Thursday, 28 February 2019

क्या है जेनेवा संधि

कल भारत के विंग कमांडर "अभिनंदन वर्धमान" को रिहा किया जायेगा. ऐसा जेनेवा संधि के तहत किया जा रहा है. लेकिन यह अच्छी तरह से समझ लेना चाहिए कि - नियम कानून भी तब लागू हो पाते है जब आपमें ताकत है. यह निश्चित रूप से भारत कि कूटनीतिक सफलता का बहुत बड़ा सबूत है. इसके सरकार निश्चित रूप से साधुवाद की पात्र है.
आइये अब ज़रा यह जान लें कि - जेनेवा संधि क्या है ? पूरे विश्व में कहीं भी युद्ध होने पर युद्धबंदियों के अधिकारों को बरकरार रखने के कुछ नियम बनाए गए इनको जेनेवा समझौते (Geneva Convention) के नाम से जाना जाता है. जेनेवा समझौते में चार संधियां और तीन अतिरिक्त प्रोटोकॉल (मसौदे) शामिल हैं,
युद्ध के हालात में भी मानवता को बरकरार रखने के लिए पहली संधि 1864 में हुई थी. इसके बाद दूसरी और तीसरी संधि 1906 और 1929 में हुई. द्वितीय विश्व युद्ध के बाद 1949 में 194 देशों ने मिलकर चौथी संधि की थी. इसमें साफ तौर पर ये बताया गया है कि युद्धबंदियों (Prisoner of War) के क्या अधिकार हैं
जेनेवा समझौते में दिए गए अनुच्छेद 3 के मुताबिक युद्ध के दौरान घायल होने वाले युद्धबंदी का अच्छे तरीके से उपचार होना चाहिए. इंटरनेशनल कमेटी ऑफ रेड क्रास के मुताबिक जेनेवा समझौते में युद्ध के दौरान गिरफ्तार सैनिकों और घायल लोगों के साथ कैसा बर्ताव करना है इसको लेकर दिशा निर्देश दिए गए हैं.
इस संधि के मुताबिक युद्धबंदियों पर केवल मुकदमा चलाया जा सकता है, लेकिन उन युद्धबंदी सैनिको को कानूनी सुविधा भी मुहैया करानी होगी. युद्धबंदियों (POW) के साथ बर्बरतापूर्ण व्यवहार नहीं होना चाहिए. साथ ही युद्धबंदियों को डराया-धमकाया नहीं जा सकता और न ही उन्हें अपमानित किया जा सकता है.
युद्धबंदियों से सिर्फ उनके नाम, सैन्य पद, नंबर और यूनिट के बारे में पूछा जा सकता है.कोई भी देश युद्धबंदियों को लेकर जनता में उत्सुकता पैदा नहीं कर सकता. उनकी अपने देश की जनता के सामने नुमाइश नहीं कर सकता है. इसके अलावा युद्ध के बाद युद्धबंदियों को वापस लैटाना होता है. जेनेवा संधि से जुड़ी मुख्य बातें
* इस संधि के तहत घायल सैनिक की उचित देखरेख की जाती है.
* संधि के तहत उन्हें खाना पीना और जरूरत की सभी चीजें दी जाती है.
* किसी भी युद्धबंदी के साथ अमानवीय बर्ताव नहीं किया जा सकता.
* किसी देश का सैनिक जैसे ही पकड़ा जाता है उस पर ये संधि लागू होती है.
* संधि के मुताबिक युद्धबंदी को डराया-धमकाया नहीं जा सकता.
* युद्धबंदी की जाति, धर्म, जन्‍म, आदि बातों के बारे में नहीं पूछा जा सकता

Monday, 25 February 2019

कब मिलेगी भारत को पूर्ण आजादी ?

पिछले हजार साल में मंगोलों, अरबो, अफगानों, तुर्कों, आदि ने भारत पर सैकड़ों हमले किये. इन लड़ाइयों में भारत की बहुत ज्यादा जन - धन की हानि हुई. इन लड़ाइयों में हिन्दुस्थानियो को कई बार हार का सामना भी करना पड़ा. इन हमलावरों ने भारत की जनता, भारत की इज्जत और भारतीयों की आस्था पर भयंकर अत्याचार किये.
ज्यादातर भारतीय उन हमलावरों से संघर्ष करते रहे लेकिन कुछ गद्दार भारतीय अपने फायदे के लिए उनसे मिलते भी रहे. जिसके कारण भारत के काफी हिस्से पर उन हमलावरों का कब्जा भी हो गया. लेकिन देशभक्त हमेंशा उस जबरन कब्जे के खिलाफ अत्याचारियों से संघर्ष करते रहे और समय समय पर काफी हिस्से उनसे वापस आजाद कराते रहे.
अभी इस समस्या से ही पार नहीं पा पाए थे कि - अंग्रेजों के रूप में एक और भयंकर समस्या भारत में आ गई. देखते ही देखते कुछ ही समय में अंग्रेजों ने सारे भारत पर कब्जा कर लिया. तब कही जाकर हिन्दुस्थानियो को होश आया. तब हिन्दुस्थानियों ने उन विदेशियों से भारत को आजाद कराने की खातिर फिर से एक भीषण संघर्ष प्रारम्भ किया.
1857 के पहले संघर्ष में तो वो मुस्लिम लोग भी, अंग्रेजों से सघर्सं में हिन्दुओं के साथ हो गए क्योंकि उनको उम्मीद थी इससे उनको अपनी रियाश्तें फिर से वापस मिल जायेंगी. 1857 में अंग्रेजों से सभी लोग लड़ रहे थे लेकिन उन सभी का उद्देश्य केवल अपनी अपनी रियासतों का आजाद कराना था, पूरे देश से उनको कोई ख़ास ज्यादा मतलब नहीं था.
अंग्रेज भारत के दुश्मन थे लेकिन हिन्दुस्थान पर अरबो, अफगानों, तुर्कों, आदि ने भी कोई कम जुल्म नहीं किये थे. देश के लोग सभी विदेशी हमलावरों से पूर्ण आजादी चाहते थे. इधर उस प्रथम स्वाधीनता संग्राम के असफल हो जाने के बाद ज्यादातर मुस्लिम्स ने सोचा कि - अंग्रेजों से आजादी के बाद हिंदुस्थानी फिर से अपने देश के मालिक बन जायेंगे.
इसलिए दुसरे स्वाधीनता संग्राम के समय, आजादी की लड़ाई में शामिल होने के बजाय, वो अपने लिए अलग भूभाग (पापिस्तान) की मांग करने लगे. इस चक्कर में उन लोगों ने कई जगह दंगा फसाद भी किया. अब देशभक्तों के सामने दोहरी समस्या थी. एक अंग्रेजों को देश से निकालना तथा दुसरी दंगा फसाद से देश और देशवाशियों को बचाना.
हिन्दुओं अंग्रेजों को निकालने का सघर्ष जारी रखा और उन अरबो, अफगानों, तुर्कों, आदि के अत्याचार को भी भुला दिया और उनको उनकी आवादी के हिसाब से भी ज्यादा जमीन देना मंजूर कर लिया, ताकि रोज-रोज का झगडा ख़त्म हो जाए. मगर यहाँ भी कुछ लोगों ने अपने आपको महान आत्मा दिखाने के चक्कर में देश के साथ धोखा कर दिया.
मुसलमानों को अलग देश पपिस्तान दे दिया लेकिन हिन्दुओं को हिन्दुस्थान नहीं दिया. यूं तो सभी विदेशियों हमलावरों से भारत को पूर्ण आजादी मिलनी चाहिए थी लेकिन अगर आपने काफी समय से देश में रह रहे लोगों को, उनके किये गए अत्याचारों को भुलाकर, अपने देश में हकदार मान भी लिया, तो बंटबारा तो न्यायपूर्ण होना चाहिए था.
जो लोग साथ नहीं रह सकते हो उनको अलग अलग कर देना बुद्धिमानी है. लेकिन बंटबारा करते समय, झगडालू को उसका हिस्सा देने के बाद भी अपने हिस्से में रहने देना, सद्भावना नहीं बल्कि मुर्खता थी. उन्होंने तो अपना हिस्सा ले लिया और आप आज भी कश्मीर, केरल, मालदा, गोधरा, मेरठ, मुरादाबाद, भागलपुर, अलीगढ़ और कैराना में उलझे हैं.

Sunday, 24 February 2019

संविधान की धारा (आर्टिकल ) 370 के बिरोध का बिरोध क्यों ?

संविधान की धारा- 370 का बिरोध करने वाले का बिरोध, अगर कोई कश्मीरी करता है, तो समझ में आता है क्योंकि कोई भी मुफ्त मिले विशेषाधिकार को भला क्यों छोड़ना चाहेगा ? लेकिन अगर शेष भारत का कोई नागरिक (मुस्लिम या मुस्लिम वोट के सहारे राजनीति करने वाला) बिरोध करता है तो उसका तो कोई कारण समझ नहीं आता.
संविधान की धारा-370 के कारण कश्मीर को जो विशेष दरजा दिया गया है, उसका लाभ केवल कश्मीरी को ही मिलता है शेष भारत के किसी अन्य मुसलमान को नहीं. पता नहीं शेष भारत के मुसलमानों को इसकी जानकारी है या नहीं ? धारा-370 के कारण शेष भारत का कोई भी व्यक्ति कश्मीर में नहीं बस सकता चाहे वो मुस्लिम ही क्यों न हो?
संघ का अंधा बिरोध करने वालों ने, देश में भ्रम फैलाया है कि- धारा- 370 खतम हो जाने से मुसलमानों का नुकशान होगा. जबकि धारा- 370 केवल कश्मीरी के नागरिक (हिन्दू मुस्लिम दोनों) के लिए ही विशेषाधिकार प्रदान करती है, शेष भारत के किसी मुसलमान के लिए नही. धारा- 370 का बिरोध तो शेष भारत के हर मुस्लिम को भी करना चाहिए.
धारा- 370 की तरह ही हिमाचल और नागालेंड जैसे राज्यों में भी धारा- 371 लागू है जो इन राज्यों को कुछ विशेषाधिकार (कश्मीर से थोडा कम ) देती है. आजादी के समय देश में परिस्थितिया तेज़ी से बदल रहीं थी कि - उस समय नेताओं को उनपर सोंचने का ज्यादा समय नहीं मिल पाया होगा इसलिए इन विवादास्पद बातों को उन्होंने मंजूर किया होगा.
लेकिन अब देश के सभी नेताओं और नागरिकों को मिलकर पुनर्बिचार करके विघटनकारी धाराओं को ख़तम करके सभी के लिए समान कानून बनाना चाहिए. देश में कहीं भी, किसी भी क्षेत्र में किसी भी व्यक्ति को जाति, धर्म या क्षेत्र के आधार पर किसी को भी न तो कोई विशेष का दर्जा दिया जाए और न ही किसी को अछूत ही माना जाए.

क्या है धारा 370 ( आर्टिकल 370 ) ?

संविधान की धारा -370 "जम्मू & कश्मीर" राज्य को विशेष दर्जा प्रदान करती है. यह धारा भारतीय राजनीति में शुरू से ही विवादित रही है. इस बिशेष दर्जे के कारण "जम्मू एवं कश्मीर" शेष भारत से बहुत अलग है. राष्ट्रवादी दल इसे "जम्मू एवं कश्मीर" में व्याप्त अलगाववाद के लिये जिम्मेदार मानते हैं तथा इसे समाप्त करने की मांग करते रहे हैं.
मुस्लिम वोटबैंक की राजनीति करने वाले नेताओं ने ऐसा झूठा फैलाया हुआ है कि - अगर धारा -370 हटायेंगे, तो देश के मुसलमानों का नुकशान होगा, जबकि इस धारा का लाभ केवल जम्मू-कश्मीर के निवासी (चाहे मुसलमान हो या हिन्दू) शेष भारत के किसी मुस्लिम को नहीं. इस धारा के कुछ प्रमुख बिंदु इस प्रकार हैं :-
............................................................................................................
1. जम्मू & कश्मीर" का अपना अलग संबिधान और अपना अलग निशान (झंडा) है.
2. पापिस्तान का कोई नागरिक अगर किसी कश्मीरी लड़की से शादी करता है तो उसको कश्मीर की नागरिकता मिल जायेगी.
3. कश्मीर की लड़की अगर किसी शेष भारत के व्यक्ति से शादी करती है तो उसके बिशेशाधिकार समाप्त हो जायेंगे.
4. भारत की संसद को "जम्मू & कश्मीर" के बारे में केवल रक्षा, विदेश और संचार के अलावा, किसी विषय में कानून बनाने का अधिकार नही है,
5. भारतीय संविधान की "धारा - 360" जिसमें देश में वित्तीय आपातकाल लगाने का प्रावधान है, वह भी जम्मू-कश्मीर पर लागू नहीं होती.
6. "जम्मू & कश्मीर" राज्य पर संविधान की धारा-356 लागू नहीं होती. इस कारण राष्ट्र-अध्यक्ष के पास राज्य के संविधान को बरख़ास्त करने का अधिकार नहीं है.
7. "जम्मू & कश्मीर" पर संविधान की धारा 356 लागू नहीं होती. इस कारण भारत के राष्ट्र-अध्यक्ष के पास राज्य की सरकार को बरख़ास्त करने का अधिकार नहीं है
8. "जम्मू & कश्मीर" का निवासी शेष भारत में कहीं भी जमीन खरीद कर वहां रह सकता है लेकिन शेष भारत का कोई नागरिक "जम्मू & कश्मीर" में नही रह सकता.
9. भारतीय संविधान की पाँचवी अनुसूची (अनुसूचित क्षेत्रों और अनुसूचित जन-जातियों के प्रशासन और नियंत्रण से संबंधित) और छठी अनुसूची (जनजाति क्षेत्रों के प्रशासन के विषय मे) "जम्मू & कश्मीर" मे लागु नही होती.
10. "जम्मू & कश्मीर" की विधानसभा की अनुमति के बिना राज्य के सीमा को परिवर्तित करने वाला कोई भी विधेयक भारत की संसद मे पेश नही किया जा सकता
11. बंटबारे के समय पापिस्तान चले गए लोगों को नागरिकता देने से इनकार करने का प्रावधान, "जम्मू & कश्मीर" से पापिस्तान गए लोगों पर लागू नही होता.
13. "जम्मू & कश्मीर" का मुख्यमंत्री, मुख्यमंत्री नही बल्कि "जम्मू & कश्मीर" का प्रधान मंत्री होगा ( यह नियम श्यामा प्रसाद मुखार्जी के बलिदान के बाद बदला गया )
14. शेष भारत के नागरिक को "जम्मू & कश्मीर" आने के लिए परमिट लेना होगा
(यह नियम भी डा. श्यामा प्रसाद मुखार्जी के बलिदान के बाद खारिज किया गया )
.......................................................................................................
ऐसे ही कई ऐसे बिंदु हैं जिनसे अलगाववाद को बढाबा मिलता है. "भारतीय जनसंघ" के नेता डा. श्यामा प्रसाद मुखार्जी ने धारा -370 के खिलाफ राष्ट्रव्यापी आन्दोलन चलाया. उन्होंने नारा दिया था - "नहीं चलेंगे एक देश में - दो विधान, दो प्रधान, दो निशान" और बिना परमिट "जम्मू & कश्मीर" में प्रवेश किया.
इस अपराध के लिए उन्हें गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया जहां रहस्यमयी परिस्तिथियों में उनकी म्रत्यु हो गई. आज भी बहुत से लोग इसे ह्त्या मानते है. डा. श्यामा प्रसाद मुखार्जी के बलिदान के बाद उत्पन्न हुए जन बिरोध को देखते हुए जवाहरलाल नेहरू और शेख अब्दुल्लाह को धारा -370 कुछ प्रावधानों को बदलने पर मजबूर होना पडा था.
जिनमे प्रधानमंत्री की जगह मुख्यमंत्री कहना स्वीकार किया गया था, शेष भारत के लोगों को जम्मू कश्मीर जाने के लिए परमिट लेने का नियम ख़त्म किया गया, इसके अलावा "तिरंगे" को ही राष्ट्रीय ध्वज मानना प्रमुख है. अगर यह नहीं हुआ होता तो आज हमें वैष्णोदेवी और अमरनाथ जाने के लिए पहले कश्मीर सरकार से परमिट लेना पड़ता

कश्मीर को विशेषाधिकार क्यों दिए गए थे ? और कैसे लागू हुई थी धारा 370 ?

कश्मीर को महाऋषि कश्यप की कर्मभूमि माना जाता है. कश्मीर में अधिकाँश समय हिन्दू राजाओं का राज रहा और उनके राज में कश्मीर की प्रतिष्ठा सारे विश्व में थी. कश्मीर को भारत का स्वर्ग कहा जाता था. कश्मीर की पहाड़ियों को सौन्दर्य सारी दुनिया के पर्यटकों को लुभाता था. कुल मिलाकर कश्मीर एक खुशहाल राज्य था.
ऐसा कहा जाता है कि - 1930 में हुए गोलमेज सम्मलेन के समय जहाँ सभी राजा और नेता, अंग्रेजो से दब कर बात कर रहे थे. वहीँ महाराजा हरिसिंह ने अंग्रेजों के सामने खुद को हिन्दुस्थान का राजा कहा था. वहीँ पर महाराजा हरि सिंह और जवाहरलाल नेहरु के बीच भी कुछ विवाद हो गया था. इस विवाद के कारण नेहरु, महाराजा हरिसिंह से नाराज हो गए थे
उन्ही दिनों कश्मीर में एक युवा नेता "शेख अब्दुल्ला" उभर रहे थे. शेख अब्दुल्ला एक बहुत ही विवादित नेता थे. माना जाता है कि - वो अंग्रेजों के एक भेदिये के रूप में काम करते थे. शेख अब्दुल्ला को कश्मीर का सुलतान बन्ने की महत्वाकांक्षा थी. शेख कश्मीर से बाहर सेक्युलर बनकर रहता था लेकिन कश्मीर पहुँचते की कट्टर मुसलमान बन जाता था.
अंग्रेजों के इशारे पर शेख ने "मुस्लिम कांफ्रेंस" नाम के एक दल का गठन किया गया, जिसके प्रमुख सदस्य थे - शेख अब्दुल्ला, मीर बाईज युसूफ शाह, सरदार इब्राहिम, गुलाम अब्बास. बाद में नेहरु के कहने पर शेख अब्दुल्ला ने "मुस्लिम कांफ्रेंस" का नाम बदलकर "नेशनल कांफ्रेंस" रख लिया था. धीरे - धीरे शेख और नेहरु में बहुत घनिष्ठता हो गई.
महाराज हरिसिंह को परेशान करने के लिए, मांउटबेटन और नेहरु ने भी शेख अब्दुल्ला को सपोर्ट किया. इसी बीच कश्मीर रियासत का दीवान "गोपाल स्वामी आयंगर" भी नेहरु से मिल गया. भारत आजाद होते समय नेहरु ने साफ़ कह दिया कि - महाराज हरि सिंह को अपने अधिकार शेख अब्दुल्ला को सौंपकर कश्मीर से बाहर जाना पड़ेगा.
विलय पत्र पर हस्ताक्षर करने में हुई देरी का यही एकमात्र कारण था. 20 अक्तूबर 1947 को पापिस्ताना ने कश्मीर पर आक्रमण कर दिया. लेकिन नेहरु ने साफ़ कह दिया कि -जब तक हरिसिंह विलयपत्र पर हस्ताक्षर करके कश्मीर नहीं छोड़ते हैं तब तक कश्मीर को कोई सैन्य मदद नहीं दी जायेगी, तब जनता की रक्षा की खातिर उनको इसे मानना पड़ा.
नेहरू ने यह भ्रम भी फैलाया कि - महाराज हरिसिंह ने कश्मीर के लिए विशेष अधिकार मांगे थे जबकि हकीकत यह है कि - उस समय महाराज हरिसिंह शर्त रखने की स्थिति में नहीं थे बल्कि खुद मजबूर थे. उनको तो खुद कश्मीर छोड़ना पडा और मुंबई में निर्वासित जीवन बिताना पडा. कश्मीर के लिए विशेष अधिकार तो शेख अब्दुल्ला ने मांगे थे.
शेख अब्दुल्ला ने एक ड्राफ्ट तैयार किया, जिसे धारा 306-A कहा जाता था. इस ड्राफ्ट को "गोपाल स्वामी आयंगर" ने नेहरु और माउंटबटन के सामने प्रस्तुत किया. धारा 306-A के अनुसार जम्मू & कश्मीर को विशेष अधिकार देने की बात कही गई थी. इस धारा 306-A को लेकर नेहरु ने सरदार पटेल तक को अँधेरे में रखा गया था.
नेहरु और पटेल के बीच विवाद की सबसे बड़ी बजह यही थी. डॉ भीमराव अंबेडकर ने भी इस धारा को लागू करने से मना कर दिया था. लेकिन कश्मीर के खराब हालात का हवाला देकर नेहरू जबरदस्ती इस धारा को लागू कर दिया. उस समय नेहरु ने भी यही कहा था कि - हालात सुधर जाने के बाद इस धारा को ख़त्म कर दिया जाएगा.
लेकिन संविधान लिखते समय यही धारा थोड़े से परिवर्तन के बाद संविधान में "आर्टिकिल -370" के रूप में रख दी गई. 26 जनवरी 1950 को जब संविधान पारित हुआ तब अनेकों राष्ट्रवादी नेताओं ने "आर्टिकिल 370" पर सवाल उठाया. उद्योग मंत्री "डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी" ने इस पर नेहरु से बात करनी चाही तो नेहरु ने साफ़ इनकार कर दिया.
इससे नाराज होकर 6 अप्रैल 1950 को "डा.श्यामा प्रसाद मुखर्जी" ने मंत्रिमंडल से त्यागपत्र दे दिया. उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सर-संघचालक गुरु गोलवलकर जी से परामर्श लेकर 21 अक्टूबर 1951 को "भारतीय जनसंघ" की स्थापना की. 1951-52 के आम चुनावों में राष्ट्रीय जनसंघ के 3 सांसद चुने गए जिनमे एक डॉ. मुखर्जी भी थे.
उसके बाद उन्होंने संसद के अन्दर 32 लोकसभा और 10 राज्यसभा सांसदों के सहयोग से "नेशनल डेमोक्रेटिक पार्टी" (गठबंधन) का गठन किया. डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी भारत की अखंडता और कश्मीर के विलय के दृढ़ समर्थक थे. उन्होंने अनुच्छेद 370 के प्रावधानों को भारत की अखंडता के लिए बहुत बड़ा ख़तरा बताया.
अनुच्छेद 370 के राष्ट्रघातक प्रावधानों को हटाने के लिए "जनसंघ" ने "हिन्दू महासभा" और "रामराज्य परिषद" के साथ मिलाकर सत्याग्रह आरंभ किया. डॉ मुखर्जी ने कश्मीर के परमिट सिस्टम का बिरोध करते हुए बिना परमिट कश्मीर जाने की घोषणा कर दी. 11 मई 1953 को उन्होंने परमिट सिस्टम का उलंघन करके कश्मीर में प्रवेश किया.
उनका नारा था . "नहीं चलेंगे एक देश में, दो निशान - दो विधान - दो प्रधान". कश्मीर में प्रवेश करते ही उनको शेख अब्दुल्ला सरकार द्वारा गिरफ्तार कर लिया गया. हिरासत में ही संदिग्ध परिस्थितियों में 23 जून 1953 को उनकी म्रत्यु हो गई. अधिकाँश लोग आजतक यही मानते हैं कि - उनकी म्रत्यु राजनैतिक हत्या थी.
तब से लेकर आजतक राष्ट्रवादी लोग इस विघटनकारी "धारा 370" को ख़त्म करने की मांग करते आ रहे हैं. परन्तु कांग्रेस ने चालाकी से यह झूठी बात फैला दी कि - जो लोग धारा 370 का बिरोध कर रहे हैं वे दरअसल मुस्लिम बिरोधी हैं. इसलिए भारत के मुसलमान भी धारा 370 का बिरोध करने वालों को अपना दुश्मन समझने लगे.
जबकि धारा 370 केवल कश्मीरी मूल के लोगों के लिए ही है. कश्मीर के बाहर के शेष भारत के मुसलमानों के लिए बैसी ही है जैसे कश्मीर के बाहर के हिन्दुओं के लिए. कांग्रेस द्वारा फैलाए गए भ्रम के कारण भारत के मुसलमान आज भी यही समझते हैं कि- शायद धारा 370 उनके फायेदे की चीज है जिसे भाजपा वाले ख़त्म करना चाहते हैं
इसी कारण देश की अन्य पार्टियां भी धारा 370 का बिरोध करने से घबराती है कि - कहीं इससे उनके मुसलमान वोटर नाराज न हो जायें. संविधान में बदलाब करने के लिए संसद में दो तिहाई बहुमत की आवश्यकता होती है अगर सभी देशवाशियों को इसकी सच्चाई समझ आ जाए तो 90% लोग भी इसे ख़त्म करने को तैयार हो जायेंगे.

Friday, 22 February 2019

देववन या देवबंद

"देवबंद" सहारनपुर जिले का 1 लाख आवादी वाला एक बड़ा क़स्बा है जो सहारनपुर-मुजफ्फरनगर मार्ग पर स्थित है. यह मुसलमानों का एक बहुत ही प्रभावी संस्थान "दारुल उलूम" है, जिसे इस्लामी शिक्षा का एक प्रमुख केंद्र माना जाता है. दारुल उलूम को एक पूरी मुस्लिम विचारधारा का जनक माना जाता है.
इस केंद्र की इस्लामी बिचारधरा को मानने वाले पूरी दुनिया में हैं. दुनिया भर में इस बिचारधारा को "देवबंदी बिचारधरा" कहा जाता है. "दारुल उलूम" को शुरूआत 30 मई 1866 को "हाजी आबिद हुसैन" व "मौलाना क़ासिम नानौतवी" ने की थी. कुछ ही समय बाद "दारुल उलूम" इस्लामिक शिक्षा के शीर्ष केंद्रों में शुमार हो गया.
"इस्लाम" की "हनफी विचारधारा" से प्रभावित "दारुल उलूम" की विचारधारा को परवान चढ़ाने में "मौलाना अशरफ अली थानवी" , "मौलाना अब्दुल रशीद गंगोही" और "मौलाना कासिम ननोतवी" की अहम भूमिका रही है. विशेष रूप से "मौलाना कासिम ननोतवी" ने इस्लामिक ‌‌शिक्षा के इस केंद्र को दुनियाभर में खास पहचान दी.
एक स्थान पर इतने सारे मुस्लिम छात्र मिलने के कारण यह स्थान हमेशा आतंकीयों" के निशाने पर भी रहा है. "जैश ए मोहम्मद" के आतंकियों का देवबंद में पकड़ा जाना इस बात का सबूत भी  है. देबबंद के स्थानीय लोगों तथा दारुल उलूम को खुद चाहिए कि-वे ऐसे प्रयास करें कि कोई आतंकी वहां पनाह न पा सके, वर्ना उनका संस्थान भी बदनाम हो जाएगा.
आइये अब जरा देवबंद का इतिहास भी जान लेते है. देवबंद एक महाभारत कालीन स्थान है. गंगा और यमुना के बीच का यह इलाका घने जंगलों वाला था. इस जंगल को "ऋषि-मुनि" लोग यज्ञ, शोध कार्य, तपस्या, शिक्षा केंद्र, आदि के लिए काफी उपयुक्त मानते थे. इन्ही कारणों से इसे "देववन" अर्थात देवताओं का वन (जंगल) कहा जाता था.
इस शहर में महाभारत कालीन कई स्‍थान हैं, जिनमें "रणखंडी गांव", "पांडु सरोवर" और "बाला सुंदरी शक्तिपीठ" प्रमुख है. पांडु सरोवर के बारे में मान्यता है कि- यहां पांडवों के बड़े भाई युधि‌ष्टिर और यक्ष के बीच प्रश्न उत्तर हुए थे. "त्रिपुर बाला सुंदरी" शक्ति पीठ को हिंदुओं के प्रसिद्ध धार्मिक स्‍थल के रूप में माना जाता है.
माँ दुर्गा के राजेश्वरी त्रिपुर बाला सुन्दरी के स्वरूप की यहाँ पूजा की जाती है. हर साल चैत्र माह की चतुर्दशी पर यहाँ विशाल मेला लगता है, जो पंद्रह दिन चलता है. देश भर से लाखों लोग इस अवसर पर माता के दर्शन के लिए आते हैं. कहा जाता है कि हर साल चैत्र मास की चतुर्दशी को यहाँ अचानक आंधी के रूप में माता मंदिर में प्रवेश करती हैं.
मंदिर के द्वार पर एक प्राचीन शिलालेख लगा है जिसे आज तक नहीं पढ़ा जा सका है. कुछ लोग देवबंद को "देववृन्द" भी कहते हैं. उनका मानना है कि - देवों का स्‍थल होने के कारण इसे "देववृन्द" कहा गया है. चाहे जो भी कहें लेकिन महाभारत काल के कई प्राचीन अवशेष आज भी यहां हैं जो इस जगह के देवस्थल होने का एहसास कराते हैं.

रानी कित्तूर चेनम्मा

दक्षिण भारत के कर्णाटक राज्य की "रानी कित्तूर चेनम्मा" के अंग्रेजों से संघर्ष की कथा उत्तर में कम लोग जानते है, लेकिन दक्षिण में उनको वही सम्मान है जैसा उत्तर में रानी लक्ष्मीबाई का है. कर्नाटक में बेलगाम के पास एक गांव ककती में 1778 को पैदा हुई चेनम्मा, बचपन से ही घुड़सवारी, तलवारवाजी, तीरंदाजी में विशेष रुचि रखने वाली थी.
रानी चेनम्मा की शादी बेलगाम में कित्तूर राजघराने में हुई थी. चेनम्मा के जीवन में प्रकृति ने कई बार क्रूर मजाक किया . पहले पति का निधन हो गया और कुछ साल बाद एकलौते पुत्र का भी निधन हो गया. रानी चेनम्मा ने पुत्र की मौत के बाद शिवलिंगप्पा को अपना उत्ताराधिकारी बनाया लेकिन अंग्रेजों ने रानी के इस कदम को स्वीकार नहीं किया.
अंग्रेजों ने शिवलिंगप्पा को पद से हटाने का का आदेश दिया लेकिन रानी चेनम्मा ने अंग्रेजों का आदेश स्वीकार करने से इनकार कर दिया. ईस्ट इण्डिया कम्पनी की विशाल व शक्तिशाली सशस्त्र सेना ने कित्तूर दुर्ग को घेर लिया था. रानी इससे भयभीत नहीं हुई बल्कि सेना और नागरिको को युद्ध के लिए तैयार किया.
अचानक कित्तूर दुर्ग का फाटक खुला और देखते ही देखते अन्दर से एक वीरागंना पुरुष वेश में शेरनी के समान गरजते हुए शत्रु दल पर टूट पड़ी . भयानक युद्ध हो रहा था, रानी रणचण्डी बन शत्रु के सैनिकों का संहार कर रही थीं, थैकरे मारा गया और अग्रेंजी सेना भाग खड़ी हुई. अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध में रानी चेनम्मा ने अपूर्व शौर्य का प्रदर्शन किया .
अग्रेजों ने पुन: दुर्ग पर डेरा डाला, कित्तूर की फौज ने दृढ़ता के साथ प्रतिरोध किया . रानी लंबे समय तक अंग्रेजी सेना का मुकाबला नहीं कर सकी. उन्हें कैद कर बेलहोंगल किले में रखा गया जहां उनकी ( 21-फरवरी -1829 ) मृत्यु हो गई. कहते हैं कि मृत्यु से पूर्व रानी चेनम्मा काशीवास करना चाहती थीं पर उनकी यह चाह पूरी न हो सकी थी.
यह संयोग ही था कि रानी चेनम्मा की मौत के छः वर्ष बाद काशी में ही लक्ष्मीबाई का जन्म हुआ. रानी लक्ष्मी बाई का जीवन भी काफी हद तक रानी चेनम्मा के जीवन से मिलता जुलता ही रहा है. इतिहास के पन्नों में अंग्रेजों से लोहा लेने वाली प्रथम वीरांगना कित्तूर की रानी चेनम्मा को ही माना जाता है.
पुणे बेंगलूर राष्ट्रीय राजमार्ग पर बेलगाम के पास कित्तूर का राजमहल तथा अन्य इमारतें गौरवशाली अतीत की याद दिलाने के लिए मौजूद हैं. उनके सम्मान में उनकी एक प्रतिमा संसद भवन परिसर में भी लगाई गई है . रानी चेनम्मा पहली महिलाओं में से थीं जिन्होंने अनावश्यक हस्तक्षेप और कर संग्रह प्रणाली को लेकर अंग्रेजों का विरोध किया था