Saturday, 30 December 2023

समाज की व्यवस्था

समाज की व्यवस्था को आसान शब्दों में समझाने के लिए बताया जाना तुम्हे समझ नहीं आता है क्योंकि तुम समझना ही नहीं चाहते हो. ऐसा नहीं है कि तुम्हे समझ नहीं आता है. तुम्हे सब समझ आता है लेकिन समाज को आपस में लड़ाकर राजनीति करना तुम्हारा पेशा है.

सृष्टि को मानव का रूप देकर समझाया गया है कि जिस तरह मानव शरीर में गर्दन का ऊपरी भाग समस्त बौद्धिक कार्य (सोंचने, समझने, देखने, सुनने और बोलने) का काम करता है, उसी तरह समाज में ब्राह्मण बौद्धिक कार्य (अध्यन, अध्यापन, लेखन, जन जागरण, आदि) करता है.
मानव शरीर में सारा पराक्रम भुजाओं द्वारा किया जाता है. पराक्रम से राष्ट्र और समाज की रक्षा की जा सकती है. समाज की व्यवस्था चलाने और समाज की रक्षा का दायित्व क्षत्रियो ने ले रखा है. इसलिए मानव देह रूपी सृष्टि में क्षत्रीय का स्थान भुजाओ में माना गया है.
पेट में भोजन जाता है और पेट में जाने वाले भोजन से ही सारे शरीर को ऊर्जा मिलती है. पेट सारे शरीर को ऊर्जा की सप्लाई न करे तो न दिमाग काम करेगा न ही हाथ / पैर. इसलिए उत्पादन और वितरण करने वाले व्यापारी को मानव देह रूपी सृष्टि में पेट का स्थान वैश्य को दिया गया है.
पूरा समाज जिसकी मेहनत पर खड़ा होता है उसे मानव रूपी सृष्टि में पैर का स्थान दिया गया है. क्या कोई यह कह सकता है कि मानव शरीर में पैर का महत्त्व कम है ? समाज के मेहनतकश वर्ग को शूद्र नाम दिया गया है और उसे मानव शरीर रुपया सृष्टि को चलाने वाला पैर कहा गया है.
बाकी कोई न किसी के मुँह से पैदा हुआ है और न पेट से , न भुजाओं से पैदा हुआ है और न पैर से. यह तो केवल समाज की व्यवस्था को समझने के लिये समाज के मानवीय स्वरूप की कल्पना मात्र है और उसमे लोगो के कार्य के अनुसार स्थान देकर उनका महत्त्व समझाया गया है

Wednesday, 6 September 2023

मुरलीधर श्रीकृष्ण के वजाय चक्रधर श्रीकृष्ण का आव्हान कीजिये

भगवान् श्रीकृष्ण को भगवान् विष्णु का अवतार माना जाता है. उन्होंने अपने जन्म के साथ ही चमत्कार दिखाने शुरू कर दिए थे. उनके जन्म के समय जेल के द्वार खुल गए और पहरेदार सो गए. वासुदेव बरसाती रात में उन्हें नन्द+यशोदा के यहाँ छोड़ आये.

उन्होंने अपनी मात्र 7 दिन की आयु से लेकर 11 साल की आयु तक अनेको राक्षसों को मारा. इसी अवधि में उन्होंने अनेकों अलौकिक लीलाएं दिखाई. पूतना, शकटासुर, तृणावर्त, वत्सासुर, वकासुर,अघासुर, अरिष्टासुर, धेनुकासुर, केसी, आदि राक्षसों को मारा


नल कूबर का उद्धार किया, गोबरर्धन पर्वत को उठाया, कालिया मर्दन किया, कुबड़ी कुब्जा का उद्धार किया, कंस का वध किया, इत्यादि. ये सब काम उन्होंने 11 साल के होने से पहले कर लिए और 12 वे बर्ष में सांदीपनि ऋषि के गुरुकुल उज्जैन चले गए.
गुरुकुल से आने के बाद वे जरासंध और महाभारत में व्यस्त रहे. उनका जीवन बचपन से ही संघर्ष भरा था. उनका सारा जीवन योद्धा और सक्षम कूटनीतिज्ञ के रूप में रहा. कुछ दुष्टों का उन्होंने खुद अंत किया और कुछ को उन्होंने कूटनीति से मरवाया.
शिशुपाल, एकलव्य, पौंड्रक, आदि को खुद मारा, जरासंध को भीम से मरवाया, नरकासुर को सत्यभामा द्वारा मरवाया, बर्बरीक को उसकी बातों में उलझाकर खुद उसके ही हाथों उसका गाला कटवा दिया, महाभारत में कृष्ण जी की भूमिका युग परिवर्तक की थी.

लेकिन मुगल काल के कवियों ने उन्हें एक प्रेमी और लड़कियां छेड़ने वाला बना दिया. समझ नहीं आता है कि अधर्मियों के संहारक श्रीकृष्ण को मुग़लकाल में रासलीला करने वाला साबित करने का प्रयास क्यों किया गया. उस काल के कवियों ने ऐसा क्यों किया ?
क्या उन्होने गोपियों के साथ रासलीला 8 से 10 साल की आयु में की थी ? श्रीकृष्ण कथा में यह प्रसंग किसने डाला होगा कि वे नहाने गई स्त्रियों के कपडे लेकर पेंड पर चढ़ गए ? जिस घाट पर स्त्रियां नहाने जाती होंगी वहां पर तो हर आयु की स्त्रियां जाती होंगी.
जब श्रीकृष्ण जी 7 साल के थे तब 11 साल की राधा जी उनसे मिलीं थी. जब वे 11 के हुए उसके बाद मथुरा चले गए. उसके बाद वे वापस कभी गोकुल नहीं गए. उसके बाद वे बहुत साल बाद तब मिले थे, जब वे महाभारत के युद्ध के लिए कुरुक्षेत्र का मैदान देखने आये थे.

तब राधा कृष्ण के प्रेम के प्रसंग उनकी किस आयु के है ? द्वापर युग की समाप्ति के बाद श्री कृष्ण के प्रपौत्र मथुरा के राजा वज्रनाभ (जिन्हे जाट अपना पूर्वज मानते है) ने महाराज परीक्षित और महर्षि शांडिल्य के सहयोग से मथुरा में अनेक मन्दिरों का निर्माण कराया.
महाराज वज्रनाभ ने कंस के कारागार को तोड़कर वहां पर अपने परदादा (भगवान श्रीकृष्णचन्द्र) का भव्य मंदिर स्थापित किया. उन्होंने अपनी दादी से श्रीकृष्ण के रूप का वर्णन सुनकर उसके अनुसार श्री कृष्ण की मूर्ति का निर्माण कराया और उसे वहां स्थापित किया.
समय समय पर अनेकों राजाओं ने इस मंदिर का विस्तार और सौन्दर्यकरण किया. कालांतर में अपने भाई भर्तहरि के आदेश पर उज्जैन के महाराजा वीर विक्रमादित्य ने भी अयोध्या, हरिद्वार और दिल्ली के साथ मथुरा का भी विकास और विस्तार किया.

हूण और कुषाण के हमलों में इस मंदिर के ध्वस्त होने के बाद गुप्तकाल के सम्राट चंद्रगुप्त विक्रमादित्य ने सन् 400 ई० में नए सिरे से एक भव्य मंदिर का निर्माण करवाया था. उसके कुछ सौ साल बाद इस्लामी हमलावर महमूद गजनवी ने यहाँ विध्वंश किया.
इसके बाद में इसे महाराजा विजयपाल देव के शासन में सन् 1150 ई. में "जज्ज" नामक किसी धनवान व्यक्ति ने भगवान श्रीकृष्ण का मंदिर बनवाया. यह मंदिर पहले की अपेक्षा और भी विशाल था, जिसे 16वीं शताब्दी के आरंभ में सिकंदर लोदी ने नष्ट करवा डाला था.

ओरछा के शासक राजा वीरसिंह जूदेव बुन्देला ने पुन: इस खंडहर पड़े स्थान पर एक भव्य और पहले की अपेक्षा विशाल भगवान श्रीकृष्ण का मंदिर बनवाया. इसके संबंध में कहा जाता है कि यह इतना ऊंचा और विशाल था कि यह आगरा से दिखाई देता था.
लेकिन 11वीं सदी तक कहीं भी ऐसा कोई जिक्र नहीं मिलता है कि वहां कोई राधा कृष्ण का भी कोई मंदिर था. न ही इस काल तक के किसी ग्रन्थ में राधा कृष्ण के मंदिर का जिक्र मिलता है और न ही राधाजी को देवी के रूप में स्थापित करने का जिक्र मिलता है.
माना जाता है कि12 वीं सदी में कवि जयदेव ने "श्री गीतगोविन्द" महाकाव्य की रचना की. इसमें श्रीकृष्ण की गोपिकाओं के साथ रासलीला, राधाविषाद वर्णन, कृष्ण के लिए व्याकुलता, कृष्ण की श्रीराधा के लिए उत्कंठा, राधा की सखी द्वारा राधा के विरह संताप का वर्णन है.
‘श्री गीतगोविन्द’ साहित्य जगत में एक अनुपम कृति है, इसकी रचना शैली, भावप्रवणता, सुमधुर राग-रागिणी, धार्मिक तात्पर्यता तथा सुमधुर कोमल-कान्त-पदावली साहित्यिक रस पिपासुओं को अपूर्व आनन्द प्रदान करती हैं. कवियों को श्री कृष्ण का यह रूप भा गया,
ऐसा समझा जाता है कि ‘श्री गीतगोविन्द’ के बाद अनेकों कवियों ने प्रेमगीत बनाने के लिए राधाकृष्ण का रूपक रखना प्रारम्भ कर दिया. रहीम, रसखान, अमीर खुसरो जैसे कवियों ने योद्धा और युगांधर भगवान् श्रीकृष्ण, प्रेमी श्री कृष्ण बना दिया.
अब मंदिरों में चक्रधर योगेश्वर श्रीकृष्ण की मूर्ति के बजाये मुरलीधर श्रीकृष्ण राधा जी के साथ विराजमान होने लगे. धर्म की स्थापना और अधर्म का नाश करने वाले, योद्धा और योगेश्वर श्रीकृष्ण को मुगल काल में, कवियों द्वारा रास रचाने वाला कन्हैया बना दिया गया.
आज के कथावाचकों को भी , अधर्मियों के संहारक और कर्मयोगी श्रीकृष्ण के बजाये दुनिया से बेखबर और प्रेमी श्रीकृष्ण के रूप में उनका गुणगान करने में आनंद आता है क्योंकि वहां आये भक्त भी ऐसे प्रेमगीत और प्रेम प्रसंग को सुनकर झूमते हुए नाचते हैं.
अब हमें श्रीकृष्ण के उसी अत्याचारियों के संहारक के रूप में पूजना होगा, श्रीकृष्ण के विराट रूप को मंदिरों में स्थापित करना होगा, उनके द्वारा सिखाये गए गीता के ज्ञान को समझना होगा, आदि. तब ही आज के समाज में शक्ति का संचार हो सकता है

Monday, 14 August 2023

जालियांबाला बाग़ काण्ड और मुसलमान

कुछ दिन पहले मुसलमानो ने एक फोटो कमेंट के साथ एक स्टोरी वायरल की थी कि- इण्डिया गेट पर मुस्लिम स्वाधीनता सेनानियों के नाम लिखे हैं. अनपढ़ हो या पढ़ालिखा हर मुस्लमान बिना सच जाने उसे आगे बढ़ा रहा था लेकिन जब उनको उसका सच बताया गया तो मुँह छुपाते फिर रहे थे. ऐसे ही अब वो जलियांवाला बाग काण्ड को लेकर एक फर्जी स्टोरी ले आये हैं

उनका कहना है कि - जलियांवाला बाग काण्ड के वक्त ख़ान अब्दुल गफ्फार ख़ान ने कहा था कि - "अगर तुम एक भी मुस्लिम की पीठ पर गोली दिखा दोगे तो मैं आजादी की जंग से दूर हो जाऊंगा. 2 दिन तक पोस्टमार्टम चला 76 मुस्लिमों की लाशें मिली और एक भी गोली पीठ पर नहीं लगी थी. अंग्रेज़ संघियों की तरह कमीने नही थे इसलिए पोस्टमार्टम रिपोर्ट ईमानदारी से बनाई.

उनकी यह कहानी भी इण्डिया गेट वाली कहानी की तरह झूठी है. 1857 की क्रान्ति के समय ही मुसलमानो को समझ आ गया था कि अब अगर देश आजाद हुआ तो उस पर कब्ज़ा हिन्दुओं का हो जाएगा. इसलिए आगाखान और सर सैय्यद जैसे मुस्लिम नेताओं ने मुसलमानो को समझाया कि - अंग्रेजों से लड़ने के बजाये उनकी नौकरी करने में ज्यादा फायदा है.
और इसी बजह से 1858 से लेकर 1947 तक मुसलमानो ने अंग्रेजों के खिलाफ कोई क्रान्ति नहीं की. 1920 -21 में मुसलमानो ने अंगेजों के खिलाफ एक आंदोलन खिलाफत अवश्य किया था लेकिन इसका उद्देश्य भी आजादी की लड़ाई नहीं बल्कि तुर्की के खलीफा का समर्थन करना था. जालियांवाला बाग़ काण्ड के समय तो खिलाफत आंदोलन भी शुरू नहीं हुआ था.
उन्होंने जो खिलाफत आन्दोलन भी चलाया था वो आजादी के लिए नहीं बल्कि तुर्की के खलीफा की बहाली के लिए चलाया था और उनका यह आन्दोलन भी बुरी तरह असफल हुआ था. अपने इस आंदोलन के असफल हो जाने के बाद भी मुसलमानो ने अंग्रेजो का कुछ नहीं बिगाड़ा बल्कि मुल्तान, मालावार, कोहाट आदि में हिन्दुओ और सिक्खों के खिलाफ दंगा कर दिया था
अब बात करते हैं जलियांवाला बाग़ काण्ड की. जलियाँबाला बाग़ की उस सभा में केवल वे लोग आये हुए थे जो बैसाखी के अवसर पर स्वर्णमंदिर में माथा टेकने आये थे. क्या मुसलमान भी गुरुद्वारे में माथा टेकने जाते हैं ? जालियांवाला बाग़ में कोई आमने की लड़ाई नहीं हुई थी. वहां तो आम जनता पर पुलिस ने अंधाधुंध गोलियां चलाई थी.
अब मेरा सवाल उनसे है जिन्होंने यह फर्जी स्टोरी बनाई है. क्या मारे गए लोगों के नाम की कोई लिस्ट जारी की गई थी, जिससे उनके नाम और धर्म का पता चलता हो ? क्या ऐसी कोई लिस्ट आई थी जिससे यह पता चलता हो कि किस धर्म वाले को कहाँ गोली लगी थी ? क्या खान अब्दुल गफ्फार खान के ऐसे किसी बयान और पोस्टमार्टम रिपोर्ट का प्रमाण है ?
आपके पास ऐसा कौन सा दस्ताबेज है जिससे पता चलता हो कि - मारे गए मुसलमानो के सीने पर गोली लगी थी उस सभा में उस सभा में आम जनता थी जो कुछ नेताओं के भाषण सुनने आई थी किसी पुलिस या सेना का आमने सामने सीधा मुकाबला करने वाले लोग नहीं . जब अंधाधुंध गोली चली वे आम लोग उससे बचने के लिए भागे ही थे.
जाहिर सी बात है जब वे भागे होंगे उनकी पीठ ही पुलिस की तरफ रही होगी. सैकड़ों लोग तो कुएं में कूद गए थे. क्या यह किसी अखबार में भी छपा था ?अब थोड़ी सी बात खान अब्दुल गफ्फार खान की भी कर लेते हैं. जिस बर्ष अमृतसर में जलियांवाला बाग़ काण्ड हुआ था उस बर्ष (1919 में) पेशावर में फौजी कानून (मार्शल ला) लागू किया गया.
उस समय खान अब्दुल गफ्फार खान ने अंग्रेजों के सामने मुसलमनो की तरफ से एक शांति प्रस्ताव प्रस्तुत किया मगर अंग्रेजों ने इसे राजद्रोह मानकर जेल में बंद कर दिया. जेल से बाहर आने के बाद उन्होंने "खुदाई खिदमतगार" नाम का एक सामाजिक संगठन बनाया जो कुछ समय बाद राजनैतिक संगठन में बदल गया. उन्होंने आजादी की लड़ाई में नहीं बल्कि खिलाफत आन्दोलन में हिस्सा लिया.

Sunday, 13 August 2023

क्या है दुबई की सम्पन्नता का राज

 मैंने देखा है कि - अक्सर कुछ लोग (खासकर मुस्लिम्स) दुबई की सम्पन्नता का बखान करके उसकी भारत से तुलना कर भारत की निंदा करते रहते हैं. लेकिन वह इस बात की चर्चा कभी नहीं करते कि - आखिर दुबई में इतना धन कहाँ से आया है ? वहां की इनकम का सोर्स क्या है ? वहां पर किस चीज का उत्पादन होता है ?

वास्तविकता यह है कि - जिस तरह दुनिया भर के भ्रस्ताचारी अपना पैसा लाकर स्विट्जरलैंड की बैंको में रखते हैं और उनके पैसे को सम्हालने के कारण स्विट्जरलैंड अमीर देश बना हुआ है ठीक उसी तरह से दुबई में दुनिया भर के भ्रष्ट लोगों ने अपना पैसा रियल एस्टेट, कंस्ट्रक्शन और व्यापार में लगाया हुआ है.
दुबई केवल कहने को मुस्लिम देश है लेकिन वहां वो हर काम धडल्ले से होता है जिनको गैर इस्लामी कहा जाता है. इसीलिए इस्लामी देशों के अमीर लोग भी जो काम अपने देश के कानून के डर से नहीं कर पाते हैं उनको करने दुबई आते हैं. दुबई की अर्थव्यवस्था अन्य देशों के अमीरों द्वारा वहां किये गए इन्वेस्ट पर निर्भर है.
दुबई की कुल आबादी का लगभग 44% तो केवल भारतीय ही हैं. उसके अलावा ईरान, अरब, बलूचिस्तान, पापिस्तान, आदि की भी काफी आवादी दुबई में रहती है. दुबई की पुरी जनसँख्या का लगभग केवल 28% लोग ही वहां के मूल निवाशी है. वे लोग भी कोई काम नहीं करते बल्कि प्रवासियों के द्वारा होने वाली कमाई से ऐश करते हैं.
अब अगर किसी एक शहर ( भारत में इससे बड़े शहर हैं ) दूर दूर से केवल अमीर लोग ही आकर बस जाएँ तो वह शहर तो अमीर हो ही जाएगा. इसके अलाबा दुबई में विश्व व्यापार ( इम्पोर्ट / एक्सपोर्ट ) भी बहुत होता है लेकिन न वहां पर कोई माल बनता है, न कोई माल दुबई में आता है और न ही कोई माल दुबई से कहीं जाता है.
वे लोग भारत और पाकिस्तान जैसे परस्पर दुश्मनों की दुश्मनी का लाभ उठाते हैं. जैसा कि हम सब जानते ही हैं कि भारत और पापिस्तान के बीच सीधे तौर पर केवल बहुत थोडा सा व्यापार होता है. जबकि हकीकत यह है कि भारत और पापिस्तान के बीच आज भी बहुत व्यापार होता है लेकिन वह सीधे न होकर बाया दुबई होता है.
दुबई में इम्पोर्ट / एक्सपोर्ट के आफिस खुले हुए हैं. वे भारत से माल खरीदते हैं. भारत से माल पहले भारत के बंगारगाह पहुँचता है. बंदरगाह से माल जहाज द्वारा दुबई को रबाना होता है फिर दुबई में बैठा व्यापारी उस माल को जहाज से बिना अनलोड कागजों में रिसीव करके दुबई का नया बिल काटकर उसे पापिस्तान रवाना कर देता है.
केवल भारत के पंजाब से ही पापिस्तान में अरबो का कारोबार होता है, जो दुबई में बैठे एजेंट्स के द्वारा होता है. पंजाब से बहुत बड़े पैमाने पर हौजरी का सामान, साइकिल, साइकिल पार्ट, ऑटो पार्ट्स, राईस मिल मशीनरी, बोयलर, कंफैक्सनरी मशीनरी, चावल, मेकेनिकल वर्कशाप मशीनरी, सिलाई मशीन आदि पापिस्तान जाती है.
अगर केवल "राईस मिल" की ही बात करें तो भारत के पंजाब और पापिस्तान के पंजाब में लगभग एक जैसी जमीन और एक जैसा वातावरण है. पापिस्तानी पंजाब में भारतीय सीमा के नजदीक बाले इलाकों (लाहौर , कसूर, बशीरपुर) में बहुत सारी राईस मिले हैं . इनके अन्दर सारी मशीनरी और बोयलर भारत से ही जाते है.
दुबई में आफिस खोलकर बैठा एजेंट भारत से (खासकर पंजाब से) मशीनरी मंगवाता है, फिर वह पापिस्तान को बेचता है. इसमें खर्च भी बहुत आता है और समय भी बहुत लगता है. पापिस्तानियों को वह मशीनरी भी 3 से चार गुना दाम में मिलती है. ऊपर का पैसा ट्रांसपोर्ट में खर्च होता है और दुबई में बैठे एजेंट की जेब में जाता है.
भारतीय पंजाब से पापिस्तानी पंजाब की दूरी सड़क मार्ग से बहुत कम है. लेकिन इस प्रकार से जाने में बहुत समय और बहुत खर्च आता है. अगर भारत पापिस्तान के बीच सीधा व्यापार शुरू हो जाए तो भारत और पापिस्तान दोनों को फायेदा होगा. केवल भारत पापिस्तान ही नही और भी कई दुश्मन देश बाया दुबई व्यापार करते हैं.
दुबई 1960 से पहले यह बहुत गरीब इलाका था. दुबई में सम्पन्नता 1960 के बाद आनी शुरू हुई. भारत पापिस्तान 1947 में आजाद हुए और आजाद होते ही आपस में लड़ पड़े. दोनों में दुश्मनी इतनी हो गई कि बातचीत भी बंद हो गई लेकिन दोनों को एक दुसरे की जरूरत भी थी, तब 1960 के आसपास दुबई के साथ मिलकर व्यापारियों ने यह रास्ता निकाला था
इसी प्रकार कपड़ा भी सूरत से कराची वाया दुबई जाता है. इसीलिए बिना कुछ भी मैन्युफैक्चर किये दुबई वाले कमा रहे हैं. अगर केवल भारत और पाकिस्तान के बीच सीधा व्यापार शुरू हो जाए तो दुबई का आधा दम निकल जाएगा. कहने को तो दुबई इस्लामी देश है लेकिन वहां शराब का इस्तेमाल और वैश्यावृत्ति धड़ल्ले से होती है

आचार्य प्रफुल्ल चन्द्र राय

 आचार्य प्रफुल्लचंद्र राय का जन्म 2 अगस्त, 1861 ई. में जैसोर ज़िले के ररौली गांव में हुआ था. यह स्थान अब बांग्लादेश में है तथा खुल्ना ज़िले के नाम से जाना जाता है. उनके पिता हरिश्चंद्र राय इस गाँव के प्रतिष्ठित ज़मींदार थे, उनका का अपना पुस्तकालय था

प्रफुल्लचंद्र राय ने अपनी प्राथमिक शिक्षा अपने पिता के बनाये स्कूल में की. 1879 में उन्होंने दसवीं की परीक्षा उत्तीर्ण की उसके बाद आगे की पढ़ाई मेट्रोपोलिटन कॉलेज (अब विद्यासागर कॉलेज) में शुरू की. यहाँ इनका झुकाव रसायन विज्ञान में हुआ.

इसके बाद उन्हे लंदन में छात्रवृत्ति मिली और वे उच्च शिक्षा के लिए लन्दन चले गए. वर्ष 1885 में उन्होंने पी.एच.डी का शोधकार्य पूरा किया. उनके उत्कृष्ट कार्यों के लिए उन्हें एडिनबरा विश्वविद्यालय की रसायन सोसायटी ने उनको अपना उपाध्यक्ष चुना.

कुछ समय बाद वे भारत आ गए. 1889 में प्रेसिडेंसी कॉलेज में रसायनविज्ञान के सहायक प्रोफेसर के पद पर नियुक्त हुए और 911 में वे प्रोफेसर बने. 1916 में वे प्रेसिडेंसी कॉलेज से रसायन विज्ञान के विभागाध्यक्ष के पद से सेवानिवृत्त हुए.

अपने अध्यन अध्यापन के समांतर में उन्होंने 1892 में अपने रहने के कमरे में ही, विलायती ढंग से अंग्रेजी एवं देशी ओषधियाँ को तैयार करने के लिये "बंगाल कैमिकल ऐंड फार्मास्युटिकल वक्र्स" का कार्य आरंभ किया. यह भारत में दवा उद्योग का प्रारम्भ था.

उन्होंने आधुनिक विज्ञान के साथ, आयुर्विज्ञान की प्राचीन भारतीय पुस्तकों का अध्यन किया. उन्होंने नागार्जुन की पुस्तक "रसेन्द्रसारसंग्रह" पर आधारित "प्राचीन हिन्दू रसायन" के विषय में एक लम्बा लेख लिखा जिसे "जर्नल डे सावंट" ने प्रकाशित किया.

इससे उत्साहित होकर आचार्य ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक "हिस्ट्री ऑफ हिन्दू केमिस्ट्री" को लिखा. उनकी यह किताब विश्वविख्यात हुई. इस किताब के माध्यम से ही सारी दुनिया प्राचीन भारत के समृद्ध रसायन ज्ञान और चिकित्सा ज्ञान से पहली बार परिचित हुई.

इस किताब का दुनिया की अनेकों भाषाओं में गया. इसके बाद सारी दुनिया के रसायन विद और चिकित्सा विद प्राचीन हिन्दू ग्रंथो को मंगवाकर उनका विटार से अध्ययन करने लगे. रसायन के क्षेत्र में आचार्य के लगभग 120 शोध-पत्र प्रकाशित हुए.

उन्होने मरक्यूरस नाइट्रेट एवं अमोनियम नाइट्राइट नामक नए यौगिकों का निर्माण किया और इनकी मदद से 80 नए यौगिक तैयार किए. रिटायर होने के बाद उन्होंने अपना सारा समय "बंगाल कैमिकल ऐंड फार्मास्युटिकल वक्र्स" को देना प्रारम्भ कर दिया.

यहाँ उन्होंने आयुर्वेद और एलोपैथी का मिश्रण करते हुए दवाइयों का निर्माण शुरू कर दिया, इनकी यह कम्पनी सफलता के नए आयाम स्थापित करने लगी. उनकी कम्पनी द्वारा "हाइड्रोक्सी क्लोरोक्वीन" के अविष्कार ने बड़ी कम्पनी बना दिया था.

वे गांधी जी और मालवीय जी का भी बहुत सम्मान करते थे. जब BHU द्वारा उन्हें डी.एस-सी की मानद उपाधि से विभूषित किया गया, तो उन्होंने कहा था कि - यह मेरे जीवन का सर्वश्रेष्ठ पुरुष्कार है, जबकि उन्हें देश विदेश के अनेकों बड़े बड़े सम्मान मिल चुके थे.

सन् 1922 में उन्होंने नागार्जुन के नाम पर वार्षिक पुरस्कार शुरू करने के लए दस हज़ार रुपये दिए. उन्होंने 1936 में डा. आशुतोष मुखर्जी के नाम पर भी शोध-पुरस्कार शुरू करने के लिए उनके डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी को भी दस हज़ार रुपया दिए थे.

उन्होंने आजीवन विवाह नहीं किया था. संयमित तथा कर्मण्य जीवन जीने के कारण, उन्होंने 83 वर्ष की दीर्घ आयु पाई. 16 जून 1944, को आपका निधन हो गया. उनका कोई उत्तराधिकारी न होने के कारण उनकी कम्पनी राष्ट्र की सम्पत्ति घोषित हो गई

गुरुद्वारा श्री दमदमा साहिब धुबरी (बोरो बाज़ार, धुबरी, असम, भारत)

उत्तर पश्चिम भारत में कब्ज़ा करने के बाद औरंगजेब अपने राज्य का विस्तार पूरे भारत में करना चाहता था. लेकिन दक्षिण में शिवाजी और असम में महाराजा चक्रधर सिंह उसे कड़ी टक्कर दे रहे थे. असम के महाराजा चक्रधर सिंह के वीर सेनापति लचित बोड़फुकन ने औरंगजेब के असम में काबिज होने के मनसूबों पर पानी फेर दिया था.

औरंगजेब ने अपने अधीन राज कर रहे अंबर के मिर्जा राजा जयसिंह के पुत्र राजा राम सिंह को अहोम (असम) के राजा चक्रध्वज सिंह को हराने के लिए एक बड़ी सेना देकर असम भेजा. यह ऑपरेशन वास्तव में राम सिंह के लिए एक सजा थी क्योंकि उसकी ही हिरासत से शिवाजी और उनके बेटे औरंगजेब की कैद से बचकर निकल गए थे.
उस समय मुग़ल सेना में मुस्लिम सैनिको के साथ हिन्दू राजा और हिन्दू सैनिक भी होते थे, लेकिन उनमे मतभेद रहते थे. राम सिंह को लगता था कि अगर गुरु तेग बहादुर उनकी सेना के साथ होंगे तो मतभेद कम होंगे. राजा राम सिंह ने असम अभियान के समय ढाका में गुरु तेग बहादुर से मुलाक़ात कर, उनसे भी अभियान में साथ जाने का अनुरोध किया.
राम सिंह को लगता था कि गुरु तेग बहादुर के साथ रहने से उनके सैनिकों का मनोबल बढ़ेगा. इसके अलाबा उन दिनों माना जाता था कि असम के लोग काला जादू जानते हैं और उसके द्वारा इंसान को जानवर तक बना देते हैं. राजा राम सिंह ने अपनी सेना को विशवास दिलाया कि हमारे साथ महान संत गुरु तेग बहादुर है. इनके रहते कालाजादू काम नहीं करेगा.
गुरु तेग बहादुर ने राजा राम सिंह का अनुरोध स्वीकार कर लिया और राम सिंह के नेतृत्व वाली औरंगजेब की मुग़ल सेना के साथ असम अभियान में साथ चल दिए. राम सिंह के नेतृत्व में मुग़ल सेना फरवरी 1669 ई. की शुरुआत में कामरूप पहुंच गई. राम सिंह और उनकी सेना ने वर्तमान में पश्चिम बंगाल / असम की सीमा के पास रंगमती किले में डेरा डाला.
गुरु तेग बहादुर ने ब्राह्मपुत्र नदी के किनारे धुबरी में अपना डेरा डाला. जब असम के राजा को पता चला कि मुग़ल सेना असम पर आक्रमण करने के इरादे से ब्रह्मपुत्र नदी के उस पार पहुँच चुकी है तो उन्होंने अपने राज्य की मुग़लों से रक्षा करने के लिए असम की महिला तांत्रिको की मदद भी ली. तांत्रिको ने ब्राह्मपुत्र के इस तरफ से तन्त्र साधना शरू कर दी.
असमिया महिला तांत्रिको ने, अपने तांत्रिक उपकरणों के साथ ब्रह्मपुत्र नदी के ठीक पार डेरा डाले गुरु तेग बहादुर के शिविर पर विनाश के मंत्रों का पाठ करना शुरू कर दिया, लेकिन उनके सभी जादुई प्रभाव उनको नुकसान पहुंचाने में विफल रहे. इससे मुग़ल सेना के सैनिको में गुरु तेग बहादुर के प्रति श्रद्धा और विश्वास और भी ज्यादा बढ़ गया.
कहा जाता है कि असमियों तांत्रिकों ने अपने तंत्र (या किसी यंत्र) की सहायता से एक 26 फुट लंबा एक पत्थर फेंका, जो एक मिसाइल की तरह आकाश में उछलता हुआ आया और गुरु तेग बहादुर के शिविर के पास जमीन पर इतना जोर से गिरा कि उसकी लंबाई का लगभग आधा हिस्सा जमीन में समा गया. इसे अभी भी उसी स्थिति में देखा जा सकता है.
जब उनकी मिसाइल गुरु को नुकसान पहुंचाने में विफल रही, तो जादूगरों ने अपने तंत्र (या किसी यंत्र) की सहायता से एक पेड़ को फेंक दिया, जो बिना किसी चोट पहुंचाए के शिविर के बहुत करीब गिर गया. उसके बाद जैसे ही गुरु तेग बहादुर ने अपना धनुष उठाया और जादू की वेदी पर तीर चलाया, उन असमिया तांत्रिको का सारा जादू अचानक समाप्त हो गया.
जादू टोना होता है या नहीं होता है, ये सोंचना आपका काम है लेकिन वहां वास्तव में ऐसी तंत्र - मन्त्र की लड़ाई भी हुई थी. असम अभियान के समय गुरु तेग बहादुर के मुग़ल सेना के साथ जाने को और उनके द्वारा वहां के देशभक्त तांत्रिको के उन पर तंत्र मन्त्र की शक्ति से हमला करने को, आप किस रूप में देखते है इसका निर्णय आप स्वयं लीजिये.
ब्रह्मपुत्र नदी के किनारे जहाँ गुरु तेग बहादुर ठहरे थे, वहां असम के धुवरी में गुरुद्वारा दमदमा साहब है. 1896-97 के आसपास आए भूकंप में नष्ट होने तक इसकी देखभाल उदासी पुजारियों द्वारा की जाती थी. यहां दो गुरुद्वारे स्थित हैं: एक गुरुद्वारा धारा साहिब या दमदमा साहिब और दूसरा गुरुद्वारा श्री तेग बहादुर साहब.

मिजोरम में 5 मार्च 1966 का जनसंहार

कल जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने संसद में अविश्वास प्रस्ताव का जबाब देते हुए 1966 में मिजोरम में हुई बमबारी की घटना का जिक्र किया, तब से लोग इंटरनेट पर उस घटना की जानकारी ढूँढने में लगे हैं. जानकर आश्चर्य होता है कि राष्ट्रवादियों के अलावा अन्य किसी को उस घटना के बारे में कोई जानकारी नहीं है. इसलिए मैं विस्तार से उस घटना पर पोस्ट लिख रहा हूँ.

यह घटना मिजोरम की राजधानी आइजोल की है. 5 मार्च 1966 की सुबह 11 बजकर 30 मिनट पर आसमान में 4 लड़ाकू विमान शहर को चारों ओर से घेर लेते हैं और बम बरसाने लगते हैं. यह किसी दुश्मन देश के नहीं, बल्कि भारतीय वायुसेना के विमान थे. उस समय मिजोरम, असम का हिस्सा था और उसे मिजो हिल्स कहते थे. ये बमबारी 13 मार्च 1966 तक होती रही.
इस कहानी की शुरुआत 6 साल पहले 1960 में हो गई थी. 1960 में केंद्र में नेहरू सरकार के समय ने असम सरकार ने असमिया भाषा को राजकीय भाषा घोषित कर दिया. मिजो लोग इसका विरोध करने लगे. 28 फरवरी 1961 को इसी वजह से मिजो नेशनल फ्रंट यानी MNF बना, इसके नेता लालडेंगा थे. MNF ने शुरुआत में शांतिपूर्वक धरनों से अपनी बात रखी.
1963 में राजद्रोह के आरोप में लालडेंगा को गिरफ्तार कर लिया गया लेकिन कोर्ट ने 1964 उन्हें बरी कर दिया. तब तक नेहरू जी का स्वर्गवास हो चूका था और शास्त्री जी प्रधानमंत्री बन चुके थे. उनके समय में 1964 में असम रेजिमेंट की सेकेंड बटालियन को ही बर्खास्त कर दिया गया, जिसमें अधिकतर मिजो लोग थे. इससे मिजो हिल्स के लोगों में और भी ज्यादा नाराजगी बढ़ गई.
इसी बीच 1965 में भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध शुरू हो गया. केंद्र पर दबाब बनाने के लिए लालडेंगा ने शास्त्री जी के नाम एक मेमोरेंडम भेजा कि - मिजो भारत के साथ लम्बे स्थायी और शांतिपूर्ण संबंध रखेगा या दुश्मनी मोल लेगा, इसका निर्णय अब भारत सरकार के हाथ में है'. शास्त्री जी ने उनको आश्वासन दिया कि युद्ध ख़त्म होने के बाद उनकी बात को सुना जाएगा,
लेकिन युद्ध की समाप्ति के समय 11 जनवरी 1966 को शास्त्री जी की मृत्यु (अथवा हत्या) हो गई और इंदिरा गांधी भारत की प्रधानमंत्री बन गईं. उन्होंने मिजो लोगों को मांग को एकदम अनसुना कर दिया. तब शांतिपूर्वक धरना प्रदर्शन करने वाला MNF हिंसा पर उतर आया. इसके अलावा जो मिजोवासी सैनिक बटालियन से निकाले गए थे, वे भी MNF में शामिल हो गए.
इन लोगों ने मिलकर मिजो नेशनल आर्मी नाम का सशस्त्र गुट बना लिया. इन लोगों ने फिर सरकार के सामने मांगे रखी लेकिन सरकार ने कोई जबाब नहीं दिया. 28 फरवरी 1966 को मिजो नेशनल फ्रंट ने 'ऑपरेशन जेरिको' शुरू कर दिया. उन लोगों ने सबसे पहले आइजोल और लुंगलाई में असम राइफल्स की छावनी पर हमला किया गया
सबसे पहले आइजोल और लुंगलाई में असम राइफल्स की छावनी पर हमला किया गया. सीमावर्ती नगर चंफाई में वन असम राइफल के ठिकाने पर आधी रात को हमला इतनी तेजी से हुआ था कि जवानों को अपने हथियार लोड करने और लुंगलाई और आइजोल खबर करने तक का समय नहीं मिला. वहीं एक जत्थे ने सरकार खजाने पर धावा बोलकर 18 लाख रुपए लूट लिए.
उग्रवादियों ने सभी हथियार लूट लिए जिसमे 6 लाइट मशीन गन, 70 राइफलें, 16 स्टेन गन और ग्रेनेड फायर करने वाली 6 राइफलें थीं. इसके अलावा एक जूनियर कमीशंड अफसर के साथ 85 जवानों को बंधक बना लिया गया और टेलीफोन एक्सचेंज को नष्ट कर दिया. यहां से किसी तरह से दो सैनिक भागने में कामयाब हुए. इन्ही 2 सैनिकों ने हमले की जानकारी दी,
प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी सेना को जवाबी कार्रवाई का आदेश दे दिया. 5 मार्च 1966 को वायुसेना के 4 लड़ाकू विमानों को आइजोल में MNF के उग्रवादियों पर बमबारी की जिम्मेदारी दी गई. इनमें 2 लड़ाकू विमान फ्रांस में बने दैसे ओरागन (तूफ़ान) और 2 ब्रिटिश हंटर विमान थे. इन लड़ाकू विमानों ने पहले दिन मशीन गन से उग्रवादियों पर फायर किया.
दूसरे दिन इन लड़ाकू विमानों ने आग लगाने वाले बम बरसाए. वायुसेना के लड़ाकू विमानों ने आइजोल और अन्य क्षेत्रों में 13 मार्च तक बमबारी की. इस घटना को लेकर विपक्ष ने सरकार को घेरा तो इंदिरा गांधी ने गोलीबारी और बमबारी से साफ़ इंकार कर दिया. उन्होंने 9 मार्च1966 को जबाब दिया कि विमानों को एयरड्रॉप और आपूर्ति के लिए भेजा गया था, बम बरसाने के लिए नहीं,
इस पर तत्कालीन जनसंघ के नेता अटल विहारी बाजपेई ने सवाल उठाया कि राशन / रशद पहुंचाने के लिए हेलीकॉप्टर भेजा जाता है या लड़ाकू विमान. विपक्ष ने सैनिको को आतंकियों से छुड़ाने के लिए सैन्य आपरेसन करने का तो समर्थन किया लेकिन बात यहाँ तक पहुँचने और पूरे आइजोल शहर में नागरिकों पर बमबारी के लिए सरकार की बहुत आलोचना भी की.
सरकार की तरफ से कहा गया कि इस पूरे अभियान में केवल 40 लोगों की जान गई, जिनमे 27 तो केवल आतंकी ही थे और केवल 13 ही आम नागरिक थे. लेकिन स्थानीय लोग बताते है कि - हमारे छोटे से शहर को अचानक 4 लड़ाकू विमानों ने घेर लिया था, गोलियों और बम चलाये गए जिसमे सैकड़ों लोग मारे गए हुए दर्जनों घर जल कर ढह गए.
जब विपक्ष ने दबाब बनाया तो सरकार ने इसका दोष पायलटों पर डाल दिया. आधिकारिक बयान दिया गया कि - विमानों को एयरड्रॉप और आपूर्ति के लिए भेजा गया था, बम बरसाने के लिए नहीं. अति उत्साह में फायरिंग करने वाले दो पायलटों से इस्तीफ़ा भी ले लिया गया. इसके बाद मामला धीरे धीरे शांत हो गया. लेकिन मिजोरम के लोगों में गुस्सा बना रहा.
केंद्र सरकार मिजोरम में लगातार क्रूर बनी रही. 1967 में एक योजना लागू की गई, जिसके तहत गांवों का पुनर्गठन किया गया. इसमें पहाड़ों पर रहने वाले मिजोवाशियों को उनके गांवों से हटाकर मुख्य सड़क के दोनों ओर बसाया गया, ताकि भारतीय प्रशासन उन पर नजर रख सके. मिजोरम के कुल 764 गांवों में से 516 गांवों के निवासियों को उनकी जगह से हटाया गया.
मिजोरम में अगले पूरे दशक तक अशांति छाई रही. 1977 में जब जनता पार्टी की सरकार आई तब एक बार फिर मिजोरम वाशियों से संवाद लागू कर उन्हें मुख्य धारा में शामिल करने की कोशिश की गई जिसकी पहल जनसंघ के नेता अटलजी की तरफ से की गई, लेकिन आश्चर्यजनक रूप से मोरारजी देसाई सरकार ने अटल जी को इस मामले में आगे बढ़ने से रोक दिया.
बताया जाता है कि गठबंधन के साथी वामपंथी नहीं चाहते थे कि दक्षिणपंथी नेता नार्थईस्ट के मामले में इंटरफेयर करें. उनको कहा गया कि आप अपना विदेश मंत्रालय सम्हालिए हर मामले में हस्तक्षेप मत कीजिये. 1980 में फिर इंदिरा गांधी की सरकार बन गई और फिर मिजोरम की उपेक्षा की गई जिसके कारण मिजोरम की आम जनता भी आतंकवादियों का समर्थन करने लगी.
1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद राजीव गांधी प्रधानमंत्री बने. 30 जून 1986 को केंद्र सरकार और MNF के बीच ऐतिहासिक मिजो शांति समझौते पर हस्ताक्षर हुएम. इसे राजीव गांधी सरकार की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक माना जाता है. 1987 में मिजोरम अलग राज्य बना. इसी साल मिजोरम में पहली बार चुनाव हुए और लालडेंगा मिजोरम के पहले मुख्यमंत्री बने.
यह भी बताया जाता है कि जिन दो पायलट से इस्तीफ़ा लिया गया था उनके नाम थे - राजेश पायलट और सुरेश कलमाड़ी. मिजोरम की जनता और विपक्ष को शांत करने के लिए इनसे इस्तीफ़ा लिया गया था लेकिन इनको इसके बदले में कांग्रेस पार्टी में महत्वपूर्ण स्थान दिया गया था. आज भी 5 मार्च को पूरा मिजोरम शोक दिवस मनाता है