Friday, 2 December 2022

बंगलादेश का निर्माण और उसमे इंदिरा गांधी की भूमिका

कांग्रेस के द्वारा जोर शोर से किये गए प्रचार के कारण बहुत से लोग यह समझते हैं कि- बंगलादेश को अलग करने का काम इंदिरा गांधी ने किया था, जबकि वास्तविकता यह है कि- पूर्वी पपिस्तान, पापिस्तानियों के पूर्वी पपिस्तान के प्रति सौतेले के कारण पापिस्तान से अलग हुआ था. इसका बहुत बड़ा कारण "बंगला" भाषा पर "उर्दू" थोपना भी था.

भारत पापिस्तान का युद्ध 3 दिसंबर 1971 से 16 दिसंबर 1971 तक चला था जबकि बंगलादेश अपने आपको 26 मार्च 1971 को ही पापिस्तान से अलग करने की घोषणा कर चूका था. इसीलिये बंगलादेश में 26 मार्च को स्वतंत्रता दिवस मनाया जाता है. बंगलादेश के निर्माण का कारण समझने के लिए हमें पहले सारे घटनाक्रम को समझना होगा.

बांग्लादेश, भारत के बंगाल का वह हिस्सा है, जिसको अंग्रेजों ने हिन्दू / मुस्लिम जनसँख्या के आधार पर सबसे पहले विभाजित किया था. अंग्रेजों ने बंगाल को दो भागों में बांटा दिया था पूर्वी बंगाल और पश्चिमी बंगाल. पूर्वी बंगाल में मुसलमानों की संख्या ज्यादा थी और पश्चिमी बंगाल.में हिन्दुओं की जनसख्या अधिक थी.
1947 में अंग्रेजों राज से से आजादी के समय, मुस्लिम बहुल होने के कारण पूर्वी बंगाल ने पपिस्तान के साथ जाना उचित समझा और वह पापिस्तान का हिस्सा बन गया. उसको पूर्वी पापिस्तान कहा जाता था. आजादी के बाद से ही पापिस्तान की राजनीति में पश्चिमी पापिस्तान का प्रभुत्व रहा और पूर्वी पापिस्तान को दुसरे दर्जे का समझा जाता रहा.
पूर्वी हिस्सा देश की सत्ता में कभी भी उचित प्रतिनिधित्व नहीं पा सका एवं हमेशा राजनीतिक रूप से उपेक्षित रहा. इसी नाराजगी का राजनैतिक लाभ लेने के लिए बांग्लादेश के नेता शेख मुजीब-उर-रहमान ने अवामी लीग का गठन किया और पाकिस्तान के अंदर ही और स्वायत्तता की मांग की. और इसी मुद्दे पर 1970 का आम चुनाव लड़ा.
चुनाव में मुजीब-उर-रहमान की अवामी लीग को जबरदस्त जीत मिली लेकिन उनको प्रधानमंत्री बनाने के बजाय जेल में डाल दिया गया. उस समय पापिस्तान में जनरल याह्या खान राष्ट्रपति थे और उन्होंने पूर्व में फैली नाराजगी को दूर करने के लिए जनरल टिक्का खान को जिम्मेदारी दी. टिक्का खान ने पूर्वी पापितान में जुल्म करना शुरू कर दिए.
टिक्का खान ने बंगाली सैनिको को हटा दिया और पश्चिमी पापिस्तानी सैनिको को पूर्वी पापिस्तान में लगा दिया. टिक्का खान ने 25 मार्च 1971आपरेशन "सर्चलाईट" शुरू कर बांग्लादेशियों पर बेतहाशा जुल्म शुरू कर दिए. इस जुल्म का बिरोध करने के लिए "मुक्ति वाहिनी" खड़ी हो गई और बंगाली मूल के सैनिक भी वगावत करके इसके साथ आ गए.
पपिस्तानी सेना और मुक्तिवाहिनी के बीच जंग शुरू हो गई. 26 मार्च 1971 को मुक्ति वाहिनी और अवामी लीग ने, पापिस्तान से अलग होने की घोषणा कर अपने आपको एक स्वतंत्र देश "बँगलादेश" घोषित कर दिया. इसके बाद पापिस्तानी सेना ने बंगलादेश की आम जनता पर जुल्म करने शुरू कर दिये, जिनमे हत्या और बलात्कार सबसे प्रमुख था.
बंगलादेश के लोग अपनी जान और इज्ज़त बचाने के लिए, बड़ी संख्या में शरणार्थी बनकर भारत में आने लगे. उनकी दुर्दशा देखकर भारतीय (खासकर बंगाली ) भारत सरकार से बंगलादेश में हस्त्क्षेप की मांग करने लगे. लेकिन भारत सरकार ने स्पष्ट कर दिया कि - यह पापिस्तान का अंदरूनी मामला है और हम इसमें कोई दखल नहीं देगे.
उन दिनों "अमेरिका" और "सोवियंत संघ" में शीतयुद्ध चल रहा था. पापिस्तान अमेरिका के गुट में था. भारत ने अपने आपको गुट निरपेक्ष घोषित किया था मगर अमेरिका भारत को सोवियत संघ का करीबी ही मानता था. इसलिए अमेरिका भारत पर नियन्त्रण रखने के लिए पापिस्तान को आधुनिक हथियारों से लैस कर रहा था.
अमेरिका ने पापिस्तान को अनेकों पनडुब्बी, युद्धपोत, टैंक और लड़ाकू विमान दे रखे थे जिनके दम पर वो अपने आपको, भारत से ज्यादा ताकत्बर समझने लगा था. वह 1948 और 1965की हार का बदला लेना चाहता था. पापिस्तान ने भारत की सीमा पर दबाब बढ़ाना शुरू कर दिया था. इसकी बजह से भारतीय सेना का चिंतित होना स्वाभाविक था.
सेना सरकार से अनुरोध कर रही थी कि- सीमा पर सेना और सैन्य संसाधन बढाए जाए. पूर्वी पापिस्तान में बंगालियों पर पापिस्तानी सेना के अत्याचार बढ़ते जा रहे थे. बंगाल की जनता भी बार बार सरकार से वहां हस्तक्षेप का अनुरोध कर रही थी लेकिन सरकार किंकर्तव्यविमूढ़ बनी हुई थी. भारत की खामोशी से पापिस्तान के भी हौशले बढ़ गए.
पापिस्तान को लगा कि - भारत, पापिस्तान की सैन्य ताकत से डर रहा है. उसको लगा यह अच्छा मौका है भारत पर हमला करने का. इससे हम 1948 और 1965 की हार का बदला भी ले लेंगे और देश की जनता का ध्यान भी बंगलादेश की घटनाओं से हट जाएगा. इसी सोंच के साथ पापिस्तान ने 3 दिसंबर 1971 को हवाई हमला कर दिया.
इस हमले को पापिस्तान ने नाम दिया था "आपरेशन चंगेज खान". पापिस्तान ने अपनी बहुत सारे बमबर्षको के साथ भारत के कई शहरों में बमबारी की. उस समय इंदिरा गांधी कलकत्ता में थीं और वहां की व्याकुल जनता को समझा रही थी कि - पूर्वी पापिस्तान में जो हो रहा है वो पापिस्तान का आंतरिक मामला है, इसमें हम कुछ नहीं कर सकते.
भारत पर हवाई हमले की खबर मिलते ही इंदिरा गांधी फौरन दिल्ली पहुंची और सेना के प्रमुखों से आपात बैठक की. बैठक में कोई नतीजा न निकलता देखकर जनरल "सैम मानेकशा ने कहा- आप पापिस्तान से युद्ध का ऐलान कीजिए, नहीं तो मैं सत्ता पलट करके युद्ध का ऐलान कर दूंगा. तब मजबूर होकर इंदिरा गांधी ने युद्ध की घोषणा कर दी.
हथियारों की आधुनिकता और उनकी संख्या के आधार पर पापिस्तान भारत से काफी आगे था, लेकिन देश के मरने मारने के जज्बे के मामले में भारतीय सेना के सामने बहुत पीछे थी. भारत की सेना ने पापिस्तान का जो हाल किया वो सारी दुनिया को पता है. सीमित संसाधनों से ही भारतीय सेना ने पापिस्तान को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया.
पापिस्तानी सेना की हार और आत्मसमर्पण के साथ ही मुजीब-उर-रहमान जेल से रिहा हो गए. मुक्ति वाहिनी और अवामी लीग ने सत्ता सम्हाल ली. इस प्रकार एक नए देश बंगलादेश का उदय हुआ जिसके निर्माण में भारतीय सेना ने बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.

बांग्लादेश की आजादी और जनसंघ

26 मार्च 1971 को शेख़ मुजीबुर रहमान ने पूर्वी पाकिस्तान को अलग स्वतंत्र देश "बांग्लादेश" घोषित कर दिया था. पूर्वी पाकिस्तान की बगावत को रोकने के लिए पश्चिमी पापिस्तान (वर्तमान पापिस्तान) की सेना, पूर्वी पापिस्तान ( वर्तमान बांग्लादेश) की जनता पर अमानवीय अत्याचार कर रही थी.

पूर्वी पापिस्तान से लाखों की संख्या में शरणाथी भारत में आ रहे थे, जिनमे प्रताड़ित हिन्दुओ की संख्या बहुत ज्यादा थी. ऐसे में भारत्तीय जनसंघ ने सरकार से आग्रह किया कि- बांग्लादेश को स्वतंत्र देश के रूप में मान्यता दी जाए, मगर इंदिरा गांधी ने इसे पापिस्तान का आंतरिक मामला कह दिया था.
भारत द्वारा बांग्लादेश को मान्यता देने की मांग को लेकर तब जनसंघ ने आंदोलन किया था. मगर इंदिरा गांधी का मानना था कि यह पाकिस्तान का अंदरूनी मामला है. सरकार पर दबाब बनाने के लिए जनसंघ ने जेल भरो आंदोलन भी चलाया था. जनसंघ के अनेकों कार्यकर्ता तब जेल गए थे.
बांग्लादेश में पाकिस्तान सेना द्वारा चुन चुन कर हिन्दू जनता पर अत्याचार किया जा रहा था लेकिन इसे भारत सरकार मुसलमानो का हिन्दुओं पर अत्याचार नहीं मान रही थी बल्कि इसे उर्दू भाषियों का बांग्लाभाषियों पर अत्याचार कह रही थी. इस बात को लेकर जनसंघ नाराज था.
प्रिंसटन यूनिवर्सिटी में राजनीति और अंतरराष्ट्रीय संबंध के प्रोफेसर जे. बास की किताब 'The Blood Telegram: Nixon, Kissinger and a Forgotten Genocide" के मुताबिक भी वह युद्ध मूल रूप से पूर्वी पाकिस्तान में रह रहे हिंदुओं के खिलाफ हो रहा था.
कांग्रेसी बखान करते हैं कि- इंदिरा ने पाकिस्तान के दो टुकड़े किये थे जबकि हकीकत यह है कि- बांग्लादेश द्वारा 26 मार्च 1971 को अपने आपको पाकिस्तान से अलग घोषित किये जाने के बाद तब से लेकर 3 दिसंबर 1971 तक इंदिरा गांधी इसे पाकिस्तान का आंतरिक मामला ही मानती थी.
3 दिसंबर 1971 को भी इंदिरा गांधी कलकत्ता में लोगों को यही समझा रहीं थी. वो तो अति उत्साह में आकर पाकिस्तान ने 3 दिसंबर 1971 को भारत के कई शहरों पर एक साथ हवाई हमला (आपरेशन चंगेजखान) कर दिया और इसके कारण की भारत को पाकितान के साथ युद्ध का ऐलान करना पड़ा.
इंदिरा गांधी की सहेली पुपुल जयकर ने तो अपनी किताब में यहाँ तक लिखा है कि - आपरेशन चंगेज खान के बाद भी इंदिरागांधी युद्ध का ऐलान करने में संकोच कर रहीं थी. तब जनरल मानेकशा ने धमकी भरे स्वर में कहा था कि - युद्ध की घोषणा आप करती हैं या फिर मैं करूँ.
अटल बिहारी वाजपेयी ने कहा था कि हम न केवल मुक्ति संग्राम में जीवन की आहुति देने वालों के साथ हैं बल्कि हम इतिहास को भी एक नई दिशा देने का प्रयत्न कर रहे हैं. नरेंद्र मोदी ने कहा, 'बांग्लादेश की आजादी के लिए संघर्ष में शामिल होना, मेरे जीवन के भी पहले आंदोलनों में से एक था
मोदी जी उस आंदोलन के समय में कब से कब तक जेल में रहे थे ये तो वे या उनका PRO बता सकता है लेकिन यह सत्य है कि - बांग्लादेश को स्वतंत्र देश की मान्यता दिलाने के लिए जनसंघ ने जेल भरो आंदोलन चलाया और उसके अनेकों कार्यकर्ता जेल गए थे.
बांग्लादेश अपना स्वाधीनता दिवस 26 मार्च 1971 को मनाता है. बांग्लादेश को एक स्वतंत्र देश के रूप में मान्यता देने वाला पहला देश भूटान था जबकि भारत ने 6 दिसंबर 1971 को बांग्लादेश को मान्यता दी थी. पाकिस्तान ने 1974 में स्वतंत्र देश के रूप में मान्यता दी थी

Thursday, 1 December 2022

संघ गीत : संगठन गढ़े चलो सुपंथ पर बढे चलो

संगठन गढ़े चलो, सुपंथ पर बढे चलो। भला हो जिसमे देश का, वो काम सब किये चलो।। संगठन गढ़े चलो, सुपंथ पर बढे चलो। भला हो जिसमे देश का, वो काम सब किये चलो।। युग के साथ मिल के सब, कदम बढ़ाना सिख लो , एकता के स्वर में गीत, गुनगुनाना सिख लो , भूल कर भी मुख से, जाति पंथ की न बात हो भाषा प्रांत के लिए, कभी न रक्तपात हो, फूट का घड़ा भरा है, फोड़ कर बढे चलो। भला हो जिसमे देश का , वो काम सब किये चलो। संगठन गढ़े चलो , सुपंथ पर बढे चलो। भला हो जिसमे देश का , वो काम सब किये चलो।। आ रही है आज चारों ओर से यही पुकार हम करेंगे त्याग मातृभूमि के लिए अपार कष्ट जो मिलेगे, मुस्कुरा के सब सहेंगे हम देश के लिए सदा, जियेंगे और मरेंगे हम देश का ही भाग्य, अपना भाग्य है ये सोच लो। भला हो जिसमे देश का, वो काम सब किये चलो। संगठन गढ़े चलो, सुपंथ पर बढे चलो। भला हो जिसमे देश का , वो काम सब किये चलो।।

संघ गीत : युगों युगों से यही हमारी, बनी हुई परिपाटी है,


युगों युगों से यही हमारी, बनी हुई परिपाटी है,
खून दिया है मगर नही दी, कभी देश की माटी है,
युगों युगों से यही हमारी, बनी हुई परिपाटी है,
खून दिया है मगर नही दी, कभी देश की माटी है,

इस धरती ने जन्म दिया है,
यही पुनीता माता है,
एक प्राण दो देह सरीका,
इससे अपना नाता है,

यह धरती है पार्वती माँ,
यही राष्ट्र शिव शंकर है,
दिगमंडल सापों का कुण्डल,
कण कण रूद्र भयंकर है,
यह पावन माटी ललाट की, ललीत ललाम ललाटी है,
खून दिया है मगर नही दी, कभी देश की माटी है,
युगों युगों से यही हमारी, बनी हुई परिपाटी है,
खून दिया है मगर नही दी, कभी देश की माटी है,
इसी भूमि पुत्री के कारण,
भस्म हुई लंका सारी,
सुई नोक भर भू के पीछे,
हुआ महा भारत भारी,

पानी सा बह उठा लहु था,
पानीपत के प्रांगण में,
बिछा दिये रिपु गण के शव थे,
उसी तरायण के रण मे,
पृष्ठ बाचते इतिहासो के, अब भी हल्दी घाटी है,
खून दिया है मगर नही दी, कभी देश की माटी है,
युगों युगों से यही हमारी, बनी हुई परिपाटी है,
खून दिया है मगर नही दी, कभी देश की माटी है,
सिख मराठे राजपूत क्या,
बंगाली क्या मद्रासी,
इस मंत्र का जाप कर रहे,
युग युग से भारतवासी,

बुन्देले अब भी दोहराते,
यही मंत्र है झाँसी में,
देंगे प्राण ना देंगे माटी,
गूंज रहा है नस नस मे,
शिश चढाया, काट गर्दने, या अरी गर्दन काटी है,
खून दिया है मगर नही दी, कभी देश की माटी है,
युगों युगों से यही हमारी, बनी हुई परिपाटी है,
खून दिया है मगर नही दी, कभी देश की माटी है,
इस धरती के कण कण पर है,
चित्र खिचा कुरबानी का,
एक एक कण छंद बोलता,
चढी शहीद जवानी का,

इसके कण है नही किंतु ये,
ज्वाला मुखी के शोले है,
किया किसी ने दावा इनपर,
ये दावा से डोले है,
इन्हें चाटने बढा उसी ने, धूल धरा की चाटी है,
खून दिया है मगर नही दी, कभी देश की माटी है,
युगों युगों से यही हमारी, बनी हुई परिपाटी है,
खून दिया है मगर नही दी, कभी देश की माटी है,

संघ गीत : देश हमें देता है सब कुछ

देश हमें देता है सब कुछ , हम भी तो कुछ देना सीखे
देश हमें देता है सब कुछ, हम भी तो कुछ देना सीखे। ।
सूरज हमें रोशनी देता,
हवा नया जीवन देती है।
भूख मिटाने को हम सब की,
धरती पर होती खेती है
औरों का भी हित हो जिससे, हम ऐसा कुछ करना सीखे
देश हमें देता है सब कुछ, हम भी तो कुछ देना सीखे
गर्मी की तपती दोपहर में,
पेड़ सदा देते हैं छाया
सुमन सुगंध सदा देते हैं,
हम सबको फूलों की माला
त्यागी तरुओं के जीवन से , हम परहित कुछ करना सीखे
देश हमें देता है सब कुछ, हम भी तो कुछ देना सीखे
जो अनपढ़ है उन्हें पढ़ाएं,
जो चुप है उनको वाणी दे
पिछड़ गए जो उन्हें बढ़ाए,
समरसता का भाव जगा दें
हम मेहनत के दीप जलाकर , नया उजाला करना सीखे
देश हमें देता है सब कुछ, हम भी तो कुछ देना सीखे
देश हमें देता है सब कुछ, हम भी तो कुछ देना सीखे
देश हमें देता है सब कुछ, हम भी तो कुछ देना सीखे

संघ गीत : हो जाओ तैयार साथियों, हो जाओ तैयार


हो जाओ तैयार। साथियों, हो जाओ तैयार।
हो जाओ तैयार साथियों, हो जाओ तैयार ।।
अर्पित कर दो तन – मन – धन,
मांग रहा बलिदान वतन।
काम ना आया, अगर देश के,
तो जीवन बेकार।
तो जीवन बेकार साथियों,
तो जीवन बेकार ,
हो जाओ तैयार साथियों, हो जाओ तैयार।
हो जाओ तैयार साथियों, हो जाओ तैयार ।।
सोचने का समय गया,
उठो लिखो इतिहास नया।
बंसी फेंको और उठा लो,
हाथों में हथियार।
हाथों में हथियार साथियों,
हाथों में हथियार।
हो जाओ तैयार साथियों, हो जाओ तैयार।
हो जाओ तैयार साथियों, हो जाओ तैयार ।।
तूफानी गति रुके नहीं,
शीश कटे पर झुके नहीं।
ठने हुए माथे के सम्मुख ,
ठहर न पाती हार
ठहर न पाती हार साथियों
ठहर न पाती हार
हो जाओ तैयार साथियों, हो जाओ तैयार।
हो जाओ तैयार साथियों, हो जाओ तैयार ।।
गूंज उठे ये धरती अंबर,
और उठा लो ऊंचा स्वर।
कोटि-कोटि कंठों से गूंजे,
धर्म की जय जयकार।
धर्म की जय जयकार साथियों
धर्म की जय जयकार।
हो जाओ तैयार साथियों, हो जाओ तैयार।
हो जाओ तैयार साथियों, हो जाओ तैयार ।।

संघ गीत : चन्दन है इस देश की माटी

चन्दन है इस देश की माटी, तपोभूमि हर ग्राम है।
हर बाला देवी की प्रतिमा, बच्चा-बच्चा राम है॥
हर शरीर मन्दिर सा पावन,
हर मानव उपकारी है।
जहाँ सिंह बन गये खिलौने,
गाय जहाँ माँ प्यारी है।
जहाँ सवेरा शंख बजाता,
लोरी गाती शाम है।
हर बाला देवी की प्रतिमा,
बच्चा-बच्चा राम है॥
चन्दन है इस देश की माटी, तपोभूमि हर ग्राम है।
हर बाला देवी की प्रतिमा, बच्चा-बच्चा राम है॥
जहाँ कर्म से भाग्य बदलते,
श्रम निष्ठा कल्याणी है।
त्याग और तप की गाथाएँ,
गाती कवि की वाणी है॥
ज्ञान जहाँ का गंगा जल सा,
निर्मल है अविराम है।
हर बाला देवी की प्रतिमा,
बच्चा-बच्चा राम है॥
चन्दन है इस देश की माटी, तपोभूमि हर ग्राम है।
हर बाला देवी की प्रतिमा, बच्चा-बच्चा राम है॥
इसके सैनिक समर भूमि में,
गाया करते गीता हैं।
जहाँ खेत में हल के नीचे,
खेला करती सीता हैं।
जीवन का आदर्श यहाँ पर,
परमेश्वर का धाम है।
हर बाला देवी की प्रतिमा,
बच्चा-बच्चा राम है ॥
चन्दन है इस देश की माटी, तपोभूमि हर ग्राम है।
हर बाला देवी की प्रतिमा, बच्चा-बच्चा राम है॥