Monday, 25 July 2022

कारगिल युद्ध का घटनाक्रम, कब क्या हुआ ?

जब सर्दियों में कारगिल सेक्टर में LOC पर भयंकर बर्फबारी होती है तो अग्रिम सीमा चौकी पर तैनात दोनों देशों के फौजी निचले स्थानों पर चले आते है और जब बर्फ पिघलती है तो फिर से अपने स्थानों पर पहुँच कर मोर्चे संभाल लेते है. 1999 में भी ऐसा ही हुआ. भारत पापिस्तान दोनों की सेना नीचे आ गई.

पापिस्तान ने अपनी सेना को आधिकारिक तौर पर वहां से हटा लिया लेकिन जेहादियों के भेष में अपने कुछ सैनिको को वहां पर बिठा दिया. इन पापीस्तानियों का नियंत्रण पापिस्तान की कुख्यात एजेंसी ISI कर रही थी, जिसे पापिस्तान की सेना और उसके संसाधनों का भी पूरा साथ मिल रहा था
अब उसके बाद का घटनाक्रम
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03 मई 1999 : एक बकरी चराने वाले ने भारतीय फ़ौज इस बात की जानकारी दी
05 मई 1999 : इस सूचना के बाद जब भारतीय फ़ौज की पेट्रोलिंग पार्टी जानकारी लेने वहां पहुंची तो पाकिस्तानियों ने उन्हें पकड़ लिया और उनमे से 5 की हत्या कर दी
09 मई 1999 : पाकिस्तानियों की गोला बरी से भारतीय फ़ौज का कारगिल स्थित गोला बारूद का स्टोर बर्बाद हो गया10 May 1999 : पहली बार द्रास, काकसार और मुश्कोह सेक्टर में पाकिस्तानी घुसपैठियों की उपस्थि देखी गई
15 मई 1999 : भारतीय फ़ौज को कश्मीर वैली से कारगिल सेक्टर के तरफ भेजा गया
26 मई 1999 : भारतीय वायु सेना को कार्यवाही के लिए कहा गया
27 मई 1999 : इस कार्यवाही में भारतीय वायु सेना के MiG-21 और MiG-27 मार गिराए गए और फ्लाइट लेफ्टिनेंट नचिकेता को बंदी बना लिया गया
28 मई 1999 : एक MI-17 हैलीकॉप्टर पाकिस्तान द्वारा मार गिराया गया और चार भारतीय फौजी मरे गए
01 जून 1999 : NH 1A पर पकिस्तान द्वारा भरी गोला बरी की गई
05 जून 1999 : तीन पाकिस्तानी सैनिकों से प्राप्त कागजातों को भारतीय सेना ने अखबारों के लिए जरी किया जिसमे पाक सेना का शामिल होना प्रमाणित होता था
06 जून 1999 : अब भारतीय सेना ने जवाबी कार्यवाही पूरी ताकत से आरम्भ कर दी
09 जून 1999 : बाल्टिक क्षेत्र की 2 अग्रिम चौकियों पर भारतीय सेना ने पुनः कब्जा लिया
11 जून 1999 : भारत ने जनरल परवेज मुशर्रफ जब वह चीन में थे और आर्मी चीफ लेफ्टीनेंत जनरल अजीज खान जो रावल पिंडी में थे उनकी बातचीत का रिकॉर्डिंग जरी की जिससे पता चलता था कि इस घुसपैंठ में आर्मी का हाथ है
13 जून 1999 : भारतीय फ़ौज ने द्रास सेक्टर में तोलिंग पर पुनः कब्ज़ा किया
15 जून 1999 : अमेरिकी प्रेसिडेंट बिल किलिंटन ने परवेज मुशर्रफ से फोन पर कहा कि वह अपनी फौजों को कारगिल सेक्टर से बहार बुलाये
29 जून 1999 : भारतीय फ़ौज ने Tiger Hill के नजदीक दो महत्त्वपूर्ण चौकियों Point 5060 और Point 5100 को पुनः कब्जाया
02 जुलाई 1999 : भारतीय फ़ौज ने कारगिल पर तीन ओर से हमला किया
04 जुलाई 1999 : भारतीय फ़ौज ने 11 घंटों के भयानक हमले में Tiger Hill पर पुनः कब्ज़ा कर लिया
05 जुलाई 1999 : जैसे ही भारतीय फ़ौज ने द्रास सेक्टर पर पुनः कब्ज़ा किया पाकिस्तानी प्रधान मंत्री शरीफ ने तुरंत बिल किलिंटन से कहा कि वह कारगिल से अपनी फ़ौज को हटा रहें है
07 जुलाई 1999 : भारतीय फ़ौज ने बटालिक में स्तिथ जुबर हिल पर कब्ज़ा किया
11 जुलाई 1999 : पाकिस्तानियों ने एक तरह से बटालिक से भागना शुरू कर दिया
14 जुलाई 1999 : भारतीय प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपाई ने आपरेशन विजय की जीत का ऐलान कर दिया
26 जुलाई 1999 : विजय दिवस के रूप में मनाये जाने का ऐलान किया गया

महान स्वाधीनता सेनानी नीरा आर्य

 नीरा आर्य (नीरा नागिनी) का जन्म 5 मार्च 1902 को उत्तरप्रदेश राज्य में बागपत जिले के खेकड़ा नगर में हुआ था. इनके पिता सेठ छज्जूमल अपने समय के एक प्रतिष्ठित व्यापारी थे, जिनका व्यापार देशभर में फैला हुआ था. खासकर कलकत्ता में इनके पिताजी के व्यापार का मुख्य केंद्र था, इसलिए इनकी शिक्षा-दीक्षा कलकत्ता में ही हुई.

नीरा आर्य हिन्दी, अंग्रेजी, बंगाली के साथ-साथ कई अन्य भाषाओं में भी प्रवीण थीं. इनकी शादी ब्रिटिश भारत में सीआईडी इंस्पेक्टर श्रीकांत जयरंजन दास के संग हुई थी. श्रीकांत जयरंजन दास अंग्रेज सरकार के स्वामीभक्त अधिकारी थी. श्रीकांत जयरंजन दास को नेताजी सुभाष चंद्र बोस की जासूसी करने और उसे मौत के घाट उतारने की जिम्मेदारी दी गई.
एक बार अवसर पाकर श्रीकांत जयरंजन दास ने नेताजी को मारने के लिए गोलियां दागी उस फायरिंग में नेताजी सुभाषचंद्र बोस तो बच गए पर उनका ड्राइवर शहीद हो गया. इसी दौरान नीरा आर्य ने अपने पति श्रीकांत जयरंजन दास के पेट में संगीन घोंपकर उसे परलोक पहुंचा दिया था. अपने पति की हत्या करने के कारण नेताजी ने उन्हें नागिनी कहा था.
विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद आजाद हिन्द फौज पर दिल्ली के लाल किले में मुकदमा चला तो ज्यादातर बंदी सैनिकों को छोड़ दिया गया, लेकिन इन्हें पति की हत्या के आरोप में काले पानी की सजा हुई थी. वहां इन्हे कठोर यातनाये दी गईं. उन्होंने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि - नेताजी का पता पिंछने के उनको अमानवीय यातनाये दी जाती थी.
उन्होंने लिखा है कि - जेलर ने कड़क आवाज में कहा, ‘‘तुम्हें छोड़ दिया जाएगा, यदि तुम बता दोगी कि तुम्हारे नेताजी सुभाष कहाँ हैं. मैंने जबाब दिया कि - ‘वे तो हवाई दुर्घटना में चल बसे. तो जेलर ने कहा - तुम झूठ बोलती हो तुम कि वे हवाई दुर्घटना में मर गए, सारी दुनिया जानती है कि- वो जिंदा है, . इस पर मैंने कहा - ‘हाँ नेताजी जिंदा हैं, वो मेरे दिल में जिंदा हैं’
जैसे ही मैंने यह कहा तो जेलर को गुस्सा आ गया था और बोला- "तो तुम्हारे दिल से हम नेताजी को निकाल देंगे’’ और फिर उसने मेरे आँचल पर हाथ डाल दिया और मेरी आँगी को फाड़ते हुए लुहार की ओर कुछ संकेत किया. लुहार ने एक बड़ी से सँडसी और बगीचे में पत्तियाँ काटने बाली कैची उठा लाया. और उस से दाए स्तन को दबाने लगा.
मुझे अत्यंत पीड़ा हो रही थी. दूसरी तरफ से जेलर ने मेरी गर्दन पकड़ते हुए कहा, ‘‘अगर फिर जबान लड़ाई तो तुम्हारे ये दोनों गुब्बारे छाती से अलग कर दिए जाएँगे". उनसे बार बार नेताजी का पता पूँछा जाता था अर्थात अंग्रेज भी हवाई दुर्घटना वाली थ्योरी को नहीं मानते थे. इनके भाई बसंत कुमार भी स्वतंत्रता सेनानी थे, जो आजादी के बाद संन्यासी बन गए थे
भारत को आजादी मिलने के बाद इन्हे भी जेल से आजादी मिल गई परन्तु इन्होने अपना जीवन ज्यादातर वास्तविक क्रांतिकारियों की तरह अत्यंत गरीबी में गुजारा क्योंकि सत्ता पर तो चरखा छाप देशभक्तों का कब्ज़ा हो गया था. इन्होंने अपना जीवन फूल बेचकर गुजारा किया और फलकनुमा, हैदराबाद में एक झोंपड़ी में रही.
उनके अंतिम दिनों में सरकारी जमीन पर बनी उनकी झोपड़ी को भी अतिक्रमण कह कर तोड़ दिया था. उस समय हिन्दी दैनिक स्वतंत्र वार्ता के पत्रकार तेजपाल सिंह धामा को उनके बारे में पता चला. उन्होंने अपने साथियों के साथ मिलकर में चारमीनार के पास उस्मानिया अस्पताल में भर्ती कराया जहाँ उन्होंने 26 जुलाई, 1998 को मौत का आलिंगन कर लिया.
तेजपाल सिंह धामा ने ही अपने सा​थियों साथ मिलकर उनका अंतिम संस्कार किया. उनका अस्थिकलश, डायरी, कुछ पुराने फोटोज एवं अन्य सामान हैदराबाद के एक मंदिर में रखे हुए स्मारक की प्रतीक्षा आज भी देख रहे हैं. गौरतलब है कि - ये तेजपाल सिंह धामा वही पत्रकार है जो भारत माता की नग्न पेंटिंग बनाने पर एमएफ हुसैन से भिड़े थे.

महान स्वाधीनता सेनानी नीरा आर्या आजाद हिन्द फ़ौज में जासुस का काम करतीं थी. उनके जीवन के बारे में मुझे अभी बहुत कुछ लिखना है. परन्तु जेलर द्वारा उनके स्तन काटने की बात लिखते लिखते मन विचलित हो गया और ज्यादा नहीं लिख पा रहा हूँ. कोशिश करूँगा कि - उनकी पुण्यतिथि तक अपने लेख को पूरा कर के पोस्ट कर सकूँ

अगर ब्रांडेड देशी शराब की कीमत बढ़ती रही तो, नकली जहरीली शराब गरीब मजदूरों की जान लेती रहेगी

 अक्सर सरकारें अपने आपको शराब विरोधी दिखाने के लिए शराब पर अंधाधुंध टैक्स लगा देती है और कई बार तो इसे अपने अपने राज्यों में प्रतिबंधित कर देती है. शराब को महंगा करने या प्रतिबंधित करने का सबसे ज्यादा असर मजदूत वर्ग पर ही पड़ता है.

आप चाहे कुछ भी कर लें लेकिन मजदूर वर्ग को शराब पीने से नहीं रोक सकते. वो कुछ भी करके किसी भी तरह से नशा करने का जुगाड़ कर ही लेता है. उसकी इस लत का फायदा माफिया तथा भ्रष्ट नेता और पुलिस वाले अक्सर उठाते रहते हैं.
शराब की मैन्युफैचरिंग कास्ट ज्यादा नहीं होती है बल्कि ब्रांडेड शराब पर बहुत ज्यादा टैक्स हैं जिसके कारण यह बहुत महंगी मिलती है. गरीब लोग सस्ती शराब के लिए कच्ची शराब बनाने वालों के पास से शराब खरीद कर पीते हैं जो कई बार जहरीली भी बन जाती है.
शराब एल्कोहल से बनती है. शराब बनाने के अलाबा इंडस्ट्रियल और लैब यूज के लिए जो स्प्रिट बेचीं जाती है उसमे एल्कोहल में कॉपर सल्फेट (तूतिया) नाम का जहरीला पदार्थ मिला दिया जाता है जिससे कि लोग उसका शराब की तरह उपयोग न करे.
दबंद लोग इसी स्प्रिट से सस्ती शराब बना कर बेचते हैं. यह लोग नौशादर से स्प्रिट को फाड़कर, उसे निथार लेते है और उसमे पानी मिलाकर बेचते हैं. इनके पास कोई टेस्टिंग सिस्टम तो होता नहीं है, बस इतना देखते है कि नीला रंग ख़त्म हो जाये.
ऐसे में कई बार नीला रंग तो ख़त्म हो जाता है लेकिन कॉपर सल्फेट (तूतिया) पूरी तरह से समाप्त नहीं होता है. तब वह शराब जहरीली रह जाती है. अक्सर शराब पीकर मरने की जो खबर आती है वो ऐसी ही जहरीली शराब के कारण आती है.
अंग्रेजी शराब पर भले ही ज्यादा टैक्स रखा जाये लेकिन अगर आप गरीब मजदूरों की जान वास्तव में बचाना चाहते हो तो ब्रांडेड देसी शराब पर से टैक्स कम करना चाहिए और उसे कम कीमत में शराब के ठेकों पर उपलब्ध कराना चाहिए.
इसके अलाबा सस्ती शराब बनाने के लिए कुछ लोग इसमे नशीली गोलियां और ज्यादा पानी मिला देते हैं. ब्रांडेड देशी शराब की कीमत ऐसे ही बढ़ती रही तो नकली जहरीली शराब से होने वाली मौतों की संख्या सम्हाले नहीं सम्हलेगी

क्या सचमुच "ज्वाला माता" के मंदिर में अकबर ने सोने का छत्र चढ़ाया था ?

मां भगवती के 51 शक्तिपीठों में से एक, यह "ज्वालामुखी मंदिर" हिमाचल प्रदेश के काँगड़ा जिले में स्थित है. पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इस स्थान पर माता सती की जीभ गिरी थी. यहां माता ज्वाला के रूप में विराजमान हैं और भगवान शिव यहां उन्मत भैरव के रूप में स्थित हैं. मुख्य मंदिर में माता की कोई मूर्ति नहीं है.

एक बड़े से हाल जैसे स्थान पर भूमि से अलग-अलग 9 स्थानों पर ज्वाला प्रकट हो रही है, उसे ही माँ का स्वरूप मान कर हिन्दू उनकी पूजा करते हैं. सबसे बड़ी ज्वाला को ज्वाला माता कहते है और अन्य 8 ज्वालाओं को अन्नपूर्णा, विध्यवासिनी, चण्डी देवी, महालक्ष्मी, हिंगलाज माता, सरस्वती, अम्बिका एवं अंजी माता का स्वरूप माना जाता है

कहा जाता है कि - बाबा गोरखनाथ ने यहाँ माता की साधना की थी. जब उनकी साधना से प्रसन्न होकर माता ने दर्शन दिए तो बाबा गोरखनाथ ने माता से कहा - आप पानी गर्म करके रखे तब तक मैं भोजन का प्रबंध करके आता हूँ. आप बचन दें कि जब तक मैं वापस नहीं आ जाता आप यहाँ से वापस नहीं जाएंगी माता ने उन्हें इसका बचन दे दिया.
लेकिन उसके बाद बाबा गोरखनाथ वहां वापस नहीं आये. तब से लेकर आज तक माता ज्वाला के रूप में वहां विराजमान है. इस स्थान के पास ही गोरखडिब्बी मंदिर है. यहाँ बने कुंड से भाप निकलती रहती मान्यता है कि कलयुग के अंत में गोरखनाथ मंदिर वापस लौटकर आएंग. तब तक गोरखनाथ को दिए बचन को निभाने के लिए ज्वाला माता यहीं तहेंगी
इस मंदिर के बारे में कहा जाता है कि- अकबर ने ज्वाला माता के मंदिर के पुजारियों को बहुत सताया और जलती ज्वाला को बुझाने की बहुत कोशिश की और जब वह अपने प्रयास में असफल रहा तो माता के चमत्कार से प्रभावित होकर नंगे पैर माँ के दर्शन करने आया और माता पर सोने का छत्र चढ़ाया साथ ही मंदिर को कई सौ बीघा भूमि दान दी.
जबकि ऐतिहासिक साक्ष्यों के अनुसार यह गलत है. अकबर मूर्ति पूजक नहीं बल्कि मूर्ति-भंजक था, उसने लाखों निर्दोष हिन्दुओं की हत्या करवाई और महिलाओं को बेइजजत किया. उसमे सनातन धर्म को मिटाने के अनेक प्रयास किये. जब कामयाब नहीं हुआ तो इस्लाम और हिन्दू के बीच का नया धर्म दीन इलाही चलाने की कोशिश की
ऐतिहासिक तथ्यो के अनुसार अकबर ने नगरकोट, नूरपुर और चम्बे पर हमला किया था. उसी दौरान अकबर ज्वाला मंदिर की ज्योति को बुझाने के प्रयास भी किये थे. इसमें असफल रहने के बाद वह मंदिर का विध्वंस करवा कर चला गया था. उसने वहां के सभी सेवादारों और पुजारियों की हत्या की और ज्योति स्थल को शिलाओं से ढंककर चला गया.
बाद में चंबा के राजा संसार चंद ने मंदिर का पुनर्निर्माण करवाया था. उसके बाद 1835 में महाराजा रणजीत सिंह ने मंदिर पर सोने का छत्र लगवाया था साथ ही महाराजा के पुत्र शेरसिंह ने मंदिर के मुख्य द्वार को चांदी से सजवाया. उसके बाद स्थानीय भक्तों और व्यापारियों ने समय समय पर इस स्थान का सौंदर्यकरण किया.
अकबर द्वारा माता के मंदिर में सोने का छत्र चढाने की कथा हिन्दू बिरोधियों ने हिन्दुओं को बहलाने के लिए शुरू कर दी और इस कथा के द्वारा अकबर की विध्वंशक कार्यवाहियों के बारे में तो बताया जाता है साथ ही उसका गलती मान लेना भी बताया जाता है. ऐसा बताने का उद्देश्य सिर्फ इतना है कि - अकबर की विध्वंशक कार्यवाहियों पर पर्दा डाला जा सके.
ज्वाला माता के मंदिर के विध्वंश को लेकर एक कहानी यह भी चलती है कि - मंदिर की ज्योति बुझाने में नाकाम रहने पर अकबर ने वहां के ध्यानु भगत के घोड़े की गर्दन कटवा दी और कहा कि ध्यानु अपनी माता से कहकर उसे जुड़वाये. तब ध्यानु भगत ने माता को अपनी गर्दन काट कर भेंट कर दी और माता ने ध्यानु और घोड़े दोनों को जिन्दा कर दिया.

जबकि अनेकों लोगों का यह मानना है कि - अकबर ने अपनी सेना द्वारा मंदिर के सभी पुजारियों और सभी सेवादारों की हत्या करवा दी थी. लेकिन बाद में अकबर के चापलूस हिन्दू दरबारियों ने अकबर के गुनाह पर पर्दा डालने के लिए यह कहानी प्रचारित कर दी कि - ध्यानु भगत ने खुद अपनी गर्दन काटकर चढ़ाई थी जिसे माता ने जोड़ भी दिया था.

Wednesday, 29 June 2022

शास्तार्थ में क्रोध उसी को आता है जो झूठ पर चल रहा होता है

भारत में शास्तार्थ (चर्चा)को बहुत महत्व दिया गया है. यहाँ हजारों साल से शास्तार्थ की परम्परा रही है. हमेशा विभिन्न बिषयों पर चर्चा होती रहती है और उस चर्चा से जो परिणाम प्राप्त होते हैं उनको आगे की चर्चा का आधार मानकर आगे फिर चर्चा होती है. इसी तरह चर्चा, प्रेक्षण, समीक्षा के द्वारा नए नए ज्ञान / विज्ञान की की खोज होती चली आई है.
भारतीय संस्कृति में हर तरह के बिचार को महत्त्व दिया जाता है. हर कोई अपने अलग बिचार रखने के लिए स्वतंत्र है, कोई भी यह नहीं कह सकता है कि जो वह करता है वही सबको करना पड़ेगा. किसी को भी कोई भी नियम जबरन मानने को बाध्य नहीं किया जाता. किसी भी तरह की जीवन शैली जीते हुए वह सनातन धर्म का हिस्सा रह सकता है.
अपने अपने बिचारों के समर्थन में तर्क और तथ्य अवश्य दे सकते हैं लेकिन दूसरों को उन्हें मानने के लिए बाध्य नहीं कर सकते. आस्तिक हो या नास्तिक, एकेश्वरवादी हो या बहुईश्वरवादी, मूर्तिपूजक हो या निराकार को मानने वाला, मांसाहारी हो या शाकाहारी, ग्रहस्त हो या ब्रह्मचारी, एक नारीव्रत हो या बहुविवाह समर्थक, इत्यादि किसी भी बिचारधारा पर चल सकता है.
भारत के किसी भी ज्ञानी, ऋषि, मुनि, महापुरुष, आदि ने कभी यह नहीं कहा कि जो मैं कह रहा हूँ वही अंतिम सत्य है और इसके आगे कुछ भी खोजा नहीं जा सकता. नई खोज के बाद जो बिचार अप्रासंगिक हो जाते हैं उनको लेकर भी किसी को अपमानित नहीं किया जाता है बल्कि यह कहा जाता है कि ऐसा उस काल में माना जाता था.
इसी प्रकार हजारो साल में लाखों विद्वानों ने समय समय पर अपनी खोजों और बिचारों से दुनिया को ज्ञान दिया. समस्या केवल तब पैदा हुई जब दुनिया में ऐसे कुछ विद्वान् आये जिन्होंने अपने फॉलोअर से कहा कि - मैं जो तुमको बता रहा हूँ, केवल वही अंतिम सत्य है और इस बिचार के अलावा अगर कोई कुछ कहता है तो वह हमारा दुश्मन है.
इस सोंच ने दुनिया को बहुत ज्यादा नुकशान पहुंचाया है. अलग अलग लोगों के अलग अलग बिचार होंगे ही और समय समय पर जब नई खोजें होंगी तो पुरानी सोंच को बदलना ही पड़ेगा. इसमें न किसी का कोई अपमान है और न ही किसी को किसी पर क्रोधित हों चाहिए. इन्ही चर्चाओं और समीक्षाओं से तो आगे और नया ज्ञान / विज्ञान खोजा जा सकता है.
शास्तार्थ में पराजित होना भी कोई अपमान जनक बात नहीं है क्योंकि इसी से नया ज्ञान मिलता है. यहाँ तो चर्चा और शास्तार्थ के समय क्रोधित हो जाने वाले व्यक्ति को, शास्तार्थ में पराजित माना जाता था. क्योंकि ऐसा माना जाता है कि जो व्यक्ति जानबूझकर की झूठ को सच साबित करने के लिए बहस करता है, उसको ही अपने झूठ की पोल खुलने पर क्रोध आता है.
इसलिए शास्तार्थ चलने रहने चाहिए और जो पुरानी बातें, नई खोजों के आने के बाद अप्रासंगिक हो जाए उन को मानने या मनवाने की जिद नहीं करनी चाहिए. आज हम जो जानते हैं कल उससे भी ज्यादा जानने को मिलेगा और हमारे आज के कई बिचार भी कल अप्रासंगिक हो जाएंगे इसलिए सभी को अपने बिचार रखने चाहिए लेकिन उनपर अड़ना नहीं चाहिए

Saturday, 4 June 2022

जिहाल ए मिश्कीन, मुकुन ब-रंजिश, बहाल ए हिजरा, बेचारा दिल है

 जिहाल ए मिश्कीन, मुकुन ब-रंजिश, बहाल ए हिजरा, बेचारा दिल है

सुनाई देती है जिसकी धड़कन , तुम्हारा दिल या हमारा दिल है : गुलामी


गुलामी फिल्म का यह गीत बहुत ज्यादा हिट हुआ था. इस गीत की पहली लाईन का सही उच्चारण बहुत ही कम लोग बोल पाते हैं, अर्थ समझना तो खैर बहुत ही मुश्किल है. मुझे लगा कि -इस पर पोस्ट लखी जाए.
यह गीत मूल रूप से अरबी / फारसी भाषा में अमीर खुसरो द्वारा लिखा गया है. लेकिन फिल्म में जो इसका भारतीयकृत हिन्दी रूप है वो गुलजार साहब ने लिखा है जिसको मिथुन चक्रवर्ती / अनीताराज / हुमाखान पर फिल्माया गया है.
इस गीत के बोल और भावार्थ तथा मूल गीत (अमीर खुसरो) भी प्रस्तुत है :-
जिहाल ए मिश्कीन, मुकुन ब-रंजिश, बहाल ए हिजरा, बेचारा दिल है
zihaal-e-miskeen mukon ba-ranjish, bahaal-e-hijra bechara dil hai
zihaal = notice
miskeen = poor
mukon = do not
ba-ranjish = with ill will, with enimity
bahaal = fresh, recent
hijra = separation
Thus the meaning is: Notice the poor (heart), and do not look at it (heart)
with enimity. It (heart) is fresh with the wounds of separation.
अर्थात -
ये गरीब (मजबूर) दिल, जुदाई के गमो से अभी तक ताजा है,
इसकी बेचारगी को बिना रंजिश के देखो.
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अमीर खुसरो का मूल गीत
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ज़ेहाल-ए-मिस्कीं मकुन तग़ाफ़ुल
दुराये नैना बनाये बतियाँ
कि ताब-ए-हिज्राँ न दारम ऐ जाँ
न लेहु काहे लगाये छतियाँ
चूँ शम्म-ए-सोज़ाँ, चूँ ज़र्रा हैराँ
हमेशा गिरियाँ, ब-इश्क़ आँ माह
न नींद नैना, न अंग चैना
न आप ही आवें, न भेजें पतियाँ
यकायक अज़ दिल ब-सद फ़रेबम
बवुर्द-ए-चशमश क़रार-ओ-तस्कीं
किसे पड़ी है जो जा सुनाये
प्यारे पी को हमारी बतियाँ
शबान-ए-हिज्राँ दराज़ चू ज़ुल्फ़
वरोज़-ए-वसलश चूँ उम्र कोताह
सखी पिया को जो मैं न देखूँ
तो कैसे काटूँ अँधेरी रतियाँ

Friday, 3 June 2022

क्या मुसलमानो में वास्तव में जातिवाद नहीं है ?

मुसलमान अक्सर कहते हैं कि - उनके यहाँ कोई भेदभाव नहीं है जबकि वास्तविकता यह है कि इनके यहाँ इतने अधिक प्रकार के वर्गीकरण है और उनमे इतना भेदभाव है कि एक दूसरे से जातीय दंगा और जातीय नरसंहार तक कर देते हैं.

भारत में भी आपने कई बार शिया और सुन्नी के बीच दंगा होने की खबर कई बार सुनी होगी. इसके अलाबा ईराक और अफगानिस्तान में सुन्नियों के द्वारा लाखों शियाओं की हत्या की गई थी यह भी आपने टीवी और समाचार पत्रों में देखा ही होगा.
शिया और सुन्नी का भेद तो मात्र कुछ मान्यताओं को लेकर ही है लेकिन आर्थिक, सामाजिक और पेशे के आधार पर भी बहुत भेदभाव है. सामजिक प्रतिष्ठा के आधार पर मुसलमानो का अशराफ, अजलाफ और अरज़ाल में वर्गीकरण होता है.
अशराफ या शोरफा :- अशराफ का अर्थ होता है शरीफ या उच्च, इस शब्द का बहुवचन 'शोरफा' भी होता है. इसमें बाहर से भारत में आए हुए अरबी, ईरानी, तुर्की, सैयद, शेख, मुगल, मिर्जा, पठान आदि जातियां आती है, जो भारत में शासक भी रहीं हैं.
जिल्फ या अजलाफ :- जिलफ का अर्थ होता है -असभ्य. और जिल्फ का बहुवचन "अजलाफ" है. जिसमें अधिकतर शिल्पकार जातियां आती हैं. जैसे - दर्जी, धोबी, धुनिया, गद्दी, सब्जिफरोस ,बढई, लुहार, हज़्ज़ाम, जुलाहा, कबाड़िया, कुम्हार, मिरासी, आदि
रजील या अरज़ाल :- रजील का अर्थ होता है - नीच और इसका बहुवचन है अरज़ाल. इसमें तथाकथित छोटा काम करने वाली जातियां आती है. इसमें हलालखोर, भंगी, हसनती, लाल बेगी, मेहतर, नट, गधेरी आदि जैसी जातियां आती है.
अशराफ में वो लोग आते हैं जो अपने आपको अरब, ईरान, तुर्की, आदि बाहरी देशों से आया असली मुस्लमान मानते है. जिल्फ और रजील में भारतीय मूल की जातिया है जो हिन्दू से कन्वर्ट हुए हैं. इन दोनों को संयुक्त रूप से पश्मांदा भी कहा जाता है
भारत में जो मुस्लिम रहते हैं उनमे से लगभग 15 प्रतिशत "अशराफ" जो खुद को बाहर से आया हुआ असली मुस्लमान मानते है और लगभग 85% पसमांदा (अज़लाफ़ + रजील ) है जो भारतीय मूल के है लेकिन धर्म परिवर्तन कर मुसलमान बने थे
मुसलमनो में केवल यही दो प्रकार ( शिया सुन्नी और अशराफ पश्मांदा) के वर्गीकरण नहीं है. इनके बीच फिरकों के आधार पर, मान्यताओं (बरेलबी / देवबंदी), आदि के आधार पर, और भी कई प्रकार के वर्गीकरण हैं, जिसके कारण भी काफी भेदभाव है.
इसलिए यह कहना कि जातीय भेदभाव केवल हिन्दुओं में ही होता है सरसार झूठ है. भारत में बाहर से आये हुए "अशराफ" मुसलमनो के वंशज आज भी अपने आपको भारतीय मूल के पसमांदा (अज़लाफ़ + रजील ) मुसलमानो से श्रेष्ठ मानते हैं