Thursday, 1 April 2021

पाकिस्तान के हिन्दू मंदिर

 पाकिस्तान ने अपनी अधार्मिक कट्टरता के चलते पाकिस्तान में मौजूद हिंदुओं के अनेकों मंदिरों को नष्ट कर दिया था. अभी जो मंदिर बचे हुए भी है, वो भी बहुत ही जीर्णशीर्ण अवस्था में हैं. अगर पाकिस्तान चाहे तो उन मंदिरों का पुनरुद्धार करके धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा दे सकता है.

ऐसा होने से हिंदू भी अपने प्राचीन मंदिरों के दर्शन कर सकेंगे और पाकिस्तानियों की आमदनी भी बढ़ेगी. यदि ऐसा होता है तो धार्मिक पर्यटन बढ़ने से दोनो देशों के बीच दुश्मनी की भावना में भी कुछ कमी अवश्य आयेगी. पाकिस्तान की सरकार और पाकिस्तान की जनता को इस विषय में विचार करना चाहिए.

हिंगलाज माता का मंदिर
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बलूचिस्तान में हिंगोल नदी के किनारे बना ये मंदिर, माता सती के 51 प्रमुख शक्तिपीठों में से एक है. एक समय जब इस मंदिर में दर्शन करने दुनियाभर से हिंदू पहुंचते थे. लेकिन अब ये मंदिर वीरान पड़ा रहता है.

कटासराज शिव मंदिर
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भगवान शिव को समर्पित यह मंदिर महाभारत काल का बताया जाता है. कटासराज मंदिर पाकिस्तान के चकवाल जिले से लगभग 40 किमी की दूरी पर स्थित है. इस परिसर में सात या इससे भी ज्यादा मंदिर हैं, जिसे सतग्रह के रूप में भी जाना जाता है.

कहते हैं कि भगवान शिव अपनी पत्नी सती के साथ यहां रहते थे. उनकी मृत्यु के बाद, दुख से त्रस्त शिव अपने आंसू नहीं रोक सके. वे इतना रोए थे, कि उनके आसूंओं से दो तालाब निर्मित हो गए. एक कटारसराज में है, तो दूसरा राजस्थान के पुष्कर में.

मंदिर में स्थित इस कुंड को कटाक्ष कुंड भी कहते हैं. तालाब और मंदिर का नाम भी एक ऐसे शब्द से लिया गया है जो उनके दुख को व्यक्त करता है। कटास का अर्थ आंखाें में आंसू से होता है. पांडवों ने अपना वनवास का काफी समय यहाँ बिताया था.

5000 साल पुराने इस मंदिर का जीर्णोद्धार पृथ्वीराज चौहान के नाना महाराजा अनंगपाल ने कराया था. कटासराज मंदिर संगीत, कला और विद्या का भी बड़ा केंद्र था. अपने उत्कर्ष काल में इस मंदिर से लगभग 10,000 विद्वान और कलाकार संबद्ध थे.

लेकिन 11वीं सदी में महमूद गजनवी के आक्रमण के बाद मंदिर का वैभव नष्ट हो गया.बताया जाता है कि 11वीं सदी में महमूद गजनवी के आक्रमण के बाद मंदिर का वैभव नष्ट हो गया. प्राण और आजीविका बचाने के लिए कलाकारों का पलायन हुआ.

बहुतों को गुलाम बनाकर अरब में बेच दिया गया जहां से ये यूरोप पहुंचे. कई शोध बताते हैं कि यूरोप की जिप्सी या रोमां जाति के लोग उन्हीं कलाकारों के वंशज हैं जिनके संगीत को रोमां संगीत कहा जाता है. सुषमा स्वराज ने कहा था कि रोमां, भारत की संतान है.

कटासराज में एक विश्वविद्यालय भी था जो दर्शनशास्त्र का बड़ा केंद्र था. कहते हैं कि वहां नाथ सम्प्रदाय के संस्थापक गोरखनाथ और प्रसिद्ध चीनी यात्री ह्वेनसांग भी गए थे. कटासराज के पास की साल्ट रेंज पहाडियों का सेंधा नमक आज भी हिंदुओं के लिए पवित्र है.

सन् 2005 में भारत के पूर्व उपप्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी ने कटासराज की यात्रा की थी. कटासराज, हमारी विरासत का वो हिस्सा है जिसका प्रभाव इस उपमहाद्वीप में ही नहीं, बल्कि रोमां संगीत की वजह से पूरी दुनिया में कायम है.

सैयदपुर का राम कुंड मंदिर
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पाकिस्तान के इस्लामाबाद के सैयदपुर गांव में स्थित है. यह मंदिर हिंदू भगवान राम को समर्पित है. इस मंदिर का निर्माण 1580 में मान सिंह प्रथम ने करवाया था. सदियों से हिंदू इस मंदिर में पूजा करने के लिए दूर-दूर की यात्रा करते थे.

1893 के रावलपिंडी गजेटियर के आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार, हर साल "राम कुंड" नामक स्थान के पास एक तालाब पर एक मेला आयोजित किया जाता था. यह याद करने के लिए कि राम और उनके परिवार ने एक बार इसमें पानी पीया था.

1947 में भारत के विभाजन के बाद मंदिर को बंद कर दिया और मूर्तियां हटा दी गई. 1960 में मंदिर की इमारत का उपयोग लड़कियों के स्कूल के रूप में किया जाने लगा. 2006 में इसे राजधानी विकास प्राधिकरण द्वारा एक पर्यटक आकर्षण में बदल दिया गया है

कराची का पंचमुखी हनुमान मंदिर
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कराची शहर में मौजूद पंचमुखी हनुमान का ये मंदिर बहुत चमत्कारी माना जाता है. कहा जाता है कि इस मंदिर की पंचमुखी हनुमान मूर्ति हजारों साल पुरानी है.

माना जाता है कि जिस जगह पर यह मंदिर है, वहां से 11 मुट्ठी मिट्टी हटाने पर यह पंचमुखी हनुमान मूर्ति प्रकट हुई थी. इस मंदिर का और अंक 11 का गहरा संबंध है.

इस मंदिर में भगवान हनुमान की 11 परिक्रमा लगाने पर भक्तों की सभी परेशानियां खत्म हो जाती हैं और उनकी सारी इच्छाएं पूरी होती है. ये मंदिर भी अपनी भव्यता खो चुका है. 

पेशावर का गोरखनाथ मंदिर
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ये पाकिस्तान के पेशावर में स्थित है. यह गुरु गोरखनाथ का मन्दिर है. ईसा पूर्व प्रथम शताब्दी में गुरु गोरखनाथ जी ने यहाँ प्रवास किया था. गुरु गोरखनाथ जी के शिष्य भर्तहरी के छोटे भाई राजा वीर विक्रमादित्य ने पश्चिम जगत को जीतने के बाद उज्जैन वापस लौटते समय इस मंदिर का निर्माण किया था.

अफगान हमलावरों के मार्ग में पड़ने के कारण इस मंदिर का कई बार विध्वंश हुआ. लेकिन समय समय पर अनेकों राजाओं ने इसका जीर्णोद्धार कराया. 1756 में अब्दाली ने उसका विध्वंस किया लेकिन बहुत जल्द 1758 में वहां अधिकार करने के बाद मराठों ने इसका पनरूद्धार करना शुरू किया.

लेकिन अब्दाली ने फिर 1760 में वहां कब्ज़ा कर लिया और इसे तोड़ दिया. उसके बाद 1851 में इस मंदिर का पुनर्निर्माण कराया गया. साल 1947 में बंटवारे के बाद इस मंदिर के कपाट बंद कर दिए गए थे. 2011 में इसे फिर से खोला गया. अब यह मंदिर भी किसी खंडहर की ही तरह दिखता है. 

श्री वरुण देव मंदिर
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यह पाकिस्तान में मनोरा द्वीप में स्थित एक हिंदू मंदिर है. यह मंदिर भगवान झूलेलाल (वरुण देव) को समर्पित है, जो हिंदू धर्म की मान्यताओं के अनुसार जल का प्रतिनिधित्व करने वाले देवता हैं. यह सभी सागरों-महासागरों और सिंध नदी के प्रमुख शासक देवता हैं.

एक किंवदंती के अनुसार,16वीं शताब्दी में भोजमल नेन्शी भाटिया नाम के एक धनी नाविक ने कलात के खान से मनोरा द्वीप खरीदा था, जिसके पास उस समय समुद्र तट की अधिकांश भूमि थी और फिर उसके परिवार ने उस पर एक मंदिर बनवाया था.

मंदिर के निर्माण का सही वर्ष ज्ञात नहीं है लेकिन माना जाता है कि वर्तमान संरचना का नवीनीकरण 1917-18 के आसपास किया गया था. सामने के गेट पर सिंधी भाषा में शिलालेख कहता हैकि भारिया के सेठ हरचंद मल दयाल दास की पवित्र स्मृति में बेटों की ओर से समर्पण

मंदिर जीर्ण-शीर्ण अवस्था में था लेकिन अमेरिकी सरकार द्वारा वित्त पोषित परियोजना के तहत सिंध एक्सप्लोरेशन एंड एडवेंचर सोसाइटी (एसईएएस) द्वारा संरचना की सुरक्षा और संरक्षण के प्रयास किए गए, जो 2018 में मंदिर को सफलतापूर्वक बहाल करने में कामयाब रहे. 




Friday, 8 January 2021

दिल्ली का इतिहास

1. दिल्ली का इतिहास बहुत पुराना है. पौराणिक जानकारी के अनुसार दिल्ली को सबसे पहले इच्छ्वाकू वंश के "महाराज दिलीप" ने बसाया था. उनके नाम से ही इसका नाम "दिल्ली" पडा था. राजा सगर के समय में यमुना के माध्यम से गंगा का जल बंगाल में ले जाने के लिए अभियान प्रारम्भ किया था. जिसका नेतृत्व उनके पुत्र अंशुमान ने किया था.
अंशुमान को इसमें सफलता नहीं मिली. उनके बाद उनके पुत्र महाराजा दिलीप ने यह अभियान आगे बढ़ाया और पहाड़ को काटकर गंगा का जल यमुना में लाने के लिए दिल्ली को अपना बेस कैंप बनाया. हालांकि उनको भी गंगा अभियान में असफलता मिली. महाराजा दिलीप द्वारा बहुत अधिक समय वहीँ रहने पर दिल्ली एक तरह से उनकी उपराजधानी बन गई.
गंगा को धरती पर लाने के अभियान में सफलता दिलीप के पुत्र भागीरथ को मिली. महाराज भागीरथ ने अपने अभियान का केंद्र दिल्ली के बजाये हरिद्वार को बनाया और गोमुख ग्लेशियर से गंगा के लिए रास्ता बनाते हुए गंगा को प्रयागराज में प्राचीन यमुना नदी तक ले गए. इस वंश के राजाओं की राजधानी अयोध्या और उपराजधानी दिल्ली बनी रही.
2. द्वापर में यह क्षेत्र उजड़कर खांडवप्रस्थ बन गया और वर्तमान मेरठ जिले के गंगा के किनारे का गाँव "हस्तिनापुर" भव्य नगर बन गया. हस्तिनापुर राज्य का कौरवों और पांडवों में बँटबारा होने पर, यमुना पार का यह हिस्सा खांडवप्रस्थ पांडवों के हिस्से में आया. अपने पुरुषार्थ और श्रीकृष्ण के आशीर्वाद से पांडवों ने इसे पुनः बसाया और नाम दिया "इन्द्रप्रस्थ".

3. कालान्तर में इन्द्रप्रस्थ और अयोध्या दोनों ही उजड़ गए. तब प्राचीन कहानियों के आधार पर, उज्जैन के राजा वीर विक्रमादित्य ने दिल्ली और अयोध्या को पुनः खोजा और उनको फिर से बसाया. उन्होंने अयोध्या को खुबसुरत नगर बनाया तथा दिल्ली के पास महरोली में विशाल बेधशाला स्थापित की. हरिद्वार में हरी की पौड़ी भी उन्होंने ही बनबाई.
4. दस्तावेजी इतिहास में दिल्ली के बारे में पहला जिक्र 737 ईसवीं में मिलता है. तब राजा अनंगपाल तोमर 'प्रथम' ने इंद्रप्रस्थ से 10 मील दक्षिण में अनंगपुर बसाया. यहां ढिल्लिका गांव था. कुछ बरस बाद उस पर राजा ने लालकोट नगरी बसाई. राजा अनंगपाल तोमर 'प्रथम' अपने आपको अर्जुन पुत्र अभिमन्यु का वंशज मानते थे.
दिल्ली को वसाने के क्रम में 1060 ईस्वी में महाराज अनंगपाल 'द्वितीय' ने दिल्ली का विस्तार किया और महरोली से 12 मील उत्तर में प्राचीन इंद्रप्रस्थ के पास यमुना किनारे लाल पत्थरों से एक भव्य किले का निर्माण प्रारम्भ किया. उनके कोई पुत्र नहीं था केवल दो पुत्रियां थीं- चन्द्रकान्ति और कीर्तिमालिनी. बड़ी पुत्री का विवाह कन्नौज के राजा विजयपाल से हुआ था और छोटी बेटी का विवाह अजमेर के राजा सोमेश्वर चौहान से हुआ था.

अनंगपाल 'द्वितीय' की बड़ी बेटी चन्द्रकान्ति का बेटा "जयचंद" खुद को दिल्ली का स्वाभाविक उत्तराधिकारी मानता था, परन्तु महाराज ने अपनी छोटी बेटी कीर्तिमालिनी के बेटे "प्रथ्वीराज चौहान " को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया. इसी बजह से जयचन्द और पृथ्वीराज चौहान में मनमुटाव हुआ जो मोहम्मद गौरी की जीत का कारण बना.
5. मोहम्मद गोरी ने पृथ्वी राज चौहान को हराने के बाद दिल्ली की कमान अपने गुलाम "कुतुबुद्दीन ऐबक" को सौंप दी. 1206 ईस्वी में गोरी की मृत्यु के बाद, क़ुतुबुद्दीन ने अपने आप को भारत का शासक घोषित कर दिया. वह 4 साल राजा रहा. क़ुतुबुद्दीन ने महरौली के "क़ुतुब काम्प्लेक्स' से सल्तनत चलाई. गुलाम वंश की रजिया सुलतान दिल्ली की अंतिम महिला शासक थी.
6. इसके बाद जलाउद्दीन खिलजी दिल्ली सल्तनत का शासक बन गया और खिलजी बंश की स्थापना की. जलालुद्दीन के भतीजे "अलालुद्दीन खिलजी" ने अपने चाचा की हत्या कर सत्ता हथिया ली. "अलालुद्दीन खिलजी" ने "सीरी" नाम की नई राजधानी बसाई. खिलजी की इस राजधानी 'सीरी' में खिलजी के अधिकारियों के रहने की व्यवस्था थी.
7. खिलजी कमजोर हुए तो 1320 में तुगलक दिल्ली में आ गए. गयासुद्दीन तुगलक ने तुगलकाबाद किले और गयासपुर के आसपास शहर बसाया. यह दौर तुगलक से ज्यादा सूफी निजामुद्दीन औलिया और उनके शागिर्द अमीर खुसरो की वजह से जाना गया. खुसरो ने ब्रजभाषा को अरबी-फारसी में पिरोकर हिंदवी जुबान को नई रंगत दी थी.
8. गयासुद्दीन तुगलक के बाद मोहम्मद बिन तुगलक सुल्तान बना. वह राजधानी को कुछ दिन दौलताबाद ले जाने के बाद दिल्ली लौट आया. उसके बाद उसके चाचा सुल्तान फिरोजशाह तुगलक गद्दी पर बैठे. फिरोजशाह ने यमुना के किनारे "कोटला" बसाया. यहां 18 गांव थे. उसने यहाँ 10 हमाम, 150 कुएं, पांच नहरें और 30 महल बनवाए.
9. 1398 में तैमूर लंग ने दिल्ली पर हमला किया. कायर फिरोजशाह तुगलक ने अपनी प्रजा की रक्षा करने के बजाय तैमूर को काफिरों को मारने और लूटने की छूट देदी थी. 15 दिनो तक दिल्ली में लूटमार करने के बाद "तैमूर" हरिद्वार को विधवंस करने निकल पडा था. लेकिन महाबली जोगराज गुर्जर की पंचायती सेना ने तैमूर लंग को भागने पर मजबूर कर दिया.
10. तैमूर के वापस जाने के बाद दिल्ली पर "लोधी वंश" का राज हो गया. बहलोल और सिकंदर के बाद इब्राहिम लोदी ने दिल्ली का विस्तार किया और खूबसूरत बनाया लेकिन उनका बसाया शहर भी फिरोजशाह के कोटला के आसपास ही था. 1526 में पानीपत के मैदान में इब्राहिम लोदी को हराकर उज्बेक हमलावर "बाबर" ने मुग़ल वंश की स्थापना की.
11. बाबर ने दिल्ली के बजाय आगरा को अपनी राजधानी बनाया लेकिन उसकी मौत के बाद हुमायूं अपनी राजधानी को फिर दिल्ली ले आया. हुमायूं ने दिल्ली के पुराने किले के आसपास के शहर को "दीन पनाह" नाम दिया. 1539 में शेर शाह सूरी ने हुमायूं को जंग में खदेड़ दिया और दीनपनाह पर कब्जा कर उस को "शेरगढ़" नाम दिया.
शेर शाह सूरी की 1545 में मौत हो गई. 1555 में हुमायूं फिर दिल्ली आया और शेरगढ़ को फिर दीनपनाह बना दिया. सात महीने बाद उसकी भी मौत हो गई. हुमायूं का बेटा अकबर अपनी राजधानी दिल्ली से आगरा में ले गया. अकबर, जहांगीर और शाहजहां ने आगरा से ही सत्ता का संचालन किया. शाहजहाँ ने दिल्ली को पुनः बसाने की योजना बनाई.
परन्तु शाहजहां के बेटे औरंगजेब ने अपने 1658 में अपने पिता को कैद कर जबरन सत्ता पर कब्ज़ा कर लिया. पिता को कैद करने और अपने भाई भतीजों की हत्या करने के कारण आगरा में औरंगजेब को सम्मान नहीं मिला, तब उसने अपनी राजधानी को दिल्ली ले जाने का बिचार किया और इसे अपने पिता शाहजहां की इच्छा कह कर प्रचारित किया.
उसने महाराजा अनंगपाल द्वितीय के अधूरे पड़े किले का जीर्णोद्धार कराया और 1679 में अपनी राजधानी आगरा से दिल्ली ले आया. अपने पिता को कैद में रखकर दुःख देने वाले औरंगजेब ने अपने पिता का खूब गुणगान किया, जिससे दिल्ली के लोग उसे अपने पिता का लायक बेटा मान लिया. जबकि आगरा के लोग उसे नालायक बेटा मानते थे.
12. 1739 में दिल्ली में मुगल शासक मोहम्मद शाह के समय ईरान से आए नादिर शाह ने दिल्ली पर हमला कर दिया. "नादिर शाह" ने "मुहम्मद शाह" से 20 करोड़ रूपय की मांग रखी. तो मुहम्मद शाह ने कहा कि- मुझे छोड़ दे और दिल्ली को लूट कर यह रकम हाशिल कर ले. नादिर ने तब तैमूर की तरह दिल्ली में भयानक कत्लेआम और लूटमार की.
मुहम्मद शाह ने अपनी बेटी का निकाह "नादिर शाह" के बेटे के साथ कर उसे अपना समधी बना लिया. वह कुल 57 दिन दिल्ली में रहा. लगातार भयानक, लूटमार, कत्लेआम और महिलाओं के साथ बलात्कार किया. वह अपने साथ तख्त-ए-ताऊस, कोहेनूर हीरा और हजारों महिलाओं को गुलाम बनाकर अपने साथ ले गया.
1747 में नादिर शाह की मौत के बाद अहेमद शाह अब्दाली अफगानिस्तान का शासक बना. 1756 में भारत के कुछ मुस्लिम नबाबो ने अहेमद शाह अब्दाली को भारत में आक्रमण करने के लिए आमंतरित किया. अपने हमलों में उसने नादिरशाह द्वारा दिल्ली में किये गये किये गये कत्लेआम और लूटमार को एक बार फिर से दुहराया.
इस बीच भारत में अंग्रेज मजबूत हो रहे थे और मुगल शासक सिमटते जा रहे थे. अंग्रेजों ने कलकत्ता को अपनी राजधानी बनाया. 1803 में दिल्ली भी अंग्रेजों के नियंत्रण में आ गई, लेकिन मुघलो की नाम मात्र की सत्ता 1857 तक चलती रही. 1857 की क्रांति की असफलता के बाद दिल्ली में अंग्रजों का पूरी तरह से कब्ज़ा हो गया.

13. 1911 में अंग्रेज भी अपनी राजधानी कलकत्ता से दिल्ली ले आये. यह दिल्ली के बसने का आखिरी दौर था जो 1911 से शुरू हुआ और नई दिल्ली कहलाया. दिल्ली में आकर जॉर्ज पंचम ने दिल्ली को राजधानी बनाने का ऐलान किया. इसके बाद एडविन लुटियंस ने शानदार इमारतें बनाईं, इनमें वाइसराय हाउस और इंडिया गेट शामिल है.
14. आजादी के बाद वाइसराय हाउस को राष्ट्रपति भवन तथा असेंबली को संसद भवन बना दिया गया और यही सत्ता का केंद्र बन गए. लाल किले के महत्त्व को बनाये रखने के लिए स्वाधीनता दिवस समारोह का आयोजन लालकिले में रखा गया और आज भी स्वाधीनता दिवस की बर्षगांठ लालकिले की प्राचीर पर तिरंगा ध्वजारोहण कर मनाई जाती है.

15. वर्तमान सरकार द्वारा अंग्रेजों की बनाई असेम्ब्ली (वर्तमान संसद भवन) के पास ही नया संसद भवन बनाया जा रहा है जिसका नाम दिया गया है "सेंट्रल विस्टा". इसकी योजना मनमोहन सिंह सरकार में बनी थी लेकिन कागजों में ही रह गई. इस पर कार्यन्वयन वर्तमान की मोदी सरकार में हुआ. आने वाले समय में यहीं से सारे देश का संचालन किया जाएगा.






Wednesday, 6 January 2021

भारतीय सनातन संस्कृति को भूलने का परिणाम है छेड़छाड़ और बलात्कार

प्राचीन भारतीय संस्कारी भारत की बात करें तो, मनुष्य की आयु के 100 बर्षों को 4 भागों में बांटा गया था. जीवन के पहले 25 बर्ष ब्रहचर्य आश्रम, 25 से 50 बर्ष गृहस्त आश्रम, 50 से 75 बर्ष वान्प्रस्थ आश्रम और 75 से सौ बर्ष संन्यास आश्रम के लिए निर्धारित किये गए थे. लोगों की आवश्यकता के अनुसार इसमें 2 - 4 बर्ष आगे पीछे करने का प्रावधान भी था. 

 ब्रह्मचर्य आश्रम में व्यक्ति ब्रह्मचारी जीवन बिताते हुए - ज्ञान, विद्या, कला, युद्ध, व्यापार, खेती, दस्तकारी, आदि सीखता था, ग्रहस्त आश्रम में आते ही उसका विवाह कर दिया जाता था. जिसके साथ उसका विवाह हो जाता था उसको वो अपना जीवन साथी मान लेता था और उसके साथ जीवन व्यतीत करते हुए अपने वंश को बढाता था. वानप्रस्थ आश्रम में वो अपनी जिम्मेदारियां अपने उत्तराधिकारियों पर डालकर उनका मार्गदर्शन करता था. 

जब उसके उत्तराधिकारी जिम्मेदारियां सम्हाल लेते थे तो वो सामान्य जीवन से संन्यास लेकर, ईश्वर की पूजापाठ, तपस्या आदि में लग जाता था. महिलाओं का जीवन भी आश्रम पद्धति से जुड़ा था, कुछ कामो में भिन्नता अवश्य थी. पुरुषों को शिक्षा दी जाती थी कि - अपनी पत्नी के अतिरिक्त प्रत्येक स्त्री को आयु के अनुसार माँ - बहन - पुत्री के रूप में देखे और स्त्री को भी सिखाया जाता था कि - पति के अतिरिक्त प्रत्येक पुरुष को आयु के अनुसार पिता - भाई - पुत्र के रूप में देखें. 

इसीलिए उस काल में दुष्ट से दुष्ट व्यक्ति भी किसी स्त्री के साथ कोई दुव्यवहार नहीं करता था. प्राचीन काल में महिलाओं से दुर्व्यवहार के केवल दो उदाहरण मिलते हैं. एक में रावण ने सीता का अपहरण किया और दुसरे में दुर्योधन ने द्रौपदी के चीरहरण का प्रयास किया. उनके इस कार्य को उनके साथियों ने तक अच्छा नहीं माना और आखिर में उनका सर्वनाश हो गया और हजारों साल से आजतक, उनको बुरा व्यक्ति मानकर नफरत की जाती है.

इन दो के अलावा कोई और उदाहरण नहीं है जिसमे शत्रुओं ने, एक दुसरे की स्त्रियों को बे-इज्ज़त करने का प्रयास किया हो. युद्ध होने पर राजाओं की सेना युद्ध लडती थी. जिस राजा की सेना जीत जाती थी उस राज्य की प्रजा जीते हुए राजा को अपना राजा मानकर उसे राजस्व और सम्मान देने लगती थी, प्रजा के जीवन में और कोई फर्क नहीं पड़ता था. 

भारत में यह समस्या तब आई, जब उन विदेशी हमलावरों ने भारत पर आक्रमण किया जिनकी संस्क्रती यहाँ से उलट थी. उनकी संस्क्रती में स्त्री कोई मनुष्य नहीं थी बल्कि वो केवल भोगने की वस्तु थी. जो युद्ध में पुरुष को मारने के बाद, उसके परिवार की स्त्रियों को अपनी जीत का इनाम मानते थे. इसके बाद ही भारतीय समाज में विकृति आई है. 

इतिहास गवाह है कि - फिर भी भारत की ज्यादातर स्वाभिमानी स्त्रियों ने जालिम हत्यारों की दासता स्वीकारने के बजाय अपनी जान देना बेहतर समझा था. इसके अलावा भारतीय राजाओं ने तब भी शत्रु स्त्रियों को कभी बेईज्ज़त नहीं किया. "शिवाजी और गौहरबानो" का किस्सा भारतीय इतिहास में अमर है. वो हमारी सभ्य संस्क्रति का सबसे बड़ा उदाहरण है. 

विदेशी अप-संस्कृति के जाल में फंसकर अपनी भारतीय संस्कृति को भुला देने से ही भारत में छेड़छाड़ और बलात्कार जैसी विकृतियाँ आई हैं. यह कहना कि - ऐसा कपड़ों के कारण होता है तो यह केवल असल समस्या से मुह फेरने जैसा है. इस समस्या का स्थाई समाधान केवल उस प्राचीन भारतीय संस्कृति के प्रचार और प्रसार से ही किया जा सकता है. 

इस तरह के अपराधों को रोकने के लिए, स्कूलों में शिक्षा के माध्यम से बच्चों को भारतीय संस्कृति का पाठ पढ़ाना चाहिए. इसके अलावा झूठी नैतिकता को दिखावा बंद करके वेश्यालयों को कानूनी मान्यता देनी चाहिए. जिससे समाज का वो बिशेष तबका वहां जाकर अपनी हवस मिटा ले और जन सामान्य को कोई तकलीफ न दे पाए.

कोस मीनार

अक्सर कहा जाता है कि - पुराने जमाने में फलां राजा ने फलां सड़क या फलां हाइवे बनाया था. यह बात पूरी तरह से गलत है कि - प्राचीन काल में किसी भी राजा ने कोई पक्की सड़क अथवा कोई हाईवे बनाया था या मार्ग में आने वाली किसी नदी / नाले पर कोई पुल बनबाया था. 

लोगों के चलने से जो रास्ते बन जाते थे वही मिट्टी के रास्ते हुआ करते थे. अपने अपने राज्य में से गुजरने वाले इन कच्चे रास्तों पर स्थानीय राजा, जागीरदार, सेठ, आदि उन रास्तों की साफ़ सफाई करा दिया करते थे और कुएं, बाउली, सुरक्षा चौकी, सराय, आदि बनबा दिया करते थे. 

प्राचीन काल से ही ऐसे कार्यों को करना बहुत ही धार्मिक कार्य माना जाता रहा है. आप अशोक, विक्रमादित्य, हर्षबर्धन, आदि के बारे में पढ़ते समय अक्सर लिखा देखते होंगे कि - उन्होंने रास्तो छायादार / फलदार बृक्ष लगबाए और कुएं - तालाब खुदबाये, आग का इंतजाम किया,... 

रास्तों के किनारे मंदिर और सराय भी बनाई जाती थी, जहाँ गुजरने वाले यात्री पड़ाव डालते थे और विश्राम करते थे. ऐसे ही रास्तों के किनारे पहचान के लिए ऊँची सी मीनार बना दी जाती थी, उसके आसपास भी कुंआ और आग की व्यवस्था राजाओं और दानियों द्वारा की जाती थी. इन मीनार को कोस मीनार कहा जाता था. 

यूँ तो इस तरह की चीजे हजारों साल से बनाई जाती रही है लेकिन शेरशाह सूरी ने अपने शासन काल में इन्हे काफी बड़ी संख्या में बनबाया था. शेरशाह सूरी ने जिस मार्ग पर ये कोस मीनार बनबाये थे, उस मार्ग को शेरशाह सूरी मार्ग कहा जाता है. अगर आप दिल्ली से जलंधर जाएँ तो आपको ऐसे अनेको कोस मीनार दिखाई दे जाएंगे. 

ये कोस मीनार ज्यादातर वर्तमान हाइवे के किनारे बने गाँवों की पतली सड़क के किनारे बने हुए है क्योंकि प्राचीन रास्ते वही पुराने है. वर्तमान वाली सीधी और चौड़ी सड़के तो बहुत बाद में बनी है. शेरशाह सूरी के बाद रास्तों को सुविधाजनक बनाने का सबसे ज्यादा काम मालवा (इंदौर) की महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने किया था. 

उन्होंने सड़को के किनारे कोस मीनार बनाने से ज्यादा  मंदिर, धर्मशाला, कुएं, तालाब, फलदार पेड़, आदि बनाने / लगाने पर ज्यादा ध्यान दिया था पहले ये रास्ते सीधे नहीं थे बल्कि गाँवों में घूमते हुए जाते थे. इसलिए आपको ज्यादातर कोस मीनार नेशनल हाईवे के किनारे नहीं बल्कि हाईवे के किनारे बसे हुए पुराने गाँवों की पुरानी सड़कों के किनारे बने हुए दिखेंगे. 

इन रास्तो को सीधा करने का काम रेल लाइन पड़ने के बाद हुआ. अंग्रेजों द्वारा भारत में रेल लाइन बिछाने के बाद, उसके समांतर में सड़को का विकास शुरू हुआ. पुराने शेरशाह सूरी मार्ग को सीधा करने के लिए कुछ पुराना रास्ता इस्तेमाल किया गया तथा कुछ नया रास्ता बनाया गया. इसको अंग्रेजों ने ग्रांड ट्रक रोड (GT road ) नाम दिया. 

अंग्रेजों ने रास्तो को पक्का करने और रास्ते में आने वाले नदी / नालों पर पुल बनाने का काम भी किया था. अंग्रेजों द्वारा GT Road पर पत्थर (गिट्टी) डालकर उन्हें कठोर बनाया गया था. अंग्रेजो ने नाम दिया था GT Road लेकिन ग्रामीण भारतीय उसे गिट्टी रोड कहा करते थे. 

वर्तमान हाई-वे और स्पीड-वे उन्ही रास्तों का विकसित रूप है. आज रास्ते बहुत चौड़े और सीधे हो चुके है. रास्तों पर बेहतरीन पुल और सुरंगे बन चुकी है. लेकिन उन परिस्तिथयों में कोस मीनार का कितना महत्त्व रहा होगा , हम इसे आज भी आसानी से समझ सकते हैं

Thursday, 19 November 2020

इंदिरा गांधी ने पापिस्तान के नहीं बल्कि दो बार कांग्रेस के दो टुकड़े किये थे.

इंदिरा गांधी ने पापिस्तान के नहीं बल्कि कांग्रेस के दो टुकड़े किये थे. लाल बहादुर शास्त्री जी की हत्या के बाद कांग्रेस के नेता मोरारजी देसाई को प्रधानमंत्री बनाना चाहते थे लेकिन नेहरु के बफादारों ने इंदिरा गांधी को आगे कर दिया. उसके बाद इंदिरा गांधी ने 1969 में कांग्रेस के सीनियर नेताओं को खुड्डे लाइन लगाकर कांग्रेस को दो फाड़ कर दिया था.

इंदिरा गाँधी गुट ने कांग्रेस (आर) बनाया था और कांग्रेस के सीनियर नेता मोरारजी देसाई और कामराज आदि ने कांग्रेस (ओ). पहले कांग्रेस का चुनाव चिन्ह था "बैलों की जोड़ी". कांग्रेस को तोड़ने के बाद इंदिरा ने कांग्रेस (आर) के लिए "गाय और बछड़ा" चुनाव चिन्ह लिया और कामराज गुट को चुनाव चिन्ह मिला था "चरखा"
इलेक्शन सिम्बल के तौर पर मिला और 1977 के चुनावों में जब इंदिरा की बुरी तरह से हार हुई थी, तो एक बार फिर इंदिरा गांधी ने कांग्रेस को दोफाड़ किया और प्रभावशाली नेताओं को दरकिनार कर एक नई पार्टी बनाई थी जिसको नाम दिया था कांग्रेस (आई). अर्थात कांग्रेस (इंदिरा). और पार्टी का नया चुनाव चिन्ह बनाया था, "हाथ का पंजा"
अब बात करते हैं पापिस्तान के दो टुकड़े करने की. तो भारत पापिस्तान का युद्ध हुआ था 4 दिसंबर 1971 से 16 दिसंबर 1971 तक. और बंगलादेश पापिस्तान से अलग हुआ था 26 मार्च 1971 को. इसके अलाबा भरत - पापिस्तान के उस युद्ध को भी सेना ने बहुत ही सीमित संशाधनो के साथ लड़ा था और अपनी बहादुरी के दम पर जीता था.
3 दिसम्बर को पापिस्तान द्वारा भारत पर किये गए हवाई हमले (आपरेशन चंगेज खान) के बाद भी इंदिरा गांधी युद्ध का निर्णय नहीं ले पा रही थी. तब जनरल मानेकशा ने कहा था कि- आप घोषणा करती हैं या फिर मैं खुद युद्ध की घोषणा करू ? उस युद्ध की घोषणा के बाद युद्ध की सारी कमान जनरल मानेकशा के हाथ में थी.
जनरल मानेकशा ने तो नेताओं के द्वारा, युद्ध को लेकर कोई बयान तक देने पर रोक लगा दी थी. उस 14 दिन के भीषण युद्ध में भारतीय सेना ने बहुत सीमित संसाधनों के साथ पापिस्तान को शिकस्त दी थी. इंदिरा गांधी या उनकी सरकार का काम था सेना को अधिक से अधिक आधुनिक हथियार उपलब्ध कराना जिसमे वह नाकाम रही थी.
भारतीय सेना ने अपनी बहादुरी और कुर्बानियों के द्वारा पापिस्तान पर जो जीत हाशिल की थी, इंदिरा गांधी ने तो उस जीत को ही "शिमला समझौते" के द्वारा हार में बदल दिया था. युद्ध के बाद जब सेना बैरकों में वापस लौट गई तब कांग्रेसियों ने इंदिरा का ऐसे गुणगान शुरू कर दिया जैसे युध्ह इंदिरा गांधी ने खुद लड़ा हो.

Sunday, 13 September 2020

AIIMS की संस्थापक राजकुमारी अमृत कौर अहलूवालिया

राजकुमारी अमृत कौर आहलुवालिया का जन्म 2 फ़रवरी 1889 को उत्तर प्रदेश राज्य के लखनऊ नगर में हुआ था. इनकी उच्च शिक्षा इंग्लैंड में हुई. ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय से एम. ए. पास करने के उपरांत वह भारत वापस लौटीं. वे रेडक्रास के साथ जुड़ गई और विश्वयुद्ध के दौरान अपनी उल्लेखनीय सेवाएं दी.

1945 में यूनेस्को की बैठकों में सम्मिलित होने के लिए जो भारतीय प्रतिनिधि दल लंदन गया था, वे उसकी उपनेत्री थी. 1946 में जब यह प्रतिनिधिमंडल यूनेस्को की सभाओं में भाग लेने के लिए पेरिस गया, तब भी वे इसकी उपनेत्री (डिप्टी लीडर) थीं. 1948 और 1949 में वे 'आल इंडिया कॉन्फ्रेंस ऑफ सोशल वर्क' की अध्यक्षा रहीं.
1947 से लेकर 1957 तक वे भारत सरकार में स्वास्थ्य मंत्री रहीं. 1950 में वे "वर्ल्ड हेल्थ असेंबली" की अध्यक्षा निर्वाचित हुई. 1950 से 1964 वे "लीग ऑफ रेडक्रास सोसाइटीज' की सहायक अध्यक्ष रहीं. 1948 से 1964 १९६४ तक "सेंट जॉन एमबुलेंस ब्रिगेड" की चीफ कमिशनर तथा "इंडियन कौंसिल ऑफ चाइल्ड वेलफेयर" की मुख्य अधिकारिणी रहीं.
1957 में नई दिल्ली में उन्नीसवीं इंटरनेशनल रेडक्रास कॉन्फ्रेंस राजकुमारी अमृत कौर आहलुवालिया की अध्यक्षता में हुई. राजकुमारी को खेलों से बड़ा प्रेम था. नेशनल स्पोर्ट्स क्लब ऑव इंडिया की स्थापना इन्होंने की थी और इस क्लब की वह अध्यक्षा शुरु से रहीं. उनको टेनिस खेलने का बड़ा शौक था. कई बार टेनिस चैंपियनशिप उनको मिली.
वे "हिंद कुष्ट निवारण संघ' की संस्थापक अध्यक्ष थी, इसके अलावा वे 'जलियावाला बाग नेशनल मेमोरियल ट्रस्ट की ट्रस्टी", "कौंसिल ऑफ साइंटिफिक एन्ड इंडस्ट्रियल रिसर्च" की गवनिंग बाडी की सदस्या भी थीं. राजकुमारी एक विदुषी महिला थीं, उन्हें दिल्ली विश्वविद्यालय, स्मिथ कालेज, वेस्टर्न कालेज, मेकमरे कालेज आदि से डाक्ट्रेट मिली थी.
उन्होंने हिमाचल के मंडी से उन्होंने पहला चुनाव लड़ा था व आजाद भारत की पहली स्वास्थ्य मंत्री रही. दिल्ली में एम्स की स्थापना के लिए सबसे ज्यादा श्रेय उन्ही को जाता है. अनेको देशो में घूमने और रेडक्रास जैसी संस्थाओं के साथ जुड़े होने के कारण उनके मन में एक बहुत बड़े हस्पताल और मेडिकल कालेज की रूपरेखा बनी हुई थी.
राजकुमारी अमृत कौर ने जब नेहरू के सामने एक ऐसा हॉस्पिटल बनाने का प्रस्ताव रखा तब नेहरू ने फंड की कमी का हवाला देकर मना कर दिया. तब उन्होंने अपनी 100 एकड़ पैतृक जमीन बेचकर एम्स के लिए प्रारम्भिक पूंजी की व्यवस्था की. उसके बाद उन्होंने अनेको राजपरिवारो तथा तथा विदेशी संस्थाओं से चंदा लेकर एम्स का निर्माण कराया.
वे एम्स की अध्यक्षा भी रहीं. उन्होंने मनाली और शिमला के अपने बंगले भी एम्स के नाम कर दिए जिससे कि- एम्स में काम करने वाले डॉक्टर / नर्स छुट्टियां मनाने के लिए वहां रुक सके. इंग्लैण्ड में रहने के दौरान राजकुमारी अमृत कौर ईसाई धर्म अपना लिया था लेकिन भारत में आने के बाद उनका रुझान फिर से हिन्दू और सिक्ख धर्म की तरफ हो गया था.
उनकी मृत्यु 2 अक्टूबर 1964 को दिल्ली में हुई. उन्होंने अपनी अंतिम इच्छा के रूप में कहा था कि - उनके शव को ईसाईयों की तरह दफनाया न जाए बल्कि उनका अग्नि संस्कार किया जाए. उनकी अंतिम इच्छा का मान रखा गया और उनका अंतिम संस्कार भारतीय पद्धति के साथ किया गया. राजकुमारी जी को सादर नमन

Thursday, 3 September 2020

नरपति सिंह रैकवार

राजा नरपति सिंह रैकवार माधोगंज रुइयाँ के राजा थे. 1867 में अनेकों देशी रियासतों में अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह के सुर उठने लगे थे. ऐसे में एक दिन नाना साहब पेशवा का एक दूत रोटी का टुकड़ा और कमल का फूल लेकर रुइया गढ़ी स्थित नरपति सिंह के दरबार में पहुंचा.

कमल क्रांति का चिन्ह व रोटी का टुकडा सभी जाति -वर्ग में भाईचारे व संगठन का प्रतीक था । रुइया नरेश ने इसे स्वीकार करते हुए नाना साहब को पैगाम भेजा और संकल्प लिया की जब तक जिन्दा रहूँगा तब तक देश को अंग्रेजों की गुलामी से मुक्त कराने के लिए संघर्ष करता रहूँगा.
नरपति सिंह रैकवार जी ने नाना साहब को यह भी सन्देश दिया कि सारी देशी रियासतें मई माह में एक साथ अंग्रेजों पर हमला करना चाहिए. नरपति सिंह ने सगे भाई बेनी सिंह को मुख्य सेनापति बनाकर तीन कमान बनाई , जिसका नेतृत्व बस्ती सिंह, लखन सिंह व बद्री ठाकुर कर रहे थे.
लेकिन इसी बीच 29 मार्च, 1857 को बैरकपुर छावनी में सैनिक मंगल पाण्डेय ने विद्रोह कर दिया. इसके कुछ दिन बाद लखनऊ में भी विद्रोह हो गया. उस समय अंग्रेजी फौज ने मल्लावां को हेड क्वाटर बना रखा था. अंग्रेजों ने लखनऊ को घेरने के लिए सेना भेजने का आदेश दे दिया,
मल्लावां के डिप्टी कमिशनर डब्लू. सी. चैपर को जब विद्रोह का समाचार मिला तो उन्होंने अंग्रेजी सेना के सचिव कैप्टन हैचिनशन को माधौगंज की ओर न जाने की सलाह दी, लेकिन हैचिनशन अपनी जिद पर अड़ा रहा और अपनी सेना को माधोगंज की तरफ भेज दिया.
लेकिन नरपति सिंह और बरुआ के गुलाब सिंह ने अपनी सेना के साथ अंग्रेजी सेना का रास्ता रोक लिया. 15 मई 1857 को संडीला में भीषण युद्ध हुआ और उन्होंने अंग्रेज सेना का वो हाल किया कि लगभग डेढ़ साल तक अंग्रेज हरदोई जिले में पैर नहीं जम सके.
संडीला की लड़ाई में जीत के बाद रुइयाँ अंग्रेजों के दुश्मनो का केंद्र बन गया. देशी रियासतों के राजा और सैनिको के साथ साथ स्वतंत्र रूप से अंग्रेजों के खिलाफ लड़ रहे स्वाधीनता सेनानी भी रुइयाँ पहुँचने लगे. यह देखकर हैचिनशन वहां से भाग गया.
पास की एक छोटी रियासत "गंजमुरादाबाद" का नवाब अंग्रेजों का पिट्ठू था. 3 जून 1857 रुइया नरेश ने गंजमुरादाबाद पर आक्रमण कर नवाब को पकड़ लिया तथा उसके भतीजे को नवाब बना दिया. इससे डिप्टी कमिशनर चैपर भी बौखला गया और अक्रामक हो उठा.
8 जून 1857 को नरपति सिंह कुछ क्रांतिकारियों को लेकर मल्लावां पर चढ़ाई कर दी. तब चैपर भागकर संडीला चला गया. क्रांतकारियों ने बड़ी संख्या में अंग्रेजों का कत्लेआम किया और देशी मूल के अंग्रेजी सैनिकों को कैद कर लिया तथा तहसील, अदालत व थाना फूंक दिया.
इसके अलावा उन्होंने बरबस के सोमवंशी मुआफ़िदारो के मुखिया माधोसिंह (जिसे अवध को शासन में मिलाने के बाद अंग्रेजों ने थानेदार नियुक्त किया था) पर आक्रमण कर उसकी बस्ती को जला दिया और अंग्रेजों के पिट्ठू माधोसिंह को भी कैद कर लिया.
राजा नरपति सिंह का रौद्र रूप देखकर अंग्रेज और अंग्रेजों के भारतीय चमचे दहल गए. नाना साहब पेशवा के कहने पर के बिठूर से तात्या टोपे और फैजाबाद से मौलवी लियाकत अली भी उनसे मिलने आये और साथ मिलकर अंग्रेजों से लड़ने पर सहमति बनाई.
उधर दिल्ली के बादशाह बहादुर शाह जफ़र को अंग्रेजों ने कैद कर लिया और अंग्रेज अफसर हडसन ने बादशाह के सामने ही उनके दो बेटों को मौत के घाट उतार दिया. बादशाह का बड़ा शहजादा फिरोजशाह किसी तरह से भागकर संडीला पहुंचा और राजा नरपति सिंह से मुलाक़ात की.
राजा के इशारे पर फिरोजशाह के वीर साथी लक्कड़ शाह ने संडीला के आस-पास का क्षेत्र स्वंतत्र कर लिया तथा मौलवी लियाकत अली ने बिलग्राम, सांडी, पाली और शाहाबाद तक अंग्रेज परस्तों को मार गिराया. इस लड़ाई के मुख्य रणनीतिकार नरपति सिंह रैकवार ही थे,
उनकी विजय को देखकर शिवराजपुर के राजा सती प्रसाद सिंह तथा बांगरमोऊ के ज़मीदार जसा सिंह भी वहां आकर राजा के सहयोगी बन गए. बेरुआ स्टेट के सरबराकार गुलाब सिंह लखनऊ, रहीमाबाद व संडीला की लड़ाई लड़ते हुए नरपति सिंह के सहयोग में आ मिले.
अब तक अंग्रेजों से लड़ाई देश के काफी बड़े हिस्से में फ़ैल चुकी थी. कई जगह अंग्रेज जीत रहे थे और कई जगहों पर भारत के स्वाधीनता सेनानी. लेकिन कोई भी अंग्रेज अधिकारी नरपति सिंह रैकवार का सामना करने जाने की हिम्मत तक नहीं कर पा रहा था.
अंततः अंग्रेजों ने अपने बहुत बड़े अधिकारी ब्रिगेडियर होप के साथ 10 लेफ्टिनेंट वाली एक बड़ी फ़ौज भेजी. 15 अप्रैल 1818 को राजा नरपत सिंह एवं अंग्रेजी सेना के बीच युद्ध हुआ जिसमें राजा नरपति सिंह जी की सेना ने ब्रिगेडियर होप एवं पांच लेफ्टिनेंट कर्नल सहित 58 अंग्रेज सैनिकों को मार गिराया
उन्होंने अंग्रेजी सेना को सवाजपुर तक खदेड़ दिया. ब्रिगेडियर होप अंग्रेजों की रानी विक्टोरिया का सगा ममेरा भाई था. जब लन्दन में ब्रिगेडियर होप की मौत की खबर पहुंची तो इनलैंड का झंडा झुका दिया गया और सात दिन का राष्ट्रीय शोक घोषित किया गया
माधौगंज में स्थित रुइया नरेश श्री नरपति सिंह का किला इस समय जीर्ण-शीर्ण हालत में पहुंच चूका है. मेरा योगी सरकार से निवेदन है कि उस किले का जीर्णोद्धार कराया जाए जिससे कि लोग यहाँ आकर आजादी की लड़ाई के नायकों को श्रद्धंजलि दे सकें.

इस विजय के उपलक्ष में राजा नरपत सिंह स्मारक संस्थान हर साल 15 अप्रैल को बड़ी धूमधाम से विजय दिवस समारोह मनाती है. इस बर्ष कोरोना महामारी के कारण यह समारोह स्थगित किया गया है. लेकिन हम अपने घर पर तो उन्हें याद कर ही सकते हैं
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