Monday, 3 June 2024

कांग्रेसी प्रोपेगण्डे की पोल

जब सोशल मीडिया नहीं था और सरकारी मीडिया कांग्रेस सरकार के नियंत्रण में था, तब कांग्रेस ने सत्ता और धन की ताकत के बल पर बहुत सारे प्रोपेगण्डे चला लिए. हिंदू महासभा / हिन्दुस्तान सोशलिष्ट रिपब्लिक आर्मी / आजाद हिन्द फ़ौज / आरएसएस / बीजेपी जिस पर जो चाहा वो आरोप लगा लिया तथा अपनी कायरता को अहिंसा साबित कर लिया.

लेकिन अब सोशल मिडिया के जमाने में उनका हर प्रोपोगंडा फेल हो जाता है. सोशल मीडिया पर कांग्रेस के प्रोपोगंडों की पोल देश की जनता ही खोल देती है. भाजपा या संघ को कुछ कोई जबाब देने की जरूरत ही नहीं पड़ती. ऐसा ही एक प्रोपोगंडा कांग्रेस ने चलाया था कि - जब देश अंग्रेजों से लड़ रहा था तब आरएसएस वाले रानी को सलामी दे रहे थे
आरएसएस के एक कार्यक्रम की फोटो को उठाकर उसमे फोटोशॉप द्वारा इंग्लैण्ड की रानी को जोड़ दिया और यह जताने की कोशिश की कि - जिस समय अंग्रेजों से आजादी की लड़ाई चल रही थी उस समय इंग्लैण्ड की रानी एलिजावेथ भारत में आई थी और आरएसएस वालों ने इंग्लैण्ड की रानी एलिजावेथ को शाखा में बुलाकर सलामी दी थी.
उस फोटो को दिखाकर परिवार विशेष के गुलाम लोग, स्वयंवकों को बदनाम करने की कोशिश करते हैं. लेकिन जब इनसे पूंछा जाता है कि- क्या यह बता सकते हो कि इंग्लैण्ड की कौन सी रानी किस सन में भारत में आई थी और किस शहर की किस शाखा में गई थी ? तब ये लोग जबाब देने के बजाये इधर उधर भागने लगते है.
सबसे पहले तो यह जान ले कि- इंग्लैण्ड की रानी एलिजाबेथ द्वितीय की ताजपोशी 6 फरवरी,1952 को हुई थी और तब तक भारत को ब्रिटिश शासन से आजाद हुए लगभग साढ़े चार साल हो चुके थे. एलिजाबेथ द्वितीय पहली बार 1961 में भारत आई थीं और उस समय उसका स्वागत कांग्रेस ने किया था और वे उन्हें किसी शाखा में लेकर नहीं गए थे.
दरअसल जिस फोटो से एलिजावेथ द्वितीय की फोटो को उठाकर आरएसएस की फोटो में जोड़ा गया है, वह 1956 में नाइजीरिया की फोटो है. फोटो में सलामी देते लोग संघ स्वयंवक नहीं बल्कि नाइजीरियाई सैनिक हैं. एलिजाबेथ द्वितीय 1956 में काडुना एयरपोर्ट पहुंची थीं तो नाइजीरियाई सैनिकों ने उन्हें सलामी दी थी.

Saturday, 1 June 2024

विवेकानन्द रॉक

प्रधानमंत्री मोदी के कन्याकुमारी में “विवेकानन्द रॉक” पर ध्यान करने पर विवाद शुरू हो गया है. आज लोग इस कारण विवेकानन्द रॉक के बारे में जानना चाह रहे है और गूगल पर सर्च कर रहे हैं. दरअसल “विवेकानन्द रॉक” कन्याकुमारी के निकट समुद्र के भीतर तीन सागरों के संगम पर एक द्वीप के रूप में स्तिथ है. यहाँ स्वामी विवेकानन्द जी 24 दिसम्बर 1892 को पहुंचे थे.

इस चट्टान पर स्वामी विवेकानन्द ने तीन दिनों तक ध्यानस्थ होकर साधना की थी और यही पर उनका सत्य से साक्षात्कार हुआ था. स्वामी विवेकानंद जी की जन्म शताब्दी के उपलक्ष्य में केरल के प्रसिद्ध समाजसेवी व नायर समुदाय के नेता श्री मन्नथ पद्मनाभन के नेतृत्व में कन्याकुमारी स्थित "विवेकानन्द रॉक मेमोरियल समिति' की स्थापना की गई.
वे उस चट्टान पर भव्य स्मारक और चट्टान तक पहुँचने के लिए एक पैदल पुल बनाना चाहते थे. लेकिन 1962 नेहरु का दौर था और स्थानीय आबादी में एक बड़ी संख्या कैथोलिक ईसाई मछुआरों की थी. ईसाई मछुआरों को जब इस बात का पता चला तो वे पहले ही उस पर कब्ज़ा करने की कोशिश करने लगे. इन कैथोलिक समूहों ने चट्टान को सैंट ज़ेवियर रॉक बुलाना शुरू कर दिया.
ईसाई मछुआरों ने वहां एक बड़ा सा क्रॉस बनाकर उस चट्टान पर लगा दिया. इसका हिन्दुओं ने विरोध किया. हिन्दुओं का दावा था कि ये विवेकानन्द रॉक है इसलिए वहाँ क्रॉस लगा देना अवैद्ध घुसपैठ है. हिन्दुओं के विरोध को देखते हुए न्यायिक जांच के आदेश दिए. श्री पद्मनाभन जी जानते थे जांच और समिति के नाम पर केवल मामले को लटकाया जा रहा है.
उनको पता था कि सरकार की उदासीनता के बावजूद दादरा, नगर हवेली, गोवा, दमन और द्वीव को आजाद कराने के लिए राष्ट्र्रीय स्वयंसेवक संघ आगे आया था. उसे देखते हुए श्री पद्मनाभन ने इस स्मारक के काम के लिए संघ के सहयोग की मांग की. पू. गुरुजी रामकृष्ण मिशन के दीक्षाप्राप्त संन्यासी थे. गुरुजी ने इस कार्य के लिए एकनाथ रानाडे की जिम्मेदारी लगाईं.
गुरूजी के आदेश पर एकनाथ रानाडे जी कन्याकुमारी पहुंचे और वहां पर लोगों से मिले. उन्होंने स्थानीय लोगों से मिलकर विवेकानंद मेमोरियल को लेकर कई बैठकें कीं. तभी एक रात अचानक वह क्रॉस गायब हो गया और स्थिति विस्फोटक हो गई. तब कांग्रेसी मुख्यमंत्री एम. भक्तवत्सलम ने विवेकानन्द रॉक को प्रतिबंधित क्षेत्र घोषित करके वहाँ हथियारबंद सिपाहियों का पहरा लगा दिया.
मामला केंद्र की सरकार पर छोड़कर राज्य सरकार निश्चिन्त हो गयी. केंद्र में उस समय संस्कृति मंत्री थे हुमांयू कबीर. उन्होंने मामले को यह कहकर ठन्डे बास्ते में डाल दिया कि चट्टान पर निर्माण से तो चट्टान की शोभा चली जाएगी. इस बीच कन्याकुमारी के स्थानीय लोगों ने संघ के नेता एकनाथ रानाडे जी को विवेकानन्द मेमोरियल रॉक मिशन का प्रमुख बना दिया.
हुमांयू कबीर का चुनावी क्षेत्र कोलकाता था. एकनाथ जी ने कूटनीति से काम लेते हुए हुमांयू कबीर के क्षेत्र में यह खबर फैला दी कि हुमांयू कबीर बंगाल के सबसे विख्यात पुत्र स्वामी विवेकानन्द का स्मारक नहीं बनने दे रहे. ऐसा करने से पूरे बंगाल में हुमांयू कबीर का विरोध होने लगा, जिसके सामने हुमायूं कबीर को झुकना पड़ा. लेकिन वे केवल एक स्टोन स्लैब लगाने को राजी हुए.
इस तरह 17 जनवरी 1963 तक वहाँ केवल एक स्टोन स्लैब लग गया. एकनाथ रानाडे लाल बहादुर शास्त्री जी के संपर्क में थे और दोनों नेताओं ने समझ लिया था कि नेहरु के आदेश के बिना काम नहीं होगा. तीन दिन तक एकनाथ रानाडे दिल्ली में ही रुके और विवेकानंद मेमोरियल रॉक पर स्मारक के समर्थन में उन्होंने सांसदों के हस्ताक्षर इकठ्ठा करने शुरू किये.
तीन दिन के अन्दर उन्होंने 323 सांसदों का समर्थन जुटा लिया. तब कहीं जाकर कांग्रेसी सरकार थोड़ी ढीली पड़ी. कांग्रेसी मुख्यमंत्री एम. भक्तवत्सलम ने इसके बाद भी केवल पंद्रह फीट बाय पंद्रह फीट का स्मारक बनाने की आज्ञा दी. तब एकनाथ जी कांची कामकोटी पीठ के 68वें शंकराचार्य जगद्गुरु श्री चंद्रशेखर सरस्वती महास्वमिंगल के पास जा पहुंचे.
कांची पीठ के शंकराचार्य महापेरियावर ने 130 फीट डेढ़ इंच बाय छप्पन फीट का नक्शा सुझाया और उस पर रानाडे, भक्तवत्सलम को मनाने में कामयाब रहे. अब सवाल यह था कि स्मारक बनाने के लिए पैसे कहाँ से आयेंगे ? नेहरू सरकार ने 1962 के युद्ध का हवाला देकर, स्मारक के लिए, कोई भी आर्थिक मदद देने इंकार कर दिया परन्तु एकनाथ जी ने हार नहीं मानी.
एकनाथ रानाडे ने विश्व भर के हिन्दुओं को एक-एक रुपये की राशि समर्पण करने का आव्हान किया. जैसे अभी राम जन्मभूमि मंदिर हिन्दुओं के समर्पण से बना है उस समय ठीक वैसे ही विवेकानन्द रॉक पर स्मारक बनाया गया. स्वामी विवेकानन्द की 108वीं जयंती (हिन्दू पंचांग के हिसाब से) 7 जनवरी 1972 को यहाँ भगवा ध्वज यहाँ फहराकर इसे राष्ट्र को समर्पित किया गया.

Tuesday, 28 May 2024

सुगम दर्शन के शुल्क से सबसे ज्यादा दुखी वो हैं जो कभी मंदिर जाते भी नहीं है

हमारे पूर्वजों ने भव्य मंदिर, तीर्थ, मेले, आदि की व्यवस्था इसलिए बनाई है जिससे लोग भव्य मंदिरो के दर्शन करने के वहाने से अपने घर से बाहर निकलें और पूरे देश को देखें, वरना पूजा तो आप अपने घर में भी कर सकते है. आपके घर के मंदिर में और भव्य मंदिरों में भगवान् एक ही है. इसलिए हमें अपने देश और देशवाशियों को समझने के लिए तीर्थयात्रा पर अवश्य जाना चाहिए.

तीर्थयात्रा दो प्रकार की होती है. पहली तीर्थयात्रा यात्रा वह है जिसमे श्रद्धालु तीर्थयात्रा के उद्देश्य से ही निकलते है और किसी भी प्रकार की परेशानी की परवाह किये बिना मंदिरो और तीर्थीं में दर्शन करने जाते हैं. जबकि दूसरी प्रकार की तीर्थयात्री वह होती है जब कोई व्यक्ति किसी अन्य उद्देश्य से किसी अन्य शहर जाता है और समय मिलने पर वहां के मंदिरों में दर्शन कर लेता है.
तीर्थयात्रा के उद्देश्य से निकले तीर्थयात्री छोटीमोटी परेशानी अथवा समय लगने की परवाह नहीं करते है लेकिन दुसरी प्रकार के तीर्थयात्री जो किसी अन्य काम से उस शहर में आये होते हैं और अपने वास्तविक काम से थोड़ा समय निकालकर उस शहर में मंदिरों के दर्शन करना चाहते है, उनको समय की बहुत चिंता होती है और कम समय में ज्यादा से ज्यादा मंदिरों में जाना चाहते है.
ज्यादा भीड़ और लम्बी लाइन देखकर वे या तो बिना मंदिर में दर्शन किये वापस आ जाते है या फिर कोई जुगाड़ ढूंढते है. किसी पुलिस वाले / मिलिट्री वाले / पुजारी / दलाल आदि को पैसे देकर शॉर्टकट से मंदिर में दर्शन करते हैं. उस श्रद्धालु के पसे देने से मंदिर को कोई लाभ नहीं होता था, इसलिए ऐसे श्रद्धालुओं के लिए ज्यादातर मंदिरों में सुगम दर्शन की सुविधा उपलब्ध कराई है.
अलग अलग शहर के अलग अलग बड़े मंदिरो में अलग अलग शुल्क है जो 50 से लेकर 300 रुपय तक है. इसके अलावा कुछ विशेष मंदिरों में कुछ विशेष पूजा / हवन / अनुष्ठान आदि भी कराये जाते हैं जिनका शुल्क कुछ सौ रुपय से लेकर कई लाख तक भी हो सकता है. जिनको वे अनुष्ठान कराने होते हैं, वे बुकिंग कराने के बाद निर्धारित समय पर वह अनुष्ठान करते है.
दलाल को दिया पैसा दलाल की जेब में जाता है जबकि इस प्रकार का निश्चित शुल्क सीधे मंदिर प्रशासन के पास आता है, जो मंदिर को चलाने और अन्य कार्यक्रमों में काम आता है. इस लिए श्रद्धालुओं को पेड तीर्थयात्रियों से नाराज नहीं होना चाहिए. यदि मंदिर प्रबंधन ऐसे तीर्थयात्रियों से कोई शुल्क लेकर उनको सुगम दर्शन की सुविधा प्रदान करता है तो क्या यह गलत होगा ?
वह किसी को रिश्वत देकर मंदिर जाए या बिना दर्शन किया वापस चला जाए, क्या उससे अच्छा यह नहीं है कि वह शुल्क देकर पूजा करले और वह शुल्क भी मंदिर के काम आये ? मैं अगर अपनी बात करूँ तो काम के सिलसिले भारत / नेपाल के विभिन्न हिस्सों में जाने का अवसर मिला है. सैकड़ों मंदिरों में जाकर भगवान् के दर्शन करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है.
किसी भी जगह जाने पर वहां के प्रशिद्ध मंदिर में जाने की इच्छा रहती है परन्तु सीमित समय होता है. अधिक भीड़ होने की स्तिथि में कई बार तो दर्शन करने और पूजा आदि में में शामिल होने का जुगाड़ हो जाता है और कई बार मंदिर जाने का इरादा छोड़ना पड़ता है. तब मैं हमेशा यही सोंचता हूँ कि ऐसे तीर्थयात्रियों को शुल्क लगाकर दर्शन कराने की व्यवस्था कराई जानी चाहिए.
हालांकि मेरा खुद यह मानना है कि भक्तों को अधिक समय तक कतार में खड़े रहने और जयकारे लगाने में ज्यादा पुण्य मिलता है और साथ ही मन ज्यादा देर तक भगवान् में लीन रहता है. लेकिन दूर से आने वाले भक्त जिनके पास समय कम होता है और कम समय में अधिक मंदिरो में जाना चाहते हैं. उनको ऐसी सुविधा मिलने पर किसी को ऐतराज नहीं करना चाहिए.
अगर मंदिर प्रशासन ऐसी कोई व्यवस्था करते हैं तो अच्छी बात है वरना जुगाड़ तो चलता ही रहेगा. जुगाड़ लगाने में खर्च किये गए पैसे पुलिसवालों के या दलालों की जेब में जाते है जबकि शुल्क लगाने से वह पैसे मंदिर को मिलते हैं. वैसे मैंने देखा है कि मंदिरों की किसी भी व्यवस्था के खिलाफ प्रलाप करने वाले लोग ज्यादातर ऐसे लोग होते है जो कभी खुद मंदिर नहीं जाते.

Tuesday, 5 March 2024

खुबसूरत नार्थईस्ट

भारत का "नार्थ ईस्ट" जिसे सेवन सिस्टर्स भी कहा जाता है. इसमे सात छोटे छोटे राज्य हैं- असम, मणिपुर, मिजोरम, त्रिपुरा, मेघालय, अरुणाचल प्रदेश और नगालैंड . सिक्किम के भारत में पूर्ण विलय के बाद सिक्किम भी इसी समूह का आठवा राज्य बन चुका है.

"नार्थईस्ट" शेष भारत के लिए तथा नार्थईस्ट के लिए शेष भारत हमेशा एक रहस्य सा रहा है और दोनों के बीच हमेशा एक अद्रश्य दीवार बनी रही. दोनों तरफ के लोगों में एक दुसरे के प्रति ऐसी भ्रांतियां बनी रहीं जिसके कारण दोनों एक दुसरे को शंका से देखते आये हैं.
सौभाग्य से मुझे नार्थईस्ट जाने का अवसर मिला है. मुझे वहां रहने वहां के लोगों से मिलने उनके साथ खाने पीने का मौक़ा मिला है. जब 1993 में मुझे कम्पनी की तरफ से पहली बार तिनसुकिया (ईस्ट आसाम) जाने को कहा गया था तो मैंने पहले मना कर दिया था.
लेकिन दबाब पड़ने पर मुझे जाना पड़ा. बहा जाने पर पता चला कि - यहाँ के लोगों में हम में तो कोई फर्क ही नहीं है. वहां के लोग हम लोगों को शुरू में भले ही ज्यादा लिफ्ट न दें, लेकिन एक बार आप पर विशवास हो जाए तो आपके लिए कुछ भी करने को तैयार रहते हैं.
नार्थईस्ट के शेष भारत से न घुलमिल पाने की सबसे बड़ी बजह ईसाई मिशनरियों द्वारा पैदा की गई गलतफहमियां थी. ईसाई मिशनरियों ने नार्थईस्ट के लोगों के बीच अपने ईसाई धर्म के प्रचार के साथ उनके मन में शेष भारत के प्रति नफरत भरने का भी काम किया था.
आजादी के बाद भी हमारी सरकारों ने इसाई मिशनरियों द्वारा किये जाने वाले कुप्रचार पर कोई रोक नहीं लगाई. कांग्रेस तो बैसे भी हमेशा जाती / धर्म / क्षेत्र के ब्लोक बनाकर उनको एक दुसरे से डराकर राजनीति करती थी. इसी के कारण वहां अलगाववाद फैला.
जहाँ तक मेरा अनुभव है. मुझे लगता है नार्थईस्ट के लोग बहुत ही साफ़ दिल के होते हैं. वो न तो किसी से छल कपट करते हैं और न ही धोखे को बर्दाश्त करते है. कांग्रेस द्वारा वहां के लोगों से किये झूठे वादे और धोखे ने भी उनके मन में नफरत भरने का काम किया.
इसाई मिशनरियों का प्रपंच और कांग्रेस / क्षेत्रीय दलों की उठापटक ही कम नहीं थी कि - एक नही मुसीबत के रूप में बंगलादेशी मुसलमान वहां पहुँचने लगे. जब तक इनकी संख्या कम थी ये छोटे छोटे काम करते रहे, लेकिन संख्या बढ़ जाने पर यह अपराध करने लगे.
इन सभी कारणों से नार्थईस्ट में अलगाववाद और आतंकवाद फैलने लगा जिससे नार्थईस्ट और शेष भारत में और ज्यादा दूरी बढ़ गई. ऐसे समय समय में कुछ राष्ट्रवादी संगठनों ने उनके बीच जाकर काम करना तथा उनकी समस्याओं को समझना शुरू किया.
उनके बीच रहकर उनको शेष भारत से उनके जुडाब को समझाया. मणिपुर का अर्जुन से रिश्ता समझाया, माँ कामाख्या, शिवसागर और परशुराम कुण्ड जैसे पौराणिक तीर्थ स्थलों पर उनको भी जाने को प्रेरित किया, त्रिपुरा के उनाकोटि शिव मंदिरों की जानकारी दी.
इसका सुखद परिणाम बहुत जल्द सामने आया. नार्थईस्ट के लोग भी अपनी प्राचीन सनातन पद्धतियों से जुड़ने लगे और शेष भारत के लोग भी नार्थईस्ट जाने लगे. पर्यटन बढ़ने से उनकी आमदनी बढ़ने के साथ साथ नार्थईस्ट और शेष भारत में मेल बढ़ने लगा.
आज नार्थईस्ट की राजनीति में भी छल प्रपंच करने वाली पार्टियों का प्रभाव कम हो रहा है तथा राष्ट्रवादी पार्टियों का प्रभाव बढ़ रहा है. इसके साथ साथ सरकार को नार्थईस्ट में बंगलादेशी घुसपैठियों तथा इसाई मिशनरियों से कड़ाई से निपटना चाहिए.
हम उम्मीद करते है कि - वर्तमान सरकार नार्थईस्ट में धार्मिक पर्यटन को बढ़ाबा देने के लिए आवश्यक कदम उठाएंगी. इसके अलावा वहा के जंगल, पहाड़, नदी, नदीद्वीप, बागान, आदि में रिसार्ट्स बनाने के लिए निवेशकों को प्रोत्साहित करना चाहिए.
महाभारत काल से जुडी अनेकों गाथाये पूर्वोत्तर से जुडी हुई हैं. भगवान परशुराम ने कर्ण को अरुणाचल के क्षेत्र में शिक्षित किया था, अर्जुन की एक पत्नी चित्रांगदा मणिपुर की थी. असम में मकर संक्रांति की सुबह पवित्र अग्नि मेजी जलाने के बाद विहू पर्व प्रारम्भ करते हैं.
मेजी की अग्नि को भीष्म पितामह की चिता माना जाता है. जिन्होंने महाभारत का युद्ध समाप्त होने के बाद, हस्तिनापुर को युधिष्ठिर के हाथों में सुरक्षित मानकर, सूर्य भगवान् के उत्तरायण में आने पर, मकर संक्रांति की सुबह अपनी इच्छा से अपना शरीर त्याग दिया था.

Friday, 9 February 2024

मलेरकोटला का बड़ा घल्लूघारा

अब्दाली ने अपने 1757 वाले चौथे हमले में पंजाब, हरियाणा, दिल्ली और पश्चमी उत्तर प्रदेश में भयानक तवाही मचाई थी. जब मराठों को इस घटना का पता चला तो उन्होंने 1758 उत्तर भारत की मुस्लिम रियासतों और अब्दाली के पिट्ठुओं पर हमला कर, अब्दाली के जुल्म का बदला लिया. इस काम में उत्तर भारत के अनेकों राजाओं ने भी उनका साथ दिया.

जब अहमद शाह अब्दाली अपने पांचवें हमले के लिए 1760 में निकला उस समय भी मराठा उसका सामना करने निकल पड़े. मराठों को उम्मीद थी कि उत्तर भारत के हिन्दू और सिक्ख उनका साथ देंगे. लेकिन उन्हें हिन्दुओं / सिक्खों का साथ नहीं मिला और दुसरी तरफ भारत की ज्यादातर मुस्लिम रियासते अब्दाली के साथ खड़ी हो गई.
14 जनवरी 1761 की पानीपत के मैदान में मराठे भूखे पेट अब्दाली की सेना से लड़े परन्तु उनकी हार हुई. उत्तर भारत के राजाओं ने भले ही पानीपत के मैदान मराठो का साथ नहीं दिया और अब्दाली से युद्ध नहीं किया लेकिन अब्दाली ने सबसे ज्यादा तवाही उत्तर भारत में ही मचाई. अब्दाली के वापस जाने के बाद उत्तर भारत के मुस्लिम नबाब अपनी गैर मुस्लिम प्रजा पर और ज्यादा अत्याचार करने लगे थे.
अब पंजाब के सिक्ख सरदारों को भी समझ आ गया था कि- उस समय अब्दाली का सामना न करके बड़ी गलती की थी. नई रणनीति बनाने के उद्देश्य से सिक्ख मिसलों ने 27 अक्तूबर 1761 की दीवाली के शुभ अवसर पर श्री अमृतसर पहुंचने का आव्हान किया. सभी मिसलों के सरदार अपने साथियों सहित धार्मिक सम्मेलन के लिए वहां पहुंचे.
‘सरबत खालसा’ ने विचार किया कि- देश में अभी तक अब्दाली के एजेंट मौजूद हैं. जँडियाला, कसूर, पेसेगी, मलेरकोटला, सरहिन्द, आदि के नाम प्रमुख है. इनमे भी कसूर और मालेरकोटला के अफगान तो अहमदशाह अब्दाली की नस्ल के ही हैं. अतः पँजाब में सिक्खों के राज्य की स्थापना के लिए इन सभी विरोधी ताकतों पर काबू करना होगा.
इन सभी तथ्यों को ध्यान में रखकर ‘गुरमता’ पारित किया गया कि- सभी सिक्ख योद्धा अपने परिवारों को पँजाब के मालबा क्षेत्र में पहुँचाकर उनकी ओर से निश्चिंत हो जाएँ और उसके बाद विरोधियों से सँघर्ष करने के लिए तैयार हो जाए. गुरमते के दूसरे प्रस्ताव में पँथ से गद्दारी करने वाले शत्रुओं से भी कड़ाई बरतने का निर्णय लिया गया.
जँडियाला का महंत आकिल दास हमेशा सिक्ख स्वरूप में ही रहता था परन्तु वह हमेशा सिक्ख विरोधी कार्यों में लगा रहता था. साथ ही वह पंथ और देश के शत्रुओं से मिलीभगत करके, कई बार पँथ को हानि पहुँचा चुका था. अतः सर्व सम्मति से निर्णय हुआ कि- सर्वप्रथम सरदार जस्सा सिंह आहलूवालिया जी, महंत आकिल दास से ही निपटेगें.
सरदार जस्सा सिंह आहलूवालिया ने जँडियाला नगर को घेर लिया, परन्तु शत्रु पक्ष ने तुरन्त सहायता के लिए अहमदशाह अब्दाली को पत्र भेजा. पत्र प्राप्त होते ही अब्दाली जंडियाला आने के लिए निकल पड़ा. वह सीधे जँडियाले पहुँचा परन्तु समय रहते सरदार जस्सा सिंह जी को अब्दाली के आने की सूचना मिल गई और उन्होंने घेरा उठा लिया.
उन्होंने अपने परिवार और सैनिकों को सतलुज नदी पार किसी सुरक्षित स्थान पर पहुँचने का आदेश दिया ताकि निश्चिंत होकर अब्दाली से टक्कर ली जा सके. जब अहमदशह जँडियाला पहुँचा तो सिक्खों को वहाँ न देखकर बड़ा निराश हुआ. दूसरी ओर मलेरकोटला के नवाब भीखन खान को पता चल गया कि सिक्ख सतलुज पार करके उसकी तरफ आ रहे है.
भीखन खान ने सरहिन्द का सूबेदार जैन खान से मदद मांगी और साथ ही अब्दाली को भी यह सूचना भेज दी कि- सिक्ख इस समय उसके इलाके में इकट्ठे हो चुके हैं. अब्दाली ने 3 फरवरी 1762 की सुबह जंडियाला से मलेरकोटला को कूच कर दिया और बिना किसी स्थान पर पड़ाव डाले, सतलुज नदी को पार कर मलेरकोटला की तरफ चल दिया.
अब्दाली ने 4 फरवरी को सरहिन्द के फौजदार जैन खान को सँदेश भेजा कि वह 5 फरवरी को सिक्खों पर सामने से हमला कर दे. यह आदेश मिलते ही सरहिंद के जैन खान, मलेरकोटले का भीखन खान, मुर्तजा खान वड़ैच, कासिम खान मढल तथा अन्य अधिकारियों ने मिलकर अगले दिन सिक्खों की हत्या करने की तैयारी कर ली.
अहमदशाह 5 फरवरी, 1762 की सुबह मलेरकोटला के निकट "कुप्प" ग्राम में पहुँच गया. वहाँ लगभग 40,000 सिक्ख शिविर डाले बैठे थे. वे लोग अपने परिवारों सहित लक्खी जँगल की ओर बढ़ने के लिए विश्राम कर रहे थे. फौजदार जैन खान ने सुयोजनित ढँग से सिक्खों पर सामने से धावा बोल दिया और अहमद शाह अब्दाली ने पिछली तरफ से.
अब्दाली का अपनी सेना को यह भी आदेश था कि जो भी व्यक्ति भारतीय वेशभूषा में दिखाई पड़े, उसे तुरन्त मौत के घाट उतार दिया जाए. इसलिए जो मुसलमान भारतीय भेष भूषा में हैं, वो अपनी पगड़ियों में पेड़ों की हरी पत्तियाँ लटका लें, जिससे कि उनकी पहेचान हो सके. सिक्खों के लिए समस्या हो गई कि वे युद्ध करे या औरतों / बच्चों को बचाए.
फिर भी उनके सरदारों ने धैर्य नहीं खोया. सरदार जस्सा सिंह आहलूवालिया, सरदार शाम सिंह सिंधिया तथा सरदार चढ़त सिंह, आदि जत्थेदारों ने तुरन्त बैठक करके लड़ने का निश्चय कर लिया. सिक्खों के लिए सबसे बड़ी कठिनाई यह थी कि- उनका सारा सामान, हथियार, गोला बारूढ और खाद्य सामग्री वहाँ से चार मील की दूरी पर करमा गाँव में था.
सिक्ख सेनापतियों ने अपने घुड़सवारों को पटियाला और बरनाला की तरफ़ दौड़ाया कि - किसी तरह से वहां से मदद प्राप्त करने का प्रयास करें लेकिन उनको वहां से कोई मदद नहीं मिल सकी. तब उन्होंने निर्णय लिया कि- सबसे पहले सामग्री वाले दस्तों से सम्बन्ध जोड़ा जाए और बच्चों तथा औरतों को किसी तरह से बरनाला पहुँचाया जाए.
उन्होंने सिक्ख योद्धाओं का घेरा बनाकर औरतों और बच्चों को सुरक्षा देते हुए बरनाला की ओर बढ़ना शुरू कर दिया. इस प्रकार वे शत्रुओं से लोहा लेते हुए औरतों / बच्चों को बचाते हुए आगे बढ़ने लगे. मलेरकोटला और सरहिंद की सेना उन पर जगह जगह हमले हर रही थी मगर वे योद्धा किसी तरह से उनसे लड़ते हुए औरतो, बच्चों और बूढ़ो की रक्षा कर रहे थे.
जहाँ कहीं भी सिक्खों की स्थिति कमजोर दिखाई देती, सरदार जस्सा सिंह उनकी सहायता के लिए अपना विशेष दस्ता लेकर तुरन्त पहुँच जाते. इस प्रकार सरदार चढ़त सिंह और सरदार शाम सिंह नारायण सिंघिया ने भी अपनी वीरता के चमत्कार दिखाए. अहमदशाह अब्दाली का लक्ष्य युद्ध लड़ना नहीं था बल्कि सिक्खों के परिवारों को समाप्त करने का था.
अब्दाली ने सैयद वली खान को विशेष सैनिक टुकड़ी दी और उसे आदेश दिया कि सिक्ख सैनिकों के घेरे को तोड़कर उनके परिवारों को कुचल दिया जाए. लेकिन सैय्यद वली खान इस कार्य में सफल नहीं हो सका और बहुत से सैनिक मरवाकर लौट आया. तब अब्दाली ने जहान खान को आठ हजार सैनिक देकर सिक्खों की दीवार तोड़कर परिवारों पर धावा बोलने को कहा.
मुट्ठीभर सिक्ख योधा जहान खान की सेना से लड़ते हुए अपने परिवारों को बचाने का पूरा प्रयास कर रहे थे. अब्दाली ने जैन खान को सँदेश भेजा कि किसी भी हाल में अन्य सिक्ख योद्धाओं को रोके और उन्हें औरतों / बच्चों की रक्षा करने वाले जत्थे की मदद न करने दे. जैन खान ने अपना पूरा बल लगा दिया कि किसी न किसी स्थान पर सिक्खों को रूकने पर विवश कर दिया जाए.
वो सिक्ख योद्धा सर-धड की बाजी लगाकर लड़े परन्तु अब्दाली, मलेरकोटला और सरहिंद की संयुक्त सेना से आखिर कब तक लड़ते. आखिर अहमदशाह अब्दाली, सिक्ख योद्धाओं की उस दीवार को तोड़ने में सफल हो गया और उसके बाद संयुक्त सेना ने भीषण कत्लेआम मचा दिया. औरतों, बूढ़ों और बच्चों को भी नहीं बक्शा. जो भी दिखा उसे क़त्ल कर दिया.
कुछ लोगो वहां से भागकर आसपास के कुतबा और बाहमणी गाँवों में शरण लेनी चाही तो वहां के मुस्लिम (रंघड़ मुसलमान) शरण देने के बजाये उन पर हमला करने लगे. इस युद्ध में लगभग 35 हजार सिक्ख वीरगति को प्राप्त हुए थे. इसलिए इस घटना को सिक्ख इतिहास का दूसरा और बड़ा घल्लूघारा (महाविनाश) के नाम से याद किया जाता है.

Saturday, 30 December 2023

समाज की व्यवस्था

समाज की व्यवस्था को आसान शब्दों में समझाने के लिए बताया जाना तुम्हे समझ नहीं आता है क्योंकि तुम समझना ही नहीं चाहते हो. ऐसा नहीं है कि तुम्हे समझ नहीं आता है. तुम्हे सब समझ आता है लेकिन समाज को आपस में लड़ाकर राजनीति करना तुम्हारा पेशा है.

सृष्टि को मानव का रूप देकर समझाया गया है कि जिस तरह मानव शरीर में गर्दन का ऊपरी भाग समस्त बौद्धिक कार्य (सोंचने, समझने, देखने, सुनने और बोलने) का काम करता है, उसी तरह समाज में ब्राह्मण बौद्धिक कार्य (अध्यन, अध्यापन, लेखन, जन जागरण, आदि) करता है.
मानव शरीर में सारा पराक्रम भुजाओं द्वारा किया जाता है. पराक्रम से राष्ट्र और समाज की रक्षा की जा सकती है. समाज की व्यवस्था चलाने और समाज की रक्षा का दायित्व क्षत्रियो ने ले रखा है. इसलिए मानव देह रूपी सृष्टि में क्षत्रीय का स्थान भुजाओ में माना गया है.
पेट में भोजन जाता है और पेट में जाने वाले भोजन से ही सारे शरीर को ऊर्जा मिलती है. पेट सारे शरीर को ऊर्जा की सप्लाई न करे तो न दिमाग काम करेगा न ही हाथ / पैर. इसलिए उत्पादन और वितरण करने वाले व्यापारी को मानव देह रूपी सृष्टि में पेट का स्थान वैश्य को दिया गया है.
पूरा समाज जिसकी मेहनत पर खड़ा होता है उसे मानव रूपी सृष्टि में पैर का स्थान दिया गया है. क्या कोई यह कह सकता है कि मानव शरीर में पैर का महत्त्व कम है ? समाज के मेहनतकश वर्ग को शूद्र नाम दिया गया है और उसे मानव शरीर रुपया सृष्टि को चलाने वाला पैर कहा गया है.
बाकी कोई न किसी के मुँह से पैदा हुआ है और न पेट से , न भुजाओं से पैदा हुआ है और न पैर से. यह तो केवल समाज की व्यवस्था को समझने के लिये समाज के मानवीय स्वरूप की कल्पना मात्र है और उसमे लोगो के कार्य के अनुसार स्थान देकर उनका महत्त्व समझाया गया है

Wednesday, 6 September 2023

मुरलीधर श्रीकृष्ण के वजाय चक्रधर श्रीकृष्ण का आव्हान कीजिये

भगवान् श्रीकृष्ण को भगवान् विष्णु का अवतार माना जाता है. उन्होंने अपने जन्म के साथ ही चमत्कार दिखाने शुरू कर दिए थे. उनके जन्म के समय जेल के द्वार खुल गए और पहरेदार सो गए. वासुदेव बरसाती रात में उन्हें नन्द+यशोदा के यहाँ छोड़ आये.

उन्होंने अपनी मात्र 7 दिन की आयु से लेकर 11 साल की आयु तक अनेको राक्षसों को मारा. इसी अवधि में उन्होंने अनेकों अलौकिक लीलाएं दिखाई. पूतना, शकटासुर, तृणावर्त, वत्सासुर, वकासुर,अघासुर, अरिष्टासुर, धेनुकासुर, केसी, आदि राक्षसों को मारा


नल कूबर का उद्धार किया, गोबरर्धन पर्वत को उठाया, कालिया मर्दन किया, कुबड़ी कुब्जा का उद्धार किया, कंस का वध किया, इत्यादि. ये सब काम उन्होंने 11 साल के होने से पहले कर लिए और 12 वे बर्ष में सांदीपनि ऋषि के गुरुकुल उज्जैन चले गए.
गुरुकुल से आने के बाद वे जरासंध और महाभारत में व्यस्त रहे. उनका जीवन बचपन से ही संघर्ष भरा था. उनका सारा जीवन योद्धा और सक्षम कूटनीतिज्ञ के रूप में रहा. कुछ दुष्टों का उन्होंने खुद अंत किया और कुछ को उन्होंने कूटनीति से मरवाया.
शिशुपाल, एकलव्य, पौंड्रक, आदि को खुद मारा, जरासंध को भीम से मरवाया, नरकासुर को सत्यभामा द्वारा मरवाया, बर्बरीक को उसकी बातों में उलझाकर खुद उसके ही हाथों उसका गाला कटवा दिया, महाभारत में कृष्ण जी की भूमिका युग परिवर्तक की थी.

लेकिन मुगल काल के कवियों ने उन्हें एक प्रेमी और लड़कियां छेड़ने वाला बना दिया. समझ नहीं आता है कि अधर्मियों के संहारक श्रीकृष्ण को मुग़लकाल में रासलीला करने वाला साबित करने का प्रयास क्यों किया गया. उस काल के कवियों ने ऐसा क्यों किया ?
क्या उन्होने गोपियों के साथ रासलीला 8 से 10 साल की आयु में की थी ? श्रीकृष्ण कथा में यह प्रसंग किसने डाला होगा कि वे नहाने गई स्त्रियों के कपडे लेकर पेंड पर चढ़ गए ? जिस घाट पर स्त्रियां नहाने जाती होंगी वहां पर तो हर आयु की स्त्रियां जाती होंगी.
जब श्रीकृष्ण जी 7 साल के थे तब 11 साल की राधा जी उनसे मिलीं थी. जब वे 11 के हुए उसके बाद मथुरा चले गए. उसके बाद वे वापस कभी गोकुल नहीं गए. उसके बाद वे बहुत साल बाद तब मिले थे, जब वे महाभारत के युद्ध के लिए कुरुक्षेत्र का मैदान देखने आये थे.

तब राधा कृष्ण के प्रेम के प्रसंग उनकी किस आयु के है ? द्वापर युग की समाप्ति के बाद श्री कृष्ण के प्रपौत्र मथुरा के राजा वज्रनाभ (जिन्हे जाट अपना पूर्वज मानते है) ने महाराज परीक्षित और महर्षि शांडिल्य के सहयोग से मथुरा में अनेक मन्दिरों का निर्माण कराया.
महाराज वज्रनाभ ने कंस के कारागार को तोड़कर वहां पर अपने परदादा (भगवान श्रीकृष्णचन्द्र) का भव्य मंदिर स्थापित किया. उन्होंने अपनी दादी से श्रीकृष्ण के रूप का वर्णन सुनकर उसके अनुसार श्री कृष्ण की मूर्ति का निर्माण कराया और उसे वहां स्थापित किया.
समय समय पर अनेकों राजाओं ने इस मंदिर का विस्तार और सौन्दर्यकरण किया. कालांतर में अपने भाई भर्तहरि के आदेश पर उज्जैन के महाराजा वीर विक्रमादित्य ने भी अयोध्या, हरिद्वार और दिल्ली के साथ मथुरा का भी विकास और विस्तार किया.

हूण और कुषाण के हमलों में इस मंदिर के ध्वस्त होने के बाद गुप्तकाल के सम्राट चंद्रगुप्त विक्रमादित्य ने सन् 400 ई० में नए सिरे से एक भव्य मंदिर का निर्माण करवाया था. उसके कुछ सौ साल बाद इस्लामी हमलावर महमूद गजनवी ने यहाँ विध्वंश किया.
इसके बाद में इसे महाराजा विजयपाल देव के शासन में सन् 1150 ई. में "जज्ज" नामक किसी धनवान व्यक्ति ने भगवान श्रीकृष्ण का मंदिर बनवाया. यह मंदिर पहले की अपेक्षा और भी विशाल था, जिसे 16वीं शताब्दी के आरंभ में सिकंदर लोदी ने नष्ट करवा डाला था.

ओरछा के शासक राजा वीरसिंह जूदेव बुन्देला ने पुन: इस खंडहर पड़े स्थान पर एक भव्य और पहले की अपेक्षा विशाल भगवान श्रीकृष्ण का मंदिर बनवाया. इसके संबंध में कहा जाता है कि यह इतना ऊंचा और विशाल था कि यह आगरा से दिखाई देता था.
लेकिन 11वीं सदी तक कहीं भी ऐसा कोई जिक्र नहीं मिलता है कि वहां कोई राधा कृष्ण का भी कोई मंदिर था. न ही इस काल तक के किसी ग्रन्थ में राधा कृष्ण के मंदिर का जिक्र मिलता है और न ही राधाजी को देवी के रूप में स्थापित करने का जिक्र मिलता है.
माना जाता है कि12 वीं सदी में कवि जयदेव ने "श्री गीतगोविन्द" महाकाव्य की रचना की. इसमें श्रीकृष्ण की गोपिकाओं के साथ रासलीला, राधाविषाद वर्णन, कृष्ण के लिए व्याकुलता, कृष्ण की श्रीराधा के लिए उत्कंठा, राधा की सखी द्वारा राधा के विरह संताप का वर्णन है.
‘श्री गीतगोविन्द’ साहित्य जगत में एक अनुपम कृति है, इसकी रचना शैली, भावप्रवणता, सुमधुर राग-रागिणी, धार्मिक तात्पर्यता तथा सुमधुर कोमल-कान्त-पदावली साहित्यिक रस पिपासुओं को अपूर्व आनन्द प्रदान करती हैं. कवियों को श्री कृष्ण का यह रूप भा गया,
ऐसा समझा जाता है कि ‘श्री गीतगोविन्द’ के बाद अनेकों कवियों ने प्रेमगीत बनाने के लिए राधाकृष्ण का रूपक रखना प्रारम्भ कर दिया. रहीम, रसखान, अमीर खुसरो जैसे कवियों ने योद्धा और युगांधर भगवान् श्रीकृष्ण, प्रेमी श्री कृष्ण बना दिया.
अब मंदिरों में चक्रधर योगेश्वर श्रीकृष्ण की मूर्ति के बजाये मुरलीधर श्रीकृष्ण राधा जी के साथ विराजमान होने लगे. धर्म की स्थापना और अधर्म का नाश करने वाले, योद्धा और योगेश्वर श्रीकृष्ण को मुगल काल में, कवियों द्वारा रास रचाने वाला कन्हैया बना दिया गया.
आज के कथावाचकों को भी , अधर्मियों के संहारक और कर्मयोगी श्रीकृष्ण के बजाये दुनिया से बेखबर और प्रेमी श्रीकृष्ण के रूप में उनका गुणगान करने में आनंद आता है क्योंकि वहां आये भक्त भी ऐसे प्रेमगीत और प्रेम प्रसंग को सुनकर झूमते हुए नाचते हैं.
अब हमें श्रीकृष्ण के उसी अत्याचारियों के संहारक के रूप में पूजना होगा, श्रीकृष्ण के विराट रूप को मंदिरों में स्थापित करना होगा, उनके द्वारा सिखाये गए गीता के ज्ञान को समझना होगा, आदि. तब ही आज के समाज में शक्ति का संचार हो सकता है