Monday, 2 September 2019

मदन लाल धींगरा

मदन लाल ढींगरा का जन्म 18 फरवरी 1883 को पंजाब के अमृतसर शहर में एक संपन्न हिंदू परिवार में हुआ था. उनके पिता सिविल सर्जन थे और अंग्रेज़ी रंग में पूरे रंगे हुए थे. उनका परिवार अंग्रेजों का विश्वासपात्र था. परन्तु मदनलाल का ननिहाल और उनकी माताजी अत्यन्त धार्मिक एवं राष्ट्रवादी संस्कारों से परिपूर्ण थे.
माँ के कारण मदन लाल के मन भी क्रांतिकारी सोंच पैदा हो गई. लाहौर में पढ़ाई करते समय वे क्रांतिकारियों के संपर्क में आये. परन्तु क्रांतिकारियों से सम्बन्ध रखने के कारण उन्हें कालेज से निकाल दिया गया. इससे नाराज होकर उनके पिता ने भी उनको घर से निकाल दिया. तब जीवन यापन करने के लिए उन्होंने मजदूरी भी की.
कारखाने में मजदूरी करते समय उन्होंने वहां यूनियन बनाने का प्रयास किया तो उन्हें वहां से भी निकाल दिया गया. उसके बाद वे अपने बड़े भाई की सलाह मानकर घर वापस आ गए और मेकेनिकल इंजीनियरिग की पढ़ाई करने लंदन चले गए. क्रांतिकारी बिचारों के मदन लाल पढ़ाई से ज्यादा क्रांतिकारी गतिबिधियों में रूचि रखने कगे.
वहां वे भारत के प्रख्यात राष्ट्रवादी विनायक दामोदर सावरकर एवं श्यामजी कृष्ण वर्मा के सम्पर्क में आये. वे लोग भी धींगड़ा की प्रचण्ड देशभक्ति से बहुत प्रभावित हुए. सावरकर ने उन्हें हथियार चलाने का प्रशिक्षण दिया. ढींगरा 'अभिनव भारत मंडल' के सदस्य होने के साथ ही 'इंडिया हाउस' नाम के संगठन से भी जुड़ गए.
इस दौरान सावरकर और ढींगरा के अतिरिक्त ब्रिटेन में पढ़ने वाले अन्य बहुत से भारतीय छात्र भारत में खुदीराम बोस, कनानी दत्त, सतिंदर पाल और कांशीराम जैसे देशभक्तों को फाँसी दिए जाने की घटनाओं से तिलमिला उठे और उन्होंने बदला लेने की की कसम खाई. और लन्दन में बड़ा काण्ड करने का निर्णय लिया.
पहले उनलोगो वाइसराय लॉर्ड कर्ज़न को भी मारने की कोशिश की थी पर वह कामयाब नहीं हो पाए थे. इसके बाद सावरकर जी ने मदनलाल को साथ लेकर भारत सचिव के राजनीतिक सलाहकार सर विलियम हट कर्जन वायली को मारने की योजना बनाई और मदनलाल को साफ कह दिया गया कि इस बार किसी भी हाल में सफल होना है.
1 जुलाई सन् 1909 की शाम को इण्डियन नेशनल ऐसोसिएशन के वार्षिकोत्सव में भाग लेने के लिये भारी संख्या में भारतीय और अंग्रेज इकठे हुए. जैसे ही कर्जन वायली अपनी पत्नी के साथ हाल में घुसे, ढींगरा ने उनके चेहरे पर पाँच गोलियाँ दाग दी.कर्ज़न को बचाने की कोशिश करने वाला पारसी डॉक्टर कोवासी लालकाका भी ढींगरा की गोलियों से मारा गया.
उसके बाद धींगड़ा ने अपने पिस्तौल से स्वयं को भी गोली मारनी चाही किन्तु उन्हें पकड़ लिया गया. उनपर मुकदमा चलाया गया तो उन्होंने कहा कि- "ब्रिटिश सरकार को कोई हक़ नही है मुझ पर मुकदमा चलाने का. जो ब्रिटिश सरकार भारत मे लाखो बेगुनाह देशभक्तों को मार रही है और हर साल 10 करोड़ पाउंड भारत से इंग्लैंड ला रही है,
उस सरकार के कानून को वो कुछ नही मानते, इसलिए इस कोर्ट मे वो अपनी सफाई भी नही देंगे, जिस जो करना है कर लो”. जब उन्हे म्रत्यु दंड देकर ले जाने लगे, तो उन्होने जज को शुक्रिया अदा करते हुए कहा था - “शुक्रिया ,आपने मुझे मेरी मात्रभूमि के लिए जान नियोछावर करने का मोका दिया”
23 जुलाई 1909 को अदालत ने उन्हें मृत्युदण्ड की सजा सुनाई. 17 अगस्त सन् 1909 को लन्दन की पेंटविले जेल में फाँसी पर लटका कर अमर कर दिया गया. उनका अंतिम संस्कार भी अंग्रेजी सरकार ने किया था क्योंकि उनके राजभक्त परिवार ने उनसे सभी सम्बन्ध समाप्त करने की घोषणा कर दी थी
वीर सावरकर ने उनके शव का अंतिम संस्कार करना चाहां, मगर उनकी मांग को ठुकरा दिया गया.

क्रान्तिकाल के भामाशाह : मेमन अब्दुल हबीब युसूफ मारफानी

द्वितीय विश्वयुद्ध प्रारम्भ हो चूका था. जर्मन, जापान, इटली, आदि देश अंग्रेजों और उनके मित्रदेशों पर कहर वरपा रहे थे. अंग्रेजों की हालत खराब थी. "दुश्मन का दुश्मन दोस्त होता है" और इसी नीति पर चलते हुए महान क्रांतिकारी नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ने अंग्रेजों के खिलाफ जर्मन -जापान - इटली का साथ देने का निर्णय लिया.
नेताजी सुभाष चन्द्र बोस जर्मन जाकर हिटलर से मिले और विश्वयुद्ध में अंग्रेजों के खिलाफ भारत की जनता द्वारा हिटलर की मदद करने का बचन दिया. उन्होंने आजाद हिन्द फ़ौज का पुनर्गठन किया. उन्होंने भारतीय मूल के ब्रिटिश सैनिको और आम नागरिकों से आजाद हिन्द फ़ौज में शामिल होने और आर्थिक मदद करने आव्हान किया.
लाखों युवा नेताजी के आव्हान पर आजाद हिन्द फ़ौज में शामिल हो गए या फिर अपने आपको आजाद हिन्द फ़ौज का सैनिक कहते हुए अपने अपने गाँव / शहर / कसबे में ही अंग्रेजों और अंग्रेजों के चापलूस भारतीयों के खिलाफ कार्यवाही करने लगे. आजाद हिन्द फ़ौज ने भारत में ब्रिटिश साम्राज्य की जड़ों को खोखला कर दिया.
ऐसे समय में जब अंग्रेज कमजोर हो गए थे तब अंग्रेजो के द्वारा बनाई गई और देशी अंग्रेजों द्वारा चलाई जा रही पार्टी "कांग्रेस" ने विश्वयुद्ध में अंग्रजों का साथ देने का ऐलान कर दिया. अब भारत में ही आम जनता दो वर्गों में विभाजित हो गई. अब विश्वयुद्ध में सुभाष समर्थक अंग्रेजों के खिलाफ थे और गांधी समर्थक अंग्रेजों के साथ थे.
नेताजी को अंग्रेजों से लड़ाई जारी रखने के लिए, अपनी फ़ौज के लिए बहुत ज्यादा धन की आवश्यकता थी. उन्होंने भारतीयों से आर्थिक मदद का आव्हान किया. उनके आव्हान पर देशभक्तों ने अपना धन-सोना-चांदी आदि आजाद हिन्द फ़ौज को समर्पित कर दिया. उस समय सौराष्ट्र के एक मुस्लिम व्यापारी ने जो किया वह तो बेमिशाल है.
सौराष्ट्र (गुजरात) के एक धनवान व्यापारी "मेमन अब्दुल हबीब युसूफ मारफानी" उस समय रंगून में थे. उन्होंने नेताजी सुभाष चन्द्र बोस से रंगून में मुलाक़ात की और सारी पूंजी, सोना, जायदाद "आजाद हिन्द फ़ौज" को समर्पित कर दी. जिसकी कीमत उस जमाने में लगभग एक करोड़ थी, आज कितनी होगी इसका अंदाज आप खुद लगा सकते हैं.
नेताजी ने ‘आजाद हिन्द बैंक’ का गठन किया और यह पूंजी उस बैंक की प्रारम्भिक पूंजी घोषित कर दी गई. इसके अलाबा नेताजी ने "मारफानी" को 'सेवक ऐ हिन्द' का खिताब देकर अपनी इस बैंक का प्रमुख घोषित कर दिया. नेताजी ने कहा - 'हबीब सेठ ने आजाद हिन्द फौज की मदद की है, उनका यह योगदान हमेशा याद रखा जायेगा'.
आजाद हिन्द फ़ौज ने जापान के सहयोग से भारत का काफी हिस्सा अंग्रेजों से आजाद करा लिया. नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ने अंडमान में आजाद हिन्द फ़ौज का झंडा फहराकर भारत की आजादी की घोषणा कर दी और खुद को भारत का प्रथम प्रधानमंत्री घोषित कर दिया. मगर यह बात अंग्रेजों के साथ साथ देशी अंग्रेजों को भी नागबार गुजरी.
दुर्भाग्य से विश्वयुद्ध में जापान-जर्मन की हार हो गई और नेताजी की दुर्घटना में म्रत्यु अथवा गायब हो जाने के कारण आजाद हिन्द फ़ौज भी बिखर गई. कुछ समय बाद जब देश आजाद हुआ तो सत्ता पर कब्ज़ा उस कांग्रेस का हो गया जो विश्वयुद्ध में आजाद हिन्द फ़ौज के खिलाफ और अंग्रेजों के साथ थी.
बहुत सारे लोग आज भी यह मानते हैं कि- आजाद हिन्द बैंक के खजाने पर भी तत्कालीन सरकार ने कब्ज़ा कर लिया था और उसे देश की सम्पत्ति घोषित करने के बजाये, कुछ लालची नेताओं ने अपनी निजी समाप्ति बना लिया. साथ ही "मेमन अब्दुल हबीब युसूफ मारफानी" जैसे देशभक्त दानवीर का नाम इतिहास में दर्ज तक नहीं होने दिया.
मुसलमानो को लेकर संघ को कोसने वालों को बताना चाहता हूँ कि - मैंने उनका नाम सबसे पहले 1990 में बरेली , संघ के प्रचारक "विनोद जी" के बौद्धिक में सुना था. उसके बाद पाञ्चजन्य में उनपर एक लेख पढ़ा था. कई साल बाद जब इंटर नेट आया तो मैंने गुमनाम महापुरुषों के बारे में खीजना प्रारम्भ कियाम. उस खोज के बाद यह लेख लिखा है.
मैंने अपनी अभी तक की जानकारी के हिसाब से तो ठीक ठाक लिख दिया है लेकिन अभी मैं खुद संतुष्ट नहीं हूँ.  अभी मैं उनके बारे में और जानना चाहता हूँ.  यदि आपमें से किसी के पास "मेमन अब्दुल हबीब युसूफ मारफानी" जी के बारे में कोई विशेष जानकारी हो तो कमेन्ट बाक्स में देने की कृपा करें, जिससे लेख को और ज्यादा विस्तार दिया जा सके. 
"मेमन अब्दुल हबीब युसूफ मारफानी" जैसे गुमनाम महापुरुषों के बारे में जानकारी पहुंचाना हम सभी का कर्तव्य होना चाहिए.

अगर कोई हिन्दू / सिक्ख गौहत्या का समर्थन करे तो उसका DNA जरुर पता करें

महाराजा रणजीत सिंह के समय की बात है. लाहौर में एक गाय के सींग एक दीवार में बने छेद में फंस गये. बहुत कोशिश के बाद भी वह उसे निकाल नही पा रही थी. लोगों की भीड़ इकट्ठी हो गई, लोग गाय को निकालने के लिए तरह तरह के सुझाव देने लगे.
परन्तु सभी का ध्यान एक बात पर ही था कि - गाय को कोई कष्ट ना हो. तभी वहां दुलीचंद नाम का एक व्यक्ति आया और आते ही बोला - गाय के सींग काट दो. लोगों ने एक बार उसे नफरत से देखा फिर उसे नजरअंदाज कर अन्य उपाय करने लगे.
आखिर में लोगों ने सावधानीपूर्वक दीवार को तोड़कर गाय को सकुशल वहां से निकाल लिया गया. इस घटना की चर्चा किसी दरबारी ने महाराजा रणजीत सिंह के दरबार में भी छेड़ दी. गाय को सकुशल निकालने की बात महाराजा भी बहुत खुश हुए.
फिर वे अचानक बोले कि- उस व्यक्ति को दरबार में बुलाया जाए. जब वह दरबार में पहुंचा तो महाराज ने उससे कहा- अपने और अपने परिवार के बारे में बताओ. तब उस व्यक्ति ने अपना परिचय देते हुए बताया कि - मेरा नाम दुलीचन्द है.
मेरे पिता का नाम सोमचंद था, जो फ़ौज में एक सिपाही था और लड़ाई में मारा जा चुका है. महाराज को उसके जबाब से सन्तुष्टि नहीं हुई. उन्होंने उसकी अधेड़ माँ को बुलवाकर पूछा तो उसकी माँ ने भी यही सब दोहराया, किन्तु महाराजा अभी भी असंतुष्ट थे.
उन्होंने जब उस महिला से सख्ती से पूछताछ करवाई तो पता चला कि- उसका पति जब लड़ाई पर जाता था तब उसके अवैध संबंध, उसके एक पड़ोसी समसुद्दीन से हो गए थे और ये लड़का दुलीचंद, सोमचन्द के बजाय "समसुद्दीन" की औलाद है.
महाराजा का संदेह सही साबित हुआ. उन्होंने अपने दरबारियों से कहा कि- कोई भी शुध्द सनातनी हिन्दू रक्त अपनी संस्कृति, अपनी मातृभूमि, पवित्र गंगा, तुलसी और गौ-माता के अरिष्ट, अपमान और उसके पराभाव को सहन नही कर सकता.
जैसे ही मैंने सुना कि दुलीचंद ने गाय के सींग काटने की बात की थी, तभी मुझे यह अहसास हो गया था कि- हो ना हो इसके रक्त में अशुद्धता आ गई है. सोमचन्द की औलाद ऐसा नही सोच सकती. तभी तो वह समसुद्दीन की औलाद निकला.
हमें "महाराजा रणजीत सिंह" की बात को सदैव ध्यान रखना चाहिए. अगर कोई दुलीचंद भारतीय संस्क्रति पर आघात करता दिखाई दे तो समझ जाइए कि - वह "सन ऑफ सोमचन्द" की आड़ में "सन ऑफ समसुद्दीन" ही होगा.

नागालैण्ड और धारा 371A का सच




अभी हाल ही में कश्मीर से अलगाववादी धारा 370 और 35a हटाई गई है. सारा देश जानता है कि यह धाराएं देश की एकता और अखंडता के लिए घातक थीं. इसलिए अंधबिरोधी इन धाराओं को हटाने के खिलाफ तो बोल नहीं पाते है लेकिन इसको हटाने के खिलाफ तरह तरह के कुतर्क अवश्य गढ़ने की कोशिश कर रहे हैं.
उनका ऐसा ही एक कुतर्क है कि मोदी ने कश्मीर से धारा 370 तो हटा दी है लेकिन नागालैंड में धारा 371 लगा दी है. अब नागालैंड का अपना अलग झंडा होगा तथा नागालैंड जाने के लिए वीजा लेना पड़ेगा. जबकि हकीकत यह है कि- नागालैंड की चर्चा करने के बाद भी , उनके चाचा नेहरू ही कटघरे में खड़े दिखाई देंगे.
धारा 371a नागालैंड में 1963 में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने ही लगाई थी, यह धारा 370 की तरह अस्थाई नहीं बल्कि एक संविधान संशोधन था जिसे हटाने के लिए दोनों सदनों से दो तिहाई बहुमत के साथ विधेयक पास करना अनिवार्य है. जिस परमिट की बात कर रहे हैं वह आज से नहीं बल्कि अंग्रेजों के समय से चल रहा है.
नागालैंड के उग्रवादी संगठन, 1947 से ही नागालैंड में राज्य सरकार के अतिरिक्त अपनी समानांतर सरकार चलाते आ रहे हैं जिनका अपना झंडा है, अपने मंत्रालय हैं, और टैक्स भी लेते हैं. 70 साल से किसी सरकार ने उनको रोकने की कोशिश तक नहीं की. 2015 से मोदी सरकार ने उस समस्या को हल करन के लिए प्रयास करना शुरू किया है.
यह कहना कि- मोदी सरकार ने नागालैंड के लिए अलग झंडे की मान्यता दी है, तथ्यहीन और झूठा प्रोपेगेंडा है. आइये अब हम नागालैंड से सम्बंधित तथ्यों का क्रमवार अध्यन करते हैं. पूर्वोत्तर के छोटे छोटे पहाड़ी राज्य दरअसल छोटे छोटे कबीलों के समान है जो अपने कबीले के अलाबा किसी बाहरी व्यक्ति को बर्दाश्त नहीं करते और उनसे लड़ते हैं.
नागालैंड में 1826 में अंग्रेजों ने ब्रिटिश शासन लागू किया था और इसे असम में मिला दिया था. 1881 में अंग्रेजों ने कोहिमा में अपनी सैनिक छावनी बनाई. असम के नागालैंड, अरुणाचल, मिजोरम, आदि वाले क्षेत्र में कई ऐसी हिंसक जनजातियों के लोग रहते थे जो अपने इलाके में आने वाले किसी भी बाहरी इंसान की बिना किसी कारण हत्या कर देते थे.
तब अंग्रेजों अरुणाचल, नागालैंड और मिजोरम में प्रवेश करने वाले बाहरी व्यक्तियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए यह व्यवस्था बनाई कि- जब भी कोई उस इलाके में जाए तो जाने से पहले प्रवेश चौकी पर अपनी इंट्री कराये. इसके साथ उसे एक परमिट मिल जाती है कि वह व्यक्ति उस इलाके में आया है राज्य की पुलिस उसकी सुरक्षा करेगी.
तब से ही यह परमिट सिस्टम चला आ रहा है. वर्तमान में यह परमिट मिजोरम नागालैंड और अरुणाचल प्रदेश में पूर्ण रूप से लागू है एवं अन्य पांच राज्यों में भी आंशिक रूप से कुछ जनजाति बहुल क्षेत्रों में लागू है. इसलिए यह कहना कि ऐसा अभी हुआ है यह पूरी तरह से झूठ और बेबुनियाद है इसको सौ साल से ज्यादा हो चुके हैं.
1946 में नागा नेता "अंगामी जापू फिजो" ने "नागा नेशनल काउंसिल" (NNC) बनाई पहले उनकी मांग यह थी कि- नागा हिल्स भारत में रहे लेकिन उन्हें स्वायत्तता दे दी जाए जिससे वे अपने पारम्परिक तरीके से रह सकें, लेकिन 14 अगस्त 1947 को इसने पापिस्तान की तरह अपने आपको भारत से अलग होकर नया राष्ट्र घोषित कर दिया.
उग्रवादी संगठन NNC ने 1951 में अपनी तरफ से एक जनमत संग्रह करवाने का दावा किया, जिसमें उन्होंने बताया कि 99% नागा हिल्स के नागरिक आजाद नागालैंड की इच्छा रखते हैं. उनकी बात पर जब केंद्र सरकार ने इस पर कोई संज्ञान नहीं लिया तो "फिजो" ने 22 मार्च 1956 को "नागा फेडरल गवर्नमेंट" बनाने की घोषणा कर दी.
एक तरह से यह है उग्रवादियों की समानांतर सरकार थी, जिसका लक्ष्य था नागा हिल्स को बंदूक के दम पर भारत से अलग करके अलग देश बनाना। अप्रैल 1956 में सुरक्षा बलों ने नागालैंड में अपने ऑपरेशन शुरू किए, NNC पर दबाव बना और आतंकवादी नेता "फिजो" साल खत्म होने से पहले ही जान बचाकर पूर्वी पाकिस्तान भाग गया.
सेना लगातार कार्यवाही करती रही लेकिन दुर्गम क्षेत्र होने और स्थानीय लोगों द्वारा आतंकियों का साथ देने के कारण जब उग्रवादियों से निपटने में सफलता नहीं मिली तो केंद्र ने वहां "आर्म्ड फोर्सेस स्पेशल पावर एक्ट" (AFSPA) कानून लगा दिया. इस कानून के अनुरूप सशस्त्र बलों को दिए विशेषाधिकार कुछ इस तरह हैं,
* चेतावनी के बाद भी कोई कानून तोड़ता है, तो उसको गोली मारी जा सकती है.
* किसी आश्रय स्थल को नष्ट किया जा सकता है, जहां से हमले का संशय हो.
* किसी भी संदिग्ध व्यक्ति को बिना किसी वारंट गिरफ्तार किया जा सकता है,
* गिरफ्तारी के समय किसी भी तरह की शक्ति का प्रयोग किया जा सकता है
* बिना वारंट किसी के भी घर की तलाशी ली जा सकती है,
* इसके लिए जरूरी बल का भी प्रयोग किया जा सकता है.
* किसी भी वाहन को रोककर उसकी तलाशी ली जा सकती है.
उग्रवाद से निपटने के लिए इस कानून को असम, मणिपुर, त्रिपुरा, मेघालय, अरुणाचल प्रदेश, मिजोरम और नागालैंड सहित पूरे पूर्वी भारत में लागू किया गया. उग्रवाद के दौर में पंजाब में भी यह क़ानून लगाया गया था और 1990 के बाद कश्मीर में भी यह कानून लागू है. AFSPA लगने के बाद फिजो 1960 में भागकर लंदन में जा छिपा.
फिर जवाहरलाल नेहरू ने इसके बाद 1963 में नागा हिल्स और त्यूएनसांग को मिलाकर नागालैंड राज्य बना दिया, साथ ही नागालैंड में राज्य की मूल नागा जनजातियों के अधिकारों को सुनिश्चित करने के लिए धारा 371A लगा दी. जिसके अनुसार उन विषयों में नागालैंड में संसद और सरकार का कोई हस्तक्षेप नहीं होगा जिनमें-
* नागालैंड के लोगों की धार्मिक / सामाजिक गतिविधियां प्रभावित होती हों.
* नागा संप्रदाय के अपने पारम्परिक कानूनों से टकराव होता हो.
* नागा कानूनों के आधार पर नागरिक और अपराधिक मामलों में न्याय.
* जमीन का स्वामित्व और खरीद फरोख्त के नियम केवल राज्य तय करेगा.
* कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए राज्यपाल को विशिष्ट अधिकार होंगे.
* केंद्र सरकार की ओर से किसी विशेष काम के लिए दी गई धनराशि उसी काम के लिए प्रयोग की जा सकती है, किसी अन्य काम के लिए नहीं.
* त्यूसांग जिले के लिए 35 सदस्यों की एक क्षेत्रीय काउंसिल बनाई जाए और इस काउंसिल से जुड़े सभी फैसले और कानून बनाने की जिम्मेदारी राज्यपाल की होगी.
साल 1963 में जब नागालैंड राज्य बना था तो इसे विशिष्ट और सुरक्षित राज्य का दर्जा आर्टिकल 371A के द्वारा ही दिया गया था, 1964 के अप्रैल में जयप्रकाश नारायण, असम के तत्कालीन मुख्यमंत्री माईला प्रसाद चालिहा और एक ईसाई धर्मगुरु रेवरेंड माइकल स्टार्क का एक शांति मिशन नागालैंड भेजा गया.
इस शांति मिशन ने NNC और केंद्र सरकार के बीच समझौता करवाने में सफलता प्राप्त की, समझौते के अनुसार दोनों पक्ष अपनी-अपनी बंदूकें त्याग देंगे, लेकिन इस समझौते के बाद भी NNC की ओर से उग्रवादी घटनाएं होती रही, कई माह तक यह नाटक चला जब भी सरकार NNC से इसकी शिकायत करती, वो कहते लड़के हैं गलती हो जाती है.
इसी बीच इस बात के सबूत मिले कि - इन घटनाओं के पीछे चीन का हाथ है. जब हालत में कोई सुधार नहीं हुआ तो तत्कालीन लालबहादुर शास्त्री की सरकार के आदेश पर 1965 में सुरक्षा बलों ने इन उग्रवादी गुटों के खिलाफ जबरदस्त कार्यवाही शुरू की. सेना का फोकस रहा NNC, NFG और NFA पर. सेना को इसमें काफी सफलता मिली.
परन्तु 1966 में शास्त्रीजी की असामयिक मौत के बाद यह अभियान रोक दिया गया. नार्थईस्ट के हालात फिर खराब हो गये. 11 नवंबर 1975 में इंदिरा गांधी ने NNC और NFG से फिर एक समझौता किया, लेकिन जब शिलांग में यह समझौता हो रहा था, तब NNC का एक मेंबर "थुइनगालेंग मुइवा" चीन से समझौता कर रहा था,
"थुइनगालेंग मुइवा" ने इंदिरा गांधी और NNC / NFG के साथ हुए समझौते की शर्ते मानने से इंकार कर दिया. चीन के पालतू उग्रवादियों ने 1980 में "नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नागालैंड" (NSCN) नाम का नया संगठन बनाया. यह आतंकवादी संगठन समाजवाद से ज्यादा हिंसक तरीके विद्रोह करने में विश्वास रखता था.
इस उग्रवादी संगठन में दो और छोटे संगठन मिल गए जिन्होंने पहले इंदिरा गांधी के साथ समझौता किया था. इसके बाद इन उग्रवादी संगठनों ने बड़े पैमाने पर हिंसा शुरू कर दी. इस संगठन में 8 साल के बाद एक बंटवारा हुआ और "खापलांग" नाम के एक खतरनाक उग्रवादी ने अपना नया संगठन बना लिया.
इसी बीच 1991 में "फिजो" की लंदन में मौत हो गई. NSCN चीन के पैसे और हथियार के दम पर लोगों की हत्या करवाता रहा. 1997 में इन्द्र कुमार गुजराल सरकार ने NSCN के साथ पहला सीजफायर समझौता किया. लेकिन दूसरा गुट NSCN (IM) समझौते को धता बताते हुए अपनी समानांतर सरकार चलाता रहा.
NSCN (IM) नागालैंड में चल रही अकेली समानांतर सरकार नहीं है. वहां NNC और NSCN के जितने धड़े हैं और उन धड़ों के जितने धड़े हैं, सबकी अपनी-अपनी ‘सरकारें’ चल रही हैं. और सभी जबरन टैक्स वसूलती है. अनेक ‘सरकारों’ के होने से नागाओं की ज़िंदगी नरक बनी हुई है. उनके लिए तय करना मुश्किल है कि किसका नियम मानें,
1999 में अटल बिहारी बाजपेई ने नागा नेताओं से बातचीत शुरू की. नागाओं की आजतक किसी भारतीय प्रधानमंत्री से सबसे ज़्यादा पटी है, तो वो थे अटल बिहारी वाजपेयी, अटलजी वो पहले नेता थे, जिन्होंने नागाओं की पहचान और इतिहास का ज़िक्र किया. साथ ही ये माना कि इंसरजेंसी में फौज से कुछ गलतियां भी हुईं.
अपनी पहचान को लेकर भावुक नागाओं को ये बात बहुत पसंद आई. अटलजी ने 1998 में पैरिस में "इसाक चिसी स्वु" और "थुइनगालेंग मुइवा" से मुलाक़ात भी की. इसी बीच आरएसएस ने भी जमीनी स्तर पर नागाओ में अपनी पैठ बना ली, परन्तु 2004 में बाजपेई सरकार चली जाने से शान्ति प्रयास एक बार फिर थम गये.
परन्तु 2004 में बाजपेई सरकार जाने के बाद एक बार फिर केंद्र और नागाओं में संवादहीनता के हालात पैदा हो गए. 2014 में मोदी सरकार बनने के बाद केन्द्र ने एक बार फिर नार्थईष्ट पर ध्यान देना शुरू किया. 3 अगस्त 2015 को एक और समझौता हुआ जो नागा शांति समझौते का फ्रेमवर्क ऑफ एग्रीमेंट हैं.
नागा लोग भी मोदी को अटलजी का शिष्य मानते हुए, मोदी के प्रति विश्वास जता रहे हैं. नागालैंड के वर्तमान राज्यपाल "आर. एन. रवि ने भी नागाओं के बीच में रहकर काफी काम किया है. इनसे पहले वाले राज्यपाल "पद्मनाभ बालकृष्ण आचार्य" ने राज्यपाल बनने से पहले संघ के सवयंसेवक के रूप में नागालैंड में बहुत सेवा कार्य किया था.
सुरक्षाबलों के लगातार चले अभियान ने नागालैंड में रहकर उग्रवाद को पालना पोषण कहीं ज्यादा मुश्किल कर दिया है, सीमाएं सील हैं या तेजी से की जा रही हैं, तो विदेशी मदद मिलने के रास्ते कम हो रहे हैं NSCN(K) म्यांमार के जंगलों से अब भी उग्रवादी घटनाएं अंजाम दे रहा है. सरकार ने इसे बातचीत शामिल नहीं किया है.
एनएससीएन के अतिरिक्त नागालैंड में 6 और उग्रवादी संगठन हैं, केंद्र सरकार उनको भी इस समझौते का हिस्सा बनाना चाहती है, लेकिन सरकार यह चाहती है कि- सरकार एक पार्टी हो और सभी नागा गुट मिलकर एक पार्टी हों. ऐसा माना जा रहा है कि- लगभग सभी उग्रवादी संगठन समझौते पर एकमत हो चुके हैं.
धीरे-धीरे समझौते की शर्ते भी बाहर आ रही हैं, जो भी कुछ इस तरह हैं-
* सरकार उन सभी गुटों से बात कर रही है लेकिन समझौता वह एक से ही करेगी, इसका एक पक्ष केंद्र सरकार होगी और दूसरा पक्ष सभी उग्रवादी संगठन.
* भारत के संविधान में निहित संप्रभुता के भाव को सभी पक्ष मान्यता देंगे, अर्थात भारतीय संघ से अलग होने की मांग का दी एंड, सभी उग्रवादी संगठन मान लेंगे कि वह भारतीय हैं.
* उग्रवादी संगठनों के द्वारा हिंसा हमेशा हमेशा के लिए खत्म, जो हथियार छोड़ने वाले उग्रवादी हथियार चलाना चाहते हैं वह भारतीय सेना में सम्मिलित हो सकते हैं, जो इस के योग्य नहीं होंगे उन्हें पुनर्वास के लिए कुछ और बंदोबस्त किया जाएगा.
* सभी उग्रवादी संगठन हथियार डाल देंगे तो सुरक्षा बल भी अपनी छावनीयों में लौट आएंगे AFSPA हटा लिया जाएगा, सुरक्षा बल आवश्यक होने पर ही दखल देंगे.
* नागालैंड राज्य की सीमाओं में कोई बदलाव नहीं होगा.
* मणिपुर और अरुणाचल के नागा बहुल इलाकों में नागा टेरिटोरियल काउंसिल बनाए जाएंगे, यह राज्य सरकार के अधीन नहीं होंगे, असम के नागा बहुल इलाकों में यह नहीं बनाई जाएंगी.
* एक ऐसी संस्था भी बनाई जाएगी जो अलग अलग राज्य में बसे ना गांव के सांस्कृतिक प्लेटफार्म का काम करेगी इस संस्था में नागा जनजातियों के प्रतिनिधि बैठेंगे और यह राजनीति से दूर रहेगी.
* नागालैंड विधानसभा में मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और बिहार की तरह विधान परिषद जैसा दूसरा सदन बनाया जाएगा और विधानसभा सीटों की संख्या भी बढ़ाई जाएगी.
* अभी नागालैंड से सिर्फ एक एक सांसद लोकसभा और राज्यसभा भेजा जाता है, इसे बढ़ाया जाएगा, कहां और कितना यह अभी साफ नहीं है.
* सरकार सात गुटों से बात कर रही है. लेकिन NSCN (K). इस गुट ने 2001 में भारत सरकार के साथ शांति समझौता किया था, लेकिन बाद में तोड़ दिया था.

गांधी जी का चरखा और राजीव गांधी का कम्प्यूटर

जो लोग राजीव गांधी को भारत में कम्प्यूटर और आईटी को लाने वाला बता रहे हैं उनको बता देना चाहता हूँ कि- भारत में कम्प्यूटर और आईटी की शुरुआत तब हो चुकी थी जब राजीव गांधी प्रधान मंत्री बनना तो दूर राजनीति में भी नहीं आये थे.
राजीव गांधी के प्रधानमंत्री बन्ने के बाद भी कोई सरकारी कम्पनी कम्प्यूटर अथवा आईटी के क्षेत्र में आगे नहीं आई. राजीव के प्रधान मंत्री बन्ने के बाद और राजीव गांधी की म्रत्यु के बाद भी इस क्षेत्र में जो कम्पनियां आइ वो अपने निजी प्रयास से आई.
* टाटा समूह ने टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज की स्थापना 1968 में की थी
* शिव नाडर ने HCL की स्थापना 1976 में की थी
* प्रेम अजीम जी की विप्रो 1977 में कम्प्यूटर कारोबार में आ गई थी.
* 1981 में विप्रो ने कम्प्यूटर का उत्पादन शुरू कर दिया था.
* इनफ़ोसिस की स्थापना एन आर नारायण मूर्ति द्वारा 1981 में हुई थी
* टेक महिंद्रा 1986 में स्टार्ट हुई थी लेकिन राजीव गांधी के सहयोग से नहीं बल्कि ब्रिटिश टेलीकाम के ज्वाइंट बेंचर के साथ
* लार्सन एंड टुब्रो इन्फोटेक की स्थापना 1997 में हुई थी.
* माइंडट्री का गठन 1999 में हुआ था .
* एमफेसिस की स्थापना 2000 में हुई थी
भारत में कम्प्यूटर और आईटी को राजीव गांधी द्वारा शुरू करना उतना ही बड़ा झूठ है जितना जितना गांधी जी के चरखे से डर कर अंग्रेजों का भाग जाना.

Wednesday, 14 August 2019

राजमाता कर्णवती की राखी और हुमायूं द्वारा चित्तौड़ की मदद का झूठ

हमारे इतिहास में मुघलों को महान दिखाने वाली, कैसी कैसी झूठी कहानिया भर दी गई हैं कि- बचपन से स्कूल में पढ़ते आने के कारण हम सहज ही उन बातों पर विशवास कर लेते हैं. ऐसी ही एक झूठी कहानी है कि - बहादुर शाह के मेवाड़ पर हमले के समय, राजमाता कर्णावती ने हुमायूं को राखी भेजी और हुमायूं ने मेवाड़ की मदद की.
जबकि वास्तविकता यह है कि - महाराणा संग्राम सिंह (राणा सांगा) के शासन काल के समय सभी मुस्लिम हमलावर और शासक ( बाबर, इब्राहिम लोदी, बहादुर शाह, आदि) मेवाड़ के राजपूत राजाओं से दुश्मनी रखते थे और अपनी जीत तथा इस्लाम के प्रचार प्रसार में उनको ही अपनी सबसे बड़ी बाधा मानते थे.
राणा सांगा ने मेवाड़ पर 1509 से 1527 तक शासन किया. इन 18 बर्षो के शासन में उन्होंने दिल्ली, गुजरात, मालवा एवं मुगल आक्रमणकारियों के आक्रमणो से अपने राज्य की ऱक्षा की. उन्होंने कुल 18 बड़े युद्ध लड़े थे. अप्रेल 1527 में बाबर के साथ हुई खानवा की लड़ाई में, कुछ गद्दारों के कारण राणा सांगा की हार हुई थी.
राणा सांगा ने दोबारा युद्ध की घोषणा की, लेकिन कुछ गद्दारों ने उनके भोजन में विष मिलाकर उनकी हत्या कर दी. युद्ध में जीत के बाद बाबर ने हिन्दुओं का भयानक कत्लेआम किया. उसने हिन्दुओं के कटे हुए सिरों का एक पिरामिड बनवाया. खानवा की जीत के बाद बाबर ने खुद को "गाज़ी" का खिताब दे दिया.
राणा सांगा की म्रत्यु के बाद राजमाता कर्णावती ने अपने दोनों बच्चो ( विक्रमादित्य और उदय सिंह ) में से बड़े बेटे विक्रमादित्य को राजा घोषित किया और खुद मेवाड़ का शासन सम्हाल लिया. परन्तु अब मेबाड़ को अनाथ समझकर मालवा का राजा बहादुर शाह और बाबर दोनों ही मेबाड़ पर कब्जा करने की कोशिश में लग गए थे.
इसी बीच 27 दिसंबर 1530 को बाबर की आगरा में मौत हो गई और उसकी जगह उसके बेटे हुमायूँ ने सत्ता सम्हाल ली. अब हुमायूं भी अपनी ताकत बढाने लगा. पहले उसने 1531 में कालिंजर के शासक "रूद्र प्रताप" से संधि की और उनके सहयोग से 1532 में लखनऊ के पास (सईं नदी के पास) महमूद लोदी को पराजित किया.
चुनार का युद्ध जीतने के बाद "हुमायूं" ने दिल्ली को अपनी राजधानी बना लिया. अब उसकी नजर मेवाड़ पर थी. मालबा का राजा बहादुर शाह भी मेवाड़ पर कब्ज़ा करना चाहता था. चित्तौड़गढ़ में किशोर राणा विक्रमादित्य के नाम पर राजमाता कर्णावती शासन कर रहीं हैं. बहादुर शाह ने चित्तौड़ के चारो ओर घेरा डाल दिया.
राणा सांगा की मौत के बाद मेबाड़ की सैन्य शक्ति काफी कमजोर हो चुकी थी. लेकिन राजमाता ने झुकने के बजाय दुश्मनों से संघर्ष करने का रास्ता चुना. राजमाता के ऊपर मेवाड़ के अलावा विक्रमादित्य और उदयसिंह की भी जिम्मेदारी थी. बहादुर शाह को चित्तौड़ में उलझा देखकर हुमायु भी मालबा पर हमला करने के लिए निकल पड़ा.
हुमायूं अभी सारंगपुर में ही था तभी उसे बहादुर शाह का सन्देश मिला, जिसमें उसने लिखा था - " चित्तौड़ के विरुद्ध मेरा यह अभियान विशुद्ध जेहाद है. जब तक मैं काफिरों के विरुद्ध जेहाद पर हूँ, तब तक आपके द्वारा मुझपर हमला करना गैर-इस्लामिल है. अतः हुमायूँ को चाहिए कि- वह अपना मालवा अभियान रोक दे".
राजमाता कर्णावती ने कुछ राजपूत नरेशों से सहायता मांगी. कुछ पड़ोसी राजा ( बूंदी नरेश) उनकी मदद को आये भी मगर ज्यादातर राजाओं ने साथ देने से इनकार कर दिया. कुछ राजपूत योद्धाओं ने रात के अँधेरे में बालक युवराज उदयसिंह को चितातौड़ से निकालकर गुप्त रास्ते से पन्ना धाय के साथ बूंदी पहुंचा दिया.
कहा जाता है कि- जब राजमाता कर्णावती को हुमायूं द्वारा मालवा पर हमला करने जाने की खबर मिली तो उन्होंने "हुमायु" को सन्देश भेजा था, जिसमे उन्होंने सामूहिक दुश्मन बहादुर शाह के खिलाफ हुमायूं के अभियान में अपना सहयोग देने की बात कही थी. इसी सन्देश को राजमाता द्वारा हुमायूं को राखी भेजकर मदद माँगना प्रचारित किया गया.
अगर इसे राजमाता द्वारा राखी भेजकर हुमायूं से मदद मांगना मान भी ले, तो भी हुमायूं ने राजमाता की कोई मदद नहीं की थी. हुमायूं ने उस युद्ध में शामिल होने के बजाय सारंगपुर में बैठकर राजपूतों और बहादुर शाह के युद्ध के परिणाम को देखना ज्यादा उचित समझा. अब राजपूतों के पास एक ही विकल्प बचा था - शाका और जौहर.
8 मार्च 1535 को राजपूत योद्धा केसरिया पगड़ी बांधे शाका के लिए किले से बाहर निकल पड़े. बहादुर शाह की सेना के सामने, राजपूतो योद्धाओं की संख्या बहुत कम थी, लेकिन दो घंटे तक चले इस युद्ध में राजपूत योद्धाओं ने अपने से चार गुना ज्यादा दुश्मनों को मारा. इधर किले के भीतर राजपूतानियों ने राजमाता के नेत्रत्व में जौहर कर लिया.
किले के बाहर राजपूत योद्धाओं का रक्त बिखरा हुआ था और किले के भीतर स्वाभिमानी हिन्दू महिलाओं के जीवित जलने की महक आ रही थी. युद्ध में जीत के बाद बहादुरशाह ने अगले तीन दिन तक चित्तौड़ दुर्ग और उसके आसपास भयानक लूटपाट की. सारे चित्तौड़ को बुरी तरह से तहस नहस कर दिया गया.
असैनिक कार्य करने वाले लुहार, कुम्हार, पशुपालक, व्यवसायी, इत्यादि पकड़ पकड़ कर काट डाला. उनकी स्त्रियों की इज्जत को लूटी गई. उनके बच्चों को भाले की नोक पर टांग कर खेल खेला गया. जिस हुमायूं को राखी का बचन निभाने वाला बताया जाता है, वह हुमायूं सारंगपुर में बैठा हुआ इस जेहाद को मजे से देख रहा था.
इस लड़ाई के बाद चित्तौड़ पर बहादुर शाह का कब्ज़ा हो गया. यहाँ एक बात बताना और जरुरी है. सती प्रथा के लिए अक्सर हिन्दुओं पर इल्जाम लगाया जाता है कि - पति के मरने पर पत्नी को जिन्दा जला दिया जाता था. यह भी उतना ही झूठ है जितना हुमायूं द्रारा राजमाता कर्णावती कोबहन मानकर मदद करना.
महराणा सांगा की म्रत्यु अप्रेल 1527 में हुई थी. अगर विधवा होने पर सती होने की परम्परा होती, तो वे उस समय सती हो गई होतीं. लेकिन उन्होंने 1527 से 1535 तक मेवाड़ पर राज किया. बहादुर शाह के हमले में पराजित होने के बाद उसके हाथों से अपनी इज्ज़त लुटने से बचाने के लिए 1535 में आत्मदाह (जौहर) किया था.
चित्तौड़ को जीतने के बाद बहादुर शाह वापस मालवा चला गया. हुमायूं और बहादुरशाह के बीच लड़ाई, इसके कई माह बाद सितम्बर 1535 में हुई थी, वह भी चित्तौड़ में नहीं बल्कि मंदसौर में. मंदसौर की इस लड़ाई में हुमायूं ने बहादुर शाह को पराजित किया था. इसी लड़ाई को राजमाता कर्णावती की खातिर लड़ी गई लड़ाई कहकर प्रचारित किया गया.
इसलिए याद रहे भारत की मिट्टी देशभक्तों के खून से आज भी सनी हुई है, देश की हवाओं में वीरान्गनाओं के जीवित जलने की महक आज भी विधमान है. इसलिए अत्याचारियों के चापलूसों द्वारा फैलाई गई झूठी कहानियों के षड्यंत्र में फंसकर उन अत्याचारियों को महान समझने की भूल कदापि मत कर बैठना. वे हमलावर नीच ही थे.

Monday, 22 July 2019

जनरल शाहनवाज खान

जनरल शाहनवाज खान का जन्म वर्तमान पापिस्तान में माटोर गाँव में 24 जनवरी 1914 को हुआ था. उनके पिता का नाम सरदार टिक्का खान था. रावलपिंडी में पढ़ाई करने के बाद वे ब्रिटिश सेना में भर्ती हो गए और ब्रिटिश सेना में कैप्टेन के पद पर पहुंचे.
द्वितीय विश्वयुद्ध के समय नेताजी सुभाष चन्द्र बोष ने हिटलर के साथ मिलकर अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध की घोषणा कर दी. उन्होंने देशवाशियों (विशेषकर भारतीय मूल के ब्रिटिश सैनिको) से आजाद हिन्द फ़ौज में शामिल होने का आव्हान किया.
तब कैप्टन शाहनवाज खान भी आजाद हिन्द फ़ौज में शामिल हो गए. सुभाष चन्द बोष उनको आजाद हिन्द फ़ौज का एक जनरल घोषित कर दिया. आजाद हिन्द फ़ौज ने मियान्मार, पूर्वोत्तर भारत और एंड अंडमान में अंग्रेजों को कड़ी टक्कर दी.
लेकिन हमें यह नहीं पता है कि - जनरल शाहनवाज ने किस मोर्चे पर का लड़ाई का नेतृत्व किया था. विश्वयुद्ध में हिटलर की हार और सुभाष चन्द्र बोष के गायब हो जाने के बाद, जनरल शाहनवाज के नेत्रत्व में आजाद हिन्द फ़ौज ने भी सरेंडर कर दिया था.
कहा जाता है कि - ले. कर्नल गुरुबख्श सिंह ढिल्लन और आजाद हिन्द फ़ौज के ज्यादातर सैनिक सरेंडर करने के खिलाफ थे और अंतिम सांस तक अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई जारी रखना चाहते थे लेकिन कर्नल प्रेम सहगल और जनरल शाहनवाज सरेंडर के पक्ष में थे.
15 नवम्बर 1945 से लेकर 31 दिसम्बर 1945 तक उनपर लालकिले में बनी अस्थाई अदालत में मुकदमा चलाया गया. जहां सुभाष चन्द्र बोष को तो विश्युद्ध का अपराधी घोषित किया, परन्तु कमाण्डर-इन-चीफ सर क्लॉड अक्लनिक द्वार इनको माफी दे दी गई.
बंटबारे के बाद शाहनवाज और उनका परिवार पापिस्तान जाना चाहता था लेकिन नेहरु द्वारा समझाने पर वे भारत में ही रुक गए जबकि उनका लगभग पूरा खानदान पापिस्तान चला गया. शाहनवाज भी आजाद हिन्द फ़ौज से नाता तोड़कर कांग्रेसी बन गए.
आजादी के समय सारा देश सुभाष चन्द्र बोश की जय जयकार कर रहा था. नेहरु के मन में जो बोष के प्रति जो दुर्भावना थी उसे भी लोग जानते ही थे. ऐसे में अपनी छवि को सुधारने की खातिर बोस के पुराने साथी शाहनवाज खान को अपने साथ मिला लिया.
लालकिले पर तिरंगा फहराने का मौका देकर, नेहरु ने सुभाष चन्द्र बोस के समर्थकों को खामोश कर दिया. आजादी के बाद जनरल शाहनवाज खान कांग्रेस में शामिल हो गए और अपने साथियों को भूल गए. वे कांग्रेस के टिकट पर मेरठ से चार बार सांसद रहे.
देश की जनता द्वारा सुभाष चन्द्र बोस का पता लगाने की जोरदार मांग के कारण नेहरु 1956 में एक समिति बनाने पर मजबूर हो गए, जिसका काम था "बोष" के लापता होने के रहस्य का पता लगाना था. शाहनवाज खान को उस समिति का अध्यक्ष बनाया.
लेकिन कभी सुभाष चन्द्र बोस के साथी रहे शाहनवाज खान ने इसके लिए कुछ भी ठोस काम नहीं किया, बल्कि केवल जनता को बहलाने के लिए टाइम पास किया. उन्होंने नेहरु द्वारा "बोष" को पकड़कर अंग्रेजों को सौंपने का बचन देने का भी बिरोध नहीं किया.
शाहनवाज खान का सम्मान केवल सुभाष चन्द्र बोस के साथी होने के कारण किया जाता है लेकिन उन्होंने सुभाष चन्द्र बोस के बारे में तथ्य जुटाने या आजाद हिन्द फ़ौज के सेनानियों के लिए ऐसा कुछ नहीं किया जिसकी चर्चा की जा सके.
पापिस्तान में रहने वाला शाहनवाज खान का परिवार भी पपिस्तानी सेना में उच्च पदों पर पहुंचा. 1965 के युद्ध के समय शाहनवाज खान भारत सरकार में कृषि मंत्री थे और उनका बेटा "महेमूद नवाज अली" पापिस्तानी सेना में उच्च अधिकारी था.
उनका बेटा "महेमूद नवाज अली" पापिस्तानी सेना से रिटायर होने के बाद अपने पिता से मिलने भारत आया था. आज भी पापिस्तानी सेना में उनके परिवार के सदस्य उच्च पदों पर हैं. कुछ समय पहले ISI के चीफ रहे "जहीर उल इस्लाम" उनके सगे भतीजे थे.
आजकल कुछ लोग उनको "शाहरुख खान" का नाना भी बता रहे हैं जबकि हकीकत यह है कि - भारत में न उनकी कोई पत्नी थी और न ही कोई बेटी. दरअसल शाहनवाज खान ने एक ऐसी सामाजिक संस्था के सदस्य थे जो गरीब मुस्लिम लड़कियों की शादी करवाती थी.
उस संस्था द्वारा कराये गए ऐसे ही एक सामूहिक विवाह में शाहरुख के माता -पिता शादी हुई थी. शाहरुख खान का शाहनवाज से इससे ज्यादा कोई रिश्ता नहीं था. 9 दिसंबर 1983 को नई दिल्ली में जनरल शाहनवाज खान का देहांत हो गया था .