Thursday, 28 March 2019

महाराजा रंजीत सिंह

 महाराजा रणजीत सिंह का जन्म 13 नवम्बर, सन 1780 को गुजरांवाला में हुआ था. रणजीत सिंह सिक्खों की बारह मिसलों में से एक 'सुकर चाकिया' से सम्बन्धित थे. उनके पिता महासिंह सुकर चाकिया मिसल के मुखिया थे. जिस समय रणजीत सिंह की आयु केवल 12 वर्ष थी, उसी समय उनके पिता का देहान्त हो गया था .
पिता की म्रत्यु के बाद उन्हें बाल्यावस्था में 'सुकर चाकिया' मिसाल का सरदार बना दिया गया.15 वर्ष की आयु में 'कन्हया मिसल' के सरदार की बेटी से उनका विवाह हुआ. इस विवाह के बाद दो मिसलों के मिल जाने से उनकी ताकत बढ़ गई थी. उनकी सास "सदा कौर" बुत ही दूरदर्शी और मह्त्वाकांक्षी महिला थी.
उनका मानना था कि जब तक सिख अलग अलग मिसलों में बंटे रहेंगे तब तक मजबूत नहीं बन सकते. अन्य मिसलो को भी जोड़ने के लिए उन्होंने अपने दामाद "रंजीत सिंह" अन्य मिसलों की लड़कियों से विवाह कराये. कोई सास अपने दामाद की कई शादियाँ कराये यह बहुत मुश्किल है लेकिन उन्होंने धर्म और राष्ट्र के हित में ऐसा किया.
इन वैवाहिक संबंधों के बाद रंजीत सिंह का प्रभाव बहुत बढ़ गया. सैन्य ताकत बढ़ जाने के बाद उन्नीस वर्षीय रणजीत सिंह ने 1799 ई. में जुलाई मास में लाहौर पर अधिकार कर लिया. उनकी ताकत को देखते हुए अफगान शासक जमानशाह ने परिस्थितिवश उनको लाहौर का उपशासक स्वीकार करते हुए राजा की उपाधि प्रदान की.
1804 ई. में कांगड़ा के सरदार 'संसार चन्द कटोच' को हराकर रणजीत सिंह ने होशियारपुर पर अधिकार कर लिया. 1805 ई. में उन्होंने अमृतसर एवं जम्मू पर अधिकार कर लिया. 1807 ई. में उन्होंने लुधियाना पर अधिकार कर लिया. इसको देखते हुए 25 अप्रैल, 1809 को अंग्रेजों ने महाराजा रंजीत सिंह से संधि की 'अमृतसर की सन्धि' कहा जाता है.
इस संधि के अनुसार सतलुज के पूर्व में अंग्रेजों का और सतलुज के पश्चिम में महाराजा रजीत सिंह का अधिकार मान लिया गया. तय हुआ कि दोनों एक दूसरे के क्षेत्र में हस्तक्षेप नहीं करेंगे. बड़े क्षेत्र पर कब्जा हो जाने के बाद उन्होंने अपने प्रशासन पर ध्यान दिया. अनपढ़ होते हुए उन्होंने जिस तरह राज्य का संचालन किया वह अच्छों अच्छों को सोंच में डाल देता है.
उनकी सरकार को 'सरकार खालसा' कहा जाता था. उन्होंने गुरु नानक और गुरु गोविन्द सिंह के नाम के सिक्के चलाये, किन्तु उन्होंने गुरुमत को भी कभी सत्ता पर हावी नहीं होने दिया. उन्होंने प्रशासन में डोगरों उच्च पद प्रदान किये एवं कुछ मुसलमानों को भी महत्त्वपूर्ण पद दिए. 'अजीजुद्दीन' उनके विदेशमंत्री तथा 'दीनानाथ' उनके वितमंत्री थे.
महाराजा रणजीत सिंह की सफलता में उनके द्वारा चुने गए मंत्रियों का बहुत हाथ था. जहाँ महान सेना नायक हरी सिंह नलवा ने उनकी सैन्य ताकत को बढ़ाया वहीँ दीवान दीनानाथ की वित्तीय योजनाओं ने राज्य का खजाना भर दिया. इस के साथ विदेशमंत्री 'अजीजुद्दीन' ने अपनी कूटनीति से विदेशों से महाराजा के अच्छे संबंध बनाए.
उनके राजस्व का प्रमुख स्रोत 'भू-राजस्व' था, जिसमें नवीन प्रणालियों का समावेश होता रहता था. महाराजा रणजीत सिंह ने नीलामी के आधार पर सबसे ऊँची बोली बोलने वाले को भू-राजस्व वसूली का अधिकार प्रदान किया. राज्य की ओर से लगान उपज का 2/5 से 1/3 भाग लिया जाता था. इस तरीके से उनका खजाना भर गया था.
महाराजा रणजीत सिंह का राज्य 4 सूबों में बंटा था - पेशावर, कश्मीर, मुल्तान और लाहौर. न्याय और प्रशासन के क्षेत्र में राजधानी में 'अदालत-ए-आला' (आधुनिक उच्च न्यायालय के समान) खोला गया था, जहाँ उच्च अधिकारियों द्वारा विवादों का निपटारा किया जाता था. उनके राज में अपराधियों के लिए कड़े दंड का प्रावधान था.
रणजीत सिंह ने अपनी सैन्य व्यवस्था पर विशेष ध्यान दिया था. उन्होंने अपनी सेना को फ़्राँसीसी सैनिकों से प्रशिक्षित करवाया. रणजीत सिंह की सेना में विभिन्न विदेशी जातियों के 39 अफ़सर कार्य करते थे, जिसमें फ़्राँसीसी, जर्मन, अमेरिकी, यूनानी, रूसी, अंग्रेज़, एंग्लो-इण्डियन, स्पेनी आदि सम्मिलित थे.
महाराजा रणजीत सिंह ने कांगड़ा, मुल्तान, अटक, कश्मीर, पेशावर, लाद्दाख, आदि की लड़ाईया जीतकर अपने राज्य को पश्चिम उत्तर में बहुत ही महत्वपूर्ण राज्य बना लिया था. उन्होंने एक ऐसे संगठित सिक्ख राज्य का निर्माण कर दिया था, जो पेशावर से सतलुज तक और कश्मीर से सिन्ध तक विस्तृत था..
किन्तु इस विस्तृत साम्राज्य में वह ऐसी कोई मज़बूत शासन व्यवस्था विकसित नहीं कर सके जिससे कि उनके बाद भी उनका राज्य संगठित रहता और शासन प्रणाली सुचारू रूप से चलती रहती जैसी कि शिवाजी ने महाराष्ट्र में उत्पन्न कर दी थी. उनकी मृत्यु (7 जून 1839) के केवल 10 वर्ष के उपरान्त ही यह साम्राज्य छिन्न भिन्न हो गया.
फिर भी यह स्वीकार करना होगा कि अफ़ग़ानों, अंग्रेज़ों तथा अपने कुछ सहधर्मी सिक्ख सरदारों के विरोध के बावजूद रणजीत सिंह ने जो महान् सफलताएँ प्राप्त कीं और जिस प्रकार से शासन किया, उनके आधार पर उनकी गणना उन्नीसवीं शताब्दी के भारतीय इतिहास की महान् विभूतियों में की जानी चाहिए.

Wednesday, 27 March 2019

शंख और ढपोरशंख

एक बार एक मछुआरे ने समुद्र देवता की प्रार्थन की. समुद्र देवता प्रसन्न हुए. उनसे मछुआरे ने कहा मुझे कोई ऐसी चीज दीजिये जिससे मेरा ठीक से जीवन यापन हो सके. समुद्र देवता ने उसे एक शंख दिया और कहा इससे तुम जो कुछ मांगोगे वह तुम्हे देगा लेकिन तुम्हारे मांगने के हिसाब से नहीं बल्कि तुम्हारी जरूरत का आंकलन करने के बाद.
इसके आलावा यह शंख 24 घंटे में केवल एक बार ही यह काम करेगा. अगर तुमको दुबारा कुछ माँगना हो तो उसके लिए 24 घंटे इन्तजार करना पड़ेगा. मछुआरा बहुत खुश हुआ, उसने शंख से कहा आज मुझे बहुत सारी मछलिया मिल जाए, उसके बाद मछुआरे ने समुद्र में जाल फेंका और बहुत सारी मछलिया उसके जाल में फंस गई,
अगले दिन उसने कहा मेरा बहुत सुंदर सा महल बन जाए, तो शंख से आवाज आई तुम को महल नहीं मिल सकता लेकिन मैं तुम्हारे इस घर को ठीक कर देता हूँ और उसका टुटा फूटा घर ठीक हो गया. इसी तरह शंख उसकी जरूरतों को पूरा करता रहा लेकिन अब वह मछुआरा सोंचने लगा कि- शंख बहुत कम चीज देता है
इस विचार के साथ उस मछुआरे ने फिर से समुद्र देवता की अराधना प्रारम्भ कर दी. कुछ दिन समुद्र देवता पुनः प्रसन्न हुए. मछुआरे ने उनसे कहा मुझे कोई दूसरा शंख दीजिये क्योंकि यह बहुत कम देता है हो गये और उस मछुआरे के मन की इच्छा जानकार उन्होंने उसे अपने हाथों से एक दूसरा शंख प्रदान किया
समुद्र देवता ने उससे कहा कि - इसका नाम ‘ढपोरशंख’ है. इस शंख से तुम जो कुछ भी मांगोगे, यह शंख उसका दुगुना तुम्हे देने की बात कहेगा और इससे तुम दिन में जितनी बार चाहो मांग सकते हो. इतना सुनते ही उस मछुआरे ने पुराना शंख समुद्र में वापस फेंक दिया और ‘ढपोरशंख’ को लेकर ख़ुशी ख़ुशी घर चल दिया.
घर पहुँचते ही उसने ढपोरशंख से कहा - मेरे लिए एक महल बना दो. सुनते ही वह शंख बोला- “एक क्या दो महल ले लो”. इस पर मछुआरा खुश होकर बोला, “ठीक है, दो महल बना दो”. तब शंख फिर से बोल उठा, “दो क्या चार महल ले लो”. मछुआरे ने कहा ठीक है चार महल दे दो , तब शंख से आवाज आई - चार क्या आठ ले लो.
इसी प्रकार मछुआरा शंख से जो कुछ भी मांगता, ढपोरशंख दुगना देने की बात करता लेकिन देता कुछ नहीं. इस पर झल्ला कर मछुआरा शंख पर बरस पड़ा, बोला "कैसे शंख हो तुम, वो पिछला वाला तो जो कहता था, दे भी देता था, लेकिन तुम दुगना देने की बात बात तो करते हो लेकिन देते कुछ नहीं हो
शंख से आवाज़ आई, "“अहम् ढपोर शंखनम्, वदामि च ददामि न”. अर्थात -मैं ढपोर शंख हूँ, मैं केवल दोगुना देने की बात करता हूँ देता कुछ नहीं. जिस "जिस शंख से तुम्हारी इच्छाऐं पूरी हो सकती थी, तुमने उसे तो तुमने खुद ही समुद्र में फेंक दिया. अब आप खुद निर्णय लीजिये कि आपको शंख चाहिए या ढपोरशंख.

Sunday, 17 March 2019

आरक्षण, सिफारिश और रिश्वत से भर्ती हुए सरकारी कर्मचारी,

आरक्षण, सिफारिश और रिश्वत से भर्ती हुए सरकारी कर्मचारी,
योग्यता देखकर भरती करने वाली प्रोफेशनल कम्पनियों का मुकाबला नहीं कर सकती
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आज जो लोग BSNL के कर्मचारियों को तनखा न मिलने को लेकर पोस्ट डाल रहे हैं, उनका मोबाइल अगर चेक करेंगे तो पायेंगे कि उनके मोबाइल में जियो का ही सिम होगा BSNLका नहीं. अपनी इस बदहाली के लिए BSNL के कर्मचारी खुद जिम्मेदार है. जब सरकारी कम्पनिया तब तक ही चल सकती है जब तक वो उस क्षेत्र में अकेली हो.
जब भी उन सरकारे कम्पनियों के सामने कोई भी प्रोफेसनल कम्पनी काम करने लगती है, जनता उन सरकारी कम्पनिययों को छोड़ देती है. केवल बीएसएनएल ही नहीं कोई भी सरकारी कम्पनी देख लीजिये, वहां केवल भ्रष्टाचार ही दिखाई देगा. उसके अलावा ये लोग घटिया सर्विस और अपने ग्राहकों से खराब व्यवहार के लिए भी जाने जाते हैं.
आरक्षण, सिफारिस और रिश्वत के द्वारा भर्ती हुए अयोग्य कर्मचारियों से आप ज्यादा अच्छे परिणाम की उम्मीद भी नहीं कर सकते. जबकि प्रोफेशनल कम्पनिया केवल योग्य व्यक्तियों को ही अपने कर्मचारी के रूप में चुनती है. BSNL ही क्या जनता तो दूरदर्शन, पोस्ट आफिस, सरकारी स्कूल, सरकारी हस्पताल, सरकारी बस, आदि सब छोड़ चुकी है.
जिनकी उम्र 40 से ऊपर है और जिन्होंने बीएसएनएल का लैण्डलाइन फोन इस्तेमाल किया है उनको पता होगा कि - कनेक्शन लेने से लेकर बिल जमा करने तक, इन निकम्मे और भ्रष्ट कर्मचारियों द्वारा ग्राहकों को कितना परेशान किया जाता था. आज जब ग्राहकों के पास अच्छे विकल्प मौजूद हैं तो वो इन निकम्मों से सर्विस क्यों लेंगे भला ?
जिन लोगों को BSNL के कर्मचारियों पर दया आ रही है वे लोग jio को छोड़ दें और BSNL का फोन इस्तेमाल करें. और भी अच्छा होगा अगर वो प्राइवेट टीवी चैनल छोड़कर दूरदर्शन देखे, प्राइवेट हस्पताल में इलाज कराने के बजाये सरकारी हस्पताल में इलाज कराये, बच्चों को सरकारे स्कूल में भेजें और कोरियर के बजाये डाकखाना इस्तेमाल करें.

Friday, 15 March 2019

देशद्रोहियों को ब्लोक करने से ज्यादा जरुरी है उनकी मानशिकता को बे-नकाब करना

अक्सर कई सज्जन मित्र मुझसे यह शिकायत करते हैं कि - मेरी मित्र सूची में कुछ गलत मानशिकता वाले लोग जुड़े हुए हैं. ये लोग हिन्दुओं, हिन्दुओ के आराध्यों, भारत माता और देशभक्तों के प्रति अभद्र टिप्पणियाँ करते हैं. उनकी सलाह है कि - ऐसे अभद्र और अधर्मियों को मैं ब्लोक कर दूँ अथवा अपनी फ्रैंडलिस्ट से निकाल दूँ
मेरा उन सज्जन मित्रों से कहना है कि - ऐसे लोगों से बचना समस्या का हल नहीं है बल्कि इनको मुहतोड़ जबाब देकर हतोत्साहित करने की जरुरत है और इससे भी ज्यादा जरुरी है, अपने लोगों को, इन देशद्रोहियों और अधर्मियों की गंदी सोंच से परिचित कराना. हमारे बहुत से अच्छे लोग सेकुलरता के भ्रम में पड़ कर मूर्ख बनते रहे है.
अधर्मी लोग जब हमको नीचा दिखाने के लिए हमारे आराध्यों, महापुरुषों, भारत माता आदि को गालियाँ देते हैं, तो वो केवल हमको ही गाली नहीं दे रहे होते हैं बल्कि उन सेकुलरों को भी दे रहे होते हैं जो सद्भावना दिखाने के चक्कर में मूर्ख बनते रहे हैं. अब ज्यादातर सेकुलर हिन्दुओं को भी देशद्रोहियों की हकीकत समझ आने लगी है.
पहले जब देशभक्त लोग पापिस्तान, बंग्लादेश और भारत के कश्मीर, केरल, असम, पश्चिमी बंगाल, आदि के हालात के बारे में लोगों को बताते थे, तो कई सेकुलर हिन्दू , इसको संघियों का झूठा प्रचार कहकर नकार देते है. लेकिन अब जब सोशल मीडिया पर खुद इनको देखने को मिलता है तो इनको भी हकीकत समझ आती है.
भारत बिरोधी और हिन्दू बिरोधी, अभद्र लोगों से बहस करने का मेरा उद्देश्य उनको समझाना है ही नही, बल्कि उनसे बहस करने का मेरा एकमात्र उद्देश्य यह है कि - उनके दिलो दिमाग में , हिन्दुओं, हिन्दुओं के आराध्यों और हिन्दुस्तान के प्रति, जितना जहर भरा हुआ है वो सबके सामने लाया जाए और इन लोगों को बे-नकाब किया जाए.
जिस तरह कैंसर से पीड़ित व्यक्ति को ठीक करना आसान नहीं है , लेकिन कैसर से पीड़ित व्यक्ति की हालत दिखा कर अन्य लोगों को सिगरेट / तम्बाकू आदि से दूर रहने के लिए प्रेरित किया जा सकता है, उसी तरह से इन अधर्मियों और देशद्रोहियों की मानशिकता सबके सामने प्रकट करके, सेकुलर देशभक्तों को भी सावधान किया जा सकता है.

क्या किसी भारतीय को "हिटलर" ने नफरत करनी चाहिए ?

 हिटलर हमारे सबसे बड़े दुश्मन अंग्रेजों का दुश्मन था और दुश्मन का दुश्मन हमेशा ही मित्र होता है. हिटलर को आप कितना भी बुरा कह लें, लेकिन वो भारत का दुश्मन हरगिज नहीं था. हिटलर का समर्थन और सहयोग तो तो हमारे "नेताजी सुभाष चन्द्र बोस" भी करते थे क्योंकि हिटलर हिन्दुस्तान के सबसे बड़े दुश्मन अंग्रेजों का दुश्मन था.
हिटलर का बिरोध केवल अंग्रेजों के वो भारतीय गुलाम करते थे, जो अंग्रेजों को दिल से अपना मालिक स्वीकार कर चुके थे. अंग्रेजों के वो मानसिक गुलाम हिटलर तो क्या भारतीय क्रांतिकारियों तक को पसंद नही करते थे. हिटलर ने क्या कभी भारत को कोई नुकशान पहुंचाया ? भारतीयों द्वरा हिटलर के बिरोध का तो कोई कारण ही नहीं बनता है.
हिटलर केवल उन यहूदियों से नफरत करता था जो जर्मनी में रहकर बफादारी इंग्लैण्ड के प्रति दिखाते थे. विश्व युद्ध में हिटलर का साथ बौद्धों का सबसे ताकतवर देश वो "जापान" भी दे रहा था जो दुनिया के सारे बौद्धों का आदर्श है, यहाँ तक कि - हिटलर का साथ तो वो "इटली" भी दे रहा था जहाँ की बेटी, आज भारत के कांग्रेसियों की राजमाता है.
अगर कोई किसी भारतीय व्यक्ति या भारतीय संगठन को हिटलर समर्थक बताता हैं तो वह उसकी बुराई नहीं बल्कि तारीफ़ करता है. अंग्रेजों का हर शत्रु भारत का मित्र माना जाना चाहिए. हो सकता मेरे द्वारा हिटलर की तारीफ़ करने पर आप मुझे बुरा कहे, लेकिन "नेताजी सुभाष चन्द्र बोस" द्वारा हिटलर का साथ देने पर आप क्या कहेंगे?
हमारा देश गाँधीजी के कहने पर अंग्रेजो की ओर से लड़ने वाले, वेतनभोगी भारतीय सैनको को सम्मान नहीं देता है बल्कि आजाद हिद फ़ौज के लिए लड़ने वाले स्वयंसेवी सैनिको को सम्मान देता है. उल्लेखनीय है कि - विश्वयुद्ध में "नेताजी सुभाष चन्द्र बोस" और उनकी "आजाद हिन्द फ़ौज" ने हिटलर का साथ दिया था और महात्मा गांधी ने अंग्रेजो का
आज हमारा देश आजाद है तो इसमें बहुत बड़ा हाथ "हिटलर" का भी है. हिटलर विश्वयुद्ध भले ही हार गया था मगर उसने अंग्रेजों की कमर तोड़कर रख दी थी. गांधी का आन्दोलन तो 1942 में ही असफल साबित हो गया था. विश्वयुद्ध में इंग्लैण्ड की बर्बादी और आजाद हिन्द फ़ौज की बहादुरी ने अंग्रेजों को भागने पर मजबूर किया था.

Wednesday, 13 March 2019

नरेंद्र मोदी का विवाह : विवाह अथवा वालविवाह कुप्रथा का अभिशाप ?

भारतीय जीवन पद्धति में मनुष्य के सौ साल के जीवन को 25 / 25 बर्ष के 4 भागों में बांटा गया है. ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास. ब्रह्मंचर्य का समय ज्ञान, युद्धकला, व्यवसाय, हुनर, इत्यादि सीखने का समय होता है. इस प्रकार बालक 25 बर्ष का युवा होने तक अपनी क्षमता और दक्षता बढाता है जो आगे चलकर उसके काम आनी है.
लगभग 25 बर्ष की आयु के समय उसका विवाह कर दिया जाता है तथा वह ब्रह्मचर्य आश्रम में अपने सीखे अपने ज्ञान के हिसाब से कार्य करते हुए अपने परिवार का पालन करने लगता है. जब वह लगभग 50 का हो जाता है तो उसके बच्चे भी युवा होने लगते हैं, तब वह अपने काम धंधे का भार धीरे धीरे अपनी संतानों पर डालने लगता है.
व्यक्ति अपनी संतानों का मार्गदर्शन करते हुए खुद अपनी जिम्मेदारियां धीरे धीरे कम करता जाता है. यह वानप्रस्थ कहलाता है. 75 साल की आयु तक पहुँचने के बाद वह सांसारिक जीवन को त्याग कर आध्यात्मिक जीवन जीने लगता है. और एक दिन संसार को त्यागकर ईश्वर में विलीन हो जाता है. इसे संन्यास कहते हैं.
भारत में हजारों साल से यह पद्धति चली आ रही थी. विदेशी आक्रमणकारियों के भारत में आकर बसने के बाद उनकी देखा देखी इस भारतीय आश्रम पद्धति का भी ह्रास हो गया. यहाँ भी वाल विवाह होने लगे, वाल विवाह में सबसे बड़ी समस्या यह आई कि - युवा होने पर कई बार बच्चों ने अपने विवाह को अस्वीकार कर दिया.
कभी बच्चों को बड़े होने पर अपने साथी की लम्बाई पसंद नहीं आई तो कभी उसके बिचार, कभी किसी की सोंच भगवान् की भक्ति में लग गई तो कभी कोई ग्रस्त जीवन को त्यागकर समाज कल्याण के कार्यों में लग गया. इन सब के कारण दुसरे साथी को काफी तकलीफ भी हुई. इन बातों ने वाल विवाह को अप्रसांगिक साबित कर दिया.
ऐसा ही एक विवाह अपने प्रधानमन्त्री "नरेंद्र मोदी" का था. नरेंद्र मोदी बचपन से संघ की शाखा में जाया करते थे और उनके मन में संघ का प्रचारक बनकर राष्ट्र की सेवा करने की भावना थी. संघ के प्रचारक विवाह नहीं करते हैं केवल समाज कल्याण में लगे रहते हैं. इनका जीवन प्राचीन काल के संतों के समान होता है
इसी बीच एक दिन नरेंद्र की माँ ने एक साधू को नरेंद्र की कुंडली दिखाई और उसके भविष्य के बारे में पूंछा तब साधू ने कहा कि - इसका जीवन उथल-पुथल भरा रहेगा. यह या तो एक दिन राजा बनेगा या फिर शंकराचार्य की तरह एक महान संत की सिद्धि हासिल करेगा. इन बातों से उनके माता पिता घबरा गए.
इसी बीच नरेंद्र की पूजा-पाठ में भी बहुत रुचि हो गई. वे अधिकतर समय पूजा-पाठ में ही व्यतीत करने लगे. तो परिजन को चिंता होने लगी कि कहीं उनका बेटा सचमुच में ही साधू न बन जाए. इसी के चलते परिवार ने मोदी की शादी करवा देने का फैसला लिया. उन्हें लगा कि शादी हो जाने के बाद वह परिवार एवं ग्रहस्थी में व्यस्त हो जाएगा.
माता पिता अपनी जानकारी के एक परिवार की 13 बर्षीय बालिका जसोदा बेन से कर दिया. उस समय नरेंद्र की आयु 14 बर्ष थी. उस समय विवाह हो गया परन्तु गौना नहीं हुआ. यह तय हुआ कि - नरेंद्र के मैट्रिक करने के बाद गौना लिया जाएगा. माता पिता द्वारा जबरन विवाह किये जाने पर बच्चे बड़ों का बिरोध नहीं कर पाते थे.
मोदी पर किताब लिखने वाली लेखिका - "कालिंदी रांदेरी" ने अपनी किताब में ऐसी कई बातों से पर्दा उठाया है. किताब के अनुसार मैट्रिक पास करने के बाद नरेंद्र की माँ ने कहा कि - अब बहू को घर ले आना चाहिए, परन्तु नरेंद्र ने कहा कि - मैं हिमालय पर जाकर तपस्या करना चाहता हूँ. और वे 16 बर्ष की आयु में हिमालय की तरफ चले गए.
वे काफी दिन बद्रीनाथ / केदारनाथ क्षेत्र में रहे. लेकिन उनकी छोटी सी उम्र को देखते हुए एक साधू ने उन्हें समझाया कि- ईश्वर की तलाश समाज की सेवा करके भी की जा सकती है. इसके लिए साधू बने रहने की कोई जरूरत नहीं. इसके बाद मोदी हिमालय से वडनगर वापस आ गए. लेकिन उनका अधिकाँश समय मंदिर अथवा संघ कार्यालय में बीतता था.
अपने बेटे का घर बसाने की कोशिश में उनकी माँ अपनी बहू जसोदाबेन को अपने घर लिवा लाइ कि - शायद पत्नी को देखकर बेटे का मन ग्रास्थी में लग जाए. लेकिन नरेंद्र ने साफ़ कह दिया कि - अब यदि उस पर ज्यादा दबाब डाला तो वह फिर हिमालय चला जाएगा. अब परिवार भी तरह समझ चुका था कि मोदी को सांसारिक जीवन में रुचि नहीं है.
नरेंद्र की माँ ने जशोदाबेन के परिजन को भी सूचना दे दी थी कि- वे नरेंद्र को वैवाहिक बंधन से मुक्ति दे दें. इसके लिए पूरे परिवार ने जशोदाबेन के परिवार से माफी मांगी. नरेंद्र के परिजन को इस फैसले का दुख था, पिता को अंतिम समय तक यह दुःख रहा कि उनकी गलती की बजह से एक मित्र और रिश्तेदार की बच्ची का जीवन बर्बाद हो गया.
लेखिका कालिंदी रांदेरी के शब्दों में- मैं जब मोदी की मां हीराबा से मिली तो उनकी आंखों में आंसू ही थे. उनका कहना था कि - नरेंद्र की मर्जी के खिलाफ उनकी शादी कराना, उनके जीवन की सबसे बड़ी भूल थी. हीराबा ने बताया कि- नरेंद्र के पिता को तो अंतिम समय तक इस बात का रंज रहा कि उन्होंने जबर्दस्ती मोदी पर शादी थोप दी थी.
अब आप खुद फैसला कीजिए कि - क्या नरेंद्र मोदी को वास्तव में विवाहित कहा जा सकता है ? इस विवाह और विवाह बिच्छेद के लिए नरेंद्र मोदी जिम्मेदार है या मध्ययुग में शुरू हुई "वाल विवाह" जैसी कुप्रथा. वाल विवाह के कारण ऐसी बहुत सारी विसंगतियां उत्पन्न हुई. इन्ही कारणों से वाल विवाह को अभिशाप मानते हुए, इस पर प्रतिबन्ध लगाया गया.

Sunday, 10 March 2019

मेजर शैतान सिंह भाटी

1962 का भारत / चीन युद्ध यूँ तो भारत की हार के लिए जाना जाता है, लेकिन यह भी सत्य है कि- हम हर मोर्चे पर नहीं हारे थे. कई मोर्चों पर भारतीय सेना ने भी चीन को धूल चटाई थी और उसे पीछे हटने को मजबूर किया था.
ऐसा ही एक मोर्चा था रेजांग-ला, जिसमे मेजर शैतान सिंह भाटी के नेतृत्व में 13वीं कुमाऊं बटालियन की "चार्ली" कंपनी के 120 जवानो ने, चीन की 5,000 सैनको वाली विशाल ब्रिगेड को कड़ी टक्कर दी और 1,300 चीनी सैनकों को मार गिराया था.
13वीं कुमाऊं बटालियन की चार्ली कंपनी, लद्दाख के "चुशुल" में मौजूद एयरफील्ड की रक्षा कर रही थी. 18 नवंबर 1962 की सुबह चीन के लगभग 5000 सैनिकों ने इस जगह पर हमला कर दिया. वहां उस समय भारत के मात्र 120 सैनिक ही मौजूद थे.
मेजर शैतान सिंह ने इसकी सूचना रेडियो द्वारा हेडक्वार्टर को भेजी. चीन की बड़ी ब्रिगेड और उनके आधुनिक हथियारों के सामने भारतीय सैनिको की कम संख्या तथा साधारण और कम हथियारों को देखते हुए हेडक्वार्टर ने उनको पीछे हटने का निर्देश दिया.
लेकिन मेजर शैतान सिंह ने कहा "चुशुल" को गंवा देने का मतलब है, लद्दाख को गँवा देना. उन्होंने कहा - जब तक मैं या मेरा एक भी सैनिक ज़िंदा है कोई चीनी यहाँ कब्जा नहीं कर सकता. मेजर शैतान सिंह और उनके 120 सैनिक मोर्चा लगाकर तैयार हो गए.
भारत के वीर सैनिको ने चीनियों को मारना शुरू किया, तो चीनियों को एक बार यह भ्रम हो गया कि- वहां बहुत बड़ी ब्रिगेड मौजूद है. भारतीय सैनिको के पास गोला बारूद की बहुत कमी थी लेकिन उन्होंने सटीक निशाने लगाकर हजार से ज्यादा चीनियों को मारा.
भारतीय गुप्तचर एजेंसी रॉ (रिसर्च एंड एनेलिसेस विंग) के पूर्व अधिकारी आर. के. यादव ने अपनी किताब "मिशन आर एंड डब्लू" में रेज़ांगला की लड़ाई का वर्णन करते हुए लिखा है कि -यह लड़ाई दुनिया के इतिहास की अद्भुद लड़ाई थी.
असलहा ख़त्म हो जाने के बाद मेजर शैतान सिंह की देख-रेख में कई भारतीय जवानों ने तो अपने हाथों से ही चीनी सैनिकों को मार गिराया था. इस ब्रिगेड में ज्यादातर सैनिक रेवाड़ी जिले के अहीर जाति के पहलवान टाइप लोग थे .
मल्ल-युद्ध में माहिर और बेहतरीन कुश्तीबाज सिंहराम यादव ने, घात लगाकर चीनी सैनिको को बालों से पकड़ा और पहाड़ी से टकरा-टकराकर मौत के घाट उतार दिया. इस तरह से उसने अकेले ही दस चीनी सैनिकों को मौत के घाट उतार दिया था.
भारत के इन 120 योद्धाओं में से 114 जवान शहीद हो गए, पांच जवानों को चीन ने युद्ध कैदी के तौर पर गिरफ्तार कर लिया. हालांकि ये जवान बाद में बच निकलने में कामयाब रहे. एक सैनिक "राम चंद्र यादव" को "मेजर शैतान सिंह" ने बेस कैम्प को सारी खबर देने भेजा था .
मेजर शैतान सिंह जब अपने सैनिकों को प्रोत्साहित करने के लिए एक पलटन से दूसरी पलटन की तरफ घूम रहे थे, तभी एक चीनी एमएमजी की गोली से वह घायल हो गए. लेकिन घायल होने के बावजूद उन्होंने लड़ना जारी रखा,
1963 में जब मेजर शैतान सिंह का शव मिला था तो वह पूरी तरह जमा हुआ था और मेजर शैतान सिंह मौत के बाद भी. अपने हथियार को मजबूती से थामे हुए थे. उन महान वीरों और राष्ट्र रक्षकों की याद में "चुशूल" में एक स्मारक भी बनाया गया है.
रेजांगला की यह लड़ाई विश्व की दुर्लभ लड़ाइयों में से एक मानी जाती है. युद्ध में असाधारण बहादुरी दिखाने के लिए सभी 120 सैनिको को विशेष सम्मान तथा उनका नेतृत्व करने वाले मेजर शैतान सिंह को परम वीर चक्र देकर सम्मानित किया गया.
लता मंगेशकर द्वारा गाए सदाबहार और अमर गीत 'ए मेरे वतन के लोगों' को लिखने वाले कवि "प्रदीप" की प्रेरणा भी मेजर शैतान सिंह और उनके बहादुर साथी ही थे. मेंजर शैतान सिंह के साथ साथ उन सभी 120 वीर सैनिको को सादर नमन