमें दो बड़े साहिबजादे लड़ते हुए शहीद हो गए हैं. उन्हें यह भी बताया गया कि छोटे साहिबजादों को सिरहंद में गिरफ्तार कर लिया गया था. वे सभी सिरहंद की ओर चल पड़े, लेकिन रास्ते में मोरिंडा के पास उनकी मुलाकात मुगल सैनिकों के गश्ती दल से हुई. उनसे हुई लड़ाई में दो सिख सैनिक शहीद हो गए. उसके बाद मलेरकोटला के सैनिको के साथ हुई मुठभेड़ में वे दो सिक्ख भी शहीद हो गए और अनूप कौर भी घायल हो गई. मुग़ल सैनिको ने बीबी अनूप कौर को बंदी बना लिया और उन्हें मलेरकोटला के नबाब शेर मोहम्मद खान के सामने प्रस्तुत कर दिया. बीबी अनूप कौर की सुंदरता को देखकर शेर मोहम्मद खान ने मोहित हो गया. जिस तरह सीता माता को देखकर रावण रावण सबकुछ भूलकर उनसे विवाह की याचना करने लगा था बैसे ही शेर मोहम्मद खान भी बीबी अनूप कौर से कहने लगा कि - धर्म परिवर्तन कर लें और उससे निकाह कर लें. उसने उनको तरह तरह के लालच दिए और धमकाया लेकिन बीबी अनूप कौर ने उसकी बात मानने से इंकार कर दिया. तब नबाब ने उन्हें अपने हरम के एक कमरे में कैद कर दिया. तब मजबूर होकर बीबी अनूप कौर ने नबाब से कहा कि अगर वह किसी तरह गुरु साहब के छोटे साहबजादो की जान बचा दे तो वह उसकी हर बात मान लेगी. अगले दिन सरहिंद के नबाब बजीर खान की कचेहरी में छोटे साहब जाड़ों पर चर्चा होते समय नबाब शेर मोहम्मद खान ने कहा कि हमारी दुश्मनी इनके पिता से है, इनसे नहीं. इसलिए इन्हे मौत की सजा न दी जाए. परन्तु उसकी बात नहीं मानी गई और दोनों छोटे साहबजादों को जिन्दा दीवार में चुनवा दिया गया. इस खबर को सुनकर अनूप कौर को बहुत दुःख हुआ. तब मौका पाकर बीबी अनूप कौर ने अपने सीने में खंजर मारकर आत्महत्या कर ली. नबाब ने इसे अपनी शिकस्त मानते हुए, उनके पार्थिव शरीर को मुस्लिमों की तरह कब्रिस्तान में दफना दिया. कुछ बर्ष बाद बाबा बन्दा बहादुर ने पंजाब पर हमला किया और चप्पड़ चिड़ी की जंग में सरहन्द के नबाब बजीर खान को मार गिराया और सरहिंद पर अपना अधिकार कर लिया उसके बाद बन्दा बहादुर ने मलेरकोटला पर हमलाकर मलेरकोटला को भी जीत लिया. प्रोफेसर गंडा सिंह अपने शोध के आधार पर लिखते हैं कि लड़ाई में बन्दा बहादुर का साथ देने वाले भाई आली सिंह और भाई माली सिंह ने बन्दा बहादुर को बीबी अनूप कौर के बलिदान के बारे में बयाया, तो बन्दा बहादुर का हृदय बीबी अनूप कौर के लिए श्रद्धा से भर गया. उन्होंने अपने साथियों से कहा कि - हम उस महान देवी के लिए कुछ और तो नहीं कर सकते लेकिन बीबी अनूप कौर का पार्थिव शरीर कब्र से निकालकर उनका दाह संस्कार अवश्य करेंगे. उन्होंने कब्रिस्तान को खुदवाकर बीबी अनूप कौर के पार्थिव शरीर के अबशेषों को निकाला और सिक्खी रीति रिवाज के उनका विधिवत अग्नि संस्कार किया. बन्दा बहादुर के इसी कार्य को उनके आलोचक इतिहासकारों ने लिखा है कि - बन्दा बहादुर मुसलमानो की कब्रों को खोदकर मुसलमानो के शव आग में जलाकर उनकी बेअदवी करता था, जबकि वास्तविकता ये हैं कि - उन्होंने केवल बीबी अनूप कपूर की ही कब्र ही खुदबाकर उनके अबशेषों का अग्नि संस्कार किया था. बीबी अनूप कपूर अमर रहे, बन्दा बहादुर अमर रहें, भारत माता की जय, वन्देमातरम

भारत का राष्ट्रीय कैलेंडर एवं डा. मेघनाथ साहा / नेहरू विवाद

भारत में डा. मेघनाथ साहा नाम के एक बड़े खगोल वैज्ञानिक हुए हैं. उन्होंने विभिन्न कैलेंडर्स और पंचांग आदि का अध्यन किया था. उन्होंने 1939 में एक लेख लिखा था ‘भारतीय कैलेंडर में सुधार की आवश्यकता’. आजादी से पहले भी उनके नेहरू जी से बहुत अच्छे समबन्ध थे. जब देश आजाद हुआ तो उन्होंने नेहरू जी को नए कलेण्डर के बारे में सुझाव दिया.

उनका प्रस्ताव प्रधानमंत्री नेहरू जी को भी पसंद आया लेकिन यह एक कठिन काम था क्योंकि कैलेंडर के साथ धर्म और स्थानीय भावनाएं भी जुड़ी हुई थीं. इसी बीच 1952 में डाक्टर मेघनाथ साहा चुनाव जीतकर संसद सदस्य भी बन गए. 1952 में नेहरू सरकार ने कैलेंडर रिफॉर्म कमेटी बनाई और डा. मेघनाथ साहा को इसका अध्यक्ष नियुक्त किया.
समिति ने देश के अलग-अलग हिस्सों में प्रचलित विभिन्न 30 कैलेंडरों का गहराई से अध्ययन किया और 1954 में अपनी सिफारिशें रखी, जिनमें से कुछ इस प्रकार थीं. महीनो के नाम हिन्दू कैलेण्डर वाले हों लेकिन साल में दिन अंग्रेजी कैलेण्डर की तरह 365 / 366 ही हों. दिन रात सामान होने वाला 22 मार्च साल का पहला दिन हो (लीप ईयर में 21 मार्च पहला दिन हो).
एक सिफारिस यह भी की गई कि इस कैलेंडर में साल के पहले 6 महीने 31 दिन के और बाद के 6 महीने 30 दिन के हों, तो लोगों को यह याद करने में सुविधा होगी कि कौन सा महीना 31 दिन का है और कौन सा 30 दिन का. इस प्रकार उन्होंने भारतीय और अंग्रेजी कैलेंडर का समावेश कर एक नया कैलण्डर तैयार किया जो तकनीकी रूप से वास्तव में काफी अच्छा है.
1955 में एकीकृत राष्ट्रीय नागरिक कैलेंडर तैयार हो गया. नेहरू जी ने इसकी प्रस्तावना में लिखा था : पुराने कैलेंडर देश में विभाजन का प्रतिनिधित्व करते हैं. अब जबकि हमने स्वतंत्रता प्राप्त कर ली है, यह स्पष्ट रूप से वांछनीय है कि हमारे देश में नागरिक, सामाजिक और अन्य उद्देश्यों के लिए कैलेंडर में भी एक निश्चित एकरूपता होनी चाहिए.
अब समस्या यह आई कि इस कैलेंडर का प्रारम्भ कब से माना जाए और इसे नाम क्या दिया जाए. कहा जाता है कि नेहरू जी इस कैलेण्डर द्वारा अपने आपको विक्रमादित्य, ईसा मसीह, शालिवाहन, आदि की तरह अमर बनाना चाहते थे और इसे नेहरू सम्वत नाम देना चाहते थे साथ ही चाहते थे इसे अपने जन्म वाले बर्ष से प्रारम्भ करना चाहते थे.
इसी बात को लेकर डा. मेघनाथ साहा और प्रधानमंत्री नेहरू में विवाद हो गया क्योंकि डा. मेघनाथ साहा चाहते थे इसे युधिष्ठिर सम्वत से शुरू किया जाए. विवाद होने पर नेहरू जी ने प्रस्ताव रखा कि आजादी का बर्ष 1947 प्रथम बर्ष हो और बर्ष का नाम "विक्रम सम्वत" की तरह "नेहरू सम्वत" हो. इस बात के लिए मेघनाथ साहा बिलकुल तैयार नहीं थे.
इस विवाद के कारण कैलेंडर जारी करने का काम रुक गया. 26 जनवरी 1956 के एक कार्यक्रम में नेहरू जी ने बिना तारीख बताये शीघ्र ही नया कैलेण्डर जारी होने की घोषणा भी कर दी. डा. मेघनाथ साहा इस बात से भी नाराज हुए. कहा जाता है कि समिति के अन्य सदस्यों द्वारा भी डा. मेघनाथ साहा पर दबाव डाला गया परन्तु वे "नेहरू सम्वत" पर नहीं माने.
तभी अचानक खबर आई कि 16 फरवरी 1956 को अचानक हृदयाघात पड़ने से 62 बर्ष की आयु में डा. मेघनाथ साहा का देहांत हो गया. उस समय वे राष्ट्रपति भवन में स्तिथ योजना आयोग के कार्यालय जा रहे थे. यह भी कहा जाता है कि वे उस समय कैलेंडर से सम्बंधित सारे दस्तावेज लेकर राष्ट्रपति डा. राजेंद्र प्रसाद को सौंपने जा रहे थे.
डा. मेघनाथ साहा के अचानक निधन से नया कैलेंडर लागू करने का कार्यक्रम टल गया और आधिकारिक तौर पर इसका उपयोग 22 मार्च 1957 को शुरू हुआ और इसे शक सम्वत से जोड़ दिया गया. अर्थात 22 मार्च 1957 को 1 चैत्र 1879 शक संवत माना गया. आज ये राष्ट्रीय कैलेण्डर है लेकिन राष्ट्र में शायद ही कोई होगा जो इसको मानता होगा.
इसके साथ सबसे बड़ी दुविधा यह है कि इसमें बर्ष को शक सम्वत नाम दिया है जबकि शक संवत पर आधारित कैलेंडर पहले से ही मौजूद है जिसमे पूर्णमासी के बाद महीना बदलता है, जिससे भ्रम की स्थिति पैदा हो जाती है. इस कैलेंडर को आम जनता के बीच स्वीकृति नहीं मिली और वर्तमान में इसका उपयोग केवल सरकारी कार्यालयों तक ही सीमित है.

Friday, 27 September 2024

पुष्कर का गौ घाट का युद्ध

हरिद्वार की तरह पुष्‍कर भी हिन्‍दुओं का बहुत बड़ा तीर्थस्‍थल है. पुष्‍कर सरोवर में कुल 52 घाट बने हुए है, जिनमे सबसे बड़ा गऊघाट है. पुष्कर में भगवान ब्रह्मा का प्रशिद्ध मंदिर है. ऐसा माना जाता है कि चारों धाम (बद्रीनाथ, जगन्नाथ, रामेश्वरम और द्वारका) के दर्शन कर लिए हैं, लेकिन आपने पुष्कर का दर्शन नहीं किया है तो आपकी यात्रा सफल नहीं मानी जाएगी.

मेड़ता की हार से बौखलाए हुए, औरंगजेब के सिपहसालार "तहव्वुर खान" ने विक्रम संवत 1737 भाद्रपद की जन्माष्टमी के अवसर पर, पुष्कर के वराह मंदिर को खंडित करने, 101 गौमाताओं का पुष्कर घाट पर क़त्ल करने और वहां के पुजारियों की हत्या करने की घोषणा कर दी. सप्तमी से पहले 101 स्वस्थ गायें पुष्कर के घाट पर लाकर बाँध दी गईं.
जब यह सूचना कुंवर राज सिंह को मिली तब कुंवर राज सिंह के विवाह की तैयारी चला रही थी. कुंवर राज सिंह ने विवाह मंडप छोड़कर पुष्कर की ओर कूच करने का निर्णय लिया और अपने साथ 700 योद्धाओं को लेकर पुष्कर की ओर चल दिये. दरअसल उन दिनों पूरे राजस्थान में ओरंगजेब की सेनाओ और राजपूतो के बीच जगह जगह युद्ध चल रहे थे.
इसका मुख्य कारण यह था कि औरंगजेब ने विष देकर जोधपुर के महाराजा जसवंत सिंह को धोखे से मरवा दिया था और मारवाड में अपनी सेना भेजकर उस पर अपना अधिकार कर लिया था. बालक महाराज अजीत सिंह को वीरवर दुर्गादास राठौर, आदि स्वामिभक्त सरदारो की संरक्षण मे सुरक्षित करके राठौड सरदारो ने मुगलो के थानो पर आक्रमण शुरू कर दिया था.
राजपूत योद्धाओं ने जोधपुर, सोजत, डीडवाना, सिवाना, आदि पर हमला कर शाही खजाने लूट लिए थे. इसके अलावा कुवंर राजसिंह ने अपने मेडतिया साथियों के साथ मेडता पर हमलाकर वहां के शाही हकीम सदुल्लाह खान को मार दिया. उस समय मेडता अजमेर सूबे मे था. इस खबर से बौखलाए हुए तहव्वुर खान हिन्दुओं को अपमानित करने का निर्णय लिया.
उसने अपनी सेना पुष्कर भेजने की तैयारी कर ली. इस खबर को सुनकर पुष्कर के ब्राह्मणो मे त्राहि त्राहि मच गई. उन्होंने अपना सन्देश कुवंर राजसिंह जी तक भेजा. वे अपने साथ एक 700 वीर योद्धाओं की छोटी से सेना लेकर पुष्कर जी पहुँच गए. उन्होंने वाराह जी के मंदिर में माथा टेकने कर आशीर्वाद लेने के बाद शाही सेना पर हमला कर दिया
उनको हराने के बाद उन्होंने घाट के पास लाकर बाँधी गई गायो को बंधन मुक्त करा दिया और मुगलो की दूसरी टुकडी पर रात्री मे ही हमला कर दिया. सप्तमी की सारी रात और अष्टमी के पूरे दिन यह युद्ध होता रहा. पुष्कर की मिट्टी रक्त से लाल हो गई. इस लड़ाई में पुष्कर में पूरी मुघल सेना का सफाया कर दिया गया. लेकिन नवमी के दिन और बड़ी मुग़ल सेना वहां पहुँच गई.
नवमी को भी भयानक युद्ध हुआ. मुग़ल सेना का सफाया हो गया लेकिन इस लड़ाई में कुंवर राजसिंह, केशरसिंह, सुजाणसिंह, चातरसिंह, रूपसिंह हठी सिंह गोकुल सिंह, आदि भी वीरगति को प्राप्त हो गए. राठौरों के भय से तहव्वुरखां भागकर तारागढ में छुप गया. इस प्रकार वीर राजपूतों ने अपना बलिदान देकर गायों, ब्राह्मणो, मंदिरों एवं पुष्कर तीर्थ की रक्षा की.
आजादी के बाद नेहरू सरकार ने पुष्कर के गौ घाट का नाम गौ घाट से बदलकर महात्मा गांधी घाट कर दिया. उनका तर्क यह था कि यहाँ पर महात्मा गांधी की चिता की राख का कुछ अंश विसर्जित किया गया था. लेकिन सभी यह मानते है कि महात्मा गांधी घाट नाम रखने की मंशा केवल यह थी कि लोग गायो की हत्या और राजपूतों के बलिदान की बात भूल जाएँ.
इसलिए सरकारी कागजों में इस घाट का नाम भले ही महात्मा गांधी घाट कर दिया हो लेकिन सभी इसे गौघाट ही कहते है

Saturday, 7 September 2024

मार्कण्डेय ऋषि

सनातन धर्मावलम्बियों के घरों में आपने अक्सर ही एक चित्र देखा होगा, जिसमें एक किशोर शिवलिंग से भावपूर्वक लिपटा हुआ है और पीछे खड़े भगवान शिव उस किशोर के प्राण हरने को उद्यत यमराज पर प्रहार कर रहे हैं. यही किशोर आगे चलकर चिरंजीवी महामुनि मार्कण्डेय के रूप में प्रसिद्ध हुआ.

वे आठ चिरंजीवी महामानवों में से एक हैं. अर्थात अश्वत्थामा, दैत्यराज बली, वेद व्यास, हनुमान, विभीषण, कृपाचार्य, परशुराम और मार्कण्डेय ऋषि सदैव जीवित हैं. इन सबमें भी मार्कण्डेय ऋषि आयु में शेष सभी से बड़े हैं. मार्कण्डेय ऋषि के चिरंजीवी बनने की कथा पद्मपुराण के उत्तरखंड में है.
ऋषि मृकंदु और उनकी पत्नी मरुदमती ने शिव की तपस्या की और उनसे पुत्र प्राप्त करने का वरदान मांगा. शिव ने मृकंदु से पूछा था कि ‘तुम्हें दीर्घ आयु वाला गुणहीन पुत्र चाहिए या अल्प आयु वाला गुणवान पुत्र ? तब मृकण्डु ने गुणवान पुत्र की कामना की. भगवान शिव ने मार्कण्डेय की आयु 16 वर्ष निश्चित की.
जब मार्कण्डेय का सोलहवां वर्ष प्रारम्भ हुआ तो पिता शोक से भर गए. कारण पूछने पर पिता ने अल्पायु की कथा बताई तो वे माता-पिता की आज्ञा लेकर केरल के त्रिप्रंगोड में समुद्र के तट पर गए और वहां शिवलिंग स्थापित कर आराधना में जुट गए. उन्होंने महामृत्युञजय मन्त्र की रचना की और जाप करने लगे.
तय समय पर काल उनके प्राण हरने आ पहुंचा. तब किशोर मार्कण्डेय ने कहा कि मैं भगवान् शिव के महामृत्युंजय मन्त्र का जाप कर रहा हूं, इसे पूरा कर लूं, तब तक ठहर जाओ. मगर काल नहीं माना और बलपूर्वक मार्कण्डेय को ग्रसना चाहा. भक्त की पुकार पर उसी समय शिवलिंग से महादेव प्रकट हुए.
भगवान् शिव ने हुंकार भरकर काल की छाती पर चरण से प्रहार किया. इसी घटना के बाद शिवजी का नाम कालान्तक पड़ा. भगवान् शिव ने न केवल मार्कण्डेय के प्राणों की रक्षा की बल्कि उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर उन्हें सदा सर्वदा के लिए काल-मुक्त कर चिरंजीवी होने का वरदान दे दिया,
कुछ विद्वानों का मानना है कि यह घटना कैथी (वाराणसी जिला) में गोमती नदी के तट पर हुई थी, जहाँ गंगा नदी और गोमती नदी का संगम होता है. इस स्थल पर एक प्राचीन मंदिर मार्कंडेय महादेव मंदिर बना हुआ है. गंगा नदी और गोमती नदी संगम क्षेत्र होने के कारण इसकी पवित्रता और भी बढ़ जाती है.
हरियाणा के लोगों का मानना है कि यह घटना अम्बाला और कुरुक्षेत्र के बीच स्तिथ शाहबाद मारकंडा कसबे में मारकंडा नदी के किनारे की है. यहाँ भी मारकंडा नदी के किनारे, राष्ट्रीय राजमार्ग के किनारे, मारकंडेश्वर महादेव का भव्य मंदिर बना हुआ है. बड़ी संख्या में भक्त या पूजा करने आते हैं.
गायत्री मंत्र की भांति महामृत्युंजय मंत्र को भी अत्यंत प्रभावी मन्त्र माना जाता है. विद्वानों का कहना है कि यह मंत्र सबसे पहले ऋग्वेद के सातवें मंडल के 59वें सूक्त में आया. रुद्र देवता के प्रति ऋषि वसिष्ठ द्वारा अनुष्टुप छंद में कृत यह इस सूक्त का बारहवां मंत्र है, जो बाद में यजुर्वेद से होते हुए अन्यत्र पहुंचा.

विद्वानों का कहना है कि मार्कण्डेय ने केवल इस मन्त्र का केवल जाप किया था लेकिन लोक-विश्वास है कि महामृत्युंजय मंत्र की रचना भी मार्कण्डेय ने ही की और इसी के बल पर स्वयं को मृत्यु से बचाकर चिर जीवन पाया, इसीलिए प्रियजनों को जीवनदान के निमित्त लोग इसका जाप कराते हैं.
वाल्मीकि रामायण के अनुसार मार्कण्डेय महाराज दशरथ के ऋत्विज (यज्ञ कराने वाला) थे और भगवान श्रीराम के विवाह में बराती बन मिथिला भी गए थे. राजा बनने के बाद श्रीराम के आमंत्रण पर ये उनकी सभा में पधारे थे और केवल इतना ही नहीं, मार्कण्डेय जी सीता के रसातल में प्रवेश के भी साक्षी बने थे.
इन्होंने नचिकेता से शिव सहस्रनाम का उपदेश ग्रहण कर उसे उपमन्यु को दिया था. महाभारत के अनुसार महामुनि मार्कण्डेय ने धृतराष्ट्र को त्रिपुराख्यान सुनाया था. वे युधिष्ठिर की राजसभा में भी आए थे और भीष्म के शरशय्याशायी होने पर अनेक ऋषि-मुनियों के साथ उनके पास खड़े हुए थे.
महाभारत के वनपर्व में 51 अध्यायों का एक समूचा उपपर्व मार्कण्डेय मुनि को ही समर्पित है. इस अवसर पर काम्यकवन में पाण्डवों के पास उपस्थित स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने मार्कण्डेय का पूजन किया था. इस विस्तृत उपपर्व में मार्कण्डेय मुनि ने कर्मफल सहित अनेक प्रश्नों पर जो उपदेश दिया.
लगभग सभी पुराणों में मार्कण्डेय ऋषि का सादर स्मरण किया गया है. स्वयं मार्कण्डेय के नाम से एक ‘मार्कण्डेय पुराण’ है. देवी पार्वती ने भी उन्हें एक पाठ लिखने का वरदान दिया था, उनके द्वारा लिखा गया यह पाठ "दुर्गा सप्तशती" के रूप में जाना जाता है, जो मार्कंडेय पुराण में एक मूल्यवान भाग है.
मार्कण्डेय इतने महिमावान हैं कि उनकी ख्याति उत्तर से दक्षिण तक फैली हुई है. उत्तर से लेकर दक्षिण तक के लोग उन्हें अपना मानते है और उनकी विरासत पर दावा करते हैं. सत्य तो यह है कि मार्कण्डेय ऋषि का वास्तविक जन्म या तपस्थल अज्ञात है लेकिन उनका व्यक्तित्व और कृतित्व सर्वज्ञात है.
जिस प्रकार शिवभक्ति कर उन्होंने चिरंजीवी जीवन पाया, उसका प्रतीक यह है कि भाव प्रबल हो तो पत्थर से भी परमात्मा प्रकट हो जाता है. अपने उपदेशों में हर युग में मार्कण्डेय सिखाते हैं कि जो व्यक्ति तन व मन से जितना अधिक सात्विक जीवन जीता है, वही व्यक्ति दीर्घायु और मृत्युंजयी होता है.

Friday, 23 August 2024

देश भर में लगभग सारे ही चोर बाजार मुस्लिम बहुल इलाकों में ही क्यों है ?

मुंबई का चोर बाजार
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भारत के प्रमुख चोर बाजारों में से एक है.. मुंबई का यह चोर बाजार, दक्षिणी मुंबई के मटन स्ट्रीट, मोहम्मद अली रोड के
पास है और मौलाना शौकत अली रोड के बीच स्थित है. इसका निकटतम स्थानीय रेलवे स्टेशन ग्रांट रोड है.

दिल्ली का चोर बाजार
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पुरानी दिल्ली लालकिले और जामा मस्जिद के क्षेत्र में यह साप्ताहिक चोर बाजार लगता है. प्रत्येक रविवार को लगने वाले इस चोर बाजार में आपको ब्रांडेड आयटम लगभग एक चौथाई कीमत में भी मिल जाएंगे। यहाँ घरेलू सामान ज्यादा मिलता है.

मेरठ का चोर बाजार
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चोरी की गाड़ियों और गाड़ियों के स्पेयर पार्ट के लिए पुरे भारत में मेरठ का सोती गंज चोर बाजार सबसे ज्यादा कुख्यात है. यह मेरठ में जकारिया मस्जिद, अनारवाली मस्जिद और मीनार मस्जिद के बीच का
इलाका है. यह ऐसा इलाका है जहाँ पुलिस भी जाने से डरती है.

बंगलुरु का चोर बाजार
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ये मार्केट बेंगलुरु में चिकपेट नामक जगह पर, बीवीके अयंगर रोड पर, नालडवाडी मस्जिद के पास लगती है. यह साप्ताहिक बाजार है जो केवल सन्डे को लगता है. यहां सेकेंड हैंड गुड्स, चोरी के गैजेट्स, कैमरा, इलेक्ट्रॉनिक आइटम और सस्ते जिम इक्विपमेंट मिलते हैं.

चेन्नई का चोर बाजार
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चेन्नई का चोर बाजार, सेन्ट्रल चेन्नई के ऑटो नगर इलाके में स्थित है. कहने को तो ये लोग कारों को मॉडिफाई करने का काम करते हैं लेकिन ये लोग गाड़ियों के ऑरिजनल पार्ट्स और कार को बदलने के लिए कुख्यात है. ये मार्केट एग्मोर ट्रेन स्टेशन से 1 किलोमीटर दूर है.
इन प्रशिद्ध चोर बाजारों के अलाबा भी विभिन्न शहरों के चोर बाजार पर नजर डालेंगे तो वहां भी ऐसे ही नज़ारे दिखाई देंगे, आसपास कोई मुस्लिम बस्ती होगी या उस शहर की कोई ख़ास मस्जिद होगी.
कोलकता मे मल्लिक बजार, लखनऊ का नख्खासा बाजार, रामपुर का रजा बाजार, आदि भी ऐसे ही चोर बाजार है. बाक़ी अपने अपने शहर के चोर बाजार के बारे में आप कमेंट बॉक्स में बताने की कृपा करे, जिससे उनका नाम भी पोस्ट में जोड़ा जा सके.

क्या अंग्रेजों ने भारत पर 200 साल तक शासन किया

 अक्सर लोग बोलते हैं कि अंग्रेजों ने भारत पर 200 साल तक राज किया. मुझे तो यह बात एकदम झूठ लगती है. मुझे आजतक समझ नहीं आया कि आखिर अंग्रेजों ने भारत पर 200 साल तक राज कैसे किया ? भारत पर अंग्रेजों के 200 तक राज करने का अर्थ है कि अंग्रेजों ने 1747 के आसपास के समय से लेकर 1947 तक भारत पर राज किया हो.

जहाँ तक मेरी जानकारी है उसके अनुसार 1857 तक देश के ज्यादातर क्षेत्र में मुस्लिम, हिन्दू एवं सिख राजाओं का राज रहा. जब 1757, 1761, 1762 में अफगान हमलाबर अहमदशाह अब्दाली ने भारत पर हमला किया उस इतिहास में भी कहीं अंग्रेजों का जिक्र नहीं आता है. उसकी लड़ाई जाटों (1757), मराठों (1761) और सिखों (1762) से हुई थी
अंग्रेजों ने 1757 में ईस्ट इंडिया कंपनी के रॉबर्ट क्लाइव के नेतृत्व में बंगाल के तत्कालीन नवाब सिराज़ुद्दौला से लड़ाई हुई थी जिसमें क्लाइव ने मीर जाफर की गद्दारी के कारण प्लासी के युद्ध में नबाब सिराजुद्दौला को हरा दिया था. उस लड़ाई के बाद अंग्रेजों का मुर्शीदाबाद पर अधिकार हो गया था. लेकिन एक मुर्शीदाबाद को तो भारत नहीं माना जा सकता है.
उसके बाद भी लम्बे समय तक कहीं हिन्दू, कहीं मुस्लिम, कहीं सिक्ख राजाओं का अधिकार बना रहा. राजस्थान, बुंदेलखंड, असम, कर्नाटक, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, हरियाणा, आदि पर हिन्दुओं का राज रहा. दिल्ली, हैदराबाद, अवध, रुहेलखंड, मैसूर, आदि पर मुस्लिम नबाबों का भी कब्ज़ा बना रहा. महाराजा रणजीत सिंह ने भी पंजाब पर 1801 से 1839 तक शासन किया.
1858 के बाद अवश्य भारत पर अंग्रेजों (ब्रिटिश संसद) का कब्ज़ा हो गया. तब कुछ भारतीय राजाओं और नबाबों ने भी अंग्रेजों की अधीनता स्वीकार कर ली लेकिन उसके बाद भी भारत की देशभक्त जनता ने अंग्रेजों को आराम से शासन नहीं करने दिया गया. अंग्रेजों के खिलाफ क्रांतिकारी अभियान लगातार चलते रहे, जिसमे कभी भारतीय जीते और कभी अंग्रेज.
पंजाब में नामधारी समुदाय के सतगुरु रामसिंह जी महाराज ने अंग्रेजों के खिलाफ अभियान चलाया, बिहार के वनवासी क्षेत्र में विरसा मुंडा के नेतृत्व में भी क्रान्ति चलती रही. उत्तर प्रदेश और बंगाल में भी अंग्रेजों को कभी चैन से नहीं बैठने दिया गया. तब अंग्रेजों ने भारतीयों के बीच पैठ बनाने के लिए अंग्रेज टाइप भारतीयों को लेकर कांग्रेस पार्टी की स्थापना की.
1885 में अंग्रेजों द्वारा कांग्रेस पार्टी बनाने से भारतीय भ्रमित हो गए और लगभग 20 के तक क्रांतिकारी अभियानों में कमी आ गई. लेकिन जल्द ही भारतीय अंग्रेजों की इस चाल को लोग समझ गए और उन्होंने अंग्रेजों और कांग्रेस के खिलाफ अपने संगठन ( युगांतर, अनुशीलन समिति, अभिनव भारत, हिन्दू महासभा, मुस्लिम लीग, आदि) बनाने प्रारम्भ कर दिए.
1907 में आई वीर सावरकर की किताब (1857:प्रथम स्वातंत्र्य समर) के बाद तो देश में जैसे क्रान्ति का ज्वार ही उठ पड़ा हुआ. 1857 में जो क्रान्ति हुई थी उसमे अंग्रेजों के खिलाफ या तो अंग्रेजी सेना के बागी भारतीय सैनिक थे या भारतीय राजा और नबाब, लेकिन 1907 के बाद आम भारतीय नागरिक भी अंग्रेजों के खिलाफ क्रांतिकारी कार्यवाहियां करने लगे.
1907 से लेकर 1915 तक पूरे देश में अनेकों क्रांतिकारी घटनाएं हुई जिसमे अनेकों अंग्रेज और अंग्रेजों के चापलूस भारतीय गद्दार मारे गए. इस दौर में अनेकों क्रांतिकारियों को फांसी और कालापानी की सजा हुई. तब 1915 में कांग्रेस द्वारा गांधी जी को भारत में लाया गया और उनके आने के बाद एक बार फिर कुछ समय के लिए क्रांतिकारी अभियानों में कमी आ गई.
लेकिन 1919 से एक बार फिर भारतीय पूरी ताकत के साथ अंग्रेजों से लड़ने लगे और 1947 में अंग्रेजों को भारत से भगाने के बाद ही दम लिया. अब मुझे कोई बताये कि अंग्रेजो ने कैसे भारत पर 200 साल राज किया क्योंकि मेरी जानकारी के अनुसार तो ये 90 साल से ज्यादा नहीं बैठता है और इन 90 साल में भी देशभक्त भारतीयों ने उन्हें कभी चैन नहीं लेने दिया.
अंग्रेज भारत से जाते जाते, अपनी बनाई पार्टी कांग्रेस को भारत की सत्ता सौंप गए. कहीं ऐसा तो नहीं है कि मुगलों के पाप को छुपाने के लिए ऐसे लोगों पर ठीकरा फोड़ा जा रहा है जो कि भारत से जा चुके थे और भारत की दुर्दशा का जिम्मेदार मुगलों को बताने के बजाए अंग्रेजों को बताने के लिए अंग्रेजों का कार्यकाल बढ़ा-चढ़ा कर बताया जाता है.
क्योंकि अगर अंग्रेजों का कार्यकाल कम करके बताया जाएगा तो कोई भी प्रश्न कर देगा कि महज 90 साल में ही अंग्रेजों ने इतना कैसे लूट लिया जबकि इन 90 वर्षों में भी लगातार आजादी की लड़ाई चल ही रही थी. इसके बाद फिर भारत के बर्बादी की सारी जिम्मेदारी मुगलों पर आ जायेगी जो तथाकथित सेक्युलरो को मंजूर नहीं है.