Sunday, 24 April 2022

सन्त कबीर दास जी की मृत्यु कहाँ और कैसे हुई ?

संत कबीर दास जी की मृत्यु कैसे हुई, इसको लेकर दो तरह की बातें कही जाती है. पहली यह कि- वे अपनी मृत्यु से पहले मगहर चले गए थे. अपने अंतिम समय में एक दिन वे चादर ओढ़ कर सो रहे थे. जब भक्तों ने चादर हटाई तो देखा वहां कबीर नहीं थे बल्कि कुछ फूल पड़े थे. उनके शिष्यों ने वो फूल आपस में बाँट लिए और उनका अंतिम संस्कार कर दिया.

हिन्दुओं के उन फूलों का अग्नि संस्कार कर दिया तथा मुसलमानों ने उन फूलों को दफनाकर वहां उनकी मजार बना दी. जबकि दुसरी कथा यह है कि - सिकंदर लोधी ने उनके सर को हाथी से कुचलवाकर उनकी हत्या की थी. कबीर दास जी के फूल बन जाने की कथा को इतिहास में मान्यता प्राप्त है जबकि ऐसी बातों को तो, खुद कबीर भी नहीं मानते थे.
कबीर दास जी ने जीवन भर आडम्बरों का बिरोध किया. वे चमत्कारों में कतई विश्वास नहीं करते थे. मगर उनकी मृत्यु के बाद खुद कबीर के अनुयायियों ने संत कबीर को एक चमत्कारी पुरुष से लेकर भगवान् तक घोषित कर दिया. यदि कबीर दास जी जीवित होते और उनके सामने किसी और की कोई ऐसी कहानी बताई जाती, तो वे उस पर कभी विशवास नहीं करते.
संत कबीर दास जी 15वीं सदी के भारतीय रहस्यवादी कवि और संत थे. वे हिन्दी साहित्य के भक्तिकालीन युग में ज्ञानाश्रयी-निर्गुण शाखा की काव्यधारा के प्रवर्तक थे. इनकी काव्य रचनाओं ने हिन्दी भाषी प्रदेश के भक्ति आंदोलन को काफी गहराई तक प्रभावित किया. था. स्वामी रामानंद को उन्होंने अपना गुरु धारण किया हुआ था.
कबीर पढ़े लिखे नहीं थे लेकिन संतों की संगत और लोगों के जीवन का बारीकी अध्यन करने के कारण उनको असीम ज्ञान प्राप्त हो गया था. उनकी रचनांओ में निराकार ब्रह्म और गुरु की महिमा का बहुत वर्णन है. इसके अलावा उनके दोहे, सामान्य जीवन में सच बोलने, गुरु पर विशवास करने और अच्छे काम करने की शिक्षा देते है.
इसके अलावा उन्होंने धार्मिक आडम्बरों के खिलाफ भी बहुत बोला तथा लोगो को इससे बचने की सलाह दी. अनेकों हिन्दू और मुसलमान उनके शिष्य बन गए लेकिन इन बातों से हिन्दुओं और मुसलमानों के अनेकों तथकथित धर्मगुरु उनसे नाराज भी रहने लगे थे. हालांकि हिन्दू जनता ने उन तथाकथित हिन्दू धर्मगुरुओं की बातों पर ध्यान नहीं दिया.
एक बार दिल्ली के सुलतान सिकंदर लोधी का काशी आगमन हुआ. मुल्ला मौलवियों ने राजा के पास कबीर की शिकायत करते हुए कहा कि - वो काफिर जुलाहा लोगों को भड़काता है. अगर वह यूं ही ये सब करता रहा तो नए लोग तो इस्लाम कबूलना बंद करेंगे ही, हो सकता है पहले से इस्लाम कबूल चुके लोग भी इस्लाम को छोड़कर काफिर बन जाएँ.
तब सिकंदर लोधी ने कबीर को दरबार में हाजिर होने का आदेश दिया, परन्तु कबीर दरबार में नहीं गए. इस पर नाराज होकर सिकंदर लोधी ने कबीर की माता नीमा को पकड़कर लाने का आदेश जारी कर दिया. तब अगले दिन कबीरदास जी तुलसी माला पहनकर, चंदन लगाकर और पगड़ी बांधकर, सुलतान के दरबार में जाने के लिए निकल पड़े.
सिकंदर ने कबीर से कहा कि - मेरे आदेश पर तुम दरबार में क्यों नहीं आये, तो कबीर ने कहा - ''हमारा बादशाह राम (निराकार ब्रह्म) है". इसपर सिकंदर लोधी आगबबूला हो गया. उसने कबीर से इस्लाम कबूलने और कुरआन की शिक्षाओं को अपने दोहों के रूप में लिखने को कहा. लेकिन कबीर ने इससे इनकार कर दिया.
तब सिकंदर लोधी ने कबीर को दर्दनाक मौत देकर मारने की सजा सुनाई. कबीर के सर को हाथी के पैर के नीचे कुचलकर मारने का आदेश दिया गया. कुछ लोगों ने राजा को सलाह दी कि - काशी में कबीर के बहुत शिष्य हैं अगर यहाँ ऐसे सजा दी तो प्रजा बगावत भी कर सकती है. तब यह तय हुआ कि - कबीर को मगहर लेजाकर सजा दी जायेगी.
कबीर की पत्नी "लोई" और पुत्र "कमाल' रोने लगे और राजा से विनती की कि- आप जो कहोगे हम वो करेंगे लेकिन "कबीर" को माफ़ कर दें. लेकिन कबीर ने राजा से कहा-
माली आवत देखिकर, कलियन करी पुकार।
फूले फूले चुन लिए, काल्हि हमारी बार।
(अर्थात - 'मुझे तो मरना ही था; आज नहीं मरता तो कल मरता, लेकिन सुलतान कब तक इस गफलत में भरमाए पड़े रहोगे कि - वह कभी नहीं मरेंगे?)
कबीर को जंजीर से बांधकर मैदान में डाल दिया गया. वहां मौजूद काजी ने कबीर से कहा कि - कुछ ही क्षणों में तुम्हारी मौत हो जायेगी लेकिन अगर तुम इस्लाम कबूल कर लो, तो तुम्हारी सजा माफ़ हो जायेगी साथ ही तुमको जिन्दा पीर घोषित कर दिया जाएगा. कबीर के इनकार करने पर, काजी ने महावत को आगे बढ़ने का आदेश दे दिया.
लेकिन हाथी जब कबीर के पास पहुंचा तो कबीर के सामने आदरभाव से बैठ गया. तब हाथी को क्रोधित करने के लिए महावत ने उसके सिर पर चोट मारी, लेकिन हाथी आगे बढ़ने के बजाय, चिंघाड़कर विपरीत दिशा में भागने लगा.इस पर नाराज होकर काजी ने महावत से कहा कि- मैं तुझे छड़ी से पीटूंगा और तेरे इस हाथी को कटवा डालूंगा.
तब महावत ने किसी तरह हाथी को काबू कर, सजा को पूरा कराया. सरकारी इतिहास में यह लिखा गया है कि- कबीर दास जी चादर ओढ़कर लेटे जब उनकी चादर हटाई गई तो देखा वहां कुछ फूल पड़े हुए थे. उनके शिष्यों ने फूल आपस में बाँट लिए. हिन्दुओं ने फूलों का अग्नि संस्कार कर दिया और मुसलमानों ने उन्हें दफना दिया.
जो कबीर दास जिन्दगी भर चमत्कार और आडम्बरों का बिरोध करते रहे, उन कबीर दास जी की म्रत्यु को ही एक चमत्कार बना दिया गया और उनके कुछ तथाकथित अनुयायियों ने उन्हें भगवान् कहकर पूजना शुरू कर दिया. जो कबीर मजार पूजा के खिलाफ थे उन्ही कबीर की मजार बनाकर वहां मजार पूजन किया जाने लगा.
कबीर को जिस समय हाथी के पैरों तले कुचलवाया जा रहा था, उस समय कबीर का एक शिष्य भी वहां मौजूद था, उसने उस घटना का वर्णन इस प्रकार से किया है.
अहो मेरे गोविन्द तुम्हारा जोर, काजी बकिवा हस्ती तोर।
बांधि भुजा भलैं करि डार्यो, हस्ति कोपि मूंड में मार्यो।
भाग्यो हस्ती चीसां मारी, वा मूरत की मैं बलिहारी।
महावत तोकूं मारौं सांटी, इसहि मराऊं घालौं काटी।
हस्ती न तोरे धरे धियान, वाकै हिरदै बसे भगवान।
कहा अपराध सन्त हौ कीन्हा, बांधि पोट कुंजर कूं दीन्हा।
कुंजर पोट बहु बन्दन करै, अजहु न सूझे काजी अंधरै।
तीन बेर पतियारा लीन्हा, मन कठोर अजहूं न पतीना।
कहै कबीर हमारे गोब्यन्द,
चौथे पद में जन का ज्यन्द

Wednesday, 20 April 2022

एकलव्य ने जो किया था वह अगर कोई आज करे तो उसका क्या हाल होगा ?

महाभारत काल में हस्तिनापुर और मगध दो शक्तिशाली दुश्मन राज्य थे. उस समय अनेकों छोटे राज्य थे जिनमे से कोई हस्तिनापुर से मित्रता रखता था और तो कोई मगध से.
हस्तिनापुर के राजा थे धृतराष्ट्र जो पितामह भीष्म के निर्देशन में राज करते थे और मगध का राजा था जरासंध.

जरासंध इतना शक्तिशाली राजा था कि उसके कारण भगवान् श्रीकृष्ण को भी मथुरा छोड़कर जाना पड़ गया था. उस जरासंध सेना का प्रधान सेनापति था "हिरण्यधनु". उस हिरण्यधनु का पुत्र था "एकलव्य"

द्रोणाचार्य का गुरुकुल हस्तिनापुर का प्राइवेट गुरुकुल था. यह कोई साधारण गुरुकुल नहीं था बल्कि सैन्य शिक्षा देने वाला स्कूल था जिसमे साधारण हथियारों से लेकर दिव्यास्त्रों तक को चलाने का प्रशिक्षण दिया जाता था.
जहाँ हस्तिनापुर के राजकोष से चलने वाले द्रोणाचार्य के इस गुरुकुल में हस्तिनापुर राज घराने के बच्चों के अलावा केवल द्रोणाचार्य का बेटा अश्वत्थामा ही पढता था. इस सौनिक स्कूल में छुपकर एकलव्य उनकी कार्यवाहियों को देखता था.
उसके बाद वह वहां से कहीं दूर जंगल में जाकर अभ्यास करता था. वहां उसने द्रोणाचार्य की एक मूर्ति बनाकर रखी थी जिससे उसे यह अहसास रहे कि वह अपने गुरु के सामने है. इस तरह से अभ्यास करके उसने बहुत कुछ सीख लिया.
अगर आपको आज यह पता चले कि पाकिस्तान या चीन का कोई सैनिक भेष बदलकर भारत के सैनिक स्कूल में जाता है या वो भारत के दिव्यास्त्रों (मिसाइल, एटम बम, एयरक्राफ्ट, आदि) की जानकारी हाशिल कर रहा है, तो क्या होगा ?
इसी प्रकार जब एकलव्य की सच्चाई गुरु द्रोणाचार्य के सामने आई तो उन्होंने उसका अंगूठा कटवा दिया. यह उन्होंने जबरन न करवा कर उसको बातों में उलझाकर खुद उसके ही हाथों कटवा दिया. यह कोई जातीय भेदभाव का मामला था ही नहीं.
यह तो द्रोणाचार्य की हस्तिनापुर के प्रति बफादारी थी. उन्होंने मगध के प्रधान सेनापति के बेटे को सरकार को सौंपने के बजाय खुद ही फैसला कर दिया और उसे जाने दिया. एक तरह से उन्होंने हस्तिनापुर के दुश्मन को प्यार से सजा दे दी थी.
जब वह वापस मगध पहुंचा तो उसका मगध में स्वागत हुआ. मगध के राजा जरासंध ने एकलव्य को अपने साम्राज्य के अधीन एक छोटे राज्य श्रृंगबेर का राजा बना दिया. जब मगध की मथुरा से लड़ाई हुई तो एकलव्य ने मगध की ओर से युद्ध में हिस्सा लिया
एकलव्य ने अपनी चार उँगलियों से वाण चलाकर अकेले ही सैकड़ों यादव योद्धाओं का वध कर दिया था. उसके बारे में जानकार खुद श्रीकृष्ण उससे युद्ध करने पहुंचे, उन्हें अपनी आंखों पर विश्वास ही नहीं हुआ था, तब कृष्ण ने खुद एकलव्य का वध किया था.
जब महाभारत का युद्ध हुआ था तब दुर्योधन ने एकलव्य के बेटे केतुमान को श्रीकृष्ण के खिलाफ भड़काकर अपने साथ मिला लिया था. उस समय केतुमान ने भी द्रोणाचार्य के नेतृत्व में पांडवों से युद्ध किया था. अर्थात उसे भी द्रोणाचार्य से कोई शिकायत नहीं थी.
अब जरा यह सोंचिये कि एकलव्य ने जो किया था वह अगर कोई आज करे तो उसका क्या क्या काटा जा सकता है ? मैकाले और वामपंथियों की बातों में मत आओ अपनी अकल लगाओ.

जिस एकलव्य को वामपंथी इतिहास कार दलित, कमजोर और निःसहाय आदिवासी बताते है वह एकलव्य वास्तव में हस्तिनापुर के सबसे बड़े शत्रु मगध के प्रधानसेनापति (Chief of Armed forces ) हिरण्यधनु का पुत्र था, जो किसी भी तरह से हस्तिनापुर की शक्ति का पता लगाना चाहता था

चोरी से दूसरे देश का सैन्य विज्ञान सीखना आज भी एक बड़ा अपराध माना जाता है. ऐसे अपराध के लिए गर्दन तक काटी जा सकती है जबकि आचार्य ने तो दया दिखाते हुए केवल विद्या का दुरुपयोग रोकने भर की सजा दी. बाक़ी अगर केवल मूर्ति के सामने अभ्यास करने से विद्या आ सकती थी तो वह मगध के जंगल में जाकर मूर्ति बना लेता, आचार्य द्रोण के आश्रम के पास के जंगल क्यों छिप कर रहता था ?

Sunday, 13 March 2022

जम्मू & कश्मीर की हिंसा कोई राजनैतिक हिंसा नहीं थी बल्कि "गज्बा ए हिन्द" की शुरआत थी

19 जनवरी 1990 को एक साथ पूरी कश्मीर घाटी में एक साथ हिन्दुओं का कत्लेआम किया जाने लगा. उनकी ह्त्या करने वाले कोई विदेशी हमलावर नहीं थे बल्कि उनके अपने पड़ोसी मुस्लमान थे जिनके साथ वो बर्षों से रह रहे थे. वो हिन्दुओं को मार रहे थे और कह रहे थे कि या तो धर्म छोड़ दो या कश्मीर. अपनी औरतों को छोड़कर कश्मीर से भाग जाओ.
जब इस घटना का जिक्र करो यो अंधविरोधी उन कश्मीरी मुसलमानो के खिलाफ बोलने के बजाय, उस घटना का दोष उस समय की वी. पी. सिंह सरकार को समर्थन देने वाली भाजपा पर डालने की कोशिश करते हैं. इसके अलावा वे जगमोहन मल्होत्रा पर भी आरोप मढ़ने की कोशिश करते हैं जो उसी दिन जम्मू & कश्मीर के राज्य पाल बनाये गए थे.
अब सवाल यह है कि - अगर केंद्र में वीपी सिंह की सरकार थी, उप प्रधानमंत्री देवीलाल थे, गृहमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद थे, सरकार को भाजपा / वामपंथी बाहर से समर्थन दे रहे थे और कश्मीर के राजयपाल जगमोहन मल्होत्रा थे, तो क्या उन कश्मीरी मुसलमानो को निर्दोष मान लिया जाए जो अपने अपने पड़ोसी हिंदुओं को बर्बरता पूर्वक मार रहे थे ?
कश्मीर में हिन्दुओं के नरसंहार का केवल एक ही कारण था और वह था "गज्बा ए हिंद" की अवधारणा. कश्मीर मुस्लिम बहुल हो चुका था और उनको केवल कोई बहाना चाहिए था. उनको यह बहाना मिला था इस समय की राज्य सरकार को बर्खाश्त करने के से. कश्मीर में काफी दिनों से हिंसा हो रही थी जिसकी बजह से फारुख सरकार को बर्खाश्त किया गया था.
1989 से 1990 के दौरान फारुक अब्दुल्ला की सरकार थी. उस दौर में जेहादियों द्वारा हिन्दुओं पर लगातर हमले हो रहे थे. फारुख अब्दुल्ला सरकार हिन्दुओं को सुरक्षा देने और दहशतगर्दों को रोकने में नाकाम रही थी. इसकी बजह से 19 जनवरी 1990 को तत्कालीन वी.पी. सिंह सरकार ने फारुख अब्दुल्ला की राज्य सरकार को बर्खाश्त कर दिया गया.
इस बर्खाश्तगी का विरोध करने के लिए फारुख अब्दुल्ला के समर्थक सड़को पर आ गए और केंद्र सरकार के खिलाफ प्रदर्शन करने लगे. केंद्र सरकार के खिलाफ होने वाला यह प्रदर्शन देखते ही देखते हिन्दुओं के ऊपर हमलों में बदल गया. मस्जिदों के लाऊडस्पीकरो से हिन्दुओ को धर्म छोड़ने या कश्मीर छोड़ने के लिए कहा जाने लगा.
अनेको हिन्दू अपने ही पडोसियो द्वारा बर्बरता पूर्वक मार दिए गए. अनेको हिन्दू लड़कियों का बलात्कार कर हत्या कर दी गई. अनेकों घरों को आग के हवाले कर दिया गया. हालत बेक़ाबू हो गए थे. तब केंद्र सरकार ने जम्मू कश्मीर के राजयपाल के. वी. कृष्णा राव को हटाकर उनकी जगह जगमोहन मल्होत्रा को जम्मू कश्मीर का राज्यपाल नियुक्त किया.
जगमोहन मल्होत्रा पहले भी 5 साल तक (अप्रैल 1984 से लेकर जुलाई 1989 तक) जम्मू & कश्मीर के राज्यपाल रह चुके थे. 20 जनवरी को चार्ज सम्हालने के बाद उन्होंने पुलिस और सेना के सहयोग से हालत सम्हालने की कोशिश की लेकिन नाकाम रहे. तब उन्होंने सेना की सहायता से हिन्दुओं को ट्रकों द्वारा मुस्लिम बहुल इलाको से बाहर निकलवाने का काम किया
उन्होंने लाखों हिन्दुओं को जेहादियों से बचाकर हिन्दू बहुल जम्मू में पहुंचाया. वहां उनके रुकने, रहने, खाने की अस्थाई व्यवस्था की. अगर कोई कहता है कि - कश्मीर के विशाल इलाके में दूर -दूर रहने वाले लाखों हिन्दू, केवल एक गवर्नर के फुसलाने पर अपना घरवार छोड़कर कैंपों में रहने के लिए चले आये, तो यह बिचार ही केवल उनके मानसिक दिवालियेपन का सबूत है.
और हाँ तब तक जगमोहन मल्होत्रा जी का भाजपा से दूर दूर तक कोई वास्ता नहीं था. "जगमोहन" प्रधानमंत्री "इंदिरा गांधी" के बहुत खास ब्यूरोक्रेट थे. इंदिरा ने आपात काल (1975 से 1977) में उनके हाथ में काफी शक्तियां प्रदान की थी, आपातकाल के दिनों में ब्योरोकेशी के ऊपर उनका सीधा नियंत्रण था और वे इंदिरा गांधी / संजय गांधी को सीधे रिपोर्ट करते थे.
1977 में मोरारजी देसाई के नेतृत्व में जनता पार्टी की सरकार आने के बाद उनको खुड्डे लाइन लगा दिया गया और जबरन रिटायर कर दिया गया. 1980 में फिर से कांग्रेस की सरकार बनने पर "इंदिरा" ने "जगमोहन" को बहुत बड़ी जिम्मेदारियां दी थीं. उनको पहले गोवा -दमन-दीव का और फिर उनको दिल्ली का राज्यपाल बनाया.
एशियाड -82 के आयोजन की भी सारी जिम्मेदारी उनके पास थी. इंदिरा गांधी ने ही अप्रेल 1984 में जगमोहन को जम्मू & कश्मीर का राज्यपाल बनाया था. इंदिरा की हत्या के बाद उनके पुत्र राजीव गांधी के लगभग पूरे शासन काल में ( जुलाई 1989 तक) वे "जम्मू एवं कश्मीर" के राज्यपाल बने रहे. तब तक भारतीय जनता पार्टी से कोई भी वास्ता नहीं था.
कश्मीर में बे-हिसाब हिन्दुओं का लूटा व मारा गया और उनकी स्त्रियों को बे-आबरू किया किया. हिन्दुओं के घरों पर नोटिस लगा दिया जाता था कि - अपनी औरतों को छोड़ कर कश्मीर से चले जाओ. उस समय हिन्दुओं को जेहादियों से बचाने वाले जगमोहन, बाद में भी लगातार सरकारों से अपील करते रहे कि कश्मीर में सख्त कार्यवाही की जाय.
वी पी सिंह सरकार और चंद्र शेखर सरकार से तो कोई उम्मीद रखना ही बेकार था लेकिन बाद पी वी नरसिंहाराव (कांग्रेस) सरकार भी कश्मीर के हालात से उदासीन बनी रही. जगमोहन हर मंच से कश्मीर के हालात पर आवाज उठाते रहे लेकिन उनको नजरअंदाज किया जाता रहा, उस समय केवल भाजपा ने उनके नजरिये का समर्थन किया।
तब उन्होंने 1995 में "कांग्रेस" छोड़कर, "भाजपा" ज्वाइन की थी. इसलिए उनके "जम्मू एवं कश्मीर" का राज्यपाल रहते हुए किसी भी कार्यवाही को भाजपा से जोड़ना केवल बात को घुमाना है. "जम्मू एवं कश्मीर" का राज्यपाल रहते हुए उनका भाजपा से कोई सम्बन्ध नहीं था. वे तो बाद में राष्ट्रवादी नीतियों के कारण कई साल बाद भाजपा में आये थे.
Ashutosh Srivastava, Sanjeev Saxena and 4 others
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Wednesday, 2 March 2022

भारतीय युद्ध प्रणाली बनाम इस्लामी युद्ध प्रणाली

प्राचीन भारत में जब कोई राजा अपने राज्य का विस्तार करने की खातिर किसी अन्य राज्य पर आक्रमण करता था तो भी उनकी प्रजा अप्रभावित रहती थी. दोनों राजा अपनी अपनी सेना लेकर किसी निर्जन स्थान पर युद्ध करते थे जिससे प्रजा को कोई परेशानी न हो. युद्ध जीतने वाले राजा को, युद्ध हारने वाले राज्य की प्रजा अपना राजा मान लेती थी.

युद्ध के समय भी युद्ध के नियम होते थे. सूर्यास्त के बाद दोनों तरफ के सैनिक एक दूसरे से मिल सकते थे. युद्ध में हारने वाले राजा की सेना भी युद्ध की समाप्ति के बाद जीते हुए राजा की सेना का अंग बन जाती थी. युद्ध के समय कोई भी सैनिक किसी असैनिक नागरिक अथवा औरतों / बच्चो पर हाथ नहीं उठा सकता था.

कई शक्तिशाली राजा बिना युद्ध के ही अन्य राजा के राज्य को अपने राज्य में मिला लेते थे. इसके लिए वो अश्वमेघ यग्य करते थे. उनका घोड़ा जिस राज्य में जाता था उसका राजा या तो आधीनता स्वीकार कर लेता था या फिर युद्ध करता था. भारत में यह व्यवस्था सैकड़ों बर्ष तक चलती रही. राजा बदलने से प्रजा के जीवन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता था.

प्राचीन भारत का राजतंत्र भी एक तरह से आज के लोकतंत्र की ही तरह था. अंतर केवल इतना था कि आज जनता वोट देकर राजा को चुनती है और तब राजा को शस्त्र और शास्त्र के द्वारा अपनी योग्यता साबित करनी पड़ती थी. राज्यों की जनता राजा के बदलने पर उसी तरह अप्रभावित रहती थी जैसे आज चुनाव में दुसरी पार्टी के जीतने पर.

भारत में जनता की मुसीबत की शुरुआत हुई विदेशी और विधर्मी आक्रमणकारी लुटेरों के हमले के बाद. यह विदेशी आक्रमणकारी युद्ध जीतने के लिए आम जनता एवं औरतों / बच्चो को अपना निशाना बनाते थे. इस्लामी हमलावर जब किसी राज्य पर हमला करते थे हारे हुए राज्य की महिलाओ और सम्पत्ति को अपनी जीत का ईनाम समझते थे.   

यह “अमानव” दहशत फैलाने के लिए बच्चो की ह्त्या करते थे, औरतों से बलात्कार करते थे तथा नागरिकों को गुलाम बनाते थे. मंदिरों को तोड़ना, धार्मिक आस्था पर चोट पहुंचाना, लूटपाट करना इनका मुख्य काम था. इन लोगों के आक्रमण के बाद भारत की व्यवस्था ही बदल गई. सोने की चिड़िया कहलाने वाला भारत, बदहाल हो गया.

Saturday, 12 February 2022

गुरमीत राम रहीम : क्या है वह मामला, जिसमे वो जेल गया है ?

सेकुलर बाबा "गुरमीत राम रहीम" का एपिसोड समाप्त हो गया है और पूरा पश्चिमोत्तर भारत राहत की सांस ले रहा है. पंजाब, हरियाणा और पश्चिम उत्तर प्रदेश में विभिन्न गुरुओं के डेरों का जो जाल बिछा हुआ है उनकी ताकत के बारे में स्थानीय लोग अच्छे से जानते हैं. इनके पास धन, जन और राजनैतिक हर तरह की ताकत है.

अभी कुछ लोग जैसे रामपाल, आशाराम, गुरमीत राम रहीम, राम ब्रक्ष यादव , आदि जैसों के नाम ही सामने आये हैं. ऐसे न जाने कितने डेरे और दरगाहें हैं जहाँ अनेकों गैरकानूनी काम होते हैं. जिन का मामला खुला है उनको देखकर शायद भोली भाली जनता को अक्ल आये और वो डेरों और दरगाहों द्वारा छले जाने से बच जाए.
यह डेरे वाले बहुत चालाक होते हैं और थोक वोट दिलाने का लालच देकर नेताओं को अपने पीछे लगाए रखते हैं. अगर केवल "डेरा सच्चा सौदा" की बात करें तो यह मौका देखकर समय समय कभी कांग्रेस, कभी भाजपा, कभी अकाली और कभी इनलो का समर्थन करता रहा है और लाभ उठाता रहा है.
जिस मामले में सेकुलर बाबा "गुरमीत राम रहीम" को सजा हुई है यह मामला बहुत पुराना है. जिन लड़कियों के साथ 2001 में डेरे में बलात्कार हुआ था उनकी स्थानीय पुलिस ने शिकायत तक दर्ज नहीं की थी, शिकायत की बात खुद पुलिस द्वारा डेरे तक पहुंचा दी गई थी और डेरे वालों ने पीड़िताओं को धमकाया था.
उस समय हरियाणा में "ओम प्रकाश चौटाला" की सरकार थी. लेकिन उन बहादुर लड़कियों ने हार नहीं मानी और केंद्र सरकार के पास गुमनाम चिट्ठी भेजकर डेरे की पोल खोली. उस समय केंद्र में अटल बिहारी बाजपेई की सरकार थी. 13 मई 2002 को यह चिट्ठी प्रधान मंत्री कार्यालय को मिली थी.
अटल सरकार ने इस चिट्ठी को संज्ञान लेते हुए राज्य सरकार को निर्देश दिए लेकिन कोई ठोस कार्यवाही नहीं हुई. इसी बीच 10 जुलाई 2002 को डेरा सच्चा सौदा की प्रबंधन समिति के सदस्य रहे रणजीत सिंह की हत्या हो गई. इन लड़कियों ने रणजीत सिंह की बहन की तरफ से भी प्रधान मंत्री को चिट्ठी लिखबाई.
तब केंद्र की अटल सरकार ने पूरे मामले की सत्यता जांचने का जिम्मा 24 सितंबर 2002 को सीबीआई को सौंप दिया. सीबीआई ने बहुत तेजी से जांच शुरू की और ऐसा लगने लगा कि - डेरे का खेल अब एक दो साल से ज्यादा नहीं चल पाएगा. लेकिन इसी बीच 2004 में केंद्र और हरियाणा दोनों जगह कांग्रेस सरकार आ गई.
उसके बाद यह मामला अधर में लटक गया. इस बीच उन लड़कियों पर हर तरह से दबाब डाला गया कि - वे मामला वापस ले लें. लेकिन वे बहादुर लडकियां अपनी पैरवी करती रहीं. दस साल बाद केंद्र में फिर सत्ता परिवर्तन हुआ. इन लड़कियों ने फिर से मोदी सरकार को चिट्ठियां लिखी और कार्यवाही को तेज करने की मांग की.
इसी बीच हरियाणा में भी सत्ता परिवर्तन हो गया. अब डेरे पर सीबीआई का शिकंजा कसना शुरू हो गया. इस केस में सीबीआई ने जितना काम पहले 12 साल में किया था उससे ज्यादा पिछले 3 साल में किया. सीबीआई की मेहनत का नतीजा है कि - आज बलात्कारी बाबा जेल पहुंचा और उन पीडिताओ को न्याय मिल सका. —

डेरा सच्चा सौदा : धार्मिक स्थल नहीं बल्कि सेकुलरों और नाश्तिकों का डेरा है

 जब से "डेरा सच्चा सौदा" का प्रमुख "गुरमीत राम रहीम" जब बलात्कार, हिंसा और बेनामी सम्पत्ति, आदि के मामलों में फंसा है तब से सेकुलर लोग उसको हिन्दू साबित करने पर तुले हैं, जिससे उसके नाम पर हिन्दुओं को बदनाम किया जा सके. जबकि हकीकत यह है कि- डेरा सच्चा सौदा के अनुयायी अपने आपको हिन्दू नहीं बल्कि इन्सां कहा करते हैं.

यह डेरा किसी हिन्दू ने नहीं बल्कि एक मुसलमान ने ही शुरू किया था. इसके प्रमुख ने अपना नाम भी "गुरमीत राम रहीम" रखा हुआ था. इसके भक्त अपने घर में सनातन देवी देवताओं की पूजा नहीं करते हैं. इस डेरे की स्थापना भी किसी हिन्दू या सिक्ख ने नहीं बल्कि एक मुसलमान ने की थी, जिसका उद्देश गरीब हिन्दुओ को धर्म से भटकाना था.

एक बलूची मुसलमान "अमकुरेजुद्दीन खान" उर्फ़ "शाह मस्ताना" ने सन 1948 में "डेरा सच्चा सौदा" की स्थापना की थी. इस संस्थान का मुख्य उद्देश्य पंजाब के दलितों और गरीबो को अपने मूल धर्म (हिन्दू / सिक्ख ) से भटकाना था. इसके लोगो में "हिन्दू, मुस्लिम और सिख" तीनो धर्म के प्रतीक दिखाए गए है, ये अपने आपको "इन्सां" कहते हैं.
यह संभवता आज तक का सबसे सेकुलर डेरा है. लेकिन रेप केस मे फँसने और कई अन्य नए मामले सामने आ जाने के बाद, सेकुलर लोग इन लोगों को हिन्दू साबित करने पर तुले हैं जिससे कि- इसके नाम के सहारे हिन्दुओं को बदनाम किया जा सके. यह डेरा अपने स्थापना काल से लेकर आजतक कांग्रेस का समर्थक रहा है.
कांग्रेस हमेशा अपने आपको सेकुलर कहती आई है और कोई भी अपने आपको सेकुलर कहता है वह उसको बहुत प्रिय होता है. अपने आपको सेकुलर साबित करके ही इस डेरे ने, धर्म बिरोधी सेकुलरों को अपना अनुयाई बनाया. 2017 में पंजाब के विधानसभा चुनाव में भी डेरे ने कांग्रेस को अपना समर्थन दिया था.
डेरा सच्चा सौदा के भक्त सनातन देवी देवताओं को बुरा भला बोलते थे और "गुरमीत राम रहीम" को पिताजी बोलते थे. वे लोग अपने घर में देवी देवताओं के चित्र और मूर्ति भी नहीं रखते थे. लेकिन मीडिया का दोगलापन देखिये कि- जब कहीं कोई ढोंगी बाबा किसी गलत काम में पकड़ा जाता है तो मीडिया वाले उसको लेकर हिन्दू धर्म पर प्रहार करने लगते हैं.
जबकि इसके उलट जब कोई आतंकी जो खुद अपने आपको सच्चा मुसलमान बताते हुए, निर्दोष लोगों की ह्त्या करता है, तो यही मीडिया उसको मुसलमान कहने से डरती है और उसके मुसलमान न कहकर भटका हुआ इंसान बताता है. तब अपनी बात को और बजनदार बनाने के लिए साथ में यह भी जोड़ देते हैं कि- आतंकी का कोई धर्म नहीं होता.

Thursday, 10 February 2022

उडुपी वाले : जिन्होंने महाभारत के युद्ध के समय दोनों सेनाओ को भोजन कराया था

उडुपी दक्षिण भारत के सबसे प्रसिद्ध तीर्थ स्थलों में से एक है. यहाँ भगवान् श्रीकृष्ण को समर्पित कई भव्य मंदिर है. जिनमे "अनंतेश्वर मंदिर" सबसे प्राचीन एवं प्रशिद्ध है. यहां पर भगवान की आकर्षक मूर्ति को रत्नों और स्वर्ण रथ से सजाया गया है. सारा उडुपी नगर इस मंदिर के चारो और बसा हुआ है. इस नगर को दक्षिणी भारत का मथुरा कहा जाता है.


"अनंतेश्वर मंदिर" को जो चीज खास बनाती है, वह है इस मंदिर की पूजा पद्धति. यहां पूरी पूजा की प्रार्थना और प्रक्रिया एक चांदी की परत वाली खिड़की से होती है जिसमें नौ छेद होते हैं जिन्हें “नवग्रह किटिकी” कहा जाता है. उडुपी अनंतेश्वर मंदिर के नाम से जाने जाने वाले कई मंदिर श्रीकृष्ण मठ के चारों ओर हैं. मंदिर में एक आश्रम भी है,
उडुपी मठ में जन्माष्टमी, राम नवमी, नरसिंह जयंती, वसंतोत्सव, अनंत चतुर्दशी और मेघ संक्रांति के त्योहार को भव्य रूप से मनाया जाता है. उडुपी को बेहतरीन खाना बनाने वाले रसोइयों के लिए भी जाना जाता है. उडुपी का जिक्र महाभारत में भी होता है. कहा जाता है कि - महाभारत के युद्ध के समय दोनों ही सेनाओ के लिए भोजन उडुपी वालों ने ही बनाया था.
कहा जाता है कि - उडुपी के राजा महान कृष्ण भक्त थे. उनके पांडवो और कौरवों दोनों से ही बहुत अच्छे समबन्ध थे. जब पांडवो और कौरवों का युद्ध तय हो गया तो दोनों ने ही उडुपी के राजा से सहातया मांगी और दोनों से मित्रता होने के कारण, वे किसी को भी इंकार नहीं कर सके. लेकिन अपने बचन को कैसे निभाए इसको लेकर धर्म संकट में फंस गए.
वे अपनी दुविधा को लेकर श्रीकृष्ण के पास पहुंचे और कहा जिस तरह आपके कौरवो और पांडवों से समबन्ध है वैसे ही मेरे भी दोनों से मित्रवत सम्बन्ध है. आपने तो एक को अपनी सेना और दूसरे को खुद को सौंप दिया है, मुझे भी कोई ऐसा मार्ग दिखाइये कि- मैं धर्मसंकट से निकल सकूँ. तब श्रीकृष्ण ने ऐसा उपाए बताया कि - कई समस्याओं का समाधान हो गया.
दोनों सेनाओ के लिए बहुत सारे भोजन की आवश्यकता होगी और आप उडुपी के लोग अपनी पाक कला के लिए बहुत प्रशिद्ध हैं. आप दोनों सेनाओं के लिए भोजन की व्यवस्था सम्हालिए. इस तरह आपका दोनों की सहायता करने का बचन भी पूरा हो जाएगा और किसी की हत्या करने का पाप भी नहीं लगेगा. उडुपी राजा ने पूँछा- मुझे कैसे पता चलेगा कि कितना भोजन बनाना है ?
तब श्रीकृष्ण ने एक मूंगफली खाते हुए मुस्कराकर कहा - इसका संकेत मैं तुम्हे दूँगा. उसके बाद उडुपी राजा श्रीकृष्ण को प्रणाम कर, कौरवों और पांडवो से मिले. कौरव और पांडव भी इस प्रस्ताव से बहुत प्रसन्न हुए क्योंकि अपनी विशाल सेनाओं को भोजन कराने की समस्या से वे लोग भी चिंतित थे. इस प्रकार श्रीकृष्ण ने सभी की समस्या का समाधान कर दिया।
महाभारत युद्ध 18 दिन तक चला और हर दिन हजारों लाखों योद्धा, सैनिक मारे जाते थे. इस हिसाब से जैसे-जैसे सैनिक घटते जा रहे थे, महाराज उडुपी भी उनके लिए कम भोजन बनाते थे, ताकि भोजन का नुकसान न हो. आश्चर्यजनक बात थी कि हर दिन, सभी सैनिकों के लिए भोजन बिल्कुल पर्याप्त होता था. न कभी कम पड़ता था और न ही कभी फेंकना पड़ता था.
युद्ध की समाप्ति के बाद उडुपी राजा के सहायक ने उडुपी राजा से कहा- आप जितना भोजन बनाने को कहते थे हम उतना ही भोजन बनाते थे लेकिन आपको यह कैसे पता चल जाता था कि - आज शाम को इतने हजार कम सैनिक भोजन करेंगे अर्थात आज इतने सैनिको और योद्धा मारे जाएंगे उसकी इतनी सटीक संख्या का पता आपको कैसे चल जाता था.
तब उडुपी राजा ने कहा - 'हर रात के भोजन के उपरांत सोने से पहले श्रीकृष्ण के पांडाल में जाता था और एक प्याले में उबले हुए मूंगफली के दाने गिनकर रख देता था. सुबह को जब वह प्याला उठाकर लाता था तो दानो को फिर गिनता था. जितने दाने कम मिलते थे, मैं उतने हजार लोगों का खाना उस दिन कम बनबाता था. अर्थात उतने हजार लोग उस दिन मारे जाते थे.
युद्ध की समाप्ति के बाद जब उडुपी राजा वापस जाने लगे तो श्रीकृष्ण ने उनको वरदान दिया कि- उडुपी के लोग जन्मजात पाक कला में निपुण होंगे. उनकी पाक कला विश्व में विख्यात होगी. उडुपी वालों के भोजन से कभी कोई असंतुष्ट नहीं होगा. वे किसी कार्यक्रम में भोजन बनायेंगे तो न वह कभी कम पड़ेगा और न ही कभी बेकार जाएगा.