Thursday, 20 July 2023

मणिपुर में आतंकियों के खिलाफ कड़ी सैन्य कार्यवाही की जाए

पिछले लगभग तीन माह से मणिपुर जल रहा है. लोगों के घर जलाये गए है, हत्याएं हुई है, लूटमार हुई है, महिलाओ के साथ बलात्कार हुआ है. जब तक दंगाई ये सब कर रहे थे विपक्ष खामोश बैठा था लेकिन जैसे ही सेना और पुलिस ने दंगाइयों पर कार्यवाही शुरू की है विपक्ष बिलबिलाने लगा है. मणिपुर के दंगापीड़ित लोग भी खुलकर सेना और पुलिस का साथ दे रहे है.

मणिपुर के दंगे और जातीय हिंसा को समझने के लिए वहां का सारा इतिहास और भूगोल भी समझना होगा. मणिपुर में अंग्रेजों के समय में जो जातीय भेदभाव शुरू किया गया था वह आजादी के बाद कम नहीं किया गया बल्कि उसे और बढ़ा दिया गया. मणिपुर में मुख्य रूप से तीन समुदाय है - मैतेई, कुकी और नगा. इसके अलावा रोहिंग्या और बांग्लादेशी भी वहां रहते है.
जिस तरह नेहरू सरकार ने कश्मीर में धारा 370 लगाकर और 35a लगाकर कश्मीरियों खासकर वहां के बहुसंख्यक मुसलमानो को विशेषाधिकार दे रखे थे और वे मुस्लमान उन विशेषधिकारो का इस्तेमाल हिन्दुओ के खिलाफ करते थे, वही स्थिति मणिपुर में है. यहाँ भी धारा 370 से लगभग मिलती जुलती धारा 371C है जिसका खामियाजा मैतेइयो को भुगतना पड़ता है.
आर्टिकल 371C के तहत मणिपुर की पहाड़ी जनजातियों को विशेष दर्जा और सुविधाएं मिली हुई हैं, जो मैतेई समुदाय को नहीं मिलती. 'लैंड रिफॉर्म एक्ट' की वजह से मैतेई समुदाय पहाड़ी इलाकों में जमीन खरीदकर बस नहीं सकता. जबकि जनजातियों पर पहाड़ी इलाके से घाटी में आकर बसने पर कोई रोक नहीं है. इससे दोनों समुदायों में मतभेद बढ़े हैं.
मणिपुर में ज्यादातर कुकी और नगा समुदाय के लोग ईसाई धर्म अपना चुके है. जबकि मैतेई लोग अपने आपको अर्जुन के पुत्र चित्रांगद (अर्जुन और चित्रांगदा का पुत्र ) का वंशज मानते है. कुकी और नगा अक्सर ही मैतियों पर हमले और अत्याचार करते रहते है. धारा 371C के कारण राज्य के 53% मैतेई राज्य की केवल 10% जमीन पर रहते है जबकि कूकी और नगा 90% भू भाग पर.
इस 90% पहाड़ी भूभाग पर रोहिंग्या और बांग्लादेशी जाकर रह सकते है लेकिन मैतेई वहां जाकर नहीं रह सकते. वर्तमान सरकार ने मैतेई समुदाय को भी ST घोषित कर दिया है और वह इन कुकियों और नागाओं से बर्दाश्त नहीं हो रहा है. मौजूदा तनाव की शुरुआत चुराचंदपुर जिले से हुई थी. ये राजधानी इम्फाल के दक्षिण में करीब 63 किलोमीटर की दूरी पर है.
इस जिले में कुकी ज्यादा हैं. गवर्नमेंट लैंड सर्वे के विरोध में 28 अप्रैल को द इंडिजेनस ट्राइबल लीडर्स फोरम ने चुराचंदपुर में आठ घंटे बंद का ऐलान किया था. देखते ही देखते इस बंद ने हिंसक रूप ले लिया. उसी रात तुइबोंग एरिया में उपद्रवियों ने वन विभाग के ऑफिस में आग लगा दी. इसके बाद 3 मई को ऑल ट्राइबल स्टूडेंट्स यूनियन ऑफ मणिपुर ने 'आदिवासी एकता मार्च' निकाला
ये मार्च मैतेइयो को एसटी का दर्जा देने के विरोध में था. इस मार्च के दौरान ही मैतेई समुदाय के घरों में भी आग लगाईं जाने लगी. उनके घरों को लूटा गया. उनकी महिलाओं की बेअदबी की गई. ये सब देखकर मैतेई भी आतंकियों से मुकाबला करने निकल पड़े. जब तक मैतेई मारे जा रहे थे कोई कुछ नहीं बोला लेकिन जब उन्होंने प्रतिकार शुरू किया तो सब बोलने लगे.
मणिपुर से आगजनी, हत्या, बलात्कार, आदि की खबर आने के बाद विपक्षी कभी ये नहीं कहते है कि अत्याचारियों के खिलाफ कड़ी कार्यवाही करो बल्कि केवल इतना कहते हैं कि वर्तमान सरकार इस्तीफ़ा दे. जैसे कि सरकार के इस्तीफ़ा देने से मणिपुर के आतंकी शांत हो जाएंगे. वहां तो ऐसी सैन्य कार्यवाही होनी चाहिए कि यहाँ विपक्षी आतंकियों के लिए रोते दिखाई दें
वैसे इस समय सेना / पुलिस आतंकियों के खिलाफ एक्शन में है इसीलिए विपक्ष इतना बिलबिला रहा है. वरना जब तक मैतेई मारे जा रहे थे तब तक ये खामोश थे. देश की जनता को भारत की सरकार, सेना और मैतेई लोगों का समर्थन करना चाहिए. कुकियों / नगाओं पर अगर कार्यवाही नहीं की गई, तो ये मैतेईयों का वही हाल करेंगे जो कश्मीर में हिन्दुओं का मुसलमानो ने किया था.
इसके अलावा नार्थ ईस्ट में ईसाई मिशनरियो की गतिविधियों पर भी नजर रखी जाए और अगर कोई आतंकियों का साथ देता पाया जाए तो उन पर भी कार्यवाही हो. बाक़ी रही बात विपक्ष की तो सबको पता है इसको लीड करने वालों ने ही पिछले सात दशक में नार्थईस्ट को शेष भारत से अलग रखकर वहां मिशनरियों को बढ़ावा दिया था और घुसपैठियों को बसाया था.

Tuesday, 4 July 2023

सर गंगाराम अग्रवाल

गंगा राम अग्रवाल का जन्म 22 अप्रेल 1851 में अविभाजित भारत के पंजाब प्रांत के ननकाना साहिब जिले के मंगताँवाला गांव में हुआ था. उनके पिता दौलत राम अग्रवाल मंगतांवाला में एक पुलिस स्टेशन में जूनियर सब इंस्पेक्टर थे. गंगा राम ने सरकारी हाईस्कूल से अपनी मैट्रिक परीक्षा उत्तीर्ण की और 1869 में लाहौर के सरकारी कॉलेज में शामिल हो गए.

1871 में, उन्होंने रुड़की के थॉमसन सिविल इंजीनियरिंग कॉलेज (अब आई आई टी रूड़की) से छात्रवृत्ति प्राप्त की. उन्होंने 1873 में स्वर्ण पदक के साथ अंतिम निचली अधीनस्थ परीक्षा उत्तीर्ण की. एक बार जब वह छुट्टियों में घर आय तो अपने पिता जी से पता चला कि अचानक एस पी साहब की पत्नी को लेबर पेन शुरू हो गया है और दाई ने हाथ खड़े कर दिए है.
एस पी साहब दौरे पर हैं. गंगा राम दौड़ते हुए पहुंच गया एस पी आवास, वहां से सरकारी जीप पर लेकर निकल पड़ा किसी डाक्टर की खोज में, लेकिन तब लाहौर में न डाक्टर था न अस्पताल. तब गंगाराम किसी तरह दूर से एक ज्यादा अनुभवी दाई को लेकर आये और उसकी कोशिश से किसी तरह जच्चा बच्चा दोनों की जान बच गई.
दूसरे दिन जब एस पी साहब लौटे तो उन्होंने गंगा राम का हाथ पकड़ कर कहा कि तुम्हारा एहसान कभी नहीं भुलूंगा, मैं तुम्हें कुछ देना चाहता हूं. गंगा राम ने कहा कि - सर जब आप जैसे अधिकारी को इतनी दिक्कत है तो समझिए कि आम जनता को कितना कष्ट होता है ? अगर मदद करना चाहते हैं तो यहां एक अस्पताल बना दीजिए.
एस पी साहब ने गंगाराम की इस मांग को ऊपर पहुंचाया और सरकार से इसकी मंजूरी मिल गए. उनको इस प्रोजेक्ट के लिए सरकारी सहायक अभियंता के रूप में नियुक्त कर दिया गया. हस्पताल को डिजाइन करने और निर्माण की देखरेख का काम भी गंगाराम को मिल गया. इस प्रकार लाहौर का पहला अस्पताल बन गया जो बाद में मेडिकल कॉलेज बना.
उसके बाद ब्रिटिश सरकार द्वारा उन्हें लाहौर का सौन्दर्यकरण करने की जिम्मेदारी दी गई. गंगा राम ने लाहौर में अनेकों स्कूल, कौलेज, चौक, चौराहे, बाजार, म्यूजियम, आदि को बनवाया. कुछ ही बर्षों में लाहौर को पूर्व का वेनिस कहा जाने लगा. उनकी योग्यता को देखते हुए उन्हें शाही असेंबली के निर्माण में मदद के लिए दिल्ली बुलाया गया.
उन्होंने जनरल पोस्ट ऑफिस लाहौर, लाहौर संग्रहालय, एचिसन कॉलेज, मेयो स्कूल ऑफ आर्ट्स (अब नेशनल कॉलेज ऑफ आर्ट्स), गंगा राम अस्पताल लाहौर, 1921, लेडी मक्लेगन गर्ल्स हाई स्कूल, मेयो अस्पताल के अल्बर्ट विक्टर विंग, सरकारी कॉलेज विश्वविद्यालय के रसायन विभाग का डिजाइन और निर्माण किया.
उन्होंने लाहौर के सर्वश्रेष्ठ इलाकों, सर गंगा राम हाई स्कूल, हैली कॉलेज ऑफ कॉमर्स, विकलांग के लिए रवि रोड हाउस, गंगा राम ट्रस्ट बिल्डिंग "द मॉल" और लेडी मेनार्ड इंडस्ट्रियल स्कूल के अलावा रेनाला खुर्द में पावरहाउस के साथ-साथ पठानकोट और अमृतसर के बीच रेलवे ट्रैक के बाद मॉडल टाउन और गुलबर्ग शहर का निर्माण किया.
उनकी इन उपलब्धियों को देखते हुए अंग्रेजी सरकार ने गंगा राम को सर की उपाधि दी. सेवानिवृत्ति के बाद वे पटियाला के पुनर्निर्माण परियोजना के लिए अधीक्षक अभियंता बन गए. लाहौर को पहचान देने वाले रचनाकार की याद में उनकी आदमकद मूर्ति उसी मेडिकल कॉलेज के प्रांगण में लगाई गई जो उनका पहला निर्माण कार्य था. 10 जुलाई 1927 को उनका स्वर्गवास हो गया.
वर्ष 1947 में भारत का विभाजन हुआ और पाकिस्तान एक नया देश बन गया. 15 अगस्त 1947 को आजादी के दिन लाहौर की सड़कों पर भीड़ उमड़ पड़ी. भीड़ जब सर गंगाराम अस्पताल के पास पहुंची तो एक मौलवी ने कहा कि चूंकि अब हमारा मुल्क एक इस्लामिक मुल्क है इसलिए यह मूर्ति यहां नहीं रह सकती है और भीड़ ने मूर्ति को तोड़ना शुरू कर दिया.
प्रसिद्ध उर्दू लेखक सादत हसन मंटो (जो उनके प्रसिद्ध व्यंग्य " टोबा टेक सिंह " के लिए जाने जाते हैं) ने 1947 के धार्मिक दंगों पर एक सच्ची घटना के आधार पर अपनी कहानी "गारलैंड" लिखी थी. उन्होंने उन जेहादियों पर लिखा था कि पाकिस्तान के अस्तित्व में आने के बाद वे लाहौर में किसी हिंदू की किसी भी स्मृति को खत्म करने की कोशिश कर रहे थे.
उस कहानी में उन्होंने लिखा था कि - लाहौर में एक आवासीय क्षेत्र पर हमला करके, वहां हिन्दुओं / सिक्खो का कत्लेआम करने के बाद, वह भीड़, लाहौर के महान हिंदू परोपकारी सर गंगा राम की मूर्ति पर हमला करने के लिए निकल पडी. उन्होंने पहले मूर्ति का मुँह कोयले से काला किया, फिर मूर्ति को जूते की माला पहनाई और फिर मूर्ति को गिरा दिया.
जैसे ही वह मूर्ति गिरी भीड़ ने चिल्लाया "चलो उसे सर गंगा राम अस्पताल भर्ती कराते है". लेकिन तब तक वहां पुलिस आ गई और उसने भीड़ को खदेड़ दिया और मूर्ति को कब्जे में कर लिया. जिन सर गंगाराम ने लाहौर को नहीं सूरत दी थी उन गंगाराम की मूर्ति को तोड़ने वालों में ऐसी भी बहुत लड़के थे जो उनके बनबाये उसी हस्पताल में पैदा हुए थे.
उसके बाद बहशियों की वह भीड़ गंगाराम के परिवार के सदस्यों को ढूंढने निकल पडी जिससे काफिरों का क़त्ल कर खुद को गाजी कहलवा सकें और जन्नत में सीट रिजर्व कर सके. तब पुलिस ने किसी तरह उनके परिवार को निकाल कर अमृतसर पहुंचाया. इस प्रकार विभाजन के बाद सर गंगा राम का परिवार भारत आ गया और पंजाब में बस गया.
उस समय के लाहौर के कलक्टर ने अपनी डायरी में लिखा था कि - कितनी नमकहराम कौम है ये जो अपनी जान बचाने वाले शख्स को भी नहीं बख्शती है. ऐसे लोगों का विनाश निश्चित है. भारत में भी सर गंगाराम का बहुत सम्मान था इसलिए जब 1951 में दिल्ली में एक बड़ा हस्पताल बनाया गया तो उसे सर गंगा राम के नाम पर समर्पित किया गया.
उनकी वह मूर्ति आज भी लाहौर में रही हुई है. दिल्ली में जब सर गंगाराम हस्पताल बनाया गया तो पाकिस्तान से आग्रह किया गया कि वह मूर्ति उन्हें देदे लेकिन पाकिस्तान ने मूर्ति देने से भी इंकार कर दिया. तब उनकी एक नई मूर्ति बनाकर दिल्ली के सर गंगाराम हस्पताल में स्थापित किया गया. कुछ लोग आज भी इस गलतफहमी में हैं कि इन लोगों को तृप्त किया जा सकता है

राजाराम जाट

औरंगजेब के जुल्म चरम पर थे, व्रज क्षेत्र में मंदिरों को तोड़ा जा रहा था, हिन्दुओं को धर्म छोड़ने पर मजबूर किया जा रहा था, हिन्दू पुरुषों को मारकर उनकी स्त्रीयों को जबरन उठाया जा रहा था. तब उस हैवान औरंगजेब को टक्कर देने के लिए एक जाट किसान "गोकुल सिंह" ने आगे बढ़कर औरंगजेब का मुकाबला करने का साहस किया.

गोकुल सिंह जाट (गोकुला जाट) ने जाटों, अहीरों और गूजरों को इकट्ठा कर औरंगजेब से टक्कर ली और कुछ समय के लिए ब्रज को औरंगजेब के आतंक से मुक्त करा लिया था. ग्रामीणों के इस विद्रोह को कुचलने के लिए औरंगजेब विशाल शाही सेना भेजी. गोकुला जाट के नेत्रत्व में 20,000 जाट, शाही सेना से मुकाबला करने निकल पड़े.
चार दिन चले इस युद्ध में जाटों ने मुघलों को भारी नुकशान पहुंचाया, लेकिन प्रशिक्षण, अनुशासन और युद्ध सामग्री की कमी के कारण जाटों को भी बहुत नुकशान हुआ. मुगल सेना ने 7000 जाटो को गोकुला व उसके चाचा उदयसिहँ सहित बँदी बना लिया. 1 जनवरी 1670 को औरंगजेब ने गोकुला और उसके चाचा को टुकड़े टुकड़े करके, शहीद कर दिया गया.
गोकुला के इस विद्रोह के बाद देश की दबी कुचली जनता में अभुतपूर्व साहस का संचार हुआ और उसके बाद देश के अन्य इलाकों में भी विद्रोह शुरु हो गए. गोकुला जाट के बलिदान बाद हिन्दुओं का नेतृत्व "राजाराम जाट'' सम्हाला. राजाराम जाट भरतपुर राज्य के राजा भज्जासिंह के पुत्र थे और सिनसिनवार जाटों के सरदार थे.
उन्होंने जाटों के दो प्रमुख क़बीलों "सिनसिनवारों" और "चाहर" को आपस में मिलाया. जाट योद्धा रामकी चाहर उनके साथ आ गए. जिससे उनकी ताकत बढ़ गई. आऊ नामक गाँव में मुघलों की छावनी थी जिसका अधिकारी था "लालबेग". लगभग 2,00,000 रुपये सालाना मालगुज़ारी वाले इस क्षेत्र में व्यवस्था बनाने के लिए एक चौकी बनाई गयी थी
एक दिन एक अहीर कहीं जा रहा था. वह अपनी पत्नी के साथ गाँव के कुएँ पर विश्राम के लिए रुका. लालबेग के एक कर्मचारी ने उस युवती के बारे में लालबेग को बताया तो लालबेग ने सिपाही भेजकर अहीर दम्पत्ति को चौकी पर बुलवा लिया. सुंदर स्त्री को देखकर वह कामातुर हो गया और उसने युवक को छोड़ दिया और उसकी पत्नी को अपने निवास पर ले गया
उस अहीर युवक ने यह बात अन्य राहगीरों को बताई. जब राजाराम को इस बात का पता चला तो उन्होंने ठान लिया कि महिलाओं की इज़्ज़त और धर्म को बचाने के लिए वह मुग़लों को सबक सिखा के ही रहेगा. उन्होंने अपना सैन्य बल तैयार किया और बार्षिक गोबरधन मेले के अवसर पर उस राक्षस लालबेग को मारने की यॊजना बनाई.
मेले में जानेवाली घास की बैल गाड़ियों में राजाराम अपने सिपाहियों के साथ छुप कर पहुंच गए. लालबेग को इस बात का अंदाज़ा भी नहीं था और उसने उन गाड़ियों को अंदर जाने की अनुमति देदी. चौकी को पार करते ही राजाराम और सिपाहियों ने गाड़ियों में आग लगा दिया. उसके बाद भयंकर युद्ध हुआ और उसमें लालबेग मारा गया.
इस युद्ध के बाद राजाराम ने अपने क़बीले को सुव्यवस्थित सेना बनाना प्रारम्भ कर दिया. अस्त्र-शस्त्रों से युक्त उसकी सेना अपने नायकों की आज्ञा मानने को हमेशा तय्यार रहती थी. राजाराम ने जंगलों में छोटी-छोटी क़िले नुमा गढ़ियाँ बनवादी. इन पर गारे की (मिट्टी की) परतें चढ़ाकर मज़बूत बनाया गया जिन पर तोप-गोलों का असर भी ना के बराबर था.
उसने मुगल शासन के खिलाफ खुला विद्रोह कर दिया. उसने धौलपुर से लेकर आगरा तक की यात्रा के लिए प्रति व्यक्ति से 200 रुपये लेना शुरू किया. इस एकत्रित धन को राजाराम अपने सैन्य को प्रशिक्षित करने में लगाता, जो मुग़लों को ढूंढ़-ढूंढ़ कर मारती थी. राजाराम की वीरता की बात औरंगज़ेब के कानों तक भी पहुंची.
उस समय औरंगजेब दक्षिण में गया हुआ था. उसने जाट- विद्रोह से निपटने के लिए अपने चाचा, ज़फ़रजंग को भेजा. राजाराम ने उसको भी धूल चटाई. उसके बाद औरंगजेब ने युद्ध के लिए अपने बेटे शाहज़ादा आज़म को भेजा लेकिन उसे वापस बुलाया और आज़म के पुत्र बीदरबख़्त को भेजा. बीदरबख़्त बालक था इसलिए ज़फ़रजंग को प्रधान सलाहकार बनाया.
बार-बार के बदलावों से शाही फ़ौज में षड्यन्त्र होने लगे. राजाराम ने मौके का फ़ायदा उठाया, 1688, मार्च में राजाराम ने सिकंदरा में मुघलों पर आक्रमण किया और 400 मुगल सैनिकों को काट दिया. औरंगज़ेब के अत्याचार, हिन्दू मन्दिरों के विनाश और मन्दिरों की जगह पर मस्जिदों का निर्माण करने से जनता के मन में बदले की भावना पनप चुकी थी.
इस कारण सभी आम हिन्दू राजाराम और उनकी सेना का साथ देने लगे. राजाराम की सेना के किसी भी सैनिक से मिलने पर उसे भोजन कराना आम हिन्दू अपना परम कर्तव्य मानने लगे थे. जनता का साथ मिलने से राजाराम का हौशला और बुलंद हो गया और उसने महावत खान के कैम्प पर हमला बोलकर करीब 200 मुगल सैनिकों को मौत के घाट उतार दिया.
अब राजा राम संदेश देना चाहते थे कि उन्होंने गोकुल जाट की मौत का बदला ले लिया है. इसके लिए उन्हें मुगल खानदान से ही कोई चाहिए था, जिसका वो अपमान कर पाते. राजा राम ने अकबर के मकबरे सिकंदरा पर हमला बोल दिया. और उन्होंने अकबर और जहांगीर की कब्र खोदकर उसके अवशेष को आग में फिंकवा दिया.
राजाराम का अनुमान सही साबित हुआ, इस घटना से औरंगजेब झुंझलाकर रह गया. वो इतना बड़ा अपमान सहन नहीं कर पा रहा था. औरंगजेब ने काबुल में मौजूद सेनानायक राम सिंह को आगरा कूच करने और राजाराम को मौत के घाट उतारने का आदेश दिया. भारत का दुर्भाग्य देखिये कि राजा राम को मारने का इरादा करके राम सिंह आ रहा था.
लेकिन भगवान श्रीराम भी ऐसा नहीं होने देना चाहते थे इसलिए मथुरा पहुँचने से पहले ही राम सिंह की मौत हो गई. राजाराम ने मुग़लों के इलाकों में जमकर लूटपाट की एवं दिल्ली आगरा के बीच आवागमन के प्रमुख मार्गों को असुरक्षित बना दिया. आगरा के फौजदार शाइस्ता खान को हराकर आगरा पर एक तरह से कब्जा ही कर लिया.
इसी बीच राजस्थान में चौहानो और शेखावतों में लड़ाई शुरू हो गई और चौहानों ने राजाराम से मदद मांगी और राजाराम चौहानो की मदद की तो शेखावत उनके खिलाफ हो गए. मुगल ऐसे ही किसी मौके की तलाश कर रहे थे. राजाराम के हाथों हारे हुए बीदर बख्त ने बूंदी के राव राजा अनिरुद्ध सिंह, और महाराव किशोर सिंह हाडा के साथ शेखावतों से हाथ मिला लिया.
4 जुलाई 1688 को बीजल के युद्ध के समय चौहान और जाटों की संयुक्त सेना युद्ध को जीत रहे थे लेकिन तभी एक पेड़ के पीछे से एक मुगल सैनिक ने एक गोली चलाई जो सीधे राजाराम के सीने में उतर गई. जिससे राजाराम वीरगति को प्राप्त हो गए. औरंगजेब के आदेश पर मुग़लों ने राजाराम के ​सिर को काटकर दक्षिण में औरंगजेब के पास भेज दिया
इधर आगरा में भीड़ के सामने ही खुले में जाटों के दूसरे बड़े नेता रामकी चाहर को भी फांसी दे दी गई. ये मुगल साम्राज्य के खिलाफ आवाज उठाने वालों के लिए चेतावनी थी. लेकिन वो कहां मानने वाले थे. राजाराम के बाद मोर्चा संभाला उनके छोटे भाई चूड़ामन ने, जो कई सालों तक औरंगजेब और उसके बाद उसके वंशजों को भी छकाते रहे.

Tuesday, 6 June 2023

जिहाद : मुंशी प्रेमचंद की एक कम प्रशिद्ध कहानी

(यूँ तो उन्होंने एक से बढ़कर एक कहानिया लिखी है लेकिन उनकी कहानी "जेहाद"
जिसको सरकारी दबाब के कारण दबाया गया बहुत ही आँखे खोलने वाली कहानी है)

( 1 )
बहुत पुरानी बात है. हिंदुओं का एक काफ़िला अपने धर्म की रक्षा के लिए पश्चिमोत्तर के पर्वत-प्रदेश से भागा चला आ रहा था. मुद्दतों से उस प्रांत में हिंदू और मुसलमान साथ-साथ रहते चले आये थे. धार्मिक द्वेष का नाम न था. पठानों के जिरगे हमेशा लड़ते रहते थे. उनकी तलवारों पर कभी जंग न लगने पाता था.
बात-बात पर उनके दल संगठित हो जाते थे. शासन की कोई व्यवस्था न थी. हर एक जिरगे और कबीले की व्यवस्था अलग थी. आपस के झगड़ों को निपटाने का भी तलवार के सिवा और कोई साधन न था. जान का बदला जान था, ख़ून का बदला खून; इस नियम में कोई अपवाद न था. यही उनका धर्म था, यही ईमान.
मगर उस भीषण रक्तपात में भी हिंदू परिवार शांति से जीवन व्यतीत करते थे. पर एक महीने से देश की हालत बदल गयी है. एक मुल्ला ने न जाने कहाँ से आ कर अनपढ़ धर्मशून्य पठानों में धर्म का भाव जागृत कर दिया है. उसकी वाणी में कोई ऐसी मोहिनी है कि बूढ़े, जवान, स्त्री-पुरुष खिंचे चले आते हैं.
वह शेरों की तरह गरज कर कहता है-खुदा ने तुम्हें इसलिए पैदा किया है कि- दुनिया को इस्लाम की रोशनी से रोशन कर दो, दुनिया से कुफ्र का निशान मिटा दो. एक काफिर के दिल को इस्लाम के उजाले से रोशनी कर देने का सवाब सारी उम्र के रोजे, नमाज़ और जकात से कहीं ज़्यादा है. जन्नत की हूरें तुम्हारी बलाएँ लेंगी.
और फरिश्ते तुम्हारे कदमों की खाक माथे पर मलेंगे, खुदा तुम्हारी पेशानी पर बोसे देगा. और सारी जनता यह आवाज़ सुन कर मज़हब के नारों से मतवाली हो जाती है. उसी धार्मिक उत्तेजना ने कुफ्र और इस्लाम का भेद उत्पन्न कर दिया है. प्रत्येक पठान जन्नत का सुख भोगने के लिए अधीर हो उठा है.
उन्हीं हिंदुओं पर जो सदियों से शांति के साथ रहते थे, हमले होने लगे हैं. कहीं उनके मंदिर ढाये जाते हैं, कहीं उनके देवताओं को गालियाँ दी जाती हैं. कहीं उन्हें जबरदस्ती इस्लाम की दीक्षा दी जाती है. हिंदू संख्या में कम हैं, असंगठित हैं; बिखरे हुए हैं, इस नयी परिस्थिति के लिए बिलकुल तैयार नहीं. उनके हाथ-पाँव फूले हुए हैं.
कितने ही तो अपनी जमा-जथा छोड़ कर भाग खड़े हुए हैं, कुछ इस आँधी के शांत हो जाने का अवसर देख रहे हैं. यह काफिला भी उन्हीं भागनेवालों में था. दोपहर का समय था. आसमान से आग बरस रही थी. पहाड़ों से ज्वाला-सी निकल रही थी. वृक्ष का कहीं नाम न था. ये लोग राज-पथ से हटे हुए, पेचीदा औघट रास्तों से चले आ रहे थे.
पग-पग पर पकड़ लिये जाने का खटका लगा हुआ था. यहाँ तक कि भूख, प्यास और ताप से विकल होकर अंत को लोग एक उभरी हुई शिला की छाँह में विश्राम करने लगे. सहसा कुछ दूर पर एक कुआँ नजर आया. वहीं डेरे डाल दिये. भय लगा हुआ था कि- जिहादियों का कोई दल पीछे से न आ रहा हो.
दो युवकों ने बंदूक भर कर कंधे पर रखीं और चारों तरफ गश्त करने लगे. बूढ़े कम्बल बिछा कर कमर सीधी करने लगे. स्त्रियाँ बालकों को गोद से उतार कर माथे का पसीना पोंछने और बिखरे हुए केशों को सँभालने लगीं. सभी के चेहरे मुरझाये हुए थे. सभी चिंता और भय से त्रास्त हो रहे थे, यहाँ तक कि- बच्चे ज़ोर से न रोते थे.
दोनों युवकों में एक लम्बा, गठीला रूपवान है. उसकी आँखों से अभिमान की रेखाएँ-सी निकल रही हैं, मानो वह अपने सामने किसी की हकीकत नहीं समझता, मानो उसकी एक-एक गत पर आकाश के देवता जयघोष कर रहे हैं. दूसरा क़द का दुबला-पतला, रूपहीन-सा आदमी है, जिसके चेहरे से दीनता झलक रही है.
मानो उसके लिए संसार में कोई आशा नहीं, मानो वह दीपक की भाँति रो-रो कर जीवन व्यतीत करने ही के लिए बनाया गया है. उसका नाम धर्मदास है; इसका ख़ज़ाँचन्द. धर्मदास ने बंदूक को ज़मीन पर टिका कर एक चट्टान पर बैठते हुए कहा- तुमने अपने लिए क्या सोचा? कोई लाख-सवा लाख की सम्पत्ति रही होगी तुम्हारी ?
ख़ज़ानचंद ने उदासीन भाव से उत्तर दिया-लाख-सवा लाख की तो नहीं, हाँ, पचास-साठ हज़ार तो नकद ही थे.
‘तो अब क्या करोगे ?’
‘जो कुछ सिर पर आयेगा, झेलूँगा ! रावलपिंडी में दो-चार सम्बन्धी हैं, शायद कुछ मदद करें. तुमने क्या सोचा है ?’
‘मुझे क्या गम ! अपने दोनों हाथ अपने साथ हैं. वहाँ इन्हीं का सहारा था, आगे भी इन्हीं का सहारा है।’
‘आज और कुशल से बीत जाये तो फिर कोई भय नहीं.’
‘मैं तो मना रहा हूँ कि- एकाध शिकार मिल जाय. एक दरजन भी आ जायँ तो भून कर रख दूँ।’
इतने में चट्टानों के नीचे से एक युवती हाथ में लोटा-डोर लिये निकली और सामने कुएँ की ओर चली. प्रभात की सुनहरी, मधुर, अरुणिमा मूर्तिमान हो गयी थी.
दोनों युवक उसकी ओर बढ़े लेकिन ख़ज़ाँचंद तो दो-चार क़दम चल कर रुक गया, धर्मदास ने युवती के हाथ से लोटा-डोर ले लिया और ख़ज़ाँचंद की ओर सगर्व नेत्रों से ताकता हुआ कुएँ की ओर चला. ख़ज़ानचंद ने फिर बंदूक सँभाली और अपनी झेंप मिटाने के लिए आकाश की ओर ताकने लगा.
इसी तरह कितनी ही बार धर्मदास के हाथों पराजित हो चुका था. शायद उसे इसका अभ्यास हो गया था. अब इसमें लेशमात्र भी संदेह न था कि श्यामा का प्रेमपात्र धर्मदास है. ख़ज़ानचंद की सारी सम्पत्ति धर्मदास के -के आगे तुच्छ थी. परोक्ष ही नहीं, प्रत्यक्ष रूप से भी श्यामा कई बार ख़ज़ाँचंद को हताश कर चुकी थी.
पर वह अभागा निराश हो कर भी न जाने क्यों उस पर प्राण देता था. तीनों एक ही बस्ती के रहनेवाले थे. श्यामा के माता-पिता पहले ही मर चुके थे. उसकी बुआ ने उसका पालन-पोषण किया था. अब भी वह बुआ ही के साथ रहती थी. उसकी अभिलाषा थी कि ख़ज़ाँचंद उसका दामाद हो, श्यामा सुख से रहे और उसे भी कुछ सहारा हो जाये;
लेकिन श्यामा धर्मदास पर रीझी हुई थी. उसे क्या खबर थी कि जिस व्यक्ति को वह पैरों से ठुकरा रही है, वही उसका एकमात्र अवलम्ब है. ख़ज़ानचंद ही वृद्धा का मुनीम, खजांची, कारिंदा सब कुछ था और यह जानते हुए भी कि- श्यामा उसे जीवन में नहीं मिल सकती. उसके धन का यह उपयोग न होता, तो वह शायद अब तक उसे लुटा कर फ़कीर हो जाता.
( 2 )
धर्मदास पानी लेकर लौट ही रहा था कि- उसे पश्चिम की ओर से कई आदमी घोड़ों पर सवार आते दिखायी दिये. जरा और समीप आने पर मालूम हुआ कि- कुल पाँच आदमी हैं. उनकी बंदूक की नलियाँ धूप में साफ़ चमक रही थीं. धर्मदास पानी लिये हुए दौड़ा कि- कहीं रास्ते ही में सवार उसे न पकड़ लें.
लेकिन कंधे पर बंदूक और एक हाथ में लोटा-डोर लिये वह बहुत तेज न दौड़ सकता था. फासला दो सौ गज से कम न था. रास्ते में पत्थरों के ढेर टूटे-फूटे पड़े हुए थे. भय होता था कि कहीं ठोकर न लग जाय, कहीं पैर न फिसल जायँ. इधर सवार प्रतिक्षण समीप होते जाते थे. अरबी घोड़ों से उसका मुकाबला ही क्या.
मुश्किल से पचास क़दम गया होगा कि -सवार उसके सिर पर आ पहुँचे और तुरंत उसे घेर लिया. धर्मदास बड़ा साहसी था; पर मृत्यु को सामने खड़ी देख कर उसकी आँखों में अँधेरा छा गया, उसके हाथ से बंदूक छूट कर गिर पड़ी. पाँचों उसी के गाँव के महसूदी पठान थे. एक पठान ने कहा-उड़ा दो सिर मरदूद का दग़ाबाज़ काफिर..
दूसरा- नहीं नहीं, ठहरो, अगर यह इस वक्त भी इस्लाम कबूल कर ले, तो हम इसे मुआफ कर सकते हैं. क्यों धर्मदास, तुम्हें इस दग़ा की क्या सज़ा दी जाय ? हमने तुम्हें रात-भर का वक्त फैसला करने के लिए दिया था. मगर तुम इसी वक्त जहन्नुम पहुँचा दिये जाओ; लेकिन हम तुम्हें फिर मौक़ा देते हैं. यह आखिरी मौक़ा है.
अगर तुमने अब भी इस्लाम न कबूल किया, तो तुम्हें दिन की रोशनी देखनी नसीब न होगी।
धर्मदास ने हिचकिचाते हुए कहा-जिस बात को अक्ल नहीं मानती, उसे कैसे ...
पहले सवार ने आवेश में आकर कहा-मज़हब को अक्ल से कोई वास्ता नहीं।
तीसरा- कुफ्र है ! कुफ्र है !
पहला- उड़ा दो सिर मरदूद का, धुआँ इस पार.
दूसरा- ठहरो-ठहरो, मार डालना मुश्किल नहीं, ज़िला लेना मुश्किल है। तुम्हारे और साथी कहाँ हैं धर्मदास ?
धर्मदास- सब मेरे साथ ही हैं।
दूसरा- कलामे शरीफ़ की कसम; अगर तुम सब खुदा और उनके रसूल पर ईमान लाओ, तो कोई तुम्हें तेज निगाहों से देख भी न सकेगा।
धर्मदास-आप लोग सोचने के लिए और कुछ मौक़ा न देंगे।
इस पर चारों सवार चिल्ला उठे-नहीं, नहीं, हम तुम्हें न जाने देंगे, यह आखिरी मौक़ा है।
इतना कहते ही पहले सवार ने बंदूक छतिया ली और नली धर्मदास की छाती की ओर करके बोला-बस बोलो, क्या मंजूर है ?
धर्मदास सिर से पैर तक काँप कर बोला- अगर मैं इस्लाम कबूल कर लूँ तो मेरे साथियों को तो कोई तकलीफ न दी जायेगी ?
दूसरा-हाँ, अगर तुम जमानत करो कि- वे भी इस्लाम कबूल कर लेंगे.
पहला- हम इस शर्त को नहीं मानते. तुम्हारे साथियों से हम खुद निपट लेंगे. तुम अपनी कहो. क्या चाहते हो ? हाँ या नहीं ?
धर्मदास ने ज़हर का घूँट पी कर कहा- मैं खुदा पर ईमान लाता हूँ.
पाँचों ने एक स्वर से कहा- अलहमद व लिल्लाह ! और बारी-बारी से धर्मदास को गले लगाया।
( 3 )
श्यामा हृदय को दोनों हाथों से थामे यह दृश्य देख रही थी. वह मन में पछता रही थी कि- मैंने क्यों इन्हें पानी लाने भेजा ? अगर मालूम होता कि विधि यों धोखा देगा, तो मैं प्यासों मर जाती, पर इन्हें न जाने देती. श्यामा से कुछ दूर ख़ज़ानचंद भी खड़ा था. श्यामा ने उसकी ओर क्षुब्ध नेत्रों से देख कर कहा- अब इनकी जान बचती नहीं मालूम होती..
ख़ज़ानचंद - बंदूक भी हाथ से छूट पड़ी है.
श्यामा - न जाने क्या बातें हो रही हैं. अरे गजब ! दुष्ट ने उनकी ओर बंदूक तानी है !
ख़ज़ानचंद - जरा और समीप आ जायँ, तो मैं बंदूक चलाऊँ. इतनी दूर की मार इसमें नहीं है.
श्यामा - अरे ! देखो, वे सब धर्मदास को गले लगा रहे हैं.यह माजरा क्या है ?
ख़ज़ानचंद - कुछ समझ में नहीं आता।
श्यामा - कहीं इसने कलमा तो नहीं पढ़ लिया ?
ख़ज़ानचंद - नहीं, ऐसा क्या होगा, धर्मदास से मुझे ऐसी आशा नहीं है.
श्यामा - मैं समझ गयी. ठीक यही बात है. बंदूक चलाओ.
ख़ज़ानचंद - धर्मदास बीच में हैं. कहीं उन्हें न लग जाय.
श्यामा - कोई हर्ज नहीं. मैं चाहती हूँ, पहला निशाना धर्मदास ही पर पड़े. कायर ! निर्लज्ज ! प्राणों के लिए धर्म त्याग किया. ऐसी बेहयाई की ज़िंदगी से मर जाना कहीं अच्छा है. क्या सोचते हो. क्या तुम्हारे भी हाथ-पाँव फूल गये. लाओ, बंदूक मुझे दे दो. मैं इस कायर को अपने हाथों से मारूँगी.
ख़ज़ानचंद - मुझे तो विश्वास नहीं होता कि धर्मदास ...
श्यामा - तुम्हें कभी विश्वास न आयेगा. लाओ, बंदूक मुझे दो. खडे़ क्या ताकते हो ? क्या जब वे सिर पर आ जायँगे, तब बंदूक चलाओ ? क्या तुम्हें भी यह मंजूर है कि- मुसलमान हो कर जान बचाओ ? अच्छी बात है, जाओ. श्यामा अपनी रक्षा आप कर सकती है; मगर उसे अब मुँह न दिखाना.
ख़ज़ानचंद ने बंदूक चलायी. एक सवार की पगड़ी को उड़ाती हुई निकल गयी. जिहादियों ने ‘अल्लाहो अकबर !’ की हाँक लगायी. दूसरी गोली चली और घोड़े की छाती पर बैठी. घोड़ा वहीं गिर पड़ा. जिहादियों ने फिर ‘अल्लाहो अकबर !’ की सदा लगायी और आगे बढ़े. तीसरी गोली आयी. एक पठान लोट गया.
पर इसके पहले कि चौथी गोली छूटे, पठान ख़ज़ानचंद के सिर पर पहुँच गये और बंदूक उसके हाथ से छीन ली. एक सवार ने ख़ज़ानचंद की ओर बंदूक तान कर कहा- उड़ा दूँ सिर मरदूद का, इससे ख़ून का बदला लेना है. दूसरे सवार ने जो इनका सरदार मालूम होता था, कहा-नहीं-नहीं, यह दिलेर आदमी है. और कहा
ख़ज़ानचंद - तुम्हारे ऊपर दगा, ख़ून और कुफ्र, ये तीन इल्ज़ाम हैं, और तुम्हें कत्ल कर देना ऐन सवाब है, लेकिन हम तुम्हें एक मौक़ा और देते हैं। अगर तुम अब भी खुदा और रसूल पर ईमान लाओ, तो हम तुम्हें सीने से लगाने को तैयार हैं. इसके सिवा तुम्हारे गुनाहों का और कोई कफारा (प्रायश्चित्त) नहीं है. यह हमारा आखिरी फैसला है. बोलो, क्या मंजूर है?
चारों पठानों ने कमर से तलवारें निकाल लीं, और उन्हें ख़ज़ाँचंद के सिर पर तान दिया मानो ‘नहीं’ का शब्द मुँह से निकलते ही चारों तलवारें उसकी गर्दन पर चल जायँगी . ख़ज़ानचंद का मुखमंडल विलक्षण तेज से आलोकित हो उठा. उसकी दोनों आँखें स्वर्गीय ज्योति से चमकने लगीं. दृढ़ता से बोला-
तुम एक हिन्दू से यह प्रश्न कर रहे हो ? क्या तुम समझते हो कि- जान के खौफ से वह अपना ईमान बेच डालेगा ? हिंदू को अपने ईश्वर तक पहुँचने के लिए किसी नबी, वली या पैगम्बर की ज़रूरत नहीं ! चारों पठानों ने कहा- ! काफिर !
ख़ज़ानचंद - अगर तुम मुझे काफिर समझते हो तो समझो. मैं अपने को तुमसे ज़्यादा खुदापरस्त समझता हूँ. मैं उस धर्म को मानता हूँ, जिसकी बुनियाद अक्ल पर है. आदमी में अक्ल ही खुदा का नूर (प्रकाश) है और हमारा ईमान हमारी अक्ल ...
चारों पठानों के मुँह से निकला ‘काफिर ! काफिर !’ और चारों तलवारें एक साथ ख़ज़ाँचंद की गर्दन पर गिर पड़ीं. लाश ज़मीन पर फड़कने लगी. धर्मदास सिर झुकाये खड़ा रहा. वह दिल में खुश था कि-अब ख़ज़ानचंद की सारी सम्पत्ति उसके हाथ लगेगी और वह श्यामा के साथ सुख से रहेगा; पर विधाता को कुछ और ही मंजूर था.
श्यामा अब तक मर्माहत-सी खड़ी यह दृश्य देख रही थी. ज्यों ही ख़ज़ानचंद की लाश ज़मीन पर गिरी, वह झपट कर लाश के पास आयी और उसे गोद में लेकर आँचल से रक्त-प्रवाह को रोकने की चेष्टा करने लगी. उसके सारे कपड़े ख़ून से तर हो गये. उसने बड़ी सुंदर बेल-बूटोंवाली साड़ियाँ पहनी होंगी, पर इस रक्त-रंजित साड़ी की शोभा अतुलनीय थी.
बेल-बूटों वाली साड़ियाँ रूप की शोभा बढ़ाती थीं, यह रक्त-रंजित साड़ी आत्मा की छवि दिखा रही थी.ऐसा जान पड़ा मानो ख़ज़ाँचंद की बुझती आँखें एक अलौकिक ज्योति से प्रकाशमान हो गयी हैं। उन नेत्रों में कितना संतोष, कितनी तृप्ति, कितनी उत्कंठा भरी हुई थी। जीवन में जिसने प्रेम की भिक्षा भी न पायी, वह मरने पर उत्सर्ग जैसे स्वर्गीय रत्न का स्वामी बना हुआ था
( 4 )
धर्मदास ने श्यामा का हाथ पकड़ कर कहा- श्यामा, होश में आओ, तुम्हारे सारे कपड़े ख़ून से तर हो गये हैं. अब रोने से क्या हासिल होगा ? ये लोग हमारे मित्र हैं, हमें कोई कष्ट न देंगे. हम फिर अपने घर चलेंगे और जीवन के सुख भोगेंगे ?
श्यामा ने तिरस्कारपूर्ण नेत्रों से देख कर कहा- तुम्हें अपना घर बहुत प्यारा है, तो जाओ, मेरी चिंता मत करो, मैं अब न जाऊँगी. हाँ, अगर अब भी मुझसे कुछ प्रेम हो तो इन लोगों से इन्हीं तलवारों से मेरा भी अंत करा दो.
धर्मदास करुणा-कातर स्वर से बोला - श्यामा, यह तुम क्या कहती हो, तुम भूल गयीं कि हमसे-तुमसे क्या बातें हुई थीं ? मुझे खुद ख़ज़ानचंद के मारे जाने का शोक है; पर भावी को कौन टाल सकता है ?
श्यामा- अगर यह भावी थी, तो यह भी भावी है कि- मैं अपना अधम जीवन उस पवित्र आत्मा के शोक में काटूँ, जिसका मैंने सदैव निरादर किया. यह कहते-कहते श्यामा का शोकोद्गार, जो अब तक क्रोध और घृणा के नीचे दबा हुआ था, उबल पड़ा और वह ख़ज़ानचंद के निस्पंद हाथों को अपने गले में डाल कर रोने लगी.
चारों पठान यह अलौकिक अनुराग और आत्म-समर्पण देख कर करुणार्द्र हो गये. सरदार ने धर्मदास से कहा- तुम इस पाकीज़ा खातून से कहो, हमारे साथ चले. हमारी जाति से इसे कोई तकलीफ न होगी. हम इसकी दिल से इज्जत करेंगे.
धर्मदास के हृदय में ईर्ष्या की आग धधक रही थी. वह रमणी, जिसे वह अपनी समझे बैठा था, इस वक्त उसका मुँह भी नहीं देखना चाहती थी. बोला- श्यामा, तुम चाहो इस लाश पर आँसुओं की नदी बहा दो, पर यह जिंदा न होगी. यहाँ से चलने की तैयारी करो. मैं साथ के और लोगों को भी जा कर समझाता हूँ.
खान लोेग हमारी रक्षा करने का जिम्मा ले रहे हैं. हमारी जायदाद, ज़मीन, दौलत सब हमको मिल जायगी. ख़ज़ानचंद की दोैलत के भी हमीं मालिक होंगे. अब देर न करो. रोने-धोने से अब कुछ हासिल नहीं. श्यामा ने धर्मदास को आग्नेय नेत्रों से देख कर कहा-और इस वापसी की कीमत क्या देनी होगी ? वही जो तुमने दी है ?
धर्मदास व्यंग्य न समझ सका. बोला-मैंने तो कोई कीमत नहीं दी.मेरे पास था ही क्या ?
श्यामा- ऐसा न कहो. तुम्हारे पास वह ख़ज़ाना था, जो तुम्हें आज कई लाख वर्ष हुए ऋषियों ने प्रदान किया था. जिसकी रक्षा रघु और मनु, राम और कृष्ण, बुद्ध और शंकर, शिवाजी और गोविंदसिंह ने की थी. उस अमूल्य भंडार को आज तुमने तुच्छ प्राणों के लिए खो दिया. इन पाँवों पर लोटना तुम्हें मुबारक हो! तुम शौक़ से जाओ.
जिन तलवारों ने वीर ख़ज़ानचंद के जीवन का अंत किया, उन्होंने मेरे प्रेम का भी फैसला कर दिया. जीवन में इस वीरात्मा का मैंने जो निरादर और अपमान किया, इसके साथ जो उदासीनता दिखायी उसका अब मरने के बाद प्रायश्चित्त करूँगी. यह धर्म पर मरने वाला वीर था, धर्म को बेचनेवाला कायर नहीं.
अगर तुममें अब भी कुछ शर्म और हया है, तो इसका क्रिया-कर्म करने में मेरी मदद करो और यदि तुम्हारे स्वामियों को यह भी पसंद न हो, तो रहने दो, मैं सब कुछ कर लूँगी.
पठानों के हृदय दर्द से तड़प उठे. धर्मान्धता का प्रकोप शांत हो गया. देखते-देखते वहाँ लकड़ियों का ढेर लग गया. धर्मदास ग्लानि से सिर झुकाये बैठा था और चारों पठान लकड़ियाँ काट रहे थे. चिता तैयार हुई और जिन निर्दय हाथों ने ख़ज़ाँचंद की जान ली थी उन्हीं ने उसके शव को चिता पर रखा.
ज्वाला प्रचंड हुई. अग्निदेव अपने अग्निमुख से उस धर्मवीर का यश गा रहे थे. पठानों ने ख़ज़ानचंद की सारी जंगम सम्पत्ति ला कर श्यामा को दे दी. श्यामा ने वहीं पर एक छोटा-सा मकान बनवाया और वीर ख़ज़ानचंद की उपासना में जीवन के दिन काटने लगी. उसकी वृद्धा बुआ तो उसके साथ रह गयी और सब लोग पठानों के साथ लौट गये,
क्योंकि अब मुसलमान होने की शर्त न थी. ख़ज़ानचंद के बलिदान ने धर्म के भूत को परास्त कर दिया. मगर धर्मदास को पठानों ने इस्लाम की दीक्षा लेने पर मजबूर किया. एक दिन नियत किया गया. मसजिद में मुल्लाओं का मेला लगा और लोग धर्मदास को उसके घर से बुलाने आये; पर उसका वहाँ पता न था. चारों तरफ तलाश हुई. कहीं निशान न मिला.
साल-भर गुजर गया. संध्या का समय था. श्यामा अपने झोंपड़े के सामने बैठी भविष्य की मधुर कल्पनाओं में मग्न थी. अतीत उसके लिए दुःख से भरा हुआ था. वर्तमान केवल एक निराशामय स्वप्न था. सारी अभिलाषाएँ भविष्य पर अवलम्बित थीं और भविष्य भी, जिसका इस जीवन से कोई सम्बन्ध न था !
आकाश पर लालिमा छायी हुई थी. सामने की पर्वतमाला स्वर्णमयी शांति के आवरण से ढकी हुई थी. वृक्षों की काँपती हुई पत्तियों से सरसराहट की आवाज़ निकल रही थी, मानो कोई वियोगी आत्मा पत्तियों पर बैठी हुई सिसकियाँ भर रही हो. उसी वक्त एक भिखारी फटे हुए कपड़े पहने झोंपड़ी के सामने खड़ा हो गया.
कुत्ता ज़ोर से भूँक उठा. श्यामा ने चौंक कर देखा और चिल्ला उठी-धर्मदास. धर्मदास ने वहीं ज़मीन पर बैठते हुए कहा- हाँ श्यामा, मैं अभागा धर्मदास ही हूँ. साल-भर से मारा-मारा फिर रहा हूँ. मुझे खोज निकालने के लिए इनाम रख दिया गया है. सारा प्रांत मेरे पीछे पड़ा हुआ है. इस जीवन से अब ऊब उठा हूँ; पर मौत भी नहीं आती.
धर्मदास एक क्षण के लिए चुप हो गया. फिर बोला-क्यों श्यामा, क्या अभी तुम्हारा हृदय मेरी तरफ से साफ़ नहीं हुआ . तुमने मेरा अपराध क्षमा नहीं किया !
श्यामा ने उदासीन भाव से कहा- मैं तुम्हारा मतलब नहीं समझी।
‘मैं अब भी हिंदू हूँ. मैंने इस्लाम नहीं कबूल किया है।’
‘जानती हूँ ’
‘यह जान कर भी तुम्हें मुझ पर दया नहीं आती
श्यामा ने कठोर नेत्रों से देखा और उत्तेजित होकर बोली-तुम्हें अपने मुँह से ऐसी बातें निकालते शर्म नहीं आती. मैं उस धर्मवीर की ब्याहता हूँ, जिसने हिंदू-जाति का मुख उज्ज्वल किया है. तुम समझते हो कि- वह मर गया. यह तुम्हारा भ्रम है. वह अमर है. मैं इस समय भी उसे स्वर्ग में बैठा देख रही हूँ. तुमने हिंदू-जाति को कलंकित किया है. मेरे सामने से दूर हो जाओ।
धर्मदास ने कुछ जवाब न दिया. चुपके से उठा, एक लम्बी साँस ली और एक तरफ चल दिया. प्रातःकाल श्यामा पानी भरने जा रही थी, तब उसने रास्ते में एक लाश पड़ी हुई देखी. दो-चार गिद्ध उस पर मँडरा रहे थे. उसका हृदय धड़कने लगा. समीप जा कर देखा और पहचान गयी. यह धर्मदास की लाश थी.



Sunday, 4 June 2023

भारत में पहली ट्रेन लाने वाले महान व्यवसायी नाना जगन्नाथ शंकरशेठ

नाना जगन्नाथ शंकरशेठ का जन्म मुंबई 10 फरवरी 1803 को एक सम्पन्न स्वर्णकार परिवार में हुआ था. युवा होने पर उन्होंने अपने पारम्परिक व्यवसाय हटकर अनेकों चीजों में हाथ डाला और सभी जगह सफलता प्राप्त की. उन्होंने मुंबई में पारसी और अफगानी व्यापारियों के साथ व्यवसाय कर मुंबई में व्यवसाय को आगे बढ़ाया.
मुंबई के विकास और शिक्षा के क्षेत्र में अत्यंत महत्वपूर्ण योगदान दिया उन्होंने मुंबई के अनेकों स्कूल / कालेज खोले. इसके लिए उन्होंने स्कूल सोसाइटी और नैटिव स्कूल ऑफ़ बम्बई की स्थापना की थी. उन्होंने लड़कियों के लिए भी विद्यालय खोले थे. हालांकि उनके बाद जन्मे लोग इस बात का क्रेडिट ले गए कि उन्होंने नारी शिक्षा पर काम किया.
सन 1856 में उनके द्वारा स्थापित विश्व विद्यालय एलिफिंस्टन एडुकेशनल इंस्टीटूशन का एलिफिंस्टन कॉलेज एक है जिसमें अपने-अपने समय में प्रसिद्ध शिक्षाशास्त्री, समाजसेवी और नेता बालशास्त्री जंभेकर, दादा भाई नौरोजी, महादेव गोविन्द रानाडे, रामकृष्ण गोपाल भांडारकर, गोपालकृष्ण गोखले और बाल गंगाधर तिलक जैसे महान व्यक्तियों शिक्षा पायी.
उन्होंने दक्षिण मुम्बई के गिरगांव में खोले गए स्टूडेंट लाइब्रेरी के लिए काफी धन दिए. उन्होंने लड़कियों के स्कूल की स्थापना की और उनको प्रोत्साहित करने के लिए निशुल्क शिक्षा की व्यवस्था की. उन्होंने अपने स्कूलों में अंग्रेजी के साथ ही संस्कृत पढ़ाने की भी व्यवस्था की थी. साथ ही गिरगांव में ही उन्होंने संस्कृत सेमिनरी और संस्कृत लाइब्रेरी की भी स्थापना की थी.
26 अगस्त 1852 को उन्होंने 'बॉम्बे एसोसएशन' के नाम से राजनीतिक दल की भी स्थापना की थी जिसमें तत्कालीन मुंबई की अनेक प्रसिद्ध व्यक्ति थे. इसके पहले अध्यक्ष सर जमशेदजी जेजीभाई बने थे। बाद में दादाभी नौरोजी और अन्य युवा भी इससे जुड़े. गिरगांव में नाना चौक के पास के भवानी-शंकर मंदिर और राम मंदिर भी जगन्नाथ सेठ की ही देन है.
पुराने मुंबई के अनेक क्षेत्रों में जगन्नाथ सेठ की कृतियां आज भी मुंबई के विकास में उनके महत्वपूर्ण योगदान की साक्षी हैं. तत्कालीन ब्रिटिश राज को उन्होंने मुंबई के अनेक विकास कार्यों के लिए आर्थिक सहायता प्रदान की थी. भारत मेंरेलगाड़ी लाने का श्रेय भी उनको ही जाता है. नाना जगन्नाथ शंकर सेठ वो पहले व्यक्ति है जिन्होंने इसके लिए पहल शुरू की थी.
इंग्लैंड में जब ट्रेन पहली बार चली तो इसकी खबर पढ़ने के बाद नाना शंकर शेठ समझ गए कि ट्रेन ही आने वाले समय में यातायात का भविष्य है. नाना जी का व्यवसाय बहुत बड़ा था और अंग्रेज अफसर भी उनके सानिध्य में रहते थे. 1843 में वे अपने पिता के दोस्त जमशेद जीजोभोय उर्फ जेजे के पास गए और इंडियन रेलवे का अपना आइडिया उन्हे बताया.
भारत में ट्रेन चलने के आइडिया से सुप्रीम कोर्ट के जज थॉमस और ब्रिटिश अधिकारी स्किन पैरी काफी खुश थे. सबको नाना का आइडिया शानदार लगा इसके बाद तीनो ने मिलकर इंडियन रेलवे एसोसिएशन को बनाया. जब नाना और जेजे जैसे प्रभावी व्यक्तियों ने ईस्ट इंडिया कंपनी को अपना सुझाव दिया, तो उन्होंने सरकार को इसमें काम करने के लिए कहा.
इन्होंने मुंबई के बड़े बड़े व्यापारियों को इस प्रोजेक्ट से जोड़ते हुए ग्रेट इंडियन रेलवेज नाम की कंपनी बनाई. उन्होंने मुंबई से थाणे के बीच रेलगाड़ी चलाने का निश्चय किया. उनका ये सपना 1853 में पूरा हुआ, जब मुंबई से थाणे की ट्रेन चली. इसमें नाना जी और जेजे भी यात्री के रूप में सवार रहे. उस ट्रेन की सफलता के बाद भारत में रेलवे का विकास प्रारम्भ हुआ.
भारत में रेलगाड़ी लाने वाले इस महापुरुष को आजादी के बाद लिखे गए इतिहास में कोई जगह नहीं दी गई. आजतक लोगों को सिर्फ इतना पता है कि अंग्रेजों ने मुंबई से थाने पहली ट्रेन चलाई थी. रेलवे के अधिआरियों तक को नाना जगन्नाथ शंकरशेठ के बारे में कोई जानकारी नहीं है. जबकि वे भारत में रेलवे को लाने वाले भागीरथ है
उनको सम्मान देते हुए महाराष्ट्र सरकार ने मार्च 2020 में 'मुम्बई सेन्ट्रल' का नाम बदलकर 'नाना शंकर सेठ टर्मिनस' करने के प्रस्ताव को मंजूरी दी तब कहीं जाकर लोगों को उनके बारे में ये सब जानकारी मिली. 31 जुलाई 1865 को उनका निधन हो गया. वे एक परोपकारी एवं शिक्षाविद थे. उन्हें ‘मुंबई का आद्य शिल्पकार’ भी माना जाता है.
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